उत्तरकाशी सुरंग हादसा: 17 दिनों की कश्मकश का ब्यौरा

    • Author, आसिफ़ अली
    • पदनाम, उत्तरकाशी से, बीबीसी हिंदी के लिए

मंगलवार रात आठ बजे के आसपास वो पल 17 दिनों तक चले लंबे इंतज़ार और जद्दोजहद के बाद आया था, जिसका पूरे देश को इंतज़ार था.

उत्तरकाशी सुरंग में फँसे सभी 41 मज़दूरों को सकुशल बाहर निकाला गया.

उत्तरकाशी ज़िले में यमुनोत्री हाईवे पर सिलक्यारा में निर्माणाधीन सुरंग में 12 नवंबर को मिट्टी धँसने से 41 मज़दूर सुरंग में ही फँस गए थे.

गंगोत्री और यमनोत्री के बीच उत्तरकाशी-यमनोत्री हाईवे पर रॉडी टॉप के नज़दीक आलवेदर रोड परियोजना के अंतर्गत यह सुरंग बनाई जा रही है.

साढ़े चार किलोमीटर लंबी सुरंग से गंगोत्री और यमनोत्री के बीच की दूरी 26 किलोमीटर कम हो जाएगी और लोगों का 45 मिनट का समय भी बचेगा. ये टनल सिलक्यारा फ़्रंट साइट से 2340 मीटर और टेल साइट से 1700 मीटर काटी जा चुकी है.

साढे़ चार किलोमीटर लंबी इस टनल को एनएचआईडीसीएल की देखरेख में दो कंपनियाँ बना रही हैं. फ़्रंट साइट से नवयुग कंपनी काम कर रही है, तो टेल साइट से गजा कंपनी सुरंग बना रही है.

दुर्घटना फ़्रंट साइट से नवयुग कंपनी के पार्ट में हुई. हादसे के बाद एस्केप टनल नहीं होने से मज़दूरों को तुरंत निकालना संभव नहीं हुआ.

टनल के जिस 60 मीटर हिस्से में लूज फ़ॉल हुआ, उस हिस्से में लाइनिंग का कार्य नहीं हुआ था.

निर्माण साइट पर काम करने वाले कुछ मज़दूरों ने पहचान ज़ाहिर न करने की शर्त पर बताया है कि इस हिस्से में कई दिन से पानी की लीकेज और लूज गिर रहा था, लेकिन ध्यान नहीं दिया गया.

12 नवंबर, जिस दिन हादसा हुआ

निर्माणधीन टनल में 12 नवंबर यानी दिवाली के दिन सुबह क़रीब 5 बजे भूस्खलन हुआ, जिसमें कंपनी के दो फ़ोरमैन समेत 41 श्रमिक अंदर फँस गए थे.

ख़बर मिलने के बाद मैं देहरादून से उत्तरकाशी के लिए निकला. दिवाली के दिन होने की वजह से सड़कों पर भीड़ कम थी, लेकिन पहाड़ों पर सफ़र वैसे भी मुश्किल भरा होता है.

उत्तरकाशी में हादसे की जगह पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई. घटना के दिन यही जानकारी मिल रही थी कि 40 मज़दूर फँसे हुए हैं.

घटना के दिन कोई बड़ा अफ़सर मौक़े पर नहीं था. इसकी एक वजह दिवाली की छुट्टी भी थी.

नतीजा ये रहा कि कई घंटों तक दुर्घटना की गंभीरता का अंदाज़ा नहीं लग पाया. सुरंग में मलबा हटाने के लिए सबसे पहले जेसीबी लगाई गई थी.

हालाँकि उसी रात इस इलाक़े के कुछ लोगों से हमारी मुलाक़ात हुई, जो इस हादसे से बेहद ख़ौफ़ज़दा थे.

उन लोगों की आशंका तो यही थी कि ये सब लोग ज़िंदा दफ़न ना हो जाएँ.

