गुवाहाटी के नालों में तीन दिन बेटे को तलाशने वाले माँ-बाप का दर्द- 'आँखें मूंदती हूँ तो बेटा दिखता है'

    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, गुवाहाटी से, बीबीसी हिंदी के लिए

गुवाहाटी के नूनमाटी इलाके के श्याम नगर में एक अजीब किस्म का सन्नाटा पसरा है.

इस इलाके की मिट्टी की कच्ची सड़क वाले माणिक दास पथ पर कुछ कदम बढ़ने पर एक घर के बाहर लगे टेंट में कुछ लोग शांत बैठे हुए दिखाई देते हैं.

घर के नजदीक पहुंचते ही रोने की आवाज तेज़ सुनाई देने लगती है.

दरअसल, यह घर आठ साल के अविनाश सरकार का है जो बीती चार जुलाई की रात अपने पिता के स्कूटर से फिसल कर गुवाहाटी के एक खुले नाले में गिर गए थे.

लगातार तीन दिन तक बचाव एजेंसियों ने सर्च ऑपरेशन चलाया लेकिन अविनाश को बचाया नहीं जा सका. लगभग 56 घंटे के सर्च ऑपरेशन के बाद अविनाश का शव घटना वाली जगह से क़रीब चार किलोमीटर दूर राजगढ़ इलाके से रविवार सुबह छह बजे बरामद किया गया.

अविनाश के पिता का हाल

हल्के बैंगनी रंग की टी-शर्ट और काले रंग की ट्रैक पैंट पहने एक व्यक्ति सदमे में घर के बाहर खड़े हैं.

वो कई बार घर के अंदर रो रही महिलाओं को शांत करने के लिए उनसे कुछ कहते हैं और फिर खुद उनके साथ रोने लगते हैं.

ये व्यक्ति अविनाश के पिता होरोलाल सरकार हैं जो अपने बच्चे को बचाने के लिए बारिश के पानी से भरे नाले में पूरी रात बेटे की तलाश करते रहे.

होरोलाल के दोनों पैर बुरी तरह जख्मी हैं. पूछने पर वो बहुत धीमी आवाज में कहते हैं- "नाले में बहुत शीशे थे."

कैसे हुई दुर्घटना

बारिश वाली उस अंधेरी रात को याद करते हुए होरोलाल कहते हैं, "रात के क़रीब 10 बज रहे थे. मैं गैरेज बंद करके घर लौट रहा था. उस रोज़ मेरा आठ साल का बेटा अविनाश भी गैरेज में आया हुआ था. मेरा 13 साल का भतीजा भी गैरेज में था. हम तीनों मेरे स्कूटर से घर के लिए निकले थे. मैंने बेटे को आगे सीट पर बैठा रखा था. भतीजा पीछे बैठा हुआ था."

"असल में मेरी दुकान के बगल में फ्लाईओवर का काम चल रहा है जिसकी वजह से एक रास्ता बंद था. इसके अलावा कई जगह बाढ़ का पानी भी भरा हुआ था. इसलिए मैंने ज्योति नगर वाले रास्ते से घर जाने का फ़ैसला किया. उस समय हल्की बारिश हो रही थी. स्ट्रीट लाइटें भी बंद पड़ी थीं. इसलिए सड़क ठीक से दिखाई नहीं दे रही थी."

"मैं जैसे ही ज्योति नगर चौक के पास पहुंचा तो अचानक मेरा स्कूटर फिसल गया और बैलेंस बिगड़ने से बेटा मेरे हाथों के बीच से निकलकर नाले में गिर गया. मैंने उसे पकड़ने की कोशिश की और मैं भी नाले में गिर गया. नाले में पानी का बहाव काफ़ी तेज़ था और अंधेरा होने के कारण मैं उसे देख नहीं पाया. मैं किसी तरह ऊपर आया और कुछ दूर आगे जाकर फिर से बेटे को नाले में तलाशा लेकिन वो नहीं मिला."

इसके बाद होरोलाल ने पास के थाने में फोन कर मदद मांगी. वो तीन दिन तक बचाव दल के साथ गुवाहाटी के अलग-अलग नालों में बेटे को तलाशते रहे.

तीन दिन का इंतज़ार, फिर मायूसी

घर के जिस कमरे से महिलाओं के लगातार रोने की आवाज़ आ रही थी उसके एक बिस्तर पर अविनाश की माँ कृष्णामणि सरकार अपने बेटे का नाम लेकर रोये जा रही थी. उनके पास वाले बिस्तर पर दो दिन से बेसुध पड़ी अविनाश की बूढ़ी नानी मालोती दास का रो-रो कर बुरा हाल था.

