शहाबुद्दीन: क्या वक़्त की राजनीति के एक प्यादे भर थे 'सिवान के सुल्तान'

    • Author, चिंकी सिन्हा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दिल्ली के तिहाड़ जेल में कई आपराधिक मामलों की सज़ा काट रहे बाहुबली नेता और सीवान के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन की कोरोना से दिल्ली के एक अस्पताल में मौत हो गई.

उनकी क़ब्र में लगे पत्थर पर सिर्फ उनका नाम, पैदा होने की तारीख, मरने के दिन और इस बात का जिक्र है कि वे कहां के थे. यह कब्र भी अब दिल्ली की तमाम गुमनाम कब्रों की तरह एक कोने में खड़ी है. आरजेडी के नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन की देह अब दिल्ली की इस कब्रगाह का हिस्सा बन चुकी है.

शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब अपने मरहूम पिता का शव सिवान ले जाना चाहते थे. लेकिन कोविड प्रोटोकोल की वजह से यह सुविधा नहीं मिल सकी. उनके वालिद को "सिवान का सुल्तान " कहा जाता था. दिल्ली में उनका इंतकाल हो गया. यहीं तिहाड़ जेल में वह बंद थे.

'सांस इज लेस एंड वर्क इज मोर'

कहीं दूर लालू प्रसाद यादव शहाबुद्दीन के जाने का शोक मना रहे हैं. आखिर वह उनके भरोसमंद सहयोगी थे. लालू कहते हैं कि यह उनका निजी नुकसान है. 2016 में खतरनाक डॉन और आरजेडी के सांसद शहाबुद्दीन सिवान गए थे. उस दौरान एक टेलीविजन इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "सांस इज लेस एंड वर्क इज मोर"यानी उम्र छोटी है और काम बहुत ज्यादा है. उन्होंने कहा था कि वह जिंदगी की आखिरी सांस तक अपने लोगों के लिए काम करते रहेंगे.

कोविड-19 के शिकार शहाबुद्दीन की एक मई को दिल्ली में मौत हो गई. इसके चार दिन बाद भी उनके गाँव में कइयों के घर खाना नहीं बना. उनके लिए यह एक युग के खत्म होने जैसा है.

एक तरफ गुस्सा और मायूसी है. दूसरी ओर राहत और जीत का आलम है. यह इस पर निर्भर है कि आप किससे बात कर रहे हैं. लेकिन हर आदमी यही कहेगा कि शहाबुद्दीन ऐसे शख्स थे, जिन्हें कोई भूल नहीं पाएगा. प्रशासन के लिए वह भारी आफत थे. पुलिस के लिए कोई बुरा सपना और अपने साये में फलने-फूलने वालों के लिए मसीहा.

शहाबुद्दीन के पैतृक गांव प्रतापपुर में एक अजीब सी खामोशी है. एक स्थानीय पत्रकार ने कहा कि लोग उनके बेटे के लौटने का इंतजार कर रहे हैं. शायद अब उनकी विरासत की बागडोर उन्हें थमाई जाएगी. लेकिन सब जानते हैं कि इसे संभालना काफी मुश्किल काम होगा.

शहाबुद्दीन के परिवार का आरोप है कि तिहाड जेल के डायरेक्टर जनरल ने उनकी 'हत्या' कर दी. शहाबुद्दीन 2004 के एक डबल मर्डर केस में तिहाड़ जेल में उम्र कैद की सजा काट रहे थे. उनकी उम्र 53 साल थी.

कोविड पॉजिटिव पाए जाने के बाद उन्हें दिल्ली के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया था. दो दिन बाद जब उनकी हालत बिगड़ गई तो उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया.

कोरोना संक्रमित होने के बाद शहाबुद्दीन के परिवार ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दायर कर उनके बेहतर इलाज का निर्देश देने को कहा था. इस अपील पर सुनवाई करते हुई हाई कोर्ट ने जेल अधिकारियों को जरूरी निर्देश दिए थे. लेकिन उनके समर्थकों का आरोप है कि "साहेब" के लिए आरजेडी ने पर्याप्त कदम नहीं उठाया जबकि वह जिंदगी भर लालू के वफादार बने रहे.

