नारायण मूर्ति ने चार महीने के पोते को गिफ़्ट किए 240 करोड़ के शेयर- प्रेस रिव्यू

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आईटी कंपनी इन्फ़ोसिस के संस्थापक अरबपति एनआर नारायण मूर्ति ने अपने चार महीने के पोते एकाग्र रोहन मूर्ति को 240 करोड़ रुपये के 15 लाख इन्फ़ोसिस के शेयर गिफ़्ट में दिए हैं.
अंग्रेज़ी अख़बार इकोनॉमिक टाइम्स लिखता है कि नारायण मूर्ति के चार महीने के पोते ने अभी चलना भी शुरू नहीं किया है लेकिन उनके अरबपति दादा ने उन्हें इतना बड़ा तोहफ़ा दिया है.
स्टॉक एक्सचेंज फ़ाइलिंग के मुताबिक़, शुक्रवार को ऑफ़ मार्केट ट्रांसेक्शन में 77 वर्षीय मूर्ति ने 0.04 फ़ीसदी शेयर ट्रांसफ़र किए.
इन शेयर के ट्रांसफ़र के बाद इन्फ़ोसिस में मूर्ति के शेयर अब 0.40 फ़ीसदी से घटकर 0.36 फ़ीसदी हो गए हैं. उनके पास अब तक़रीबन 1.5 करोड़ शेयर हैं.
सोमवार को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में इन्फ़ोसिस के शेयर 1,604 रुपये पर बंद हुए जिसके तहत एकाग्र की शेयर वेल्यू 240.6 करोड़ बैठती है.
एनआर नारायण मूर्ति सिर्फ़ अकेले नहीं हैं जिनके पोते के पास शेयर हैं. इन्फ़ोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि ने अपने पोते तनुष नीलेकणि को 0.09 फ़ीसदी शेयर और शिबुलाल के पोते-पोती मिलन शिबुलाल और निकिता शिबुलाल के पास 0.19-0.19 फ़ीसदी शेयर हैं.
आईटी कंपनी के प्रमोटर और प्रमोटर ग्रुप्स के पास अब 14.78 फ़ीसदी शेयर हैं.
इलेक्टोरल बॉन्ड: किसने किसे कितना दिया की जानकारी पर इंडस्ट्री बॉडी को आपत्ति क्यों?

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एसबीआई को निर्देश दिया था कि वो चुनाव आयोग को इलेक्टोरल बॉन्ड के अल्फ़ा-न्यूमेरिक कोड की भी जानकारी दे.
लेकिन भारत कई औद्योगिक संगठन ऐसा नहीं चाहते हैं.
अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़, सुप्रीम कोर्ट में एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एसोचैम) ने सोमवार को कहा कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश से भारत के हितों पर असर होगा.
एसोचैम ने सुप्रीम कोर्ट में लगाई अपनी याचिका में इसका विरोध किया है.
उसने कहा, “नए मानकों के आधार पर गोपनीय नियमों का उल्लंघन करना और जानकारियां साझा करने के असर को समझना ज़रूरी है. इस तरह के निर्देश अगर अतीत से ही लागू होते हैं तो ये क़ानून के शासन को नज़रअंदाज़ करेंगे और औद्योगिक हितों पर इनका गहरा असर होगा.”
अख़बार लिखता है कि तीन बड़े औद्योगिक निकायों- एसोचैम, फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स (फ़िक्की) और कन्फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) ने सुप्रीम कोर्ट का रुख़ करते हुए ‘माननीय न्यायालय के इलेक्टोरल बॉन्ड के अल्फ़ा-न्यूमेरिक नंबर्स को जारी करने के सीमित निर्देशों का विरोध किया है.’
इन निकायों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि उद्योग समूहों ने एक ख़ास सरकारी योजना के तहत ये बॉन्ड ख़रीदे थे.
हालांकि, शीर्ष न्यायालय ने उनको सुनने से इनकार कर दिया और कहा कि याचिका सूची में दर्ज नहीं है और इसके लिए प्रक्रिया का पालन करना होगा.
क्या कह रहे हैं ये अहम निकाय

