क़तर 2022: क्या वर्ल्ड कप का ऐसा राजनीतिकरण पहले कभी हुआ है?

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ये उन कई विवादित हेडलाइनों में से एक है जिस कारण फ़ीफ़ा और वर्ल्ड कप के आयोजक क़तर से बचने की कोशिश कर रहे थे.
अब वर्ल्ड कप का पहला मुक़ाबला होने में दो हफ़्ते से भी कम का समय रह गया है. इसी बीच वर्ल्ड कप के एक अधिकारिक दूतों में से एक ने समलैंगिकता को लेकर विवादित बयान दे दिया है.
उन्होंने इसे “दिमाग़ की एक ख़राबी” बता दिया है.
क़तर के पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी ख़ालिद सलमान ने जर्मनी के प्रसारक ज़ेडडीएफ़ से बातचीत में दिए इस बयान ने पहले से ही विवादों में घिरे क़तर वर्ल्ड कप को एक और विवाद में झोंक दिया है.
क़तर में होने वाला वर्ल्ड कप पहले से ही श्रमिकों के अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और यूक्रेन युद्ध को लेकर विवादों में है.
बढ़ रहे विवादों के बीच कई लोगों का मानना है कि यह राजनीतिक रूप से अब तक का सबसे विवादित वर्ल्ड कप हो गया है.
एलजीबीटी अधिकार

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लीवरपूल एफ़सी एलजीबीटी प्लस ग्रुप कोप आउट्स के संस्थापक पॉल एमान कहते हैं, “मैं शुरू में ये उम्मीद कर रहा था कि वो ऐसे ही सुधार करेंगे जैसे उन्होंने प्रवासी मज़दूरों के लिए किए हैं, वो एलजीबीटी समुदाय के लोगों की ज़िंदगी सुधारने के लिए भी कुछ ना कुछ क़दम उठाएंगे.”
वर्ल्ड कप की आयोजक समिति ने उन्हें साल 2019 में क़तर बुलाया था. इस दौरे पर उनके पति भी साथ में थे.
क़तर में समलैंगिक रिश्ते और समलैंगिक रिश्तों को बढ़ावा देना प्रतिबंधित है. ऐसा करने पर जुर्माने से लेकर मौत की सज़ा तक का प्रावधान है.
लेकिन विश्व कप के आयोजकों का कहना था कि वर्ल्ड कप देखने के लिए क़तर आने पर ‘सभी का स्वागत है’. क़तर ने दावा किया था कि किसी के ख़िलाफ़ भी भेदभाव नहीं होगा.
लेकिन ख़ालिद सलमान के साक्षात्कार जैसी घटनाओं ने पॉल जैसे लोगों की उम्मीदों को कुचल दिया है.
“ये दुखद है कि, जब से क़तर पर मामले को सुलझाने का दबाव बढ़ा है, क़तर ने वास्तव में एलजीबीटी लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं.”
समलैंगिक लोगों को जेल भेजे जाने और ‘उन्हें सुधारने के लिए दी जा रही थेरेपी’ की रिपोर्टों के बाद पॉल अब वर्ल्ड कप देखने नहीं जा रहे हैं.
“क़तर में अधिकारी अब भी एलजीबीटी लोगों के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं. ऐसे में वर्ल्ड कप देखने जाने के लिए मेरी आत्मा अनुमति नहीं दे रही है.”
खिलाड़ियों का प्रदर्शन

