बुलिंग की रोकथाम के लिए क्या कर सकते हैं अभिभावक

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    • Author, रवि प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

साल 2022 में दिल्ली से सटे फ़रीदाबाद में एक छात्र के ख़ुदकुशी के मामले ने सभी को झकझोर कर रख दिया था.

इस बच्चे की माँ आरती मल्होत्रा ने तब बीबीसी से बातचीत में कहा था कि उनके बच्चे के जेंडर को लेकर बुली किया जाता था.

हमारे आसपास स्कूलों या कॉलेज में बुली के मामले आए दिन सामने आते रहते हैं.

इसे ध्यान में रखते हुए भारत सरकार के मानव संसाधन और विकास मंत्रालय ने भी सीबीएसई से बुलिंग रोकने के लिए सख़्त कार्रवाई करने और बुलिंग के दोषी पाए गए छात्रों को स्कूल से निष्कासित करने तक की बात कही थी.

जानकारों की मानें, तो बुलिंग बच्चों के दिमाग़ और मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती है और युवा होने पर इसकी छाप बनी रहती है.

दुनिया की नामचीन हस्तियों को भी अपने जीवन में इसका सामना करना पड़ा है और वे सेलिब्रेटी बनने के बाद भी उन बुरी यादों को नहीं भुला पाए हैं.

बुलिंग के बारे में अमेरिकी गायिका लेडी गागा, कनाडा के गायक शान मेंडेस, अमेरिकी अभिनेता ब्लैक लिवली, अमेरिकी अभिनेत्री करेन एलन, ब्रिटिश राजकुमारी केट मिडलटन, अमेरिकी फ़िल्म निर्देशक माइक निकोलस और अमेरिकी रैपर एमिनेम भी बात कर चुके हैं.

इन सभी सेलिब्रिटीयों ने अपने साथ स्कूल के दिनों में हुई बुलिंग की बात सार्वजनिक मंचों पर कही है.

साथ ही इन्होंने इस बात को भी साझा किया कि स्कूल के दिनो में हुई बुलिंग ने उनके बाद के जीवन पर भी किस तरह से प्रभाव डाला.

बुलिंग से मानसिक और शारीरिक प्रभावों पर कई शोध भी हो चुके हैं.

किंग्स कालेज लंदन में डेवलपमेंटल साइकोलॉजी की प्रोफ़ेसर लुईस आर्सेनाल्ट का कहना है, "लोगों को लगता था कि बुलिंग एक सामान्य व्यवहार है और ये कि अच्छा भी है क्योंकि ये आपके कैरेक्टर को बनाने में मदद करता है लेकिन शोधकर्ताओं को ये समझने में लंबा समय लगा कि बुलिंग एक ऐसा बर्ताव है जो नुक़सानदेह हो सकता है.”

साथ ही वे कहती हैं “पहले तो हम यह मानते ही नहीं थे कि बुलिंग कोई बीमारी है. हमें यह समझने मे बहुत वक़्त लगा कि बुलिंग के कारण लोग बीमार हो रहे हैं और बुलिंग की आदत भी एक तरह की मानसिक समस्या ही है.”

स्कूल में बुलिंग

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क्या कहता है शोध

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हाल ही में हुई एक रिसर्च कहती है कि बुलिंग लोगों को मानसिक और शारीरिक तौर पर बीमार बना सकती है.

बचपन में बुलिंग के शिकार हुए कई लोग अपनी प्रौढ़ावस्था में भी इस वजह से स्वस्थ महसूस नहीं करते. उन्हें इलाज के लिए डॉक्टर के पास जाना पड़ता है.

प्रोफ़ेसर लुईस आर्सेनाल्ट ने अपनी रिसर्च में पाया कि इससे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है.

वे बताती हैं कि 7-12 साल की उम्र में बुलिंग के शिकार बच्चों में यह असर उनकी उम्र के 45 वें साल तक बरकरार रह सकता है.

हार्वड रिव्यू ऑफ़ साइकियाट्रिक में प्रकाशित उनके शोध आलेख में कई उदाहरणों के साथ बुलिंग के ख़तरों की व्याख्या की गई है.

उन्होंने लिखा है कि बचपन में हुई बुलिंग का प्रभाव दशकों तक रहता है. इससे लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है.

इससे पैनिक डिसॉर्डर भी हो सकता है. कई लोग बाद के दिनो में भी दोस्त नहीं बना पाते और उन्हें दूसरों पर भरोसा करने मे कठिनाइयाँ होती हैं.

इसका असर उनके शैक्षणिक उपलब्धियों पर भी पड़ता है और इस कारण उन्हें बाद के दिनों में आर्थिक परेशानियाँ भी हो जाती हैं.