फिलहाल, मरने के बाद भी विवादास्पद बने हुए शहाबुद्दीन के साथी अब भी मातम मना रहे हैं. लेकिन लोग उनकी यादों को लेकर बंटे हुए हैं.

बाहुबली सांसद की पसंद

शहाबुद्दीन बाहुबली भी थे और खूंखार डॉन भी. वह अपराध की दुनिया से राजनीति में आए थे. लेकिन वह और भी बहुत कुछ थे. सिवान में पले-बढ़े महताब आलम अब आरजेडी में शामिल हो गए हैं. अपने घर में लगे शहाबुद्दीन और लालू यादव के पोस्टरों को देखते हुए वह पुरानी बातों को याद करते हैं.

2009 में महताब की मुलाकात शहाबुद्दीन से गया जेल में हुआ करती थी. वह शहाबुद्दीन के लिए किताबें लेकर जाते थे. महताब कहते हैं कि शहाबुद्दीन खूब पढ़ा करते थे. वह राजनीति विज्ञान में पीएचडी थे. 33 साल के आलम शहाबुद्दीन को एक ऐसे शख्स के तौर पर जानते हैं जो अंदर से बड़ा स्टाइलिश थे.

आलम कहते हैं कि दो साल पहले वह शहाबुद्दीन से तिहाड़ जेल में मिले थे.

महताब आलम की याद में एक चीज़ जो बरकरार है वो यह कि शहाबुद्दीन जहां भी जाते थे उनके साथ जेल मैनुअल और संविधान जरूर हुआ करता था. आलम कहते हैं, "वह खुद फ़ारसी सीख रहे थे."

शायद प्रतापपुर में शहाबुद्दीन की मूर्ति लगे. लेकिन उनकी कब्र पर लगे पत्थर पर उनके बारे में जो लिखा है, वह उनके बारे में सिवाय तथ्यों के अलावा कुछ नहीं बताता है. लेकिन शहाबुद्दीन जैसा शख्स सिर्फ तथ्यों का बना नहीं होता. तथ्य उनकी पूरी शख्सियत का एक हिस्सा होता है. दरअसल इस तरह के लोगों की शख्सियत तमाम तरह के नजरियों, उन्हें देखे जाने के तरीकों, फैसलों और कुछ असहज सच्चाइयों को मिलकर बनी होती है.

क्या शहाबुद्दीन राजनीति की बिसात पर सिर्फ एक प्यादा थे?

शहाबुद्दीन अपराध और राजनीति के नापाक गठजोड़ से पैदा हुए शायद सबसे स्वछंद, सबसे अनोखे और सबसे ताकतवर बाहुबली थे. कुछ लोगों का कहना है बड़े दांव वाली राजनीति की दुनिया में एक वह एक प्यादा भर थे. कुछ लोग कहते हैं कि शहाबुद्दीन ने जैसी हिंसा फैलाई, वैसी इससे पहले किसी ने नहीं फैलाई थी.

सिवान के ही रहने वाले अजय तिवारी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि वह हमेशा से शहाबुद्दीन के आलोचक रहे हैं. लेकिन अगर आज वह जेल से बाहर होते तो सिवान को मेडिकल ऑक्सीजन और डॉक्टरों की ऐसी किल्लत नहीं झेलनी पड़ती. सरकारी अस्पताल के डॉक्टर के अस्पताल में आकर मरीजों को देखते, अपने दवाखानों में बैठे नहीं रहते.

वह लिखते हैं, "शहाबुद्दीन को याद किए जाने को लेकर सिवान के लोग हमेशा पसोपेश में रहेंगे. यह व्यवस्था की नाकामी ही है जो किसी शहाबुद्दीन को रॉबिनहुड जैसा बना देती है. आज भी बिहार में सिस्टम विलेन बना हुआ और लोग यहां से पलायन करने को मजबूर हैं. बिहार के लोग अब भी अपने-अपने रॉबिनहुड तलाश रहे हैं".

