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असमः "ज़मीन से बेदख़ल करने से अच्छा होता, हमें मार डालते", सरकार के अभियान में प्रभावित लोगों की शिकायत- ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, बाटाद्रवा के हाईडूबी गांव से
"सरकार ने हमारे घर तोड़ दिए हैं. हम अपने बच्चों को लेकर कहां जाएं. सबकुछ तोड़ दिया है. सरकार की तरफ़ से जो घर मिला था उसे भी तोड़ दिया."
"आप देखिए इतनी कड़ाके की ठंड में कितनी तकलीफ़ में यहां रहना पड़ रहा है. हम पर यह ज़ुल्म क्यों? जिनके आंगन में इस प्लास्टिक के तंबू में रहने दिया था अब वे भी यहां से जाने के लिए कह रहे हैं. हम कहां जाएंगे? सरकार इस उम्र में हमें शांति से रहने के लिए थोड़ी ज़मीन दे, या हमें मार डाले."
असम के बाटाद्रवा हाईडूबी गांव की रहने वाली 73 साल की अमीना ख़ातून कांपती हुई आवाज़ में ये बातें कहती हैं.
असम सरकार ने 19 दिसंबर को नगांव ज़िले के बाटाद्रवा थाना क्षेत्र की सरकारी ज़मीन ख़ाली कराने के लिए शांतिजान बाज़ार इलाक़े के आसपास चार गांवों में बेदख़ली अभियान चलाया था.
ज़िला प्रशासन का कहना है कि इस बेदख़ली अभियान में क़रीब 900 बीघा (1.20 वर्ग किलोमीटर) सरकारी ज़मीन ख़ाली कराई गई है जहां कथित तौर पर 302 परिवारों ने अवैध क़ब्ज़ा कर रखा था.
आयोग की रिपोर्ट पर अभियान
अमीना ख़ातून के गांव हाईडूबी में जहां कुछ दिन पहले तक उनका मकान था अब उस ज़मीन पर टूटे हुए घरों का मलबा है.
हाईडूबी के अलावा ज़िला प्रशासन ने जामाई बस्ती, भोमरागुरी और लालूंग गांव में भी बेदख़ली अभियान चलाकर सरकारी ज़मीन को ख़ाली कराया है. जिन गांवों में प्रशासन ने बेदख़ली अभियान चलाया था वो इलाक़ा बाटाद्रवा थाना (असमिया समाज का पवित्र स्थान) के पास है.
ये वही स्थान है जहां 15वीं-16वीं शताब्दी के संत-विद्वान और सामाजिक-धार्मिक सुधारक श्रीमंत शंकरदेव का जन्म हुआ था.
राज्य सरकार ने असम में मौजूद 'सत्रों' (श्रीमंत शंकरदेव द्वारा स्थापित वैष्णव मठ) की भूमि की समस्याओं की समीक्षा और आकलन के लिए सत्ताधारी तीन विधायकों को शामिल कर एक आयोग का गठन किया था. इस आयोग की ओर से अतिक्रमण को लेकर सौंपी गई रिपोर्ट के बाद सरकार ने बाटाद्रवा में पहला बेदख़ली अभियान चलाया.
प्लास्टिक के तंबू में रातें काट रहे बेघर लोग
इस बेदख़ली अभियान के बाद कई लोग आसपास के गांवों में अपने रिश्तेदारों के यहां चले गए हैं जबकि कुछ लोग किराए के मकान में अपने बच्चों के साथ ठहरे हुए हैं. लेकिन अमीना ख़ातून के गांव के अब भी क़रीब 30 परिवार वहीं पड़ोस में पहचान के लोगों की ख़ाली ज़मीन में प्लास्टिक के तंबू में रह रहे हैं.
इन प्लास्टिक के छोटे तंबुओं में ठंड से बचने के लिए ज़मीन पर धान की पुआल बिछाई गई है. बेघर हुए लोग अब अपने रातें वहीं गुज़ार रहे हैं.
'हमने देखा था दरंग ज़िले में कैसे गोलियां चली थीं'
अपनी तकलीफ़ बयान करते हुए अमीना ग़ुस्से में कहती हैं, "रात को ठंड के कारण नींद नहीं आती है. कुत्ते-बिल्ली तंबू में घुस आते हैं. हम इंसान हैं. इतनी तकलीफ़ नहीं झेल सकते. पति और बेटे की मौत हो चुकी है. यहां पोते और बहू के साथ बहुत शर्म से रहना पड़ रहा है."
