पाकिस्तान में मानसिक विकार का सामना कर रहे बच्चों को संभालना कितना चुनौतीपूर्ण: ब्लॉग

बच्ची

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    • Author, उरूज जाफ़री
    • पदनाम, इस्लामाबाद से, बीबीसी हिंदी के लिए

वो पिछले 12 सालों से अपनी मां के साथ हमारे घर आया करती थी. मेरे लिए बिलकुल बेटियों जैसी थी. बड़ी समझदार, शौक से स्कूल जाती.

समय बीतता गया वो नन्हीं सी सलमा बड़ी होती गई. कुछ हफ्ते पहले उसकी मां ने बताया कि "बाजी आज कल सलमा सोते, जागते और अक्सर तो बैठे-बैठे भी डर जाती है, रोती है, कहती है- 'मुझे कोई डराता है. कोई लंबा सा आदमी है जो आप लोगों को नहीं दिखता, लेकिन मुझे डराता है."

मैंने उन्हें अपने बच्चों की डॉक्टर के पास भेजा. डॉक्टर का मानना था कि शारीरिक तौर पर सलमा बिलकुल सुस्त है, जहां तक इसके अचानक डर जाने की बात है तो बच्चे से बात करें, कोई दबाव हो सकता है, जिसकी वजह से ऐसा हो.

हमने यह करके देखा, केएफसी गए, खाना ऑर्डर किया, सलमा से गपशप भी की लेकिन ऐसा कुछ ना जान सके जो उसके डराने का कारण होता. लेकिन कुछ तो था.

सलमा को इस साल नौवीं क्लास की बोर्ड परीक्षा देनी है. मैंने कुछ थेरेपिस्ट और मनोचिकित्सकों से भी इस बारे में बात की और एडवोकेसी ग्रुप से भी बात की.

बच्चों में न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर

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ऐसे बच्चे हों या बड़े हों, समाज तो उन्हें पागल कहना शुरू कर देता है, ऐसे में सवाल यही है कि ये स्थिति आख़िर है क्या, जबकि कई न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर की समस्या का सामना किया जा सकता है.

कइयों की ये स्थिति किसी भी मां-बाप और परिवार के लिए बड़ी कठिन हो सकती है. कभी बच्चे डिसलेक्सिया, ऑटिज़्म और इप्लिपेसी से भी जूझ रहे होते हैं. मां-बाप, परिवार, स्कूल और समाज सभी मिल कर इनके साथ सामान्य ढंग से पेश आ सकते हैं और इनको पागल भी कर सकते हैं.

बहरहाल, इन दिनों सलमा का इलाज चल रहा है और वो बेहतर भी हो रही है.

मैंने इसी इश्यू को कुछ और परिवारों के साथ भी मिलकर खोजना चाहा. इबाद अब यूनिवर्सिटी का छात्र है. वो पैदाइश से ही ऑटिज़्म का शिकार था. मां-बाप को उसके छह महीने के होने पर यह पता चल गया था कि वह दूसरे बच्चों की तरह चलता-फिरता या फिर बोलता नहीं है.

बोलने में जैसे वह शब्दों को आवाज़ देना चाहता हो लेकिन अल्फ़ाज़ बन नहीं पाते. जब उसने क़दम उठाना शुरू किए तो वह दूसरे बच्चों जैसे नहीं चलता था बल्कि अपने पंजों पर सारा वज़न डालकर चलने की कोशिश करता.

इबाद का जन्म नॉर्वे में हुआ था. वो अपना मां-बाप का पहला बच्चा है. इबाद की मां सीमा जी का मानना है, ''मुझे नज़र आ रहा था कि कुछ तो अलग है मेरे बेटे में और उसका जीवन आसान नहीं होगा.''

एक मां ने कैसे संभाला ऑटिज़्म के शिकार बच्चे को

ऑटिज़्म का शिकार एक बच्चा

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सीमा जी ने बताया कि नॉर्वे में बच्चों के लिहाज़ से सिस्टम अच्छा और सपोर्ट करने वाला था. इबाद के शिक्षक भी उसकी सेहत पर नज़र रखते थे. उसने दो साल के होने अपने पंजों पर चलना और भागना तो शुरू कर दिया था लेकिन बोल वो अब भी नहीं पाता था.