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अंतरराष्ट्रीय राजनेताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की आलोचना के साथ-साथ मैदान से भी विरोध की आवाज़ें उठी हैं.
डेनमार्क मुक़ाबलों को दौरान अपनी ‘कमतर जर्सियां’ पहनेगा जिस पर देश और ब्रांड के लोगों मुश्किल से ही दिख पाएंगे.
डेनमार्क के कप्तान और नौ अन्य देशों के कप्तान जिनमें इंग्लैंड, फ़्रांस, जर्मनी और बेल्जियम भी शामिल हैं, वनलव का आर्मबैंड पहनेंगे जिस पर रेनबो का लोगो (सतरंगी लोगो) बना होगा.
टीमों की गुज़ारिश के बावजूद अभी फ़ीफ़ा ने स्पष्ट नहीं किया है कि उनके ऐसा करने से वर्ल्ड कप का कोई क़ानून टूटेगा या नहीं.
वर्ल्ड कप के नियमों के तहत खिलाड़ियों को मैच के दौरान राजनीतिक प्रतीक इस्तेमाल करने या राजनीतिक संदेश देने की अनुमति नहीं होती है.
अंतरराष्ट्रीय खेल क़ानून विशेषज्ञ डॉ. ग्रेगरी लॉनिड्स का मानना है कि फ़ुटबॉल की नियामक संस्था के सामने कड़ी चुनौती है. उसे तय करना है कि कहां रेखा खींचनी है.
“नार्वे के खिलाड़ियों ने हाल ही में अपनी टी-शर्टों पर एक संदेश लिखा है, सवाल ये है कि- क्या इसे राजनीतिक संदेश माना जाएगा?”
“मैं नहीं जानता, क्या आप ये परिभाषित कर सकते हैं कि राजनीतिक संदेश क्या है? मुझे नहीं लगता कि कोई भी ये परिभाषित कर सकता है, और यही समस्या है जिसका सामना इस वक़्त फ़ीफ़ा को करना पड़ रहा है.”
पॉल अमान का मानना है कि समलैंगिक अधिकार “मूल सामाजिक मुद्दा हैं, ये राजनीति नहीं है” और खिलाड़ियों को समलैंगिक अधिकारों पर बात करने के लिए दंडित नहीं किया जा सकता है.
लेकिन खिलाड़ियों और समर्थकों को टूर्नामेंट शुरू होने के बाद ही पता चलेगा कि नियमों का पालन कैसे कराया जाएगा.
श्रमिकों के अधिकार

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क़तर में निर्माण में लगे श्रमिकों का समर्थन एक ऐसा मुद्दा है जिसे लेकर अभियान चला रहे कार्यकर्ता बहुत ख़ुश होंगे अगर खिलाड़ी इस बारे में भी बात करें तो.
मानवाधिकार और श्रमिक अधिकार जांच सलाहकार इक्विडेम के संस्थापक मुस्तफ़ा क़ादरी कहते हैं, “मुझे लगता है कि फ़ीफ़ा का ये कहना बहुत ग़लत है कि- ये राजनीतिक है, ऐसा करने पर आप पर प्रतिबंध लग सकते हैं.”
इस संगठन ने क़तर में स्टेडियमों में निर्माण काम कर रहे श्रमिकों से बात की है और उन्हें पता चला है कि यहां नौकिरयां पाने के लिए श्रमिकों ने पैसे चुकाए हैं. श्रमिकों को वेतन मिलने में दिक्कतें हुई और उन्हें बेहद गर्म तापमान में भी काम करना पड़ा है.
कई रिपोर्टों में दावा किया गया है कि 2010 में क़तर को वर्ल्ड कप की मेज़बानी मिलने के बाद से छह हज़ार श्रमिकों की मौत हो चुकी है.
हालांकि क़तर की सरकार का कहना है कि ये आंकड़ा भ्रामक है और स्टेडियमों के निर्माण के दौरान कुल 37 मौतें हुई हैं और इनमें से सिर्फ़ तीन ही ‘काम से संबंधित’ थीं.
अधिकारियों का कहना है कि क़तर में कफ़ाला की व्यवस्था ख़त्म कर दी गई है और ये इस बात का सबूत है कि हालात सुधरे हैं. कफ़ाला व्यवस्था के तहत किसी भी प्रवासी मज़दूर को नौकरी बदलने या कोई और काम करने के लिए अपने नियोक्ता की मंज़ूरी लेना अनिवार्य होता था.
हालांकि मुस्तफ़ा का कहना है कि कुछ सुधारों से निश्चित रूप से श्रमिकों को कुछ मदद मिली है लेकिन जो बदलाव हुए हैं वो ‘स्पष्ट रूप से पर्याप्त नहीं हैं.’
विवादित विजेता
एलजीबीटी अधिकारों और प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों को लेकर हो रही आलोचना के बाद कई लोग ये सवाल उठा रहे हैं कि फ़ीफ़ा का क़तर को मेज़बानी देना क्या सही फ़ैसला था.
मेज़बानी देने की प्रक्रिया पर पहले ही गंभीर और व्यापक भ्रष्टाचार के आरोप लग चुके हैं, इसे लेकर दो जांचें भी शुरू हुईं. एक जांच स्विट़रलैंड के अभियोजकों ने और दूसरी अमेरिका के न्याय विभाग ने साल 2015 में खोली थीं.
क़तर हमेशा से ही किसी भी तरह के ग़लत काम को नकारता रहा है और साल 2017 में फ़ीफ़ा की अपनी जांच के बाद भी क़तर को क्लीनचिट दे दी गई थी.
क़तर को मेज़बानी देने के फ़ैसले का समर्थन करने वालों लोगों का तर्क है कि देशों के खेलों के ज़रिए शामिल करना उन्हें खोलने और बदलाव के लिए तैयार करने का अच्छा तरीक़ा है.
हालांकि मुस्तफ़ा को लगता है कि भले ही इससे “मौजूदा मानवाधिकार मुद्दों पर ज़रूर बात हुई है” लेकिन “इसका इस्तेमाल उतना करने के लिए नहीं हो सका है जितना कि किया जा सकता था.”
डॉ. ग्रेगरी लॉनिड्स मानते हैं कि फ़ीफ़ा के क़तर को मेज़बानी देने का एक कारण ये हो सकता है कि फ़ीफ़ा बदलाव को बढ़ावा देना चाहती हो.
“वो समावेश का एक माहौल बनाना चाहते हैं. अगर आप उस देश को दुनिया के लिए खोल पा रहे हैं तो आप उसे ये समझाने की कोशिश कर सकते हैं कि व्यक्तिगत आज़ादी और अन्य मामलों में अलग नज़रिया लिया जा सकता है.”
लेकिन समलैंगिक अधिकारों और श्रमिकों के अधिकारों को लेकर लगातार होती रही चर्चा के बाद बहुत से लोगों को ये लगता है कि फ़ीफ़ा ने ग़लत फ़ैसला लिया.
रूस को किया बाहर