जेएनयू में पीएचडी कर रहे और आरजेडी की राज्य कार्यकारिणी के सदस्य जयंत जिज्ञासु कहते हैं कि मीडिया में शहाबुद्दीन की जो छवि पेश की जाती है उसमें कभी यह नहीं बताया जाता कि उन्होंने कभी भी सांप्रदायिक हिंसा को हवा नहीं दी. लालू के प्रति उनकी वफादारी बिना शर्त रही. वह कहते हैं, "शहाबुद्दीन ने लालू को हमेशा अपने बड़े भाई की तरह माना.'

दो दशक तक सिवान के बेताज बादशाह रहे शहाबुद्दीन

पूरे दो दशक तक शहाबुद्दीन सिवान के बेताज बादशाह रहे जो अपनी अदालत चलाया करते थे. उन्होंने डॉक्टरों की फीस 50 रुपये तय कर दी थी. उन्होंने सिवान में अपना आधार मजबूत करने की कोशिश कर रहे सीपीआई (एमएल) से लड़ाई की और जिसे भी जरूरत पड़ी सुरक्षा दी. सिवान के लोग उनसे प्यार करते थे. लोगों को उनसे डर भी लगता था. कहा जाता है कि जब वह सिवान में होते थे किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि किसी दूसरी पार्टी का झंडा लहरा दे.

महताब आलम कहते हैं, "हमें उनकी जरूरत थी. आप वजह जानती हैं. पहले की तुलना में आज मुसलमानों का अपना नेता होना ज्यादा जरूरी है."देखा जाए तो सिवान के खूंखार डॉन शहाबुद्दीन के उभार और पतन कई मायनों में हिंदुत्व के उभार से जुड़ा हुआ रहा है.

राजनीति में शहाबुद्दीन का उदय उस दौर में हुआ जब, देश भर में बिखरे हिंदू वोट बैंक को मजबूत करने के लिए 25 सितंबर 1990 को लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से राम रथ यात्रा निकाली थी. आडवाणी ने 1980 और 1990 के दशकों में हिंदू राष्ट्रवादी आंदोलन की अगुआई की थी.

1984 में विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन बनाने का आंदोलन छेड़ा था जो आखिरकार 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस में बदल गया था. उस दौर में हिंदू राष्ट्रवादी दल मुसलमानों को देशद्रोही बता कर हिंदुओं की गोलबंदी में लगे थे. इन अभियानों की वजह से बिहार में भागलपुर समेत देश के कई हिस्सों में भयंकर सांप्रदायिक दंगे हुए. अक्टूबर, 1990 में लालू यादव ने बिहार के समस्तीपुर में लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार करवा लिया.

जेल के अंदर से राजनीति की दुनिया में प्रवेश

उसी साल शहाबुद्दीन ने प्रतापपुर से स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर चुनाव में जीत हासिल की. उस वक्त उनका चुनाव चिन्ह था- शेर. उस वक्त वह सिर्फ 23 साल के थे और जेल में बंद थे. उनके समर्थकों ने उन्हें जेल से ही चुनाव लड़ने को कहा. शहाबुद्दीन जीरादेई सीट से लड़े और कांग्रेस के त्रिभुवन सिंह को 378 वोटों से हराने में कामयाब रहे. जीरादेई सीट जीतने के बाद शाहाबुद्दीन को ज़मानत मिल गई . देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद भी जीरादेई के ही रहने वाले थे.

सिवान के डीएवीए कॉलेज में पढ़ने के समय से ही शहाबुद्दीन छात्र राजनीति में सक्रिय हो गए थे. शहाबुद्दीन कोई गरीब परिवार से नहीं आए थे. उन दिनों शहाबुद्दीन के लिए कैंपेनिंग करने वाले लोगों में नन्हे भी शामिल रहा करते थे.

