शांति निकेतन: एक अनाम कस्बे से विश्व धरोहर बनने तक का सफ़र

बोलपुर रेलवे स्टेशन.

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    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए

शांति निकेतन को यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट की लिस्ट (विश्व धरोहरों की सूची) में शामिल किया गया है. इसके लिए शांति निकेतन ने काफ़ी लंबा सफ़र तय किया.

रविवार को सऊदी अरब में वर्ल्ड हेरिटेज कमिटी के 45 वें सत्र की बैठक में शांति निकेतन को वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में शामिल किया गया.

पश्चिम बंगाल में 'लाल माटी के देश' के नाम से मशहूर बीरभूम ज़िले में बसे शांति निकेतन का नाम देश और दुनिया में अनजाना नहीं है. इसे मशहूर बनाया कवि गुरु रवींद्रनाथ टैगोर की ओर से स्थापित विश्वभारती विश्वविद्यालय ने.

शांति निकेतन का शाब्दिक अर्थ है शांति का निवास यानी वह जगह जहां शांति हो. हालांकि हाल के वर्षों में विश्व भारती विश्वविद्यालय के विवाद के कारण यह शहर अपने नाम के विपरीत ग़लत वजहों से सुर्खियों रहा. यह शहर केंद्र और राज्य सरकार के बीच टकराव का भी केंद्र रहा.

शांति निकेतन में जश्न का माहौल

 विश्वभारती विश्वविद्यालय

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यूनेस्को के ऐलान के बाद से इस शहर में उत्सव जैसा माहौल है. रविवार रात को ही शांति निकेतन विश्वविद्यालय परिसर में एक जुलूस निकाला गया. आगे भी कई कार्यक्रम आयोजित करने की योजना है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस ख़बर पर ख़ुशी जताई है. इन दोनों नेताओं के समर्थकों के बीच इसका श्रेय लेने की अघोषित होड़ भी शुरू हो गई है.

ममता फ़िलहाल स्पेन के दौरे पर हैं. ममता बनर्जी ने अपने एक ट्वीट में कहा है कि राज्य सरकार बीते 12 सालों से शांति निकेतन के आधारभूत ढांचे को विकसित करने की दिशा में काम कर रही है.

शांति निकेतन का रवींद्रनाथ टैगोर से नाता

रवींद्रनाथ टैगोर की प्रतिमा.

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बंगाल की कला और संस्कृति का केंद्र कहे जाने वाला यह शहर इतिहास के अनेक गौरवशाली अध्याय का साक्षी रहा है.

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शांति निकेतन की स्थापना भले यहां विश्वविद्यालय की स्थापना के बहुत पहले हुई हो लेकिन रवींद्रनाथ टैगोर की ओर से स्थापित विश्वभारती विश्वविद्यालय ने ही इस शहर को वैश्विक पहचान दिलाई. यह दोनों लंबे अरसे से एक-दूसरे के पर्याय बन चुके हैं.

इस शहर को सरकारी कामकाज़ की भाषा में बोलपुर कहा जाता है. इसे हेरिटेज लिस्ट में शामिल करने की कोशिशें तो 2010 में ही शुरू हुईं थीं. इसमें कामयाबी अब मिली है.

बीती मई में रवींद्र जयंती के मौक़े पर ही इसके संकेत मिलने लगे थे कि शांति निकेतन को विश्व धरोहर का दर्जा मिलने का इंतज़ार अब जल्दी ही ख़त्म होने वाला है.

शांति निकेतन का नाम बंगाल के इतिहास और संस्कृति से काफ़ी गहरे जुड़ा है. बंगाल के इतिहास और संस्कृति पर कोई भी बहस शांति निकेतन के ज़िक्र के बिना अधूरी ही रहेगी.

वर्ष 1901 में शांति निकेतन में पहली बार एक स्कूल की स्थापना की गई थी. दुनिया भर में मशहूर शांति निकेतन विश्वविद्यालय की स्थापना 1921 में हुई थी.

विश्वविद्यालय के संचालन के लिए 1922 में विश्व भारती सोसाइटी का गठन किया गया. कवि गुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने इसी सोसाइटी को अपनी पूरी संपत्ति दान दे दी थी. साल 1951 में इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिला था.

इस शहर की स्थापना कविगुरु रवींद्रनाथ के पिता महर्षि देवेंद्र नाथ टैगोर ने 1863 में की थी. तब उस जगह को भुवनडांगा के नाम से जाना जाता था. उन्होंने उस साल करीब 20 एकड़ जमीन सालाना पांच रुपए की लीज पर ली.