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फ़ीफ़ा ने वर्ल्ड कप के क्वालिफ़ायर मुक़ाबलों के दौरान ही रूस को वर्ल्ड कप से बाहर कर दिया था. फ़रवरी 2022 में लिए गए इस फ़ैसले के बाद फ़ीफ़ा की दुनिया भर में तारीफ़ भी हुई थी.
मैदान पर नियमों का उल्लंघन करने या प्रशासनिक कारणों की वजह से देशों का वर्ल्ड कप से बाहर होना कोई असमान्य बात नहीं है लेकिन किसी टीम को ऐसे अपराध के लिए बाहर करना जो फ़ुटबॉल से जुड़ा हो, अधिक असामान्य है.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद जर्मनी और जापान और रंगभेद के दौरान दक्षिण अफ़्रीका को भी इस तरह के निलंबन का सामना करना पड़ा है.
डॉ. ग्रेगरी कहते हैं कि, “फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप के दौरान राजनीतिक संदेशों को दूर रखने की कोशिश कर रहा है लेकिन यह अपने आप में एक राजनीतिक संगठन है.”
“अंततः फ़ीफ़ा को राजनीतिक फ़ैसले लेने ही होते हैं.” रूस को निलंबित करने का क़दम तब उठाया गया जब उसके ग्रुप में शामिल टीमों- पोलैंड, चेक गणराज्य और स्वीडन ने यूक्रेन पर आक्रमण के विरोध में रूस के ख़िलाफ़ खेलने से ही इनकार कर दिया था.
डॉ. ग्रेगरी कहते हैं कि अगर फ़ीफ़ा रूस के ख़िलाफ़ क़दम नहीं उठाता तो उसके सामने ‘अन्य देशों के भी इस क्रांति में शामिल होने’ का ख़तरा था.
सुधार

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विरोध के बावजूद, क़तर के शासक, तमाम बिन हमाद अल थानी ने, अपने देश के वर्ल्ड कप की मेज़बानी को लेकर हो रही आलोचना का यह कहकर जवाब दिया है , “दशकों से, मध्यपूर्व भेदभाव का सामना करता रहा है, और मैंने ये देखा है कि इस तरह के भेदभाव की बड़ी वजह ये है कि लोग हमारे बारे में नहीं जानते हैं, और कई मामलों में वो हमें जानने से ही इनकार कर देते हैं.”
उन्होंने ये दावा भी किया है कि कुछ लोगों ने, “हमले किए हैं, इस रफ़्तार से जिसे पहले नहीं देखा गया है, ऐसे हमले तब नहीं हुए जब इस तरह का मेगा स्पोर्ट आयोजन किसी और देश में या किसी और महाद्वीप पर हुआ है.”
उन्होंने कहा है, “क़तर ने जो प्रगति, सुधार और विकास किया है” उन्हें उस पर गर्व है.
लेकिन जैसे-जैसे वर्ल्ड कप क़रीब आ रहा है, प्रदर्शन और विवाद मैदान और मैदान के बाहर जारी रह सकते हैं, ऐसे में वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल के अलावा दूसरी वजहों से भी सुर्ख़ियों में बना ही रहेगा.
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