वह कहते हैं, " जब चुनाव लड़ने की बार आई तो प्रशासन की ओर से कहा गया कि शहाबुद्दीन की उम्र कम है. इस पर हमने सिवान में दंगा कर दिया था. हमने प्रशासन से पूछा कि अगर उनकी उम्र चुनाव लड़ने की नहीं थी तो फिर उन्हें पर्चा दाखिल क्यों करने दिया. "

इस तरह जेल के अंदर से ही उनका राजनीति में प्रवेश हुआ. लेकिन फिरौती के कई हाई प्रोफाइल मामलों, अपहरण और हत्याओं से जुड़े केस में नामज़द होने के बावजूद राजनीतिक संरक्षण की बदौलत वह जेल से अपना विशाल क्राइम सिंडिकेट चलाते रहे.

सेक्यूलर-सांप्रदायिक राजनीति का टकराव और शहाबुद्दीन का उभार

उन दिनों सिवान के हर गली-कूचे में शहाबदुद्दीन के कटआउट लगे होते थे. सिवान में एक तरह से उन्होंने अपनी एक समानांतर व्यवस्था बना ली थी.

पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ( PUCL) की 2001 की एक सरकारी रिपोर्ट बताती है कि आरजेडी सरकार की ओर से उन्हें पूरी तरह संरक्षण मिला हुआ था. उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई लगभग असंभव थी. इसके बाद शहाबुद्दीन का कहा हुआ ही कानून बनने लगा. इससे चारों ओर उनके अजेय होने का एक आभामंडल सा छा गया.

रिपोर्ट में कहा गया गया, "पुलिस ने शहाबुद्दीन की आपराधिक गतिविधियों से आंखें मूंद ली हैं उन्हें सिवान को अपनी जागीर की तरह इस्तेमाल करने की छूट दे दी है. इस वजह से उनकी धौंस चल रही है. शहाबुद्दीन का इतना आतंक है कि सिवान में कोई भी शख्स उन मामलों में उनके खिलाफ खड़ा नहीं होना चाहता, जिनमें उन्हें अभियुक्त बनाया गया है. "

जिन दो दशकों में हिंदू राष्ट्रवाद अपने उभार पर था, उनमें लालू यादव अगड़ी जातियों का सामना करने के अपने फॉर्मूले पर काम कर रहे थे. मुस्लिम और यादवों के गठबंधन के अपने फॉर्मूले की बदौलत वह 1990 में सत्ता हासिल कर सके. इससे पहले 1989 में बिहार के भागलपुर में भयंकर सांप्रदायिक दंगे हुए थे. इनमें एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे. इनमें से कई मुसलमान थे. मुसमलानों का कहना था कि कांग्रेस के मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा राज्य में सांप्रदायिक माहौल को बिगड़ने से रोक नहीं पाए.

इस दौरान लालू यादव ने देश में आरक्षण विरोधी आंदोलन के खिलाफ एकजुटता पैदा करने पर ध्यान देने लगे. लेकिन इस बीच, पूरे देश में राम जन्मभूमि आंदोलन ने जोर पकड़ लिया. पीयूडीआर की एक रिपोर्ट के मुताबिक भागलपुर के कुख्यात दंगे में मारे गए लोगों में 93 फीसदी मुसलमान थे.

इस सारी पृष्ठभूमि में राज्य की 17 फीसदी मुस्लिम आबादी ने जेपी आंदोलन की उपज और सेक्यूलर और सोशलिस्ट राजनीति के पैरोकार लालू में अपना संभावित नेता तलाशना शुरू कर दिया. लालू यादव को राज्य की 14 फीसदी यादव आबादी का समर्थन हासिल था. इस तरह MY (मुस्लिम यादव) फॉर्मूला उन्हें 2005 तक बिहार की सत्ता में टिकाए रखा.

न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर इंद्रजीत राय बिहार की राजनीति पर नज़र रखते है. उनका कहना है कि लालू को इस तरह प्रोजेक्ट किया गया मानों वह सबकुछ हड़पने वाले नेता हों. उन्होंने आडवाणी की रथयात्रा रोक दी और इसके लिए ऊंची जाति के लोगों ने उन्हें कभी माफ नहीं किया. बिहार की राजनीतिक संस्कृति धीरे-धीरे अपराध और राजनीति के गठजोड़ में समाती गई. और लालू ने इसकी विरासत अपने हाथ में ले ली.''