सुरंग के आसपास कोई रिहाइश नहीं है. यहाँ सिर्फ़ छोटी ज़रूरतों को पूरा करने वाली इक्का-दुक्का दुकाने हैं, जो यहाँ रह रहे मज़दूरों की वजह से चल रही थी.

सुरंग के सबसे नज़दीक (क़रीब 4 किलोमीटर की दूरी पर) महर गाँव है, जो सिर्फ़ नाम से तो गाँव है, लेकिन यहाँ सड़क किनारे चंद दुकानें हैं, जिनके पीछे घर मौजूद हैं. लिहाज़ा हादसे की जगह सबसे नज़दीक महर गाँव में ही ठहरने का विकल्प था.

13 नवंबर, हादसे का दूसरा दिन

13 नवंबर की सुबह हम क़रीब छह बजे टनल के सामने पहुँच गए, जब हमने इस टनल को पहली बार उजाले में देखा था.

रविवार की शाम से सुबह तक बड़ा बदलाव ये दिखा कि मौक़े पर राहत व बचाव के लिए एसडीआरएफ़, एनडीआरफ़, आईटीबीपी सहित फ़ायर सर्विस की टीमें सहित पुलिस के जवान मौजूद थे.

तभी हमें टनल के अंदर से आते एक पुलिस अफ़सर नज़र आए. यह सीओ उत्तरकाशी प्रशांत कुमार थे, जो टनल में फँसे मज़दूरों की ख़ैर ख़बर लेने गए थे.

उस वक़्त बातचीत के दौरान उन्होंने हमें बताया कि वे अभी टनल के अंदर से ही आए हैं और टनल में फँसे लोगों के साथ उनका संपर्क हुआ था.

प्रशांत कुमार ने बताया था, “जो एनएचआईडीसीएल की पाइप लाइन थी, जो यहाँ पानी और ऑक्सीजन सप्लाई कर रही है, उससे हमने वायरलेस के ज़रिए संपर्क करने की कोशिश की, तो अंदर फँसे लोगों ने हमें कनेक्ट किया और अपनी कुशलता प्रकट की.”

उनके मुताबिक़ बात वायरलेस से हो रही है, उसमें शॉट सिग्नल्स हैं. उसी से पता लग पा रहा था कि वो ठीक हैं या उनको क्या चाहिए.

टनल में फँसे लोगों ने थोड़ा खाने पीने की माँग की थी. लाइन बहुत छोटी थी, तो उसी से कुछ खाने पीने की चीज़ें भेजी गईं.

टनल में फँसे अधिकांश लोग झारखंड, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, ओडिशा, बिहार और पश्चिम बंगाल के रहने वाले हैं.

दिवाली से अगले दिन सरकार को इस घटना की गंभीरता का अहसास हो चुका था.

तब कहीं जाकर यहाँ शासन से अधिकारी भेजे गए और विशेषज्ञ एजेंसियों से संपर्क साधा गया.

14 नवंबर, तीसरा दिन

14 नवंबर को टनल में फँसी ज़िंदगियों को बचाने की जद्दोजहद जारी थी. राहत और बचाव की कोशिशें की जा रही थी.

टनल में अंदर ऑगर मशीन और एमएस पाइप भी भेजे गए थे. मौक़े पर ज़रूरी साजो सामान के साथ विशेषज्ञ और इंजीनियर्स मौजूद थे.

शॉट क़्रीटिंग मशीनों से मलबे को थामने का प्रयास किया जा रहा था. लेकिन फिर भी मलबा गिरने से रुक नहीं पा रहा था.

जिसके बाद रेस्क्यू टीमों ने नई रणनीति अपनाई. जिसके तहत ऑगर मशीन देहरादून से मँगाई गईं.

900 एमएम व्यास के एमएस पाइप ग़ाज़ियाबाद और हरिद्वार से मँगाए गए. ऑगर मशीन के लिए प्लेटफ़ॉर्म तैयार कर लिया गया.

पाइप के भीतर से मज़दूरों को निकालने की योजना बनाई गई.