सीआईआई की याचिका की ख़ास जानकारियां सार्वजनिक नहीं हुई हैं लेकिन फ़िक्की के प्रवक्ता ने अख़बार से कहा है कि विश्व स्तर पर भारत के मामले में व्यापार करने में आसानी ही उसकी विशेषता है.
“अतीत के आधार पर कार्रवाई करना भारतीय और वैश्विक निवेशकों का व्यवसाय में भरोसे को कम करेगा. हमारी याचिका का यही आधार है.”
सीआईआई के सूत्रों ने अख़बार से कहा कि बॉन्ड स्कीम ने गोपनीयता का वादा किया गया था.
साथ ही उनकी मांग है कि इस तरह की जानकारियां सार्वजनिक करना अतीत से ही औद्योगिक निकाय के सदस्यों को नुक़सान पहुंचाएगा.
हालांकि, अब तक उद्योग घरानों ने इस तरह की जानकारी सार्वजनिक करने को लेकर सीधा सुप्रीम कोर्ट का रुख़ नहीं किया है लेकिन औद्योगिक निकायों ने चिंता जताते हुए कहा है कि किसने किस पार्टी को चंदा दिया, इसकी जानकारी सार्वजनिक करना किसी की बनी बनाई धारणा को नुक़सान पहुंचाएगा.
सीआईआई के एक वरिष्ठ सदस्य ने अख़बार से कहा, “अगर मैं कांग्रेस को देता हूं तो बीजेपी नाराज़ होगी और इसी तरह इसके उलट होगा. इसमें गोपनीयता का एक वादा था. यह बहुत कठिन होता है, जब नए फ़ैसले अतीत से ही लागू किए जाते हैं.”
वहीं एक दूसरे अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने एक ख़बर प्रकाशित की है, जिसके मुताबिक़ केंद्र सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष की याचिका से ख़ुद को अलग कर लिया है.
एसोसिएशन के अध्यक्ष आदेश सी. अग्रवाल ने व्यक्तिगत तौर पर याचिका दायर कर सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि वो इलेक्टोरल बॉन्ड की सभी जानकारियां सार्वजनिक करने के फ़ैसले पर पुनर्विचार करे.
साथ ही इस याचिका में इस बात पर भी ज़ोर दिया गया था कि न्यायालय के पास ऐसा कोई तंत्र नहीं है जो ये सुनिश्चित करे कि इस डेटा का इस्तेमाल कई एनजीओ के इसे ग़लत तरीक़े से पेश करने के ट्रेंड और मतदाता को भ्रमित करने से रोके.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली पांच जजों की पीठ से कहा कि सरकार इलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी सार्वजनिक करने के सुप्रीम कोर्ट के 11 फ़रवरी के फ़ैसले और 11 मार्च के निर्देश के साथ है.
हालांकि सॉलिसिटर जनरल ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि इस फ़ैसले के उलटे परिणाम भी हैं.
तुषार मेहता ने कोर्ट से कहा कि कई एनजीओ आंकड़ों में हेराफेरी और ग़लत व्याख्या कर मतदाताओं और अदालत को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं.
15 लोगों ने ख़रीदे थे 158 करोड़ के इलेक्टोरल बॉन्ड

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सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद सार्वजनिक हुए इलेक्टोरल बॉन्ड के डेटा से पता चला है कि अप्रैल 2019 से जनवरी 2024 के बीच कम से कम 333 लोगों ने व्यक्तिगत तौर पर 358.91 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड ख़रीदे थे.
देश के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (एसबीआई) ने चुनाव आयोग को इलेक्टोरल बॉन्ड का डेटा दिया था, जिसे चुनाव आयोग ने सार्वजनिक किया है.
अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस अपनी एक ख़ास रिपोर्ट में लिखता है कि जिन 15 प्रमुख हस्तियों ने व्यक्तिगत तौर पर ये बॉन्ड ख़रीदे थे वो बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों से जुड़े हैं. अख़बार के मुताबिक़, इन प्रमुख हस्तियों ने 158.64 करोड़ के या 44.2% इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे.
अख़बार लिखता है कि उन्होंने उन कंपनियों को अपने सवाल भेजे हैं, जिनसे ये लोग जुड़े हुए हैं. साथ ही अख़बार ने उन 15 लोगों के नाम प्रकाशित किए हैं.
इनमें सबसे पहला नाम स्टील किंग के तौर पर प्रसिद्ध लक्ष्मी निवास मित्तल का है जिन्होंने 35 करोड़ के इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे थे.
अख़बार के मुताबिक़, फ़ोर्ब्स की सूची में शामिल मित्तल की कुल संपत्ति 1,670 करोड़ रुपये की है और वो दुनिया की सबसे बड़ी स्टील निर्माता कंपनी आर्सेलर मित्तल के सीईओ और एक्ज़िक्यूटिव चेयरमैन हैं.
मित्तल लंदन में रहते हैं और उन्होंने साल 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान 18 अप्रैल 2019 को ये बॉन्ड ख़रीदे थे.
आर्सेलर मित्तल कंपनी के एक प्रवक्ता ने इस विषय पर किसी भी तरह की टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है.
वहीं रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड से जुड़े चार्टर्ड अकाउंटेंटे लक्ष्मीदास वल्लभदास मर्चेंट ने 25 करोड़ के बॉन्ड ख़रीदे. इसके अलावा इस सूची में इंडिगो एयरलाइंस के प्रमोटर राहुल भाटिया भी शामिल हैं.
डेंगू की वैक्सीन

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डेंगू के लिए वैक्सीन व्यावसायिक रूप से साल 2026 से मिलनी शुरू हो जाएगी.
अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक़, इम्युनोलॉजिकल्स लिमिटेड (आईआईएल) के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉक्टर के. आनंद कुमार ने बताया है कि वैक्सीन की सुरक्षा को लेकर क्लीनिकल ट्रायल के पहले चरण को ख़त्म कर लिया गया है.
वैक्सीन की क्षमता के टेस्ट के दूसरे और तीसरे चरण के ट्रायल जल्द ही शुरू होंगे.
आईआईएल राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है जिसकी स्थापना साल 1982 में की गई थी.
डॉक्टर कुमार ने अख़बार के साथ बातचीत में कहा कि ‘सुरक्षा की दृष्टि से हमने पहले चरण के ट्रायल को पूरा कर लिया है. ये बहुत सफल रहा है. इसको लेकर कोई हानिकारक रिपोर्ट नहीं है. हम दूसरे और तीसरे चरण के ट्रायल जल्द शुरू करेंगे.'
उन्होंने बताया कि ‘ट्रायल दिसंबर से पूरे कर लिए जाएंगे और 2026 की शुरुआत तक हम इसे सार्वजनिक करना चाहते हैं लेकिन मध्य 2026 तक इसे ज़रूर सार्वजनिक कर दिया जाएगा.’
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