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क्या है तेलंगाना की एसएलबीसी सुरंग परियोजना, जो 20 साल में भी पूरी नहीं हो पाई है
- Author, अमरेंद्र यारलगड्डा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
तेलंगाना में श्रीशैलम लेफ्ट बैंक कनाल या एसएलबीसी सुरंग की छत का एक हिस्सा गिरने से आठ लोग सुरंग में फंस गए हैं. यह हादसा शनिवार सुबह क़रीब आठ बजे हुआ और सुरंग में फंसे लोगों को बचाने का अभियान फिलहाल जारी है.
सिंचाई विभाग के अधिकारियों का कहना है कि क़रीब तीन साल के बाद हाल ही में इस परियोजना का काम फिर से शुरू हुआ है और इसी दौरान यह हादसा हुआ है.
एसएलबीसी सुरंग परियोजना को तेलंगाना में सबसे लंबे समय से निर्माणाधीन परियोजना कहा जा सकता है.
यह परियोजना मूल रूप से क्या है और इसके लिए 44 किलोमीटर लंबी सुरंग क्यों बनाई जा रही है? इस परियोजना से किन इलाक़ों को लाभ होगा? एक सवाल यह भी है कि इसका काम इतने लंबे समय से क्यों चल रहा है?
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एसएलबीसी सुरंग के लिए महत्वपूर्ण मोड़
श्रीशैलम लेफ्ट बैंक कनाल परियोजना के लिए काम शुरू करने का विचार क़रीब 42 वर्ष पहले रखा गया था.
बीस साल पहले इसके लिए बजट स्वीकृत होने के बाद इस पर काम शुरू हुआ था.
एसएलबीसी सुरंग परियोजना की मदद से कृष्णा नदी से क़रीब 30 टीएमसी (अरब क्यूबिक फ़ीट) पानी को मोड़ने की योजना है.
इसके ज़रिए सरकार का लक्ष्य नालगोंडा, सूर्यपेट, यदाद्रि और भुवनागिरी ज़िलों में चार लाख एकड़ भूमि को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराना है.
इसके अलावा हैदराबाद शहर में पीने के पानी की आपूर्ति के लिए पानी की दिशा बदलने का भी फ़ैसला किया गया है.
अगस्त 2005 में अविभाजित आंध्र प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने 2,813 करोड़ रुपये की लागत से एसएलबीसी सुरंग परियोजना के निर्माण को मंज़ूरी दी थी.
तत्कालीन मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी ने इसकी आधारशिला रखी थी और साल 2007 में इस परियोजना के लिए निर्माण का काम शुरू हुआ था.
इस परियोजना में 43.93 किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण काफ़ी अहम है.
निर्माण कंपनी ने टनल बोरिंग मशीन (टीबीएम) से इसका काम शुरू किया.
इस परियोजना के तहत दो सुरंगें, एक हेड रेगुलेटर, दो लिंक नहरें, एक जलाशय और अन्य काम किए जाने हैं.
सुरंगें कितनी लम्बी हैं?
सिंचाई विभाग के अनुसार श्रीशैलम परियोजना के ऊपरी हिस्से पर 43.93 किलोमीटर लंबी पहली सुरंग (सुरंग-1) का निर्माण 9.2 मीटर की रेडियस के साथ किया जाना था.
इसके लिए केंद्र सरकार ने 1,925 करोड़ रुपए दिए. इसमें 33.35 किलोमीटर का काम किया जा चुका है.
इस सुरंग के लिए इनलेट और आउटलेट दोनों तरफ से काम किया गया है.
यह कार्य नागरकुरनूल ज़िले के अमराबाद मंडल के डोमलापेंटा में किया गया है. सुरंग का काम अचम्पेटा मंडल के मन्नेवारी पल्ली में पूरा किया जाना है. अभी इसमें 9.56 किलोमीटर सुरंग का निर्माण होना बाकी है.
इसके अलावा 8.75 मीटर रेडियस वाली 7.13 किलोमीटर लंबी एक अन्य सुरंग (सुरंग-2) का निर्माण पूरा हो चुका है.
यह सुरंग नालगोंडा ज़िले के चंदमपेट मंडल में तेलदेवरापल्ली से नेरेदुगोम्मा तक स्थित है.
परियोजना में अभी डिंडी में एक जलाशय, पेंडलीपाकला और उदय समुद्र में जलाशय का निर्माण किया जाना है.
यह काम साल 2010 तक पूरा हो जाना था, लेकिन तय समय सीमा से क़रीब 15 साल गुज़र जाने के बाद भी इस पर काम जारी है.
इस मामले पर बीबीसी ने तेलंगाना जल साधना समिति की संयोजक नैनाला गोवर्धन से बात की है.
उनका कहना है, "अविभाजित आंध्र प्रदेश के समय में ही इस परियोजना का 52 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है. उसके बाद पिछले क़रीब दस साल में 23 प्रतिशत काम पूरा किया गया है.''
सुरंग बनाना ज़रूरी क्यों है?