15 नवंबर, जब आई पहली बड़ी मुश्किल

15 नवंबर सुबह क़रीब नौ बजे टनल में मज़दूरों को फँसे क़रीब 72 घंटे से अधिक समय हो चुका था.

मलबे को ड्रिल करने वाली ऑगर मशीन के सुरंग में भेजे जाने के बाद से लग रहा था कि अब जल्द ही रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा हो जाएगा.

लेकिन 15 नवंबर की सुबह जो जानकारी मिली, उसके मुताबिक़ ऑगर मशीन मलबे में सही तरह से ड्रिल नहीं कर पा रही थी.

मशीन के लिए जो बेस बनाया गया था, अब उसे डिस्मेंटल करने का काम किया जा रहा था.

एसडीआरएफ़ के इंस्पेक्टर भास्कर ने बताया था कि ऑगर मशीन में कुछ तकनीकी ख़राबी आई है और कंपनी वालों ने बताया था कि अब दूसरी मशीन दिल्ली से एयरलिफ़्ट करके मँगाई जा रही है.

मशीन के बेस में दिक़्क़त आ रही थी, उसे ठीक करने का प्रयास किया जा रहा था. दोपहर होते-होते टनल में फँसे मज़दूरों के साथियों ने टनल के बाहर ग़ुस्सा ज़ाहिर करते हुए विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया.

टनल के बाहर मौजूद पुलिस ने उन्हें चुप कराने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन बाहर इकट्ठा हुए मज़दूर मानने को तैयार नहीं हुए.

एनएचआईडीसीएल कंपनी के अधिकारियों के बड़ी मुश्किल से समझाने के बाद वे चुप हुए. तब तक यह घटना देश-विदेश में चर्चा का विषय बन चुकी थी.

ऐसे में केंद्र सरकार भी सक्रिय हो गई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीएम धामी से फ़ोन पर बात कर स्थिति की जानकारी ली.

साथ ही किसी भी आवश्यकता के लिए पीएमओ से संपर्क में रहने को कहा गया.

उत्तरकाशी टनल में रेस्क्यू कार्य में लगी ऑगर मशीन के ड्रिल करने वाले पार्ट में ख़राबी आने के बाद उच्च क्षमता की दूसरी ऑगर मशीन को दिल्ली से मँगाया गया.

विमान से एयरलिफ़्ट कर मशीन को उत्तरकाशी के चिन्यालीसौड़ हवाई पट्टी तक तीन खेपों में पहुँचाया गया.

रेस्क्यू के लिए उच्च क्षमता की दूसरी मशीन दिल्ली से एयरलिफ़्ट करके मँगवाई गई थी. यह मशीन एयर फ़ोर्स के सी1, 30 एयरक्राफ़्ट से मँगाई गई थी.

यहाँ उत्तरकाशी में चिन्यालीसौड़ हवाई पट्टी पर तीन एयरक्राफ़्ट यह मशीन को लेकर उतरे थे.

शुरुआती दौर में ज़िला प्रशासन और कंपनी के लोगों में कॉआर्डिनेशन की भारी कमी देखी गई.

ज़िला प्रशासन को स्टेटस रिपोर्ट तक नहीं दी जा रही थी, नतीजा 15 नवंबर को एडीएम उत्तरकाशी तीरथ पाल सिंह को कंपनी के एक्सक्यूटिव डायरेक्टर को नोटिस भेजकर कहा कि हर दो घंटे में आप ज़िला प्रशासन को स्टेटस रिपोर्ट दें, वरना किसी भी लापरवाही के लिए आप स्वयं ज़िम्मेदार होंगे.

16 नवंबर, जब पहुंचे केंद्रीय मंत्री

16 नवंबर को केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह ने ऑपरेशन साइट का दौरा किया.

उनके साथ सचिव अनुराग जैन समेत चीफ़ इंजीनियर राहुल गुप्ता भी मौजूद थे.

जनरल वीके सिंह ने निरीक्षण के बाद अधिकारियों के साथ बैठक की और पूरे रेस्क्यू मामले की जानकारी ली.