आरती मल्होत्रा ने भी अपने बच्चे आर्वे के बारे में बताया था वो भी डिप्रेशन में चला गया था और उसका इलाज भी चला था.

लेकिन स्थिति इतनी ख़राब हो गई थी कि उसने सुसाइड करने जैसा क़दम उठा लिया.

लेकिन अगर किसी लड़की के साथ बचपन में बुलिंग होती है तो इस शोध के मुताबिक़ उसे युवावस्था में जाकर घबराहट या इससे संबंधित बीमारी होने की अशंका 27 गुना अधिक होती है वहीं पुरुषों में ये औसत 18 गुना ज़्यादा होता है.

मनोवैज्ञानिकों की राय

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सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकियाट्री मे एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ संजय मुंडा कहते हैं कि बुलिंग को कई लोग दरकिनार कर देते है, जो बिल्कुल भी सही नहीं है.

डॉ संजय मुंडा बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, “बुलिंग के शिकार बच्चे पूरी उम्र वे बातें नहीं भूल पाते. वे हमेशा सशंय में रहते हैं."

वे इस बारे में अभिभावकों को ये सलाह देते हैं, ''अगर बच्चा ऐसी किसी समस्या के साथ उनके पास आता है तो उन्हें इस पर खुलकर बात करतनी चाहिए. वे बच्चों के व्यवहार में परिवर्तन देखते हैं तो उसे ख़ारिज न करें.”

डॉ संजय मुंडा बताते हैं कि अगर माता-पिता इस बारे में सचेत रहते हैं तो इससे समय रहते बुलिंग के प्रभावों को कम करने में आसानी होगी.

डॉ मुंडा मानते हैं कि बुलिंग को लेकर भारत में अभी उतनी जागरुकता नहीं है.

वे एक मामला साझा करते हुए कहते हैं कि हाल ही में उनके पास एक 11 साल के बच्चे का मामला सामने आया था.

इस बच्चे को उसके दोस्त तंग करते थे इसलिए वो स्कूल नहीं जाना चाहता था लेकिन उसकी काउंसलिंग के बाद अब वो पहले की तरह स्कूल जाता है.

ऐसे में अभिभावकों को घबराने की बजाए मनोचिकित्सकों से सलाह लेनी चाहिए.

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बुलिंग की रोकथाम के क़ानून

भारत में बुलिंग की रोकथाम के लिए अलग से कोई क़ानून नहीं है. वरिष्ठ वकील दीपक भारती कहते हैं कि वैसे तो बुलिंग के लिए कोई विशेष क़ानून नहीं है लेकिन आइपीसी की कई धाराओं से इससे डील किया जा सकता है.

वे कहते हैं, “अगर बुलिंग के कारण किसी ने आत्महत्या कर ली, तो उसके साथ बदमाशी करने वाले लोगों के ख़िलाफ़ हत्या के लिए उकसाने का मामला (आइपीसी की धारा 306) दर्ज कराया जा सकता है. इसमें दोष साबित होने पर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है.”

“बात अगर मारपीट, गाली-गलौज या शारीरिक हानि की होगी, तो इसके लिए भी भारतीय दंड संहिता में प्रवाधान किए गए हैं. इसलिए यह समझना कि बुलिंग करके कोई बच जाएगा, यह गलत है. उसे क़ानून के मुताबिक़ सज़ा मिलनी ही है.”

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अभिभावक कैसे कर सकते हैं मदद

दक्षिण कैरोलिना (अमेरिका) के क्लेमसन विश्वविद्यालय में डेवलपमेंटल साइकोलॉजी की प्रोफ़ेसर सुशान लिंबर कहती हैं कि बच्चों के माता-पिता को ऐसे मामलों के सामने आने का इंतज़ार नहीं करना चाहिए.

उनके अनुसार अभिभावको को ख़ुद पहल कर अपने बच्चों से बात करनी चाहिए और जानने की कोशिश करनी चाहिए कि उन्हें दोस्तों से कोई परेशानी तो नहीं है.

वे कहती हैं, ''वयस्कों को बच्चों की चिंताओं को गंभीरता से लेना चाहिए, भले ही वो पहली नज़र में छोटी लगें. अच्छी तरह से उनकी बातें सुनें और सुनते समय अपनी भावनाओं पर नियंत्रण भी रखें. संभव हो तो इस संबंध में स्कूल के साथ भी बातचीत शुरू करनी चाहिए. ताकि बच्चा सुरक्षित महसूस कर सके.''

(आत्महत्या एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है. अगर आप भी तनाव से गुजर रहे हैं तो भारत सरकार की जीवनसाथी हेल्पलाइन 18002333330 से मदद ले सकते हैं. आपको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए.)

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