''शहाबुद्दीन को मिले संरक्षण ने इस सामाजिक गठजोड़ की कमजोरियों को उभार दिया. भागलपुर के दंगों की वजह से लालू ने मुस्लिमों को एक ऐसे समुदाय के तौर पर देखना शुरू कर दिया, जिसके अंदर कोई बंटवारा नहीं था. इसे उन्होंने एक अखंड समुदाय मान लिया और शहाबुद्दीन जैसे इलिट मुसलमानों के साथ काम करना शुरू कर दिया. उस दौर में हिंदू राष्ट्रवाद का उभार शुरू हो चुका था और मुसलमान पीछे धकेले जा रहे थे. ऐसे में शहाबुद्दीन ने खुद को मुसलमानों के नेताओं के तौर पर पेश किया. "

'शहाबुद्दीन एक समझौता थे, जिसे लालू यादव को करना पड़ा'

प्रोफेसर जैफ्री विट्सो का रिसर्च लोकतंत्र के आलोचनात्मक पुनर्विचार और उत्तर औपनिवेशिक राज्य पर केंद्रित है. उन्होंने बिहार में निचली जातियों की राजनीति की पड़ताल के जरिये इसे परखा है. 'डेमोक्रेसी अगेंस्ट डेवलपमेंट' नाम की किताब के लेखक प्रोफेसर जैफ्री कहते हैं कि शाहाबुद्दीन एक समझौता थे, जिसे लालू यादव को करना पड़ा.

अमेरिका से फोन पर बातचीत में उन्होंने कहा, "जब आप MY फॉर्मूला की चीर-फाड़ करते हैं तो आपका सामना कई असुविधाजनक सचाइयों से होता है. सबसे पहली बात यह कि शहाबुद्दीन पहले एक माफिया डॉन थे उसके बाद राजनीतिक नेता. पहले उन्होंने अपराध के बल पर अपना एक आधार बनाया और फिर इसके दम पर आगे बढ़े. "

विट्सो 2001 का पंचायत चुनाव देखने बिहार आए थे. वह कहते हैं, यहां हवा ही कुछ दूसरी थी. माहौल बड़ा भारी था. कई मायनों में उस समय शहाबुद्दीन दूसरे माफिया डॉन से ज्यादा खतरनाक थे. उनका नेटवर्क सिवान से बाहर भी फैला हुआ था.

वह कहते हैं, "वह सबसे बड़े मुस्लिम माफिया थे.पूरे सिवान पर उनका नियंत्रण था. सरकारी दफ्तर बिल्कुल समय से चलते थे. शहाबुद्दीन का भय आप महसूस कर सकते थे. गांवों में मैंने देखा कि उनका गठजोड़ जमींदारों से था. उन्होंने खूब पैसा बनाया था. दरअसल लालू ने एक शैतान से सौदेबाजी की थी. शहाबुद्दीन मुस्लिम ताकत का प्रतिनिधित्व करते थे. जो काफी कुछ मायने रखता था. लोग शहाबुद्दीन को प्यार करते थे. साथ ही उनसे डरते भी थे. "

सीपीआई (एमएल) और शाहाबुद्दीन का टकराव

विट्सो उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, "सिवान की स्थिति बिहार के दूसरे इलाकों से अलग थी. यहां खाड़ी के देशों में कमाने गए लोगों का पैसा आता था. मर्द गले में सोने की चेन पहनते थे. लेकिन गांवों में भयंकर गरीबी थी. कइयों का कहना था कि शहाबुद्दीन जमींदारों को सीपीआई (एमएल) से संरक्षण देते थे, जो उन दिनों इन इलाकों में एक ताकत बन चुकी थी."