अविनाश की दादी होरीदासी सरकार दरवाज़े के पास बैठी अपनी हथेलियों से आसूँ पूछ रही थी.

पिछले कुछ दिनों से अविनाश की इस दुखद घटना ने राज्य को गमगीन कर दिया है.

अविनाश की मां कृष्णामणि कहती हैं, "वो मेरे साथ बाज़ार गया था. हम पहले पति के गैरेज गए. वहां मेरा भतीजा शुनु भी था. उसने कहा कि मैं पापा के साथ घर आऊंगा. मैं उसे छोड़कर चली आई और वो नहीं आया. वो क्यों नहीं आया? सबके होते हुए वो कैसे नाले में गिर गया? मैं अब भी इस उम्मीद में हूं कि वो घर आएगा. मैं जब भी आंखें बंद करती हूं धुनु (बेटे का प्यार का नाम) को ही देखती हूं."

"वो तीन दिन का समय काटे नहीं कट रहा था. छाती दर्द से भारी हो गई थी. एक दिन बाद जब नाले से बेटे की चप्पल मिली तो उसके ज़िंदा होने की थोड़ी उम्मीद जगी थी. तीसरे दिन सुबह फोन आया कि वो मिल गया है. मैं गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज के लिए भागी लेकिन जब वहां पहुंच कर देखा तो सबकुछ ख़त्म हो गया था."

"मैंने उसके शव को देखा लेकिन मेरा दिल यह मानने को तैयार ही नही कि वो मेरा ही बेटा है. कुछ दिन पहले मैंने उसे बुरी नज़र से बचाने के लिए पैर में काला धागा बांधा था. वो धागा बंधा हुआ था."

इस घटना के लिए आप किसको ज़िम्मेदार मानती है?

इन सवालों के जवाब में कृष्णामणि कहती हैं, "सरकार अगर कोई काम करती है तो उसे ठीक से करना चाहिए. जिस तरह नालों का निर्माण किया गया है उसको ढकने की व्यवस्था भी करनी चाहिए थी. रास्ते में अंधेरा था. अगर स्ट्रीट लाइट की रोशनी होती तो शायद मेरा बेटा गिरते ही दिख जाता. नाले पर रेलिंग भी नहीं थी. मेरा बेटा तो अब वापस नहीं आएगा लेकिन आगे किसी बच्चे जान ऐसे न जाए इसके लिए सरकार को उचित उपाय करने होंगे."

कृष्णामणि जब ये बातें कह रही थी उस समय उनका दो साल का छोटा बेटा मां के मोबाइल पर बड़े भाई की फोटो देखकर भैया-भैया पुकार रहा था.

बच्चे की तलाश में क्यों लगे 56 घंटे

घटना वाली रात सर्च ऑपरेशन शुरू करने वाले राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (एसडीआरएफ) के एक अधिकारी ने बताया कि बारिश के कारण नाले में पहाड़ों से बहकर कीचड़ मिट्टी काफ़ी आ रही थी जिससे बचाव दल को सर्च ऑपरेशन में काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा.

उन्होंने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया, "घटना वाली रात करीब 12 बजे एसडीआरएफ़ के आठ से नौ लोगों की टीम नाले के अंदर बच्चे को तक तलाशती रही. बारिश की वजह से नाले में करीब छह फुट की ऊंचाई तक पानी भरा हुआ था. हालांकि बाद में जब बारिश रुकी तो पानी कम हो गया. सुबह तक सर्च ऑपरेशन चला पर बच्चा नहीं मिला."

बचाव दल के अधिकारी ने कहा कि जिस जगह घटना हुई थी, वहां से नीचे की ओर क़रीब दो किलोमीटर नाले के ऊपर ज़्यादातर जगहों पर कवर नहीं थे. बच्चे के पिता मानते हैं कि अगर नाला ढँका हुआ होता या फिर नाले के पास रेलिंग होती तो उनका बच्चा आज ज़िंदा होता.

इस सर्च ऑपरेशन में इतना समय लगने का कारण बताते हुए एसडीआरएफ अधिकारी ने बताया, "शहर में नालों का नेटवर्क काफी जटिल है. ऊपर जहां घटना हुई थी वहां नाले की गहराई ज़्यादा थी जबकि शहर के कुछ इलाकों में नाले चार फुट तक गहरे थे. जहां बचाव दल बैठकर आगे बढ़ रही थी."

