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असम: 'रेप और हत्या' के मामले की जांच कर रहे अधिकारी और सरकारी डॉक्टर गिरफ़्तार
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- ........से, गुवाहाटी से
"वो पढ़ाई करना चाहती थी लेकिन हम ग़रीब लोग है जैसे-तैसे मज़दूरी कर अपना पेट भरते हैं. इसलिए हमने बेटी को उन लोगों के साथ भेज दिया. हमने सोचा था कि उसे वहां भरपेट खाना मिलेगा और वो अच्छी तरह रहेगी. उन लोगों ने उसे स्कूल में पढ़ाई करवाने की बात भी हमसे कही थी. लेकिन मेरी बेटी को मार दिया गया."
13 साल की मंजू तुरी (बदला हुआ नाम) की मां देवंती तुरी इतना कहने के बाद रोने लगती है.
दरअसल बीते 11 जून को आदिवासी नाबालिग लड़की मंजू का शव असम के दरांग ज़िले के धूला थाना क्षेत्र में रहने वाले कृष्ण कमल बरुआ के घर से बरामद हुआ था.
कृष्ण कमल बरुआ और उनकी पत्नी सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) में काम करते हैं और मंजू पिछले दो साल से उनके घर पर घरेलू सहायिका के रूप में काम कर रही थी.
पीड़ित परिवार ने 12 जून को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई. पुलिस में दर्ज शिकायत में मंजू का बलात्कार करने के बाद हत्या के आरोप लगाए गए हैं.
मंजू की मां देवंती कहती हैं, "इस साल जब वो बिहू के त्योहार पर घर आई थी, तो वापस जाना नहीं चाह रही थी. वो यहीं रहकर पढ़ना चाहती थीं. लेकिन वो लोग उसे जबरदस्ती ले गए और एक हफ़्ते के अंदर उसकी मौत की ख़बर आ गई. मेरी बेटी के हत्यारों को कड़ी सज़ा मिलनी होगी."
असम के सीएम पीड़ित के घर पहुंचे
फिलहाल इस मामले की जांच कर रही सीआईडी अर्थात आपराधिक जांच विभाग ने तत्कालीन ज़िला पुलिस अधीक्षक राज मोहन राय, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक रूपम फुकन, मजिस्ट्रेट आशीर्वाद हज़ारिका, थाना प्रभारी उत्पल बोरा तथा तीन सरकारी चिकित्सकों को गिरफ़्तार कर लिया है.
जबकि पुलिस ने इस मामले के मुख्य अभियुक्त कृष्ण कमल बरुआ को पहले ही गिरफ़्तार कर लिया था.
इस मामले की जांच को लेकर शुरुआत में ज़िला पुलिस प्रशासन की तरफ़ से कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए थे.
पहले यह मामला अप्राकृतिक मौत के रूप में दर्ज किया गया था, लेकिन बाद में इसे आत्महत्या में बदल दिया गया.
लेकिन ऑल असम आदिवासी छात्र संघ और गांव के लोगों द्वारा इस मामले को लेकर प्रशासन पर लगातार दबाव बनाने के बाद 12 अगस्त को मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा राज्य के पुलिस महानिदेशक के साथ पीड़ित परिवार से मिलने उनके गांव पहुंचे.
मुख्यमंत्री हिमंत ने दोबारा जांच के आदेश दिए
इस बीच मुख्यमंत्री ने उस दौरान दरांग ज़िले के पुलिस अधीक्षक रहे राज मोहन राय से इस मामले से जुड़े कई सवाल पूछे और उसी दिन उन्होंने पुलिस अधीक्षक और अन्य तीन पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया.
मुख्यमंत्री के कहने पर इस मामले की फिर से जांच करने की ज़िम्मेदारी सीआईडी को सौंपी गई और तीन अधिकारियों को लेकर एसआईटी टीम का गठन किया गया.
इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "यह एक आत्महत्या का मामला होने का दावा करने के बावजूद रस्सी से लटकते हुए शव की कोई तस्वीर नहीं ली गई. इसके अलावा अभियुक्तों ने ख़ुद लड़की के शव को उस स्थान से हटाया था. ''
उन्होंने कहा, ''उस समय मैंने दरांग ज़िले के एसपी से कई सवाल पूछे थे, लेकिन वे कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए. ऐसा लगता है कि इस पूरी घटना को छिपाने का प्रयास किया गया."
उन्होंने कहा, "पुलिस अधीक्षक, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, थाना प्रभारी, शव का पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक और जिस मजिस्ट्रेट ने क़ानूनी जांच की थी उन सभी की भूमिका पर संदेह था. इसके बाद हमने इस मामले की जांच सीआईडी से करवाई जिसमें कई तथ्यों का पता चला जिसके बाद ये गिरफ़्तारियां हुई."
मुख्यमंत्री ने कहा कि इस घटना की नए सिरे से जांच के दौरान सीआईडी ने फोरेंसिक और कई वैज्ञानिक साक्ष्य संग्रह किए है और शव को कब्र से निकाल कर दोबारा पोस्टमार्टम किया गया है.
