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सिवान में हेना शहाब का बदलता 'रंग' और जेडीयू-आरजेडी की रोचक जंग
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, सिवान से
बिहार की सिवान लोकसभा सीट से पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन की पत्नी हेना शहाब का 'भगवा चुनाव प्रचार’ काफ़ी चर्चा में है.
हेना साहब की निर्दलीय उम्मीदवारी ने इस सीट के चुनावी समीकरण को रोचक बना दिया है.
बिहार के बाहुबली नेताओं में शुमार मोहम्मद शहाबुद्दीन राष्ट्रीय जनता दल के नेता थे.
वे सिवान से कई बार लोकसभा का चुनाव जीते थे.
हेना शहाब भी आरजेडी के टिकट पर चुनाव लड़ चुकी हैं.
लेकिन इस लोकसभा चुनाव में उन्होंने आरजेडी से चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया.
हेना का आरोप है कि उनके पति आरजेडी के संस्थापक सदस्य थे, लेकिन उनके निधन के बाद पार्टी ने कोई श्रद्धांजलि तक नहीं दी.
मोहम्मद शहाबुद्दीन का साल 2021 में कोविड के दौरान निधन हो गया था, वो उस वक़्त दिल्ली के तिहाड़ जेल में कई आपराधिक मामलों में सज़ा काट रहे थे.
सिवान लोकसभा सीट से जेडीयू ने अपने मौजूदा सांसद कविता सिंह का टिकट काटकर यहाँ से विजयलक्ष्मी देवी को चुनाव मैदान में उतारा है.
विजय लक्ष्मी देवी रमेश सिंह कुशवाहा की पत्नी हैं. रमेश सिंह कुशवाहा जेडीयू के पूर्व विधायक हैं और सीपीआई (एमएल) को छोड़कर जेडीयू में शामिल हुए थे.
सिवान लोकसभी सीट से आरजेडी ने बिहार विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष अवध बिहारी चौधरी को चुनाव मैदान में उतारा है. अवध बिहारी चौधरी सिवान विधानभा सीट से विधायक भी हैं.
हेना शहाब का भगवा रंग
सिवान में आरजेडी जहाँ अपने मुस्लिम-यादव समीकरण पर भरोसा करते हुए दिखती है, जबकि हेना शहाब ने अपने चुनाव प्रचार में भगवा रंग को शामिल कर आरजेडी और जेडीयू के वोटों में सेंध लगाने की तैयारी में दिखती हैं.
हेना साहब का दावा है कि सिवान की जनता ने मोहम्मद शहाबुद्दीन के दौर में विकास देखा था और उसके बाद इलाके में विकास का कोई काम नहीं हुआ है.
उनका कहना है, “गाँव के जो वोटर और जो महिलाएँ पढ़ी लिखी नहीं हैं, मैं उन्हें समझाती हूँ कि मैं निर्दलीय चुनाव लड़ रही हूँ. इसलिए ईवीएम की एक डमी भी अपने साथ रखती हूँ. मैं किसी दल से नहीं हूँ, मैं दिल से हूँ. हम भगवा, हरा, पीला, गुलाबी सबके साथ हैं. हर रंग हमारा अपना है.”
हेना शहाब अपने समर्थकों के साथ सिवान के गाँव-गाँव में प्रचार कर रही हैं और उनके साथ भगवा कपड़े या भगवा पगड़ी लगाए समर्थक भी बड़ी संख्या में दिखते हैं.
हेना के समर्थन में उनकी सभा में आई लीलावती देवी कहती हैं, "हेना निर्दलीय खड़ी हैं, हम उन्हें दिल से वोट देंगे, हमारा विश्वास है कि वह जीतेंगीं जरूर जीतेंगी."
दूसरी ओर सिवान सीट से विजय लक्ष्मी देवी की जीत के लिए उनके पति भी चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं.
शुक्रवार को जब हम सिवान पहुँचे तो हमें बताया गया कि चुनाव प्रचार के थकान की वजह से विजय लक्ष्मी कुशवाहा बीमार हैं.