उन्होंने कहा, "जिन नालों पर कवर लगे हुए थे उन्हें हटाकर बचाव दल को काम करना पड़ रहा था. नाले के ऊपर लगे स्लैब को खोलकर फिर से लगाने में काफ़ी समय लगा. इसके अलावा कई जगह नाले के अंदर टनल में कीचड़ था उसे जेसीबी लगाकर बाहर निकाला गया."

जब दो दिन तक बच्चा नहीं मिला तो छह जुलाई की सुबह राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) की टीम अपने दो खोजी कुत्तों के साथ नाले में उतरी.

इस बार बचाव अभियान में एनडीआरएफ के साथ एसडीआरएफ, पुलिस, गुवाहाटी नगर निगम और स्थानीय प्रशासन की एक बड़ी टीम खनन मशीनों और अन्य उपकरणों के साथ बच्चे को तलाशना शुरू किया. सात जुलाई की सुबह करीब नौ बजे बच्चे का शव राजगढ़ के अपूर्व सिन्हा पथ के पास वाले नाले से बरामद किया गया.

जब इस घटना को लेकर सरकार की लापरवाही पर सवाल खड़े होने लगे तो मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा खुद बचाव अभियान का जायजा लेने पहुंचे थे.

मुख्यमंत्री सरमा ने बचाव दल के साथ बेटे को तलाश रहे होरोलाल को आश्वासन दिया कि वो किसी भी कीमत पर उनके बेटे को तलाशेंगे.

मुख्यमंत्री का बयान

इस घटना को लेकर मुख्यमंत्री ने मीडिया के समक्ष कहा, "गुवाहाटी जैसे बड़े शहर में कुछ समस्याएं तो होंगी ही, लेकिन लोगों ने जहां भी ध्यान दिलाया प्रशासन ने उसे सुधारने के लिए क़दम उठाया है."

मुख्यमंत्री ने पत्रकारों से कहा, "हम गुवाहाटी को बाढ़ मुक्त बनाने के लिए काम कर रहे हैं. जब एक क्षेत्र की बाढ़ की समस्या हल हो जाती है, तो विभिन्न कारणों से नए क्षेत्रों में बाढ़ आ जाती है. हमारा विभाग इस समस्या को लेकर लगातार काम कर रहा हैं."

उन्होने कहा कि भारी बारिश के दौरान वाहन न चलाने जैसे सुरक्षा उपायों के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ानी होगी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों.

इसके बाद सोमवार की शाम को मुख्यमंत्री सरमा ने होरोलाल के घर पहुंचकर परिवार को सांत्वना दी है और हरसभंव मदद का भरोसा दिया.

वहीं इस घटना के संदर्भ में सरकारी विभाग की लापरवाही और गुवाहाटी के खुले नालों के बारे में पूछने पर गुवाहाटी नगर निगम के मेयर मृगेन सरनिया ने बीबीसी से कहा, "बीते 45 सालों में उस जगह (ज्योति नगर) किसी तरह की घटना नहीं हुई है."

मेयर मृगेन सरनिया ने कहा, "हमने बारिश का पानी शहर से निकालने के लिए नालों की व्यवस्था पर काफी काम किया है. कुछ इलाकों को छोड़कर अब गुवाहाटी में एक-दो घंटे से ज्यादा पानी जमा नहीं होता है. यह बहुत दुखद है और दुर्भाग्यपूर्ण घटना है. ऐसी घटनाएं दोबारा शहर में न हो उसके लिए निगम लोक निर्माण विभाग समेत कई संबंधित विभागों के साथ संपर्क कर रहा है."

गुवाहाटी नगर निगम के मेयर ने साथ ही कहा कि लोगों को बाढ़ और बारिश के समय सरकार द्वारा जारी की गई अलर्ट को भी मानना चाहिए ताकि किसी भी अनहोनी से बचा जा सके.

हालांकि अविनाश सरकार की मौत ने गुवाहाटी शहर के लोगों को उन पुरानी घटनाओं की याद दिला दी है जिनमें मैनहोल और खुले नालों की वजह से कई लोगों की जानें गई हैं.

साल 2003 से राजधानी गुवाहाटी में मैनहोल और खुले नालों की वजह से नाबालिगों सहित कम से कम नौ लोगों की जान गई है.

एक मामले को छोड़कर सभी आठ मौतें मॉनसून के दौरान हुई हैं, जब शहर का एक बड़ा हिस्सा बाढ़ के पानी में डूब जाता है. यह ऐसा समय होता है जब नालियां और नदी उफान पर होते हैं.

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