जनरल सिंह ने टनल में फँसे मज़दूरों के परिजनों से बातचीत कर उन्हें भरोसा दिलाया कि सरकार रेस्क्यू के लिए हरसंभव प्रयास करेगी. संयम रख कर सरकार के प्रयासों में सहयोग करे.

मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि प्राथमिकता लोगों को सकुशल बाहर निकालना है. सरकार टनल में फँसे लोगों को बाहर निकालने का हरसंभव प्रयास करेगी.

जनरल वीके सिंह ने ये भी कहा था कि राज्य की एजेंसियों के साथ केंद्रीय एजेंसियों की मदद ली जा रही है. विदेशी विशेषज्ञ एजेंसियों की मदद भी ली जा रही है.

17 नवंबर, हादसे के बाद छठा दिन

17 नवंबर को उत्तरकाशी टनल में फँसे छठा दिन था और मज़दूरों को बाहर निकालने वाला पाइप 24 मीटर तक ड्रिल किया गया था.

उस दिन क़रीब एक बजे एनएचआईडीसीएल के डायरेक्टर अंशु मनीष खलको ने बताया था कि बैकअप प्लान के तौर पर एक और मशीन को इंदौर से एयरलिफ़्ट किया जा रहा है.

लेकिन लोगों को चिंता भी सता रही थी कि ना जाने अब मज़दूरों को बाहर निकालने में ओर कितना वक़्त लगेगा.

ऐसे में कंपनी की एक लापरवाही भी सामने आई. कंपनी के पास कई दिन तक भी सुरंग में फँसे मज़दूरों का सटीक डेटा नहीं था. कंपनी ने पहले सुरंग में फँसे मज़दूरों के अलग-अलग आँकड़े दिए थे.

कुछ घंटों बाद बताया गया कि सुरंग में 40 श्रमिक फँसे हुए हैं. क़रीब पाँच दिन बाद 17 नवंबर को जानकारी दी गई कि 40 नहीं बल्कि 41 श्रमिक फँसे हुए हैं. इसे कंपनी की एक बड़ी चूक के तौर पर देखा गया.

18 नवंबर, पीएमओ ने संभाली कमान

18 नवंबर को पीएमओ की ओर से पूर्व सलाहकार भास्कर खुल्बे और पीएमओ के डिप्टी सेक्रेटरी मंगेश घिल्डियाल को मौक़े पर भेजा गया और इसके साथ ही पीएमओ ने पूरे ऑपरेशन की कमान अपने हाथ में ले ली.

अभी तक मज़दूरों को टनल से सुरक्षित बाहर निकाले जाने वाले पाइप को 24 मीटर (4 पाइप) तक मलबे में ड्रिल किया जा चुका था.

टनल में फँसे मज़दूरों के अलग अलग राज्यों से यहाँ आए परिजन बाहर बेहद परेशान और घबराए हुए नज़र आ रहे थे.

इजाज़त लेकर वो टनल में अपने अपने रिश्तेदारों से पाइप के ज़रिए बात करके आते-जाते रहते थे.

18 नवंबर की सुबह क़रीब नौ बजे टनल में फँसे अपने भाई से मिलकर आए बिहार के एक मज़दूर के भाई ने बताया कि अब अंदर फँसे सभी लोगों की हालत अब दुरुस्त नहीं है.

उधर पिछले 24 घंटों से बचाव अभियान में कोई प्रगति नहीं हुई थी. 24 मीटर रेस्क्यू पाइप मलबे में ड्रिल करने की बात कही गई थी, उससे आगे का काम नहीं बढ़ पाया था.

कहीं और से भी रास्ता खोजे जाने पर एक्सपर्ट सलाह मशविरे के साथ बैठकों का भी दौर जारी था. इन्हीं सबके बीच डिप्टी सेक्रेटरी पीएमओ मंगेश घिल्डियाल भी मौक़े पर मुआयना करने पहुँचे थे.