रमेश कुशवाहा हेना शहाब को लेकर तंज करते हैं, “अब स्थिति ऐसी हो गई है कि सबको भगवा अपनाना होगा. अगर हेना शहाब को भगवा से इतना प्रेम है, तो जेडीयू में शामिल हो जाएँ या 21 मई को प्रधानमंत्री यहाँ सभा करने आ रहे हैं, उसी समय बीजेपी में शामिल हो जाएँ.”
रमेश कुशवाहा दावा करते हैं कि सिवान की जनता उस पुराने दौर में लौटना नहीं चाहती है, जहाँ डर था. शहाबुद्दीन बाहुबली थे उनका मॉडल खौफनाक था लोग उनके डर से मुँह नहीं खोल पाते थे.
आरजेडी के लिए मौक़ा कितना बड़ा
सिवान में हेना शहाब और विजयलक्ष्मी देवी की मौजूदगी में आरजेडी के अवध बिहारी चौधरी अपने लिए बड़ा मौक़ा देख रहे हैं.
अवध बिहार चौधरी यहाँ युवाओं को नौकरी, महिलाओं को आर्थिक मदद और महंगाई से छुटकारा दिलाने जैसे मुद्दों को उठाते नज़र आते हैं.
सिवान सीट पर उनके विरोध में खड़ी दोनों ही महिला उम्मीदवारों के साथ उनके पति का नाम जुड़ा है, जिनकी छवि पर सवाल उठते रहे हैं.
इसलिए अवध बिहार चौधरी उम्मीदवार की छवि को भी मुद्दा बनाते हुए दिखते हैं.
अवध बिहारी चौधरी का आरोप है कि बीते 15 साल के कथित विकास को देखने के बाद सिवान की जनता अब एक अच्छे चरित्र और अच्छी छवि के उम्मीदवार को चुनेगी.
उनका दावा है, “अब निर्दलीय उम्मीदवार को कोई वोट नहीं देता है, क्योंकि उनका कोई मेनिफ़ेस्टो नहीं होता है. वह जीत कर किस तरफ़ चला जाएगा, लोगों को यह भी पता नहीं होता है. सिवान में मुक़ाबला ‘इंडिया’ और ‘एनडीए’ के बीच है. यहाँ ‘इंडिया’ बहुत ऊपर है.”
बिहार में उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे सिवान की चर्चा कभी देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की जन्मभूमि के तौर पर होती है.
कभी सिवान का ज़िक्र भारत के चर्चित ठग नटवरलाल से जुड़े क़िस्सों में होता है.
दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष चंद्रशेखर का बिंदुसार गाँव भी इसी सिवान ज़िले में है.
साल 1997 में 31 मार्च को सिवान के जेपी चौक पर एक धरने के कार्यक्रम के दौरान चंद्रशेखर और भाकपा (माले) के एक दूसरे नेता की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी.
इस मामले में राजद नेता और पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन सहित पाँच लोग अभियुक्त बनाए गए थे.
चुनावी समीकरण
मोहम्मद शहाबुद्दीन ने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत साल 1990 में निर्दलीय विधायक के तौर पर की थी.
बाद में 1992 से 2004 तक वो चार बार इलाक़े के सांसद चुने गए थे. उनको सिवान के बहुचर्चित तिहरे हत्याकांड समेत लगभग दर्जनभर मामलों में सज़ा हुई थी.
सिवान के हालिया चुनावी इतिहास को देखें, तो साल 2019 में इस सीट से जदयू ने बाहुबली नेता अजय सिंह की पत्नी कविता सिंह को उम्मीदवार बनाया था. उन्होंने आरजेडी की हेना शहाब को पराजित किया था.
इससे पहले साल 2014 के चुनावों में बीजेपी के ओम प्रकाश यादव ने आरजेडी की हेना शहाब को पराजित किया था.
जबकि साल 2009 के लोकसभा चुनावों में ओम प्रकाश यादव ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर आरजेडी की हेना शहाब को मात दी थी.
