पुतिन के प्रस्ताव को चीन ने क्यों नहीं किया स्वीकार

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सोमवार को कहा था कि उन्होंने उस सुझाव पर सहमति दे दी है, जिसमें रूस और अमेरिका सैन्य बजट में बड़ी कटौती पर बात कर सकते हैं.
दोनों देशों के बीच सैन्य बजट में 50 फ़ीसदी तक की कटौती पर बात हो रही है.
पुतिन ने कहा था, ''हम अमेरिका के साथ सैन्य खर्चों में कटौती को लेकर एक समझौते पर पहुँच सकते हैं. हम इसके ख़िलाफ़ नहीं हैं. यह ऐसा सुझाव है, जिससे मैं भी सहमत हूँ. अमेरिका अपने सैन्य बजट में 50 फ़ीसदी की कटौती करेगा और हम भी वैसा ही करेंगे. चीन भी चाहे तो इसमें शामिल हो सकता है.''
लेकिन चीन को पुतिन का यह सुझाव पसंद नहीं आया.
25 फ़रवरी को समाचार एजेंसी एएफ़पी ने चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जिआन से पूछा कि पुतिन ने कहा है कि चीन भी इस प्रस्ताव में शामिल हो सकता है, क्या चीन इस प्रस्ताव का समर्थन करेगा? 24 फ़रवरी की रात राष्ट्रपति शी जिनपिंग और राष्ट्रपति पुतिन के बीच जो बातचीत हुई थी, उसमें क्या इस प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई थी?''
इस सवाल के जवाब में चीन विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने लिन जिआन ने कहा, ''राष्ट्रपति पुतिन और शी जिनपिंग के बीच फोन पर जो बातचीत हुई, उसका रीडआउट जारी किया जा चुका है. आपने रक्षा खर्चों की बात की. हाल के वर्षों में वैश्विक रक्षा खर्चों में भारी बढ़ोतरी हुई है."
"आँकड़ों के मुताबिक़ 2024 में वैश्विक रक्षा ख़र्च 2.43 ट्रिलियन डॉलर था, जो कि अब तक का रिकॉर्ड है. वैश्विक रक्षा खर्चों में भारी बढ़ोतरी बढ़ती वैश्विक असुरक्षा के कारण है. सभी देश वैश्विक सुरक्षा की चुनौतियों से जूझ रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को और ख़ास कर बड़े देशों को विश्व शांति के लिए पहल करनी चाहिए.''
चीन ने क्यों इनकार किया

लिन जिआन ने कहा, ''चीन शांतिपूर्ण प्रगति के लिए प्रतिबद्ध है. राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा, विकास से जुड़े हित और विश्व शांति बनाए रखने को रक्षा खर्चों को सीमित करने से जोड़ना उचित नहीं है. चीन की अपनी आत्मरक्षा रणनीति है, जिसके तहत हम राष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के बीच समन्वय बनाते हैं. चीन किसी भी देश से हथियारों की होड़ नहीं कर रहा है. हमारी नीति दुनिया की स्थिरता और शांति के पक्ष में है.''
चीन ने पुतिन के प्रस्ताव को स्वीकार तो नहीं किया लेकिन कुछ अहम बातें कहीं.
चीन ने कहा कि हाल के वर्षों में रक्षा खर्च दुनिया के कई इलाक़ों में तनाव के कारण बढ़ा है. चीन ने यह भी कहा कि बड़े देशों की ज़िम्मेदारी है कि शांति के लिए काम करें.
लिन से पहले चीन के विदेश मंत्रालय ने इस महीने की शुरुआत में कहा था कि अमेरिका का सैन्य ख़र्च दुनिया भर में सबसे ज़्यादा है और उसे मिसाल पेश करना चाहिए.
चीन ने कहा था कि दुनिया के 90 प्रतिशत परमाणु हथियार रूस और अमेरिका के पास हैं. ऐसे में पहले इन्हें अपना परमाणु हथियार कम करना चाहिए तब बाक़ी देशों से कहना चाहिए.
क्या है चीन की मंशा