इन सब बातों के बीच आज एक बार फिर से सभी मज़दूर अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर करते हुए टनल से कुछ दूरी पर बनाए गए एनएचआईडीसीएल के दफ़्तर पहुँचे.

मज़दूर ग़ुस्से में थे और अपने साथियों के बाहर आने को लेकर कंपनी के आला अधिकारियों से बात करना चाहते थे.

जिसकी वजह से आला अधिकारियों को ऐसे माहौल में ज़रूरी बैठक छोड़कर बाहर निकलना ही पड़ा. अधिकारियों के बाहर आने पर मज़दूरों ने अंदर फँसे हुए अपने साथियों की पीड़ा बताई.

टनल में लोडर अपलोडर का काम करने वाले मृत्युंजय कुमार ने भी टनल के अंदर के मौजूदा हालातों के बारे में बताया कि टनल के अंदर की स्थिति ख़राब है.

उन्होंने बताया कि टनल के अंदर लूज़ पोज़ीशन है. उसी हालात में वे काम कर रहे हैं.

19 नवंबर, नितिन गडकरी का दौरा

19 नवंबर को केंदीय मंत्री नितिन गडकरी ने ऑपरेशन साइट का दौरा किया. इसके साथ ही ऑपरेशन में तेज़ी आई. अब टनल को भेदने के लिए अलग-अलग छह प्लान पर काम शुरू हुआ.

मज़दूरों को सुरक्षित निकालने के लिए सुरंग के दाएँ और बाएँ हिस्से से एस्केप टनल बनाने के साथ ही सुरंग के ऊपर पहाड़ी से वर्टीकल ड्रिलिंग करने के विकल्प पर अमल शुरू हुआ.

20 नवंबर, जब मिली पहली अच्छी ख़बर

20 नवंबर को पहली अच्छी खबर के साथ ही मज़दूरों के बाहर निकालने की उम्मीद की किरण भी नज़र आई.

सुबह क़रीब 11 बजे छह इंच का 57 मीटर लंबा लाइफ़ सपोर्ट पाइप टनल के आरपार हुआ था, अब श्रमिकों तक पर्याप्त मात्रा में भोजन सप्लाई होने लगा.

साथ ही उनसे वॉकी टॉकी और वीडियो के ज़रिए बातचीत का रास्ता साफ़ हुआ.

हम मीडियाकर्मियों के लिए उम्मीद और आशंकाओं के बादल ऐसे तैर रहे थे कि कई साथी सुरंग के बाहर ही अलाव जलाकर समय बिताने लगे थे. एक ही कपड़े में सात दिन यूँ निकल आए थे, तब ध्यान आया कि जूते भी अब जवाब देने लगे हैं.

लेकिन सारा ध्यान सुरंग के अंदर होने वाले काम और उससे संबंधित जानकारी जुटाने पर ही था. कई बातें तकनीकी होती थीं, जिसे खुद भी समझने में समय लग रहा था.

21 नवंबर, मलबा निकलने का काम

21 नवंबर तक टनल में जो मलबा था, उसमें 22 मीटर तक ही ड्रिल किया गया था. यही स्थिति पिछले तीन दिनो से बनी थी. एक-एक करके दिन बढ़ते जा रहे थे.

एनएचआईडीसीएल के एमडी महमूद अहमद ने बताया था कि टनल में ऑगर मशीन से होरिजेंटल ड्रिलिंग का काम जल्द शुरू होने जा रहा है. 900 एमएम पाइप की जगह अब 800 एमएम की पाइप की ड्रिलिंग का काम शुरू हुआ है.

उन्होंने बताया था कि क़रीब 40 घंटे में बड़ी ख़बर मिल सकती है. लेकिन बोरिंग के दौरान मलबे के 22 से 45 मीटर हिस्से में पाइप को क्रॉस कराना चुनौतीपूर्ण काम हो सकता है. क्योंकि इसी हिस्से में बोल्डर और मशीनों के दबे होने की आशंका है.