इबाद के मां-बाप ने कुछ समय सब्र से गुज़ारा लेकिन जब वो तीन साल का हुआ तो फिर उसके काफ़ी सारे मेडिकल टेस्ट हुए जो अलग अलग मसलों से जुड़े थे और ये सब डायग्नोसिस ज़रूरी भी थे.

साढ़े चार साल की उम्र में इबाद को ऑटिस्टिक पाया गया. ऑटिज़्म, दिमाग़ की ऐसी स्थिति होती है जिसका कोई एक कारण नहीं होता है. उसकी कई तरह की अलर्जी और पंजों पर चलने की समस्या भी अब साथ ही रहने वाली थी. एक मां होने के नाते सीमा जी को ख़्वाब में दिखना शुरू हो गया था कि इबाद के जीवन से जुड़ी मुश्किलों को उन्हें उसके साथ मिलकर आसान बनानी होंगी.

जब ये सब डायग्नोसिस हुई तो सीमा जी फौरी तौर पर उसको सहन नहीं कर सकीं और अस्पताल में डॉक्टरों से मीटिंग के वक्त ख़ूब रोने लगीं. ये वो पहला दिन था जब इबाद के लिए मां-बाप, डॉक्टर, केजी स्कूल का स्टाफ़ और थेरेपिस्ट- सबने मिलकर अपनी अपनी ज़िम्मेदारियां बांट लीं. और इन लोगों ने आज तक पीछे मुड़कर नहीं देखा. इबाद के लिए जीवन को छोटे छोटे क़दमों से जीना आसान बनाया.

पाकिस्तान में एडवोकेसी समूह तो कुछ ना कुछ काम कर रहे हैं, जो इन न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर से जूझ रहे बच्चों और मां-बाप को गाइड करते हैं.

जहां तक समाज और परिवार का ताल्लुक है तो सीमा जी का कहना था कि इबाद को लेकर सभी घर वालों ने समझदारी से हालात को समझा और यही वजह है कि वह परिवार भर में बहुत लाडला है. लेकिन समाज से जूझना कभी आसान नहीं होता.

अगर इन कठिनाइयों को लोगों से बांटा न गया तो ये मुश्किल बन सकती है लेकिन अच्छा है कि इनको जितनी जल्दी लोगों तक शेयर कर के स्थिति को समझाया जा सके. लेकिन हां, ये इतना आसां भी नहीं है.

थेरेपिस्ट के पास कौन जाता है?

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थेरेपिस्ट फ़रयाल यूसुफ़ का मानना है कि जो लोग उनको थेरेपी के लिए संपर्क करते हैं वो ज़्यादातर घबराहट, तनाव, सेक्स आइडेंटिटी क्राइसिस या कामकाजी दबाव पर बात करना चाहते हैं. इसके अलावा सेहत से जुड़े मसलों पर भी बात करते हैं.

जहां तक बच्चों का सवाल है तो एपिलेप्सी या मिर्गी की बीमारी का सामना कर रहे बच्चों के मां बाप भी थेरेपी के लिए संपर्क करते हैं. इस तरह की मानसिक समस्याएं बच्चों में अक्सर अनुवांशिकता से आती हैं. इसलिए कई बार बच्चे के साथ उनके माता-पिता को भी थेरेपी की ज़रूरत होती है.

अनुवांशिकता के अलावा ये समस्याएं इम्यून सिस्टम के कमज़ोर होने से भी हो सकती हैं. इसके अलावा बचपन में हुए कोई हादसे या मामले भी बच्चों के ज़हनी संतुलन को बिगाड़ सकते हैं और मां को अगर गर्भावस्था के दिनों में कोई सदमा हो जाए तो भी बच्चे के दिमाग़ पर उसका असर हो सकता है.

बच्चों को थेरेपी के लिए एक ख़ास सेटअप की दरकार होती है. वो एक कमरा भी हो सकता है, कमरे का रंग, उसमें रखे खिलौने, पेपर, दूसरी चीज़ें, गुड़िया या पेंसिल भी हो सकती हैं. जिनके साथ बच्चा खुद को जुड़ा हुआ महसूस कर सके और बात करना आसान हो. अक्सर बच्चों के परिवार वालों को भी इस थेरेपी की ज़रूरत पड़ सकती है कि किस तरह से वे दिमाग़ी तनाव को कम कर सकें.