सिवान लोकसभा सीट में कुछ छह विधासभा सीटें हैं. साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में सिवान, रघुनाथपुर और बड़हरिया सीट पर आरजेडी की जीत हुई थी.
जबकि ज़ीरादेई और दरौली सीट पर सीपीआई (एमएल) ने कब्ज़ा किया था.
सिवान की केवल एक विधानसभा सीट ‘दरौंधा’ पर बीजेपी ने जीत दर्ज की थी.
साल 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान सिवान में क़रीब 18 लाख़ वोटर थे.
यहाँ यादव, मुस्लिम और राजपूत वोटरों का बड़ा असर माना जाता है.
इस सीट पर कुशवाहा, सहनी और ईबीसी वोटर भी चुनावी समीकरण के लिहाज़ से काफ़ी अहम हैं.
क्या कहते हैं लोग
सिवान के ग्रामीण इलाक़ों से बड़ी संख्या में रोज़गार की तलाश में युवाओं का पलायन हो रहा है. यहाँ कई घरों में एक-दो लोग नज़र आते हैं. कई घरों में ताले लगे हुए दिखते हैं.
भारत के बड़े शहरों के अलावा यहाँ के युवा काम की तलाश में विदेशों में भी रह रहे हैं.
सऊदी अरब में नौकरी करने वाले फ़ैज़ान अली फ़िलहाल सिवान में हेना शहाब के चुनाव प्रचार के लिए आए हैं. उनके सिर पर भगवा पगड़ी लगी है.
उनका कहना है, "हेना शहाब ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि सब रंग हमारा है. सारे लोग हमारे हैं. सिवान ने शहाबुद्दी साहब के दौर में विकास देखा है. उसके बाद यहाँ विकास का कोई काम नहीं हुआ है."
माना जाता है कि सियासत में रंगों का यह मेल सिवान में अगड़ी जातियों को संदेश देने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.
अगर हेना शहाब इसमें कामयाब होती हैं तो सिवान के चुनावी समीकरण में बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है.
इस सियासत में जहाँ जेडीयू अगड़ी जाति के वोटरों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश में दिखती है, वहीं आरजेडी के लिए मुस्लिम वोटरों को अपने पक्ष में लाने की चुनौती है.
आरजेडी के समर्थक मोहम्मद कैफ़ आरोप लगाते हैं, “मोदी सरकार के सारे क़ानून मुसलमानों के ख़िलाफ़ होते हैं. सीएए, एनआरसी, समान आचार संहिता, टोपी, मदरसा, कफ़न और ज्ञानवापी, सारे मुद्दे मुसलमानों से ही जुड़े हुए हैं. ऐसे में कोई (हेना शहाब) रंग बदलता है, तो इसका मतलब है कि वह लोगों को धोखा दे रहा है.”
सिवान रंगों की सियासत के अलावा रोज़गार, महंगाई, उम्मीदवार की छवि, विकास, संविधान और आरक्षण से लेकर मुफ़्त के राशन तक की चर्चा चुनावी शोर में सुनने को मिल रही है.
सिवान सदर के सरावे गाँव के इंद्रजीत राम कहते हैं, “हमें आरक्षण भी संविधान से मिला है. संविधान ऐसी चीज़ नहीं है कि आज लिख दिया, कल बदल दिया. हमारे लिए मुद्दा शिक्षा है. हमारे यहाँ स्नातक की 3 साल की पढ़ाई 5-6 साल में पूरी होती है. इसलिए बच्चों को उत्तर प्रदेश के कॉलेज से पढ़ाई करनी पड़ती है. इसमें सुधार बहुत ज़रूरी है.”
इसी गाँव के भीखू राम का कहना है कि अभी चुनावों में मुद्दा क्या होगा यह तय नहीं हुआ है. इसमें अभी थोड़ा समय लगेगा, उसके बाद ही पता चलेगा कि लोग वोट किसे देंगे.
सिवान लोकसभा सीट की बात करें तो यहाँ मौजूदा चुनावों के छठे चरण में 25 मई को वोट डाले जाएँगे.
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