कैसा पड़ा शांतिनिकेतन नाम

विश्वभारती विश्वविद्यालय.

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उसके बाद वहाँ एक आश्रम की स्थापना की गई. देवेंद्रनाथ ने उस आश्रम का नाम शांति निकेतन रखा था. उसी के आधार पर धीरे-धीरे यह इलाक़ा शांति निकेतन के नाम से मशहूर हो गया.

उन्नीसवीं सदी के मध्य में बोलपुर एक छोटी-सी जगह थी. इस कस्बे का एक हिस्सा रायपुर के सिन्हा परिवार की जमींदारी का हिस्सा था. उसी परिवार के भुवन मोहन सिन्हा ने भुवनडांगा गांव बसाया था.

कविगुरु रवींद्रनाथ 1878 में पहली बार यहां आए थे. बीसवीं सदी की शुरुआत में यह शहर धीरे-धीरे राज्य की कला और संस्कृति के केंद्र के तौर पर उभरने लगा. यहां आयोजित होने वाला पौष मेला और होली उत्सव भी विश्व भारती विश्वविद्यालय की तरह पूरी दुनिया में मशहूर है. इस दौरान पूरी दुनिया से पर्यटक यहां पहुंचते हैं.

स्वाधीनता आंदोलन में शांति निकेतन की भूमिका

विश्वभारती विश्वविद्यालय.

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शांति निकेतन ने भले स्वाधीनता आंदोलन के दौरान कोई बड़ा क्रांतिकारी नहीं पैदा किया हो, लेकिन बंग-भंग और स्वाधीनता आंदोलन में इस शहर की भूमिका बेहद अहम रही.

कविगुरु रवींद्रनाथ अपनी रचनाओं के ज़रिए लोगों में अलख जगाने का काम करते रहे. महात्मा गांधी के साथ उनकी पहली मुलाक़ात भी यहीं हुई थी.

गांधी जी से कई मुद्दों पर मतभेद के बावजूद कविगुरु ने स्वदेशी आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था.

जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद उन्होंने 'नाइट' की उपाधि का त्याग कर दिया था. गुरुदेव ने यहीं लिखा था कि 'जोदि तोर डाक सुने केउ ना आसे, तोबे एकला चलो रे'. उनकी यह पंक्तियां प्रासंगिक हैं.

रवींद्रनाथ टैगोर ने 1905 में बंग-भंग आंदोलन के दौरान बंगाली आबादी को एकजुट करने के लिए 'बांग्लार माटी, बांग्लार जल' (बंगाल की मिट्टी, बंगाल का पानी) गीत लिखा. उन्होंने मशहूर गीत 'आमार सोनार बांग्ला' भी लिखा. इस गीत ने लोगों में राष्ट्रवाद की भावना मजबूत करने में मदद की. रवींद्रनाथ ने उसी दौरान सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए राखी उत्सव की शुरुआत की. इसमे हिंदू और मुस्लिम समुदायों के लोगों ने एक-दूसरे की कलाई पर रंग-बिरंगे धागे बांधे थे.

रवींद्रनाथ टैगोर के सपनों का सम्मान

विश्वभारती विश्वविद्यालय परिसर.

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इतिहास के प्रोफेसर पवित्र कुमार घोष कहते हैं, ''शांति निकेतन को यूनेस्को की सूची में बहुत पहले ही जगह मिल जानी चाहिए थी. लेकिन देर आयद दुरुस्त आयद. सांप्रदायिक सद्भाव, संस्कृति और कला के क्षेत्र में इस शहर के योगदान का इतिहास बेहद समृद्ध रहा है. बंग-भंग और स्वाधीनता आंदोलन में भी इसने अहम भूमिका निभाई थी.''

कोलकाता के रवींद्र भारती विश्वविद्यालय में इतिहास के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर हितेंद्र पटेल कहते हैं, ''यह महान कवि चिंतक रवींद्रनाथ टैगोर के सपनों का सम्मान है. पूरी मानवता के प्रति समर्पित शिक्षा के आदर्श को लेकर चले कवि ने समाज और आत्म शक्ति उद्बोधन को जोड़ा था, यह देखने का आदर्श दिया था कि लोक जीवन के आदर्श और साथ शिक्षा के समन्वय से ही बेहतर मनुष्य और समाज का निर्माण संभव है. शांतिनिकेतन को वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में शामिल किया जाना हमारे लिए गर्व का विषय है.''

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