सीपीआई-एमएल पोलित ब्यूरो के नंदकिशोर प्रसाद 1990 के दशक में सिवान में पार्टी का काम देखते थे. वह कहते हैं शहाबुद्दीन उस दौर में एक छोटे अपराधी थे लेकिन लालू यादव के संरक्षण में वह एक डॉन बन गए.

प्रसाद कहते हैं, " शहाबुद्दीन जब तक सिवान में रहे किसी दूसरी पार्टी का झंडा वहां नहीं फहराया जा सका. बीजेपी की कभी वहां दफ्तर खोलने की हिम्मत नहीं हुई. सिर्फ एक पार्टी उनसे टक्कर ले पाई और वह थी सीपीआई (एमएल). हम उसके आतंक के खिलाफ लड़ रहे थे. उन्होंने गरीबों के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया. लेकिन हम गरीबों के हक में खड़े थे. "

1997 में जब सिवान में सीपीआई (एमएल) के नेता चंद्रशेखर और श्याम नारायण यादव नुक्कड़ सभा कर रहे रहे थे उन्हें मार डाला गया. कहा गया कि शहाबुद्दीन के गुर्गों ने उन्हें मार डाला. प्रसाद कहते हैं "उन दिनों कहा जा रहा था कि चंद्रशेखर को शहाबुद्दीन ने नहीं मरवाया. उस समय तो वह जेल में थे. लेकिन इनमें से ज्यादातर बात मीडिया की फैलाई हुई थी."

बिहार विधानसभा के पूर्व सदस्य अमरनाथ यादव और सीपीआई के नेता शहाबुद्दीन के राज के खिलाफ खड़े होने के लिए जाने जाते हैं. वह कहते हैं, "हम जमींदारों से जमीन छीन कर भूमिहीनों में बांटते थे. यही हमारा आंदोलन था. सिवान उन दिनों बेहद खतरनाक जगह मानी जाती थी. वह बूथ कैप्चरिंग का जमाना था. लालू कहा करते थे के वे कम्यूनिस्टों को खत्म कर देंगे. सीपीआई (एमएल) और शहाबुद्दीन के बीच लड़ाई में 153 लोग मारे गए थे."

लालू सामाजिक न्याय के लिए खड़े हुए थे और पिछड़े वर्गों के लोगों के नेता बन गए थे. लेकिन वह बिहार में सीपीआई-एमएल को नहीं देखना चाहते थे.एक वक्त तो उन्होंने कहा था कि कि वह सीपीआई-एमएल को खत्म करने के लिए जहन्नुम की ताकतों के साथ भी समझौता करने को तैयार हैं और उन्होंने यही किया. शाहाबुद्दीन इसी सौदेबाजी का नतीजा थे. शाहाबुद्दीन से सहानुभूति रखने वालों में से कइयों का यह मानना है कि वह राजनीतिक दलों और जमींदारों के प्यादे से ज्यादा कुछ नहीं थे. यही वजह है कि आरजेडी की ताकत खत्म होने के साथ ही शाहाबुद्दीन का भी जलवा खत्म होने लगा.

'अपराध और राजनीति के संगम से पैदा होते हैं शहाबुद्दीन जैसे नेता'

इस तरह शहाबुद्दीन और फिर आरजेडी की ढलान के साथ ही सिवान में बीजेपी का उभार शुरू हो गया. शहाबुद्दीन माफिया थे , यह कोई झूठ नहीं था. दरअसल वह एक बाहुबली थे जो नए उभरे राजनीतिक हालत में लालू यादव के समझौते के नतीजे के तौर पर सामने आए थे.

1990 के दशक तक देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की जन्मस्थल सिवान शहाबुद्दीन के नाम का पर्याय बन गया था. यहां मुस्लिमों की आबादी 20 फीसदी है. इसके बाद यादवों का नंबर आता है.

रिटायर्ड आईपीएस अफसर मनोज नाथ ने अपने ब्लॉग में लिखा कि शहाबुद्दीन की मौत हो गई लेकिन जिस इको-सिस्टम ने उन्हें फैलाया वह अभी जिंदा है. नाथ कहते हैं शहाबुद्दीन अपराध और राजनीति के इसी संगम के सबसे चिर-परिचित संतान थे.