गांव के लोग बताते हैं कि ज़मीन को ख़ाली कराने के लिए 15 दिसंबर से ही इलाक़े में सैकड़ों पुलिसवाले जमा होने लगे थे. नगांव ज़िले की पुलिस अधीक्षक लीना डोले ने बाद में पत्रकारों को शांतिजन बाज़ार क्षेत्र में 600 से अधिक सुरक्षाकर्मियों की तैनाती के साथ अभियान शुरू करने की जानकारी दी थी.
अपना घर गंवाने क बाद वहीं पास के तंबू में रह रहे मोहम्मद सोहराबुद्दीन उस दिन प्रशासन की ओर से चलाए गए बेदख़ली अभियान को याद करते हुए कहते हैं, "घर तोड़ने से चार-पांच दिन पहले ही इलाक़े में पुलिस जमा होने लगी थी. हमें बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि पुलिस इतनी तादाद में क्यों आई है. लेकिन यह अहसास ज़रूर था कि कोई बड़ा ख़तरा आने वाला है."
वे कहते हैं, "मकान तोड़ने से दो दिन पहले पता चला कि ज़मीन ख़ाली कराने के लिए इतनी फ़ोर्स भेजी गई है. बहुत लोग डर के मारे अपना कुछ क़ीमती सामान लेकर घर छोड़कर चले गए. कोई कुछ नहीं बोला क्योंकि हमने देखा था कि दरंग ज़िले में कैसे गोलियां चली थीं."
'अच्छा होता सबको क़तार में खड़ा कर गोली मार देते'
राज मिस्त्री का काम करने वाले 50 साल के सोहराबुद्दीन काग़ज़ दिखाते हुए कहते हैं कि जब असम गण परिषद की सरकार थी उस समय इलाक़े के विधायक तथा तत्कालीन मंत्री दिजेन बोरा ने 1988 में उनके जैसे 14 भूमिहीन परिवारों को हाईडूबी में 14 बीघा तीन कट्ठा 13 लेसा ज़मीन दी थी. अब मौजूदा सरकार इन काग़ज़ों को मानने के लिए तैयार नहीं है.
जिन लोगों को 'अतिक्रमणकारी' बताया जा रहा है उनकी नागरिकता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.
ऐसे ही एक सवाल का जवाब देते हुए 71 साल के होइबुर रहमान कहते हैं, "हम इसी देश के नागरिक हैं. हमारे पास एनआरसी है, वोटर कार्ड है. भूमिहीन सर्टिफ़िकेट है. फिर सरकार क्यों तंग कर रही पता नहीं. बिना कोई नोटिस दिए हमारे मकान तोड़ दिए. पहले सरकार ने मकान बनाकर दिया था. शौचालय दिया. बिजली-रास्ते की व्यवस्था की. फिर सबकुछ ज़मीन में मिला दिया. बच्चों को लेकर कहां जाए. हिमंत सरकार ने कहा था कि हमारे बच्चों को डॉक्टर-इंजीनियर बनाएंगे लेकिन उन्होंने हमें पूरी तरह ही बर्बाद कर दिया. इससे अच्छा तो यह होता कि हम सबको क़तार में खड़ा कर गोली मार देते."
'1966 से इस ज़मीन का ख़ज़ाना जमा कराते आए हैं'
ज़िला प्रशासन ने जिन 302 परिवारों से ज़मीन ख़ाली कराई है उनमें से 99 फ़ीसदी बंगाली मूल के मुसलमान हैं. हालांकि इस दौरान कुछ हिंदू लोगों के मकान और दुकान भी तोड़े गए हैं.
सरकार के इस बेदख़ली अभियान में अपना मकान गंवा चुके धर्म बोरा कहते हैं, "सबकुछ ख़त्म हो गया है. पाई, पाई जोड़कर बच्चों के लिए घर बनवाया था. अब इस जन्म में दोबारा घर नहीं बना सकूंगा. सरकार ने बिना कोई नोटिस दिए सीधे हमारा घर तोड़ दिया. मेरी बेटी इस साल मैट्रिक परीक्षा की तैयारी कर रही थी लेकिन वो मानसिक तौर पर बहुत टूट चुकी है."
