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असम में बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी, डर के साए में मुसलमान
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, गुवाहाटी से
असम सरकार ने राज्य में बहुविवाह प्रथा पर प्रतिबंध लगाने लिए एक रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में चार सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है.
यह विशेषज्ञ समिति इस बात का अध्ययन करेगी कि राज्य विधायिका के पास बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाने के अधिकार हैं या नहीं.
असम सरकार के अनुसार, यह समिति अगले छह महीने के भीतर रिपोर्ट दाखिल करेगी.
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने पिछले मंगलवार को बहुविवाह पर रोक लगाने के लिए इस विशेषज्ञ समिति का गठन करने की घोषणा की थी.
उन्होंने कहा था, "बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाने को लेकर कानूनी विशेषज्ञों और विद्वानों वाली यह समिति भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के साथ-साथ मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अधिनियम, 1937 के प्रावधानों की जांच करेगी."
उन्होंने यह भी कहा था, "हम यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड की ओर नहीं जा रहे हैं जिसके लिए एक राष्ट्रीय सहमति की आवश्यकता होती है, लेकिन असम में यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड के एक घटक के रूप में हम एक राज्य अधिनियम के माध्यम से बहुविवाह को असंवैधानिक और अवैध घोषित करना चाहते हैं."
देश की आजादी के बाद से यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड की मांग उठती रही है. लेकिन यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड से अलग असम सरकार राज्य में एक नया क़ानून लाकर जिस तर्ज पर बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास कर रही है उसको लेकर सवाल उठ रहे हैं.
मुख्यमंत्री के इस बयान ने ख़ासकर निचले असम में बसे बंगाली मूल के मुसलमानों को चिंता में डाल दिया है.
क्या यह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति है?
असम के नदी तटीय इलाकों में बसे बंगाली मूल के मुसलमानों के बीच असमिया संस्कृति को बढ़ावा देने का काम कर रहे चार-चापौरी परिषद के अध्यक्ष डॉक्टर हाफिज अहमद कहते हैं, "राज्य सरकार का यह कदम पूरी तरह से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति से प्रेरित है. मुख्यमंत्री जो कह रहे हैं वो पूरी तरह से सच नहीं है."
वो कहते हैं, "भारत में बहुविवाह को लेकर जो लेटेस्ट आंकड़े हैं उनमें मुसलमानों में ही नहीं बल्कि हिंदुओं में भी यह प्रथा होने की बात कही गई है."
बहुविवाह पर सरकार के इस कदम की आलोचना ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष रिजाउल करीम भी करते हैं.
बीबीसी से बातचीत में वे कहते हैं, "हमारा संगठन 1980 से मुसलमान बहुल इलाकों में बहुविवाह और बाल विवाह के खिलाफ काम करता आ रहा है लेकिन जिस तरह मुख्यमंत्री बात कर रहे हैं उसमें बिलकुल सच्चाई नहीं है."
आंकड़े क्या कहते हैं?
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में बहुविवाह प्रथा मुसलमानों के अलावा अन्य समुदायों में भी प्रचलित है, हालांकि मौजूदा आंकड़ों में गिरावट भी देखी गई है.
एनएफएचएस के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 1.4 फीसदी महिलाएं बहुविवाह में हैं जिनकी उम्र 15 से 49 साल है.
आंकड़ों के मुताबिक बहुविवाह में सबसे ज्यादा महिलाएं उच्च जनजातीय आबादी वाले पूर्वोत्तर राज्य मेघालय (6.2 फीसदी) से हैं, जबकि राज्यों की इस सूची में असम 2.4 फीसदी के साथ छठे स्थान पर है.
गुवाहाटी विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर अब्दुल मन्नान कहते हैं, "अगर बहुविवाह पर रोक को लेकर सरकार अच्छी नीयत के साथ कानून लाना चाहती है तो हम सभी स्वागत करेंगे."
"भले ही मुसलमानों को धार्मिक तौर पर बहुविवाह करने की क़ानूनी इजाज़त है, लेकिन असम के मुसलमानों में यह प्रथा अब नहीं के बराबर रह गई है."
नए क़ानून से क्या बदलेगा?
गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील अंशुमन बोरा कहते हैं, "बहुविवाह हमेशा से ही एक मुद्दा रहा है लेकिन इसके लिए देश में पहले से एक क़ानून है. आईपीसी की धारा 494 के तहत दूसरा विवाह करना अपराध है. बावजूद असम सरकार नया क़ानून बनाने जा रही है तो इसके कई मायने होंगे."