पुलिस एफ़आईआर लिखने से कर रही थी आनाकानी
ऑल असम आदिवासी छात्र संघ के शोणितपुर ज़िले के उपाध्यक्ष नारायण सिंह गौड़ ने इस घटना पर बीबीसी से कहा, "हमारे जनजाति के लोग शिक्षा के स्तर पर आज भी काफी पीछे हैं. ग़रीब है. मंजू के माता-पिता दोनों मज़दूर है और उनकी पांच संतानें थीं. जिनमें अब मंजू नहीं रहीं. ''
वो कहते हैं, '' पुलिस शुरुआत में एफ़आरआई लिखने को तैयार नहीं थी. लेकिन मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद इस मामले में इतने बड़े स्तर पर कार्रवाई हुई है. हम चाहते हैं कि दोषियों को सख़्त सज़ा मिले ताकि ऐसी घटनाओं को आगे रोका जा सके."
नारायण सिंह गौड़ की मानें तो असम सरकार ने इस घटना के बाद शोणितपुर ज़िले के प्रजापथार गांव में रहने वाले मंजू के पिता राजू तुरी को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत एक घर दिया है, जिसके निर्माण का काम जारी है. इसके अलावा पंचायत स्तर की एक योजना के तहत पीड़ित परिवार को क़रीब 2 लाख रुपये की मदद की जा रही है.
क्या इन आदिवासी लोगों की आर्थिक स्तर पर ऐसी मदद किसी घटना से पहले नहीं होनी चाहिए?
इस सवाल का जवाब देते हुए नारायण सिंह गौड़ कहते हैं, "सरकार को शिक्षा और आर्थिक स्तर पर हमारी जनजाति के लोगों की ज़्यादा मदद करने की ज़रूरत है. ख़ासकर राजू तुरी जैसे लोगों की आर्थिक मदद होनी चाहिए, ताकि वे अपने बच्चों को कभी बाहर काम करने न भेजें."
'सरकार को इस बारे में सख्ती से जांच करने की ज़रूरत'
वहीं ऑल असम चाय छात्र संघ के नेता मोहन तांती का कहना है कि "ये बाल अधिकार हनन का मामला है और यह कोई इकलौता मामला नहीं है, ऐसे कई बड़े लोग हैं जो ख़ासकर हमारी चाय जनजाति के नाबालिग बच्चों को अपने घरों में काम के लिए रखे हुए हैं. लिहाजा सरकार को इस बारे में सख्ती से जांच करने की ज़रूरत है."
इस बीच सीआईडी ने इस मामले को लेकर एक आधिकारिक बयान जारी करते हुए बताया, "सीआईडी ने अपनी जांच में जो साक्ष्य एकत्र किए है उनमें तत्कालीन पुलिस अधीक्षक राज मोहन राय द्वारा नाबालिग बालिका हत्याकांड के मुख्य आरोपी कृष्ण कमल बरुआ के परिजनों से रिश्वत लेने के प्रमाण मिले हैं और उसी आधार पर उन्हें गिरफ़्तार किया गया है.
मुख़्य अभियुक्त के परिवार के बैंक खाते के विवरण, सीडीआर, टावर लोकेशन और जियो लोकेशन मैपिंग विश्लेषण करने तथा सभी संबंधित गवाहों की जांच के बाद यह रिकॉर्ड में आया है कि एसपी राय ने मुख़्य अभियुक्त को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए तत्कालीन थाना प्रभारी के माध्यम से अभियुक्त परिवार से 2 लाख रुपये लिए थे."
सीआईडी ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और आईपीसी की धारा 120बी/420/218 आरडब्ल्यू की धारा 7(बी), (8)1)0i) आईपीसी अधिनियम 1988 (2018 में संशोधित) के तहत एक नया मामला (सं. 20/2022) दर्ज कर इन पुलिस अधिकारियों को गिरफ़्तार किया है.
इसके अलावा इन सभी सरकारी अधिकारियों पर आरोप है कि इन लोगों ने इस मामले में जांच प्रक्रिया के दौरान नियमों का पालन नहीं किया और इसे आत्महत्या के रूप में पारित करने के प्रयास में फर्जी रिपोर्ट प्रस्तुत की.
मुख्यमंत्री क्या बोले?
इस मामले की जांच को लेकर मुख्यमंत्री सरमा कहते है, "घर में सहायिका के तौर पर काम करने वाली लड़कियों के साथ बलात्कार-हत्या के जो मामले सामने आते हैं उनमें कई बार आरोपी आत्महत्या का दावा कर बचने का प्रयास करते है. ''
वो कहते हैं, ''कई बार पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जांच रिपोर्ट भी पुलिस की मदद नहीं करती,इसलिए इस मामले की जांच और कार्रवाई से सरकार उन सभी अधिकारियों को कड़ा संदेश देना चाहती है ताकि पुलिस, मजिस्ट्रेट और चिकित्सक अपने कर्तव्य का पालन ईमानदारी से करें."
पुलिस की एक जानकारी के अनुसार जेल में बंद मुख़्य अभियुक्त कृष्ण कमल बरुआ के ख़िलाफ़ 25 सितंबर को एक विस्तृत आरोप पत्र दायर किया गया है.
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