"1966 से इस ज़मीन का ख़ज़ाना जमा कराते आए हैं. घर तोड़ने से एक दिन पहले रात को मुझे बताया गया. हम कोई सामान नहीं निकाल पाए. हमारे पड़ोसी गोपाल कलिता का पक्का मकान भी उन लोगों ने ढहा दिया. हम सब लोग अब किराए के एक कच्चे मकान में रह रहे हैं. 58 साल से इस घर में रह रहे थे."
'टूट गया सपनों का घर'
अपने मकान के टूटने पर गोपाल कलिता कहते हैं, "30 लाख रुपये ख़र्च कर पक्का मकान बनाया था. 15 साल एक-एक पैसा जोड़े थे. हम जैसे लोगों के लिए यह सपनों का घर था. अब पूरा परिवार रास्ते पर आ गया है. गांव मुखिया ने बताया था कि हमारे घर नहीं टूटेंगे लेकिन तोड़ने वालों ने हमारी एक भी नहीं सुनी. हम उनके आगे रोते-गिड़गिड़ाते रहे."
राज्य में 2016 में बीजेपी की पहली बार सरकार बनने के बाद काजीरंगा नेशनल पार्क के पास एक बेदख़ली अभियान का विरोध कर रहे बंगाली मूल के दो मुसलमान पुलिस की गोलीबारी में मारे गए थे.
इसके बाद सितंबर, 2021 में असम पुलिस ने दरांग ज़िले के धौलपुर इलाक़े में ग्रामीणों पर गोलियां चलाईं थीं. वो लोग भी एक बेदख़ली अभियान का विरोध कर रहे थे. पुलिस फ़ायरिंग में दो नागरिकों की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल हुए थे.
बाटाद्रवा में कॉलेज की पढ़ाई कर रहे वाशिम (बदला हुआ नाम) कहते हैं, "गांव के लोगों ने उनका विरोध नहीं किया क्योंकि पुलिसकर्मी सैकड़ों की तादाद में थे. मकान तोड़ने के दो दिन पहले से पुलिस जिस क़दर फ़्लैग मार्च कर रही थी, उससे इलाक़े में भय और दहशत का माहौल पैदा हो गया था."
प्रशासन का क्या है कहना?
नागांव ज़िला प्रशासन का कहना है कि 80 प्रतिशत से अधिक लोगों ने अपने घरों, दुकानों और अन्य ढांचों को ख़ुद ही तोड़ दिया और दूसरी जगह चले गए.
इस पूरी घटना पर बात करते हुए नागांव के ज़िला उपायुक्त नरेंद्र शाह ने बीबीसी से कहा, "हमने सरकारी ज़मीन पर बैठे लोगों की वेरिफ़िकेशन करवाई थी. इस तरह हमने क़ानूनी नियमों के तहत चार गांव में क़रीब 900 बीघा ज़मीन ख़ाली करवाई और यह काम बहुत शांतिपूर्ण तरीक़े से किया गया. सरकार ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को ज़मीन का पट्टा देने की कोशिश कर रही है लेकिन इसके साथ हमारी कोशिश है कि सरकारी ज़मीन पर ग़ैर-क़ानूनी क़ब्ज़ा किए बैठे लोगों को हटाएं."
एक सवाल का जवाब देते हुए ज़िला उपायुक्त कहते हैं कि जिन 302 परिवारों को हटाया गया है उनमें क़रीब 90 फ़ीसद लोगों के पास अपनी ज़मीन है.
इस बेदख़ली अभियान की प्रक्रिया में शामिल नागांव ज़िले की अतिरिक्त उपायुक्त शांतना बोरा ने कहा कि जिन लोगों को हटाया गया है उनमें क़रीब 25 परिवारों ने ही पुनर्वास के लिए सरकार से ज़मीन देने के लिए आवेदन किया है. मकान तोड़ने से पहले लोगों को नोटिस जारी करने के सवाल पर वो बस इतना कहती हैं कि सरकारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा हटाने के लिए कई बार नोटिस देना अनिवार्य नहीं होता.