मौत के वक्त शहाबुद्दीन एक दोहरे हत्याकांड जेल की सजा भुगत रहे थे. हालांकि आखिरी वक्त तक उनके खिलाफ अपराध के 40 से अधिक मामले दर्ज थे. इनमें से एक मामला जेएनयू स्टूडेंट यूनियन के पूर्व अध्यक्ष चंद्रशेखर की गोली मार कर हत्या करने का भी था.

चंद्रशेखर को दिन-दहाड़े सिवान में गोली मार दी गई थी. इसके बाद शहाबुद्दीन के खिलाफ एक बिजनेसमैन के तीन बेटों को मार डालने का केस था. चंद्रशेखर की विधवा मां कौशल्या देवी अब जीवित नहीं हैं. लेकिन उन्होंने बेटे कि लिए इंसाफ एक लंबी जंग लड़ी. उन्होंने अपनी बेटे की हत्या में शहाबुद्दीन को नामजद किया था.

बिजनेसमैन चंदूबाबू के दो बेटों को तेजाब में नहला कर मार डाला गया था और तीसरे बेटे को भी इसके कुछ साल बाद गोली मार दी गई थी.

कुछ महीनों पहले चंदू बाबू की भी मौत हो गई. कुछ साल पहले जब चंदू बाबू और उनके बेटों ने अपनी जमीन और दुकान पर कब्जा करने की कोशिश में लगे गुंडों का विरोध किया था. इसके बाद शहाबुद्दीन के लोगों ने चंदू बाबू के दो बेटों को तेजाब में नहलाकर मार डाला था. इस मामले में चश्मदीद तीसरे बेटे राजीव रोशन को भी 2014 में गोली मार दी गई थी.

नीतीश के ख़िलाफ़ बयान

2016 में शहाबुद्दीन जमानत पर जेल से बाहर आ गए थे. इस साल नीतीश कुमार लालू यादव के साथ मिलकर चुनाव जीत चुके थे. 2016 में शहाबुद्दीन जब जेल से निकले तब तक लगभग 13 साल की सजा काट चुके थे. लोग याद करते हैं कैसे वह अपने साथ जेल से दो बोरी किताबें ले गए थे. भागलपुर जेल से उनकी 200 गाड़ियों के काफिले को सिवान पहुंचने में 14 घंटे लगे क्योंकि लोग सिवान के सुल्तान की एक झलक पाने के लिए सड़कों पर उमड़ पड़े थे.

2005 से ही शहाबुद्दीन अलग-अलग केस में जेल में बंद रहे हैं. 2016 में जेल से निकलने के बाद उन्होंने जनता दल यूनाइटेड के नेता नीतीश कुमार के लिए कहा कि वह परिस्थितियों के सीएम हैं.

इस बयान के थोड़े दिनों बाद ही 15 फरवरी 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने शहाबुद्दीन की ज़मानत रद्द कर दी. उन्हें सिवान जेल से हाई सिक्योरिटी वाली तिहाड़ जेल में शिफ्ट कर दिया गया.

2016 में थोड़े समय के लिए शहाबुद्दीन जेल से बाहर हुए थे. इससे पहले वह 2005 से जेल में ही बंद थे.

1998 में सीपीआई-एमएल कार्यकर्ता छोटेलाल गुप्ता की सिवान में अपहरण के बाद हत्या कर दी गई थी. इस मामले में 2007 में शहाबुद्दीन को उम्र कैद की सजा हुई. 2015 में दो भाइयों को तेजाब से नहला कर और उनकी गोली मार कर हत्या देने के मामले में शहाबुद्दीन को उम्र कैद की सजा मिली.

तीसरे भाई की भी 2014 में गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. वह अपने भाइयों की हत्या का गवाह था. जिस दिन उसकी हत्या हुई उसके ठीक तीन दिन बाद उसे इस मामले में अदालत में गवाही देनी थी. 1996 में डिस्ट्रिक्ट पुलिस चीफ सिंघल पर प्राणघातक हमला हुआ था. इस मामले में भी शहाबुद्दीन के खिलाफ 2007 में दस साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई.