इस परियोजना से जिन इलाक़ों में पानी मोड़ा जाएगा वह पूरी तरह से नल्लामाला वन क्षेत्र में आता है. इसलिए यहां खुली नहर की खुदाई करना और पर्यावरण क़ानूनों के मुताबिक़ खुली खुदाई कर काम पूरा करना एक मुश्किल काम है.
सिंचाई विशेषज्ञों का कहना है कि इसके लिए मंज़ूरी नहीं मिल सकती.
इसके अलावा ग्रेविटी आधारित सुरंग के ज़रिए पानी ले जाने का प्रस्ताव कई साल से चल रहा है.
ग्रेविटी या गुरुत्वाकर्षण पर आधारित सुरंग का मतलब यह है कि सुरंग से कुदरती तौर पर ऊंचे इलाक़े से निचले इलाक़े की तरफ पानी लाया जाए.
इस तरह के टनल की ढलान भी काफ़ी कम रखी जाती है ताकि पानी धीरे-धीरे आगे की तरफ बढ़े और इससे न तो सतह की कटाई हो और न ही यह अपने साथ सिल्ट (गाद या मिट्टी) को बहाकर अपने साथ ले जाए.
इस परियोजना के प्रस्तावित मार्ग पर एक वन्यजीव अभयारण्य है.
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने पहले ही इस परियोजना को इस शर्त पर मंज़ूरी दी है कि इससे वन और वन्यजीव संरक्षण केंद्रों को कोई बाधा नहीं पहुंचाई जाएगी.
तेलंगाना के एक रिटायर मुख्य अभियंता श्याम प्रसाद रेड्डी ने बीबीसी को बताया, "चूंकि यह एक संरक्षित वन क्षेत्र है, इसलिए जब यह प्रस्ताव रखा गया था, तब भी सुरंग के माध्यम से पानी ले जाने की योजना थी."
40 साल पुरानी योजना
श्रीशैलम लेफ्ट बैंक कनाल या एसएलबीसी सुरंग की योजना क़रीब चार दशक पहले बनाई गई थी.
1978 में राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री चेन्ना रेड्डी ने इस परियोजना का अध्ययन करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था.
इसी समिति ने सबसे पहले सर्वेक्षण कराने और सुरंग के माध्यम से पानी की दिशा मोड़ने का सुझाव दिया था.
उसके बाद 1980 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अंजैया ने अक्कम्मा क्रेटर पर एक सुरंग के निर्माण की आधारशिला रखी थी. तत्कालीन सरकार ने इस परियोजना के लिए 3 करोड़ रुपये भी आवंटित किए थे.
फिर एनटीआर ने मुख्यमंत्री बनने के बाद मई 1983 में लेफ्ट बैंक नहर और राइट बैंक नहर की आधारशिला रखी थी.
बाद में साल 1995 में सरकार को लगा कि सुरंग के निर्माण में देरी हो रही है, इसलिए उन्होंने विकल्प के रूप में नालगोंडा ज़िले के पुट्टंगंडी से एक लिफ्ट सिंचाई योजना का प्रस्ताव रखा और इस परियोजना को अपनाया गया.
इसे एलिमिनेटीमाधव रेड्डी लिफ्ट सिंचाई योजना नाम दिया जा रहा है, जो कि श्रीशैलम लेफ्ट बैंक कनाल परियोजना में लगातार हो रही देरी की वजह से विकल्प के तौर पर अपनाया गया है.
इसका इस्तेमाल पुट्टंगंडी से पानी को मोड़ने और संयुक्त नालगोंडा ज़िले के लिए सिंचाई और पेयजल के साथ-साथ हैदराबाद की पेयजल ज़रूरतों के लिए पानी उपलब्ध कराने के लिए किया जा रहा है.
हालांकि यह परियोजना एसएलबीसी सुरंग परियोजना के विकल्प के रूप में बनाई गई थी, लेकिन दशकों से यह तर्क दिया जाता रहा है कि केवल सुरंग का निर्माण ही इस समस्या को स्थाई समाधान प्रदान करेगा.
उसके बाद राज्य सरकार साल 2005 में इस दिशा में आगे बढ़ी है.
देरी की वजह क्या है?
अधिकारियों का कहना है कि एसएलबीसी परियोजना साल 2010 तक पूरी हो जानी चाहिए थी.
लेकिन अब तक परियोजना के पूरा होने की समयसीमा को छह बार आगे बढ़ाया जा चुका है. मौजूदा समय सीमा के मुताबिक़ इसे जून 2026 तक पूरा किया जाना है.
इस सुरंग के शुरुआती छोर की तरफ भारी मात्रा में पानी का रिसाव होने की वजह से इसका काम मुश्किल हो गया है. यानी यहां पानी और गाद की निकासी के दौरान काम किए जाने की ज़रूरत है.
नैनाला गोवर्धन का कहना है, "परियोजना में रिसाव को नियंत्रित करना बहुत मुश्किल है. श्रीशैलम परियोजना के पास चल रहे काम के दौरान रिसाव काफ़ी ज़्यादा है और इस तरह के पानी के बीच काम करना एक चुनौती है."