21 नवंबर को ही टनल से पहला वीडियो बाहर आया. यहाँ भी कॉआर्डिनेशन की कमी देखी गई. ज़िला प्रशासन को बताए बिना पहले ही मीडिया में वीडियो वायरल कर दिया गया.

इस पर ज़िला प्रशासन की ओर से एनएचआईडीसीएल के अधिकारियों को नोटिस भी जारी किया गया और इसके बाद हुई सख़्ती के तहत दिल्ली में ऑपरेशन की अपडेट ब्रीफ़िंग होने लगी.

22 नवंबर, उम्मीद और आशंकाओं का 11वाँ दिन

22 नवंबर को उत्तरकाशी टनल में मज़दूरों को फँसे हुए 11 दिन हो चुके थे और उन्हें बचाने की कोशिशें जारी थी.

एनएचआईडीसीएल के एमडी महमूद अहमद ने टनल में फँसे 41 मज़दूरों के लिए किए जा रहे रेस्क्यू कार्यों के बारे जानकारी दी.

उन्होंने बताया कि अब तक सुरंग में 39 मीटर तक की ड्रिल किया जा चुका है. क़रीब 57 मीटर तक ड्रिल किया जाना है. यानी अभी 18 मीटर और ड्रिल किया जाएगा.

हालाँकि तब तक ये घटना दुनिया भर की मीडिया की सुर्ख़ियों में आ चुका था.

उत्तरकाशी में सुरंग के सामने मीडिया कर्मियों की संख्या सैकड़ों में पहुँच गई थी. इसका असर ये कि था कि मैगी और पराठा के दाम भी आसमान पर पहुँच गए थे. पानी की बोतलें भी तीन गुने दाम पर मिलने लगी थीं.

23 नवंबर से 25 नवंबर: मुसीबतों के बादल

23 नवंबर को अवरोध आने के कारण टनल में काम रोकना पड़ा. जिसके बाद जीपीआर स्कैन किया गया और मशीन को इंस्टॉल किया गया. इन सबमें वक़्त लग रहा था और आम लोगों की बेचैनी भी बढ़ रही थी.

24 नवंबर को 800 एमएम पाइप के भीतर फँसे लोहे को काटने के दौरान गैस कटर के धुएँ की महक मज़दूरों तक पहुँची तो उम्मीदें बढ़ीं. लेकिन अवरोध के कारण काम को एक बार फिर रोकना पड़ा.

25 नवंबर को ऑगर ड्रिलिंग मशीन का हेड मलबे में फँस गाया. मशीन के हेड के टूटने से अब पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन से उम्मीदों को झटका लगा.

ऑगर मशीन का एक भाग मलबे में फँस गया था, जिसके बाद ऑगर के फँसे भाग को काटकर टुकड़ों में निकलना पड़ा.

साथ ही तय किया गया कि एस्केप टनल बनाने के लिए आगे की ड्रिलिंग और बाधाओं की कटिंग मैनुअली की जाएगी.

26 नवंबर को वर्टिकल ड्रिंलिंग का काम शुरू

26 नवंबर को वर्टिकल ड्रिलिंग शुरू हुई. पहले दिन 15 मीटर तक इसकी खुदाई पहुँच गई थी.

साथ साथ टनल में मशीन के फँसे भाग को काटकर टुकड़ों में निकाला गया.

दरअसल मुश्किलें इसलिए भी थी कि सारे बचाव अभियान में सुरंग में कोई दूसरा हादसा ना हो जाए, इसका ख़्याल रखा जा रहा था.

ऑगर ड्रिलिंग मशीन के टूटे पार्टस को प्लाज्मा एवं लेज़र कटर से टुकड़ों में काटा गया.

27 नवंबर, जब मशीन हुईं नाकाम

27 नवंबर को उत्तरकाशी सुरंग में मैनुअल ड्रिलिंग का काम शुरू हुआ. जो काम ऑगर मशीन की ब्लेड मलबे में मौजूद सरियों के जाल में फँसने की वजह से रुकी हुई थी.