बच्चों के लिए थेरेपी का असली मक़सद उनको किसी भी तरह के सामाजिक दबाव और शर्म से जूझना सिखाना होता है. ये मरीज़ और थेरेपिस्ट, दोनों के लिए आसान नहीं होता. किसी की तकलीफ़ को समझते हुए उसकी रूह पर मरहम रखना होता है ताकि वो अपने तकलीफ़ों को खुद संभालना सीख सके.

ANILA KHAN
पाकिस्तान में अगर सरकार-मीडिया की सपोर्ट हो जाए तो ऐसे मरीज़ या युवाओं को बहुत हौसला मिलेगा और वो खुद को अक्षम या मज़बूर नहीं समझेंगे और समाज में सामान्य तरीके से क़दम बढ़ा सकेंगे
अनिला ख़ान
मनोवैज्ञानिक काउंसलर

ये सब सिर्फ़ थेरेपिस्ट और मरीज़ की कोशिश से नहीं बल्कि समाज, जिसमें परिवार, दोस्त, स्कूल सभी शामिल हैं, सबके समझाने और साथ देने से ही एक मरीज़ खुद को संभाल सकता है.

ऐसे बच्चों और बड़ों की एडवोकेसी करने वाली अनिला ख़ान का कहना है कि पाकिस्तान में अगर सरकार और मीडिया की सपोर्ट हो जाए तो ऐसे मरीज़ या युवाओं को बहुत हौसला मिलेगा और वो खुद को अक्षम या मजबूर नहीं समझेंगे और समाज में सामान्य तरीक़े से क़दम बढ़ा सकेंगे.

पाकिस्तान में नहीं हैं सुविधाएं

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अनिला ख़ान का मानना है कि अफ़सोस की बात ये है कि पाकिस्तान में ऐसा नहीं हो पा रहा है. उनके मुताबिक़, पाकिस्तान में तक़रीबन तीस लाख लोग हैं जिन्हें दिमाग़ी तौर पर देखभाल की ज़रूरत है, लेकिन इन लोगों को देखभाल के लिए ज़रूरी सुविधाएं कम हैं.

अनिला ख़ान ने इबाद और उनके परिवार वालों को भी गाइड किया. जब इबाद, अपने परिवार के साथ नॉर्वे से पाकिस्तान आया तो उसे वैसे स्कूल में तालमेल बिठाना था, जहां स्पेशल छात्रों के लिए सुविधाएं ना के बराबर थीं.

ऑटिज़्म में किसी भी व्यक्ति को समझाने और बोलने में सामान्य से ज़्यादा वक्त लग जाता है. फॉरेस्ट गंप हो, तारे ज़मीं पर या माय नेम इज़ ख़ान, इन सभी किरदारों में ऐसे सपोर्टिव कैरेक्टर दिखाए गए हैं जो इन ख़ास लोगों के जीवन में बदलाव ला सके.

इबाद के असली जीवन में ये किरदार उसके मां-बाप ने अदा किए. जो हर लम्हे उसकी हिम्मत बंधाते, उसे ज़िंदगी को जीने की सीख देते रहे हैं. पाकिस्तान में ऐसे ख़ास स्कूल और रोल मॉडल्स कम ही हैं लेकिन अब्दुल सत्तार इदी वो नाम हैं जो सारी दुनिया के लिए रोल मॉडल से कम नहीं हैं.

अब्दुल सत्तार इदी को थी यह समस्या

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यक़ीन करना भले मुश्किल हो लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी एंबुलेंस सेवा के जनक रहे अब्दुल सत्तार इदी को ज़िंदगी के चालीस साल तक मिर्गी की दवा खानी पड़ी. ये जानकारी उनके बेटे फ़ैसल इदी से हासिल हुई जो बताते हैं कि उनके अब्बू, ने अपने जीवन में मिर्गी के चलते कोई रुकावट नहीं देखी.

फ़ैसल के मुताबिक इदी साहब को ये समस्या बचपन से नहीं थी, लेकिन एक हादसे के बाद उनके साथ ये समस्या शुरू हुई थी.

वे तब बीस साल के युवा थे. इसकी चपेट में आने के बाद वे बात करते-करते कुछ पलों के लिए बिलकुल होश खो देते थे, थोड़े समय के बाद वापस सामान्य हो जाते थे.

फ़ैसल इदी के मुताबिक उनके वालिद कराची के मशहूर न्यूरोलॉजिस्ट राशिद जुमा के मरीज़ थे, लेकिन इससे उनकी समाजसेवा में कहीं कोई बाधा नहीं पहुंची.

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