वो कहते हैं, "एक से अधिक शादी से जुड़े इस क़ानून में सबसे मुश्किल काम शादी को साबित करना होता है. आईपीसी में भी किसी शादी को सबूतों के साथ प्रमाण करना बहुत कठिन काम होता है."
उनके मुताबिक़, "आईपीसी में यह अपराध सभी व्यक्तियों पर उनके धार्मिक मतभेदों के बावजूद समान रूप से लागू होता है. ऐसा नहीं है कि आईपीसी के तहत मुस्लिम सुरक्षित हैं."
"वे अपने मुस्लिम क़ानून के तहत चार शादी कर सकते हैं लेकिन आईपीसी के तहत उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है."
अंशुमन सवाल करते हैं कि जब यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड लाने की बात हो रही है तो असम सरकार को बहुविवाह के लिए एक अलग क़ानून बनाने की क्या जरूरत पड़ गई?
वो कहते हैं, "यह एक राजनीतिक नौटंकी है क्योंकि बाल विवाह में सरकार ने शुरू में जो भी कार्रवाई की बाद में वह सुस्त पड़ गई. चाय जनाजति इलाकों में बड़े पैमाने पर बाल विवाह के मामले हैं लेकिन सरकार ने वहां कोई कार्रवाई नहीं की."
रिटायर्ड जज रूमी कुमारी फुकन की अध्यक्षता में बनी विशेषज्ञ समिति में एकमात्र मुस्लिम सदस्य गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील नेकिबुर ज़मान हैं.
वो कहते हैं, "अभी केवल समिति बनाई है. इसलिए आगे के कामकाज को लेकर जब तक हमारी पहली बैठक नहीं हो जाती, कुछ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन बंगाली मूल के मुसलमानों में बहुविवाह के मामले हैं और हम इन तमाम बातों का अध्ययन करेंगे."
"हमें सभी कानूनी प्रावधानों की जांच करने के साथ ही मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अधिनियम के भी प्रावधानों को देखना होगा."
मुसलमानों को निशाना बनाने का आरोप
असम विधानसभा में कांग्रेस पार्टी के विपक्ष के नेता देवव्रत सैकिया, सरकार के इस कदम को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से जोड़ते है.
वो कहते हैं, "अभी तक देश में यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड बना नहीं है और राज्य सरकार अलग से नया कानून बनाने चली है. इस तरह के प्रोपेगेंडा में समय और सरकारी पैसा बर्बाद करने की बजाए राज्य की अन्य समस्याओं पर ध्यान देने की ज़रूरत है."
ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के प्रमुख मौलाना बदरुद्दीन अजमल का कहना है, "बहुविवाह केवल मुसलमानों में नहीं है बल्कि अन्य समुदाय में भी है. लिहाजा केवल चुनिंदा मुसलमानों को टारगेट करना उचित नहीं है."
भारत में बहुविवाह एक से अधिक पत्नी या पति होने की प्रथा है. यह मुद्दा व्यक्तिगत कानूनों और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) दोनों द्वारा शासित है.
मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अधिनियम, 1937 के तहत मुस्लिम पुरुषों को एक से ज़्यादा शादी करने की छूट है जिसके तहत पहली पत्नी से सहमति लेने की शर्त है. हालांकि इस क़ानून में केवल पुरुषों को दूसरी शादी करने की इजाजत है. मुस्लिम महिलाएं दूसरी शादी नहीं कर सकती हैं.
राज्य में लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी कहते हैं, "मौजूदा सरकार ने अब तक जो भी कदम उठाए है उनमें ज़्यादातर बंगाली मूल के मुसलमान प्रभावित हुए हैं. फिर चाहे बाल विवाह हो, अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई हो या फिर मदरसों पर कार्रवाई हो."
वो कहते हैं, "बीजेपी सरकार हिंदुत्व की राजनीति के एजेंडे के तहत जो भी काम करती है उसमें प्रभावित होने वाले अधिकांश मुसलमान ही होते हैं."
बीजेपी का जवाब
असम प्रदेश बीजेपी के वरिष्ठ नेता प्रमोद स्वामी कहते हैं, "राजनीति करने वाले लोग कुछ भी आरोप मढ़ देते हैं लेकिन मूल सवाल है कि क्या बहुविवाह प्रथा समाज के हित में है या नहीं?"
वो कहते हैं, "हमारी सरकार इस पर प्रतिबंध के लिए उन सभी क़ानूनी पहलुओं की पड़ताल कर रही है. हम महिला सशक्तिकरण की दिशा में काम करते रहे हैं, यही कारण है कि तीन तलाक़ को ख़त्म किया गया."
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