इसी दौरान एनएचआईडीसीएल के प्रबंध निदेशक महमूद अहमद ने बताया कि अब रैट माइनर तकनीक से मैनुअल ड्रिलिंग की जा रही है. ऑगर मशीन का इस्तेमाल भी कटिंग के बजाय पाइप को पुश करने के लिए किया जा रहा है.

साथ ही साथ उन्होंने बताया कि वर्टिकल ड्रिलिंग का काम भी 36 मीटर तक पूरा किया जा चुका है. जो कुल 86 मीटर होना है.

अब लगने लगा था कि यह ऑपरेशन कामयाबी की ओर बढ़ रहा है. लेकिन पूर्व में आई बाधाओं के चलते इस बार भी मन में कहीं ना कहीं शंका थी.

28 नवंबर यानी उम्मीद की वो सुबह

28 नवंबर की सुबह से ही ऐसा लग रहा था कि सुरंग के भीतर फँसे मज़दूर कभी भी बाहर निकाले जा सकते हैं. रैट पुशिंग तकनीक से काम कर रहे लोगों तेज़ी से सुरंग के भीतर अपने काम को अंजाम दे रहे थे.

इस काम के लिए दिल्ली से एक्सपर्ट लोग बुलाए गए थे. यह कुल 12 लोगों की टीम थी.

जब सोमवार शाम सुरंग में इन्होंने अपना काम करना शुरू किया था, तब कुल 12 मीटर मलबा हटाना बाक़ी रह गया था.

दिल्ली से आई इस टीम के सदस्यों ने ये काम अपने हाथों, हथौड़ी व कुदाली जैसे औज़ारों से काम किया.

मंगलवार सुबह 8.30 बजे तक ये लोग छह मीटर तक मलबा बाहर भी निकाल चुके थे.

इस 12 सदस्यीय टीम के लीडर वक़ील हसन और सुरंग में रात भर काम कर चुके मुन्ना ने हमें सुरंग के भीतर किए गए काम के बारे में बताया.

इन्होंने बताया कि 800 एमएम डायमीटर के पाइप में दो लोग अंदर जाकर अपने हाथों से खोदकर मलबा बाहर भेजते हैं. दो लड़के अपने हाथों से मलबा हटाने का काम करते हैं, जिसके बाद उस मलबे को बाहर हाथ से बनाई गाड़ी से बाहर भेजा जाता है.

दिन गुज़रता गया और सुरंग के सामने आसपास के इलाक़ों से आए लोग जुटते गए. सुरंग में 17 दिनों से बंद मज़दूरों के अलग-अलग राज्यों से आये परिजन भी आस लगाए यहाँ नज़र आए.

दोपहर के वक़्त हल्की बारिश की बूँदा बूंदी ज़रूर हुई, लेकिन कुछ ही देर में थम भी गई.

यहाँ जमा देश के सभी न्यूज़ चैनल के पत्रकार लगातार अपनी लाइव रिपोर्टिंग में व्यस्त थे. डॉक्टरों की टीम सहित तमाम एजेंसियाँ अलर्ट मोड पर थीं.

दिन से ही कई एम्बुलेंस सुरंग के आसपास आकर खड़े हो चुकी थी, जो हर वक़्त तैयार थी. आख़िरकार देर शाम के समय वो वक़्त आ ही गया जब एक-एक करके मज़दूर बाहर निकाले.

सबसे पहले इन श्रमिकों से उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मुलाक़ात की.

टनल के आसपास जमा लोग, कर्मचारी और कई दिनो से यहाँ डेरा डाले पत्रकार सभी मज़दूरों के बाहर आने पर ख़ुश थे.

हमारे चेहरों पर भी 17 दिन की थकान ग़ायब हो चुकी थी. मौत और ज़िंदगी की जंग में ज़िंदगी जीत चुकी थी. ये शाम तो थी लेकिन 41 मज़दूरों के परिवारों के लिए उम्मीद की सुबह थी.

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