इतनी कड़ाके की ठंड में ज़िला प्रशासन से किसी तरह की मदद नहीं दिए जाने के सवाल पर ज़िला उपायुक्त कहते हैं, "हमने लोगों को ज़मीन ख़ाली करवाने से पहले पर्याप्त समय दिया था. प्रशासन से मदद नहीं मिलने के आरोप के पीछे उनका क्या मक़सद है उसको समझ पाना मुश्किल है. हम निश्चित तौर पर योग्य और वास्तविक नागरिक की मदद करेंगे."
'भूमिहीन बंगाली मूल के मुसलमानों में डर'
पिछले विधानसभा चुनाव में राज्य के मठों की ज़मीन से अतिक्रमण हटाना बीजेपी का प्रमुख चुनावी मुद्दा था.
असम विधानसभा में पेश किए गए सरकारी आंकड़ों के अनुसार मई 2021 में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनने के बाद से सरकारी ज़मीन पर कथित रूप से अतिक्रमण करने वाले कुल 4,449 परिवारों को बेदख़ल किया गया है. अबतक दरांग ज़िले में 2,153 परिवारों को, होजाई ज़िले के लामडिंग आरक्षित वन में 805 परिवारों को और धुबरी ज़िले में सरकारी भूमि से 404 परिवारों को बेदख़ल किया गया है.
एक तरफ़ सरकार ने जहां 'स्वदेशी' भूमिहीन लोगों को भूमि के स्वामित्व देने के लिए ज़मीन के पट्टे वितरित किए हैं वहीं कई पीढ़ियों से असम में रह रहे भूमिहीन बंगाली मूल के मुसलमान राज्य सरकार की नई भूमि नीति से डरे हुए हैं.
असम के नदी तटीय इलाक़ों में बसे बंगाली मूल के मुसलमानों के बीच असमिया संस्कृति को बढ़ावा देने का काम कर रहे चार चापौरी परिषद के अध्यक्ष डॉ. हाफ़िज़ अहमद का कहना है, "मौजूदा बीजेपी सरकार जिस व्यापक स्तर पर बेदख़ली अभियान चला रही है उसका विरोध करने के लिए कोई सामने नहीं आ रहा है. दरअसल लोग बहुत डरे हुए हैं."
"बंगाली मूल के मुसलमानों के वोट से जो लोग विधायक बने हैं उनमें कई भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. इसलिए वे भी चुप हैं. मुसलमानों के कुछ संगठन पहले की सरकारों में लोकतांत्रिक तरीक़े से विरोध करते थे लेकिन अब वे भी शांत बैठ गए हैं. इसलिए सरकार की भूमि नीति से लेकर निर्वाचन क्षेत्रों में नए परिसीमन तक सबकुछ बंगाली मूल के मुसलमानों के ख़िलाफ़ जा रहा है."
एक अन्य मामले में मुआवज़ा देने का आदेश
एक अन्य मामले में बाटाद्रवा पुलिस स्टेशन के पुलिसकर्मियों की ओर से एक नागरिक के घर पर बुलडोज़र चलाने से जुड़ी एक स्वत: संज्ञान जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद इसी मंगलवार को गुवाहाटी हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वो प्रभावित व्यक्तियों को मुआवज़ा देने के लिए उचित निर्णय ले.
अदालत में जनहित याचिका दायर करने वाले वकील अनवर हुसैन लस्कर ने बीबीसी को बताया, "पिछले साल मई में एक मुसलमान युवक की 'हिरासत में मौत' के बाद उग्र हुई स्थानीय भीड़ ने बाटाद्रवा थाने में आग लगा दी थी जिसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए युवक के कुछ रिश्तेदारों के घर बुलडोज़र से तोड़ दिए थे. यह कार्रवाई क़ानून के ख़िलाफ़ थी. लिहाज़ा मैंने गुवाहाटी हाई कोर्ट में एक स्वत:संज्ञान जनहित याचिका दायर की थी."
"कोर्ट ने सुनवाई करते हुए सरकारी वकील से पूछा कि किसकी अनुमति के तहत लोगों के घर पर बुलडोज़र चलाए गए. सरकारी वकील के जवाब से असंतुष्ट अदालत ने मंगलवार को प्रभावित लोगों को मुआवज़ा देने का आदेश दिया है."
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