शहाबुद्दीन की ग़ैर मौजूदगी में सिवान बदल चुका है. लेकिन दहशत की ये कहानियां यहां अब भी याद की जाती हैं. इनमें से एक खौफनाक कहानी शहाबुद्दीन और उनके लोगों और पुलिस के बीच हुई मुठभेड़ की है.

मार्च, 2001 में सिवान के एसपी बच्चू सिंह मीणा के नेतृत्व में जब पुलिस की एक टीम शहाबुद्दीन को प्रतापपुर स्थित उनके घर गिरफ्तार करने पहुंची तो उनके लोगों और पुलिस वालों के बीच काफी देर तक गोलीबारी हुई. शहाबुद्दीन इससे पहले एक स्थानीय पुलिस अफसर को पीट चुके थे.

इस मुठभेड़ में दो पुलिसकर्मी समेत दस लोग मारे गए थे. छापेमारी के दौरान उनके घर से एके-47 समेत हथियारों का बड़ा जखीरा बरामद हुआ था. अपने लोगों के मारे जाने के बाद शहाबुद्दीन ने एसपी की हत्या करने की कसम खाई थी. शहाबुद्दीन के घर पर छापा मारने के एक दिन बाद ही राबड़ी देवी सरकार ने मीणा समेत जिले के सारी सीनियर अफसरों का तबादला कर दिया था.

'वफ़ादारी की विरासत छोड़ गए हैं शहाबुद्दीन'

नन्हे और दूसरे लोगों के लिए जो 'शहाबुद्दीन के आदमी' माने जाते थे, उनका नेता कोई देवदूत नहीं था और न ही वह अपने धंधे में ईमानदार था. लेकिन उनके नेता के खिलाफ रेप का कोई केस नहीं था.

नन्हे कहते हैं, " शहाबुद्दीन के हाथों इंसाफ होता था. उन्होंने दुश्मन बना लिए. जब वह अपनी पंचायतों में मामले सुलझाने लगे तो वकील उनके दुश्मन बन गए क्योंकि उनका धंधा चौपट हो गया था. शहाबुद्दीन ऊंची जातियों के लोगों के लिए चीन की दीवार की तरह खड़े हो गए. जमींदार उन्हें आवाज देते थे और वह उनकी रक्षा के लिए तुरंत खड़े हो जाते थे."

एक शख्स के तौर पर शहाबुद्दीन कैसे थे, इस बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं है. अपने जीते जी उनकी जो छवि बनी, उसने उनकी जिंदगी को ढांप लिया. इसलिए किसी और दूसरी चीज की गुंजाइश ही नहीं बची. लेकिन नन्हे का कहना है कि वह अक्सर जेल के अंदर पेड़ लगाया करते थे. उन्होंने ऐसी जेल भी बनवाई थी, जिनके कमरों में टाइल्स लगी थीं. अक्सर वह कहा करते थे कि जब समय आएगा तो जेल के इन कमरों में रहेंगे. कई बार नन्हे जेल के अंदर जाकर उनसे मिल आते थे.

वह कहते हैं, वे अक्सर चौकी या जमीन पर सोया करते थे. नन्हे और महताब आलम जैसे लोगों का कहना है कि शहाबुद्दीन वफादारी की अपनी विरासत छोड़ गए हैं. वह कहते हैं, "मैडम सिवान की राजनीति बड़ी खतरनाक है. साहेब अपनी नजदीकियां किसी से छिपाते नहीं थे. उन्होंने लालू का साथ कभी नहीं छोड़ा. अब उनके परिवार को लोगों का प्यार हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी. राजनीति अलग तरह का खेल है. "

शहाबुद्दीन सिवान के इतिहास का हिस्सा हैं. भले ही उनकी देह कहीं और दफन हो लेकिन उनकी कहानियां बिहार के इस सीमावर्ती शहर और इससे जुड़े लोगों की ही हैं.

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