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दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में रूसी और मध्य एशिया अध्ययन केंद्र में असोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ राजन कुमार मानते हैं कि रक्षा खर्चों में कटौती के लिए पुतिन का तैयार होना बहुत हैरान नहीं करता है.
डॉ राजन कुमार कहते हैं, ''हथियारों की होड़ रोकने के लिए अमेरिका और रूस के बीच समझौते होते रहे हैं. यहां तक कि सोवियत संघ और अमेरिका के बीच भी कई समझौते हुए थे. रूस की अर्थव्यवस्था इतनी अच्छी नहीं है कि वह अमेरिका के साथ हथियारों में होड़ कर सकता है. इससे फ़ायदा रूस को ही होगा.''
डॉ राजन कुमार कहते हैं, ''अब असली होड़ चीन और अमेरिका के बीच है लेकिन चीन ऐसे किसी भी प्रस्ताव का समर्थन नहीं करेगा."
"चीन को लगता है कि वह अब भी सैन्य ताक़त के मामले में अमेरिका से पीछे है और जब तक अमेरिका की बराबरी नहीं कर लेगा तब तक रक्षा बजट में कटौती के लिए तैयार नहीं होगा. रूस यह भी नहीं चाहता है कि चीन सैन्य ताक़त के रूप में महाशक्तिशाली बन जाए. चीन रूस का पड़ोसी है.''
चीन की सैन्य ताक़त

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1969 में आमूर और उसुरी नदी के तट पर रूस और चीन के बीच एक युद्ध भी हो चुका है. इस युद्ध में रूस ने चीन पर परमाणु हमले की धमकी तक दे डाली थी.
इसमें चीन को क़दम पीछे खींचने पड़े थे. 2004 में दोनों देशों के बीच समझौते हुए और सेंट्रल एशिया के कई द्वीपों को रूस ने चीन को सौंप दिया था.
यूक्रेन और रूस की जंग में चीन आधिकारिक रूप से तटस्थ रहा है लेकिन इस दौरान रूस से गैस और तेल सबसे ज़्यादा चीन ने ही आयात किया है. यूरोप का कहना है कि रूस-यूक्रेन जंग के दौरान पुतिन को चीन से काफ़ी मदद मिली है.
लंदन स्थित थिंक टैंक इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फोर स्ट्रैटिजिक स्टडीज़ (आईआईएसएस) ने 12 फ़रवरी को अपनी रिपोर्ट जारी की थी. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले साल वैश्विक सैन्य खर्च 2.46 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गया था.
2024 में चीन का सैन्य खर्च 236 अरब डॉलर था. चीन ने 7.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी की थी. लेकिन कई विश्लेषक मानते हैं कि चीन का असली सैन्य ख़र्च आधिकारिक आँकड़ों से कहीं ज़्यादा होता है.
अमेरिकन एन्टरप्राइजेज इंस्टिट्यूट का अनुमान है कि पिछले साल चीन का सैन्य ख़र्च 711 अरब डॉलर था, जो अमेरिका के 850 अरब डॉलर से बहुत पीछे नहीं है.
हाल के दशकों में चीन ने पीपल्स लिबरेशन आर्मी का तेज़ी से आधुनिकीकरण किया है. शी जिनपिंग का लक्ष्य है कि जब चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के शासन का 2049 में 100 साल हो जाए तो एक वर्ल्ड क्लास आर्मी तैयार हो जानी चाहिए.
चीन की इसी तैयारी को अमेरिका चुनौती के रूप में देखता है. चीन की बढ़ती ताक़त से चिंता केवल अमेरिका की ही नहीं है बल्कि भारत, जापान और ताइवान भी चिंतित हैं. ताइवान को चीन अपना हिस्सा बताता है.

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इंस्टिट्यूट फ़ॉर स्ट्रैटिजिक स्टडीज ने कहा, ''2024 में एशियाई देशों के रक्षा बजट में मध्यम गति की वृद्धि देखने को मिली है. चीन के बढ़ते सैन्य खर्च और उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों के आधुनिकीकरण को आसपास के देश ख़तरे के रूप में देख रहे हैं. ऐसे में इन देशों ने रक्षा बजट को बढ़ाया है. ख़ास कर जापान ने.''
अमेरिका और रूस की बढ़ती क़रीबी पर दुनिया भर की नज़रें हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच भरोसा किस हद तक बढ़ता है, इसे लेकर अभी कुछ भी कहना मुश्किल है.
फ़रवरी 2022 में यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध शुरू होने के बाद रूस और चीन में गर्मजोशी बढ़ी थी. पश्चिम के कड़े प्रतिबंधों के कारण रूस के पास चीन के क़रीब जाने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं था. लेकिन ट्रंप अब रूस को लेकर जिस तरह की उदारता दिखा रहे हैं, उससे पूरा समीकरण बदलता दिख रहा है.
ट्रंप का कहना है कि जब यूक्रेन की समस्या सुलझ जाएगी तब रक्षा खर्चों और परमाणु हथियारों को कम करने पर बात शुरू होगी. ट्रंप राष्ट्रपति पुतिन से मिलने की तैयारी कर रहे हैं.
ट्रंप रूस से यूक्रेन में जारी जंग ख़त्म करने के लिए बात तो कर रहे हैं लेकिन इसमें न तो यूरोप शामिल है और न ही यूक्रेन.
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