उन्होंने बताया कि वे पत्थरों को टूटने से बचाने के लिए छल्ले बनाकर और सीमेंट की परत लगाकर काम करेंगे.
वहीं निर्माण कंपनी ने कहा कि परियोजना के लिए ज़रूरी सुरंग खोदने वाली मशीन कई बार ख़राब हो चुकी है.
रिटायर चीफ़ इंजीनियर श्याम प्रसाद रेड्डी ने कहा, "इसके अलावा इस परियोजना के लिए फंड की भी समस्या है. इसके बिजली बिल का भुगतान ठीक से नहीं किया गया. निर्माण कंपनी और सरकार दोनों के बीच फंड की समस्या के कारण काम बुरी तरह प्रभावित हुआ है."
उन्होंने यह भी बताया कि बीच में कटाई में आई समस्या के कारण डेढ़ साल तक काम को रोकना पड़ा था.
सिंचाई विभाग के एक अधिकारी ने बीबीसी को बताया, "अब तक परियोजना की कुल लागत 2,647 करोड़ रुपये. पिछले दस साल में इसके लिए केवल 500 करोड़ रुपये आवंटित किये गये हैं. ख़ासकर साल 2019, 2020 और 2021 के दौरान तीन साल में केवल 10 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं."
परियोजना को लेकर बढ़ती उम्मीद
तेलंगाना में कांग्रेस सरकार आने के बाद परियोजना पर ख़र्च का अनुमान एक बार फिर बढ़ा दिया गया. साल 2017 में जहां अनुमानित ख़र्च बढ़कर 3,152 करोड़ रुपये हो गया, वहीं कांग्रेस सरकार ने इसे बढ़ाकर 4,637 करोड़ रुपये कर दिया.
इसके लिए सरकार ने सिंचाई विभाग के प्रमुख अभियंता (ईएनसी) अनिल कुमार की अध्यक्षता में एक समिति गठित की है.
समिति ने पाया कि सुरंग पर काम फिर से शुरू करने के लिए पानी के रिसाव की रोकथाम और बोरिंग मशीन बियरिंग स्थापित करने की ज़रूरत होगी.
इसके लिए निर्माण कंपनी को एडवांस के तौर पर 50 करोड़ रुपये आवंटित करने का प्रस्ताव किया गया और सरकार ने पिछले साल यह धनराशि जारी की थी.
तेलंगाना सरकार ने साल 2024-25 के बजट में इस परियोजना के लिए 800 करोड़ रुपये भी आवंटित किए हैं.
पिछले साल जुलाई में सिंचाई मंत्री उत्तम कुमार रेड्डी ने घोषणा की थी कि परियोजना को दो साल के अंदर पूरा करने के लिए कदम उठाए जाएंगे.
उन्होंने कहा, "निर्माण कंपनी की वर्तमान योजना प्रति माह 300 मीटर की दर से सुरंग खोदने की है और इस तरह से यह परियोजना दो से ढाई साल में पूरी हो जाएगी."
सिंचाई विशेषज्ञों का कहना है कि सुरंग का काम कई साल से चल रहा है, जिसकी वजह से समस्याएं बढ़ती जा रही हैं.
सुरंग के अंदर काम में परेशानी
नैनाला गोवर्धन ने बीबीसी को बताया कि परियोजना के पास सुरंग के अंदर काम करने में कई समस्याएं हैं.
उनका कहना है कि सुरंग निर्माण मार्ग पर जिन क्षेत्रों में ज़मीन 'ढीली' है, उन्हें रडार की मदद से पहचाना जाना चाहिए और सुरंग के अंदर की तरफ धंसने की संभावना से बचने के लिए सावधानी बरतनी होगी.
उन्होंने कहा, "जब सुरंग बनाने वाली मशीन चलती है तो बहुत तेज़ आवाज़ आती है. वहां इस शोर को खींचने का कोई तरीका मौजूद नहीं है. इसका कान और दिमाग़ पर गहरा असर पड़ता है. जर्मन मशीनों की व्यवस्था इसके अनुसार की जानी चाहिए."
वहीं सिंचाई विशेषज्ञों का कहना है कि आमतौर पर हवा और रोशनी आने के लिए हर 500 मीटर पर एक सुरक्षा चैंबर बनाया जाना जाहिए.
लेकिन समस्या यह भी है कि एसएलबीसी के मामले में चैंबर बनाने के लिए खुदाई की अनुमति नहीं है क्योंकि यह एक संरक्षित वन क्षेत्र है.
नैनाला गोवर्धन ने बीबीसी को बताया, "यहां कई साल से चल रहे काम की वजह के कुछ हानिकारक गैस भी निकल रहे हैं. कई बार ऐसे हालात भी हो जाते हैं कि आप सांस भी नहीं ले पाते. इसके लिए बाहर की तरफ से हवा आने की जगह होनी चाहिए."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित