इटली की प्रधानमंत्री ने लिया अहम फ़ैसला, क्या यह भारत के हक़ में होगा?

इटली की सरकार ने आधिकारिक तौर पर चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) प्रोजेक्ट से बाहर निकलने की घोषणा कर दी है.

प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी प्रशासन ने चीन को जानकारी दी है कि वह साल ख़त्म होने से पहले ही प्रोजेक्ट से बाहर आ जाएगा.

हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात में हुए कोप-28 से अलग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कई नेताओं से मुलाक़ात हुई थी, जिसमें जियोर्जिया मेलोनी भी शामिल थीं.

मेलोनी ने पीएम मोदी के साथ सेल्फी ली थी, जिसे शेयर करते हुए उन्होंने नरेंद्र मोदी को ‘अच्छा दोस्त’ बताया था.

चीन की सबसे महत्वाकांक्षी व्यापार और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना बीआरआई पर साल 2019 में हस्ताक्षर करने वाला इटली, एकमात्र प्रमुख पश्चिमी देश था.

उस समय अमेरिका, यूरोपीय संघ और पश्चिम के कई देशों ने इटली की आलोचना की थी.

अमेरिका कहना है कि चीन इस प्रोजेक्ट के ज़रिए देशों को ‘क़र्ज़ के जाल’ में फँसा रहा है और उनका इस्तेमाल अपने हितों के लिए कर रहा है.

भारत के हक़ में यह फ़ैसला?

इटली का बीआरआई से अलग होना भारत के लिए एक सकारात्मक ख़बर के रूप में देखा जा रहा है. भारत हमेशा से बीआरआई के विरोध में रहा है. पाकिस्तान भी इस परियोजना में शामिल है.

चाइना पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर यानी सीपीईसी बीआरआई का ही हिस्सा है. सीपीईसी के तहत कई निर्माण पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में भी हुए हैं. भारत इसका विरोध करता है और कहता है कि यह उसकी संप्रभुता का उल्लंघन है.

ऐसे में इटली का बीआरआई से अलग होना भारत के लिए राहत से कम नहीं है.

भारत-मध्य पूर्व- यूरोप कॉरिडोर को चीन की बीआरआई के जवाब में देखा जा रहा है. इसी साल सितंबर महीने में नई दिल्ली में हुए जी-20 समिट में इस परियोजना की नींव रखी गई थी.

इसमें भारत, इसराइल, सऊदी अरब, यूएई और जॉर्डन शामिल हैं. हालांकि इसराइल और हमास के बीच छिड़े युद्ध के कारण भारत-मध्य पूर्व-यूरोप कॉरिडोर को लेकर सवाल उठने लगे हैं.

इससे पहले अर्जेंटीना ने ब्रिक्स में शामिल होने के फ़ैसले से पीछे हटने का निर्णय किया था. ब्रिक्स को ब्रिक्स प्लस में विस्तार देने के तहत अर्जेंटीना को भी इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था. अर्जेंटीना के इस फ़ैसले को भी चीन के ख़िलाफ़ देखा गया.

जब इटली ने चीन से मिलाया हाथ

समझौता 2024 मार्च में ख़त्म हो कर ऑटो-रीन्यू यानी अपने आप फिर से लागू हो जाएगा, बशर्ते दोनों पक्षों में से एक पक्ष दूसरे को कम से कम तीन महीने पहले इस बात की जानकारी दे कि वो इस समझौते को आगे लागू नहीं करना चाहता है, लेकिन अब इटली ने यह जानकारी चीन को दे दी है.

बीआरआई प्रोजेक्ट में इटली के शामिल होने के फ़ैसले को प्रधानमंत्री मेलोनी ने पिछली सरकार की एक गंभीर ग़लती बताई थी. वे पहले भी यह संकेत दे चुकी थीं कि इस प्रोजेक्ट से पीछे हटने का मन बना रही हैं.

साल 2019 में इटली के तत्कालीन प्रधानमंत्री ग्यूसेप कोंटे ने चीन के साथ बीआरआई समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

2018 में इटली की वित्त मंत्री जियोवानी ट्रिया के चीन दौरे के बाद इटली ने इसमें शामिल होने का फ़ैसला किया था.

हालांकि मेलोनी सरकार ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि वह बीआरआई से क़दम पीछे खींचने के बावजूद चीन के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना चाहती हैं.

इटली का चीन से आयात बढ़ा

बीआरआई के तहत चीन ने इटली के अंदर 20 अरब यूरो का एक प्रोजेक्ट शुरू किया था. हालांकि उस प्रोजेक्ट का एक छोटा सा हिस्सा ही अभी पूरा हुआ है.

पिछले साल इटली ने चीन को 16.4 अरब यूरो का सामान भेजा था, वहीं साल 2019 में यह निर्यात 13 अरब यूरो था.

इसके उलट चीन का निर्यात इस बीच 31.7 अरब यूरो से बढ़कर 57.3 अरब यूरो हो गया है.

यूरोपीय यूनियन की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं फ्रांस और जर्मनी, बीआरआई का सदस्य न होने के बावजूद चीन के साथ कहीं ज्यादा बड़े पैमाने पर व्यापार करती हैं.

पिछले साल प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद मेलोनी ने अपने पूर्ववर्ती पीएम की तुलना में अधिक पश्चिम और नेटो समर्थक विदेश नीति की वकालत की है.

इटली का यह फ़ैसला यूरोपीय संघ आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अहम बैठक से पहले आया है.

बैठक के दौरान उम्मीद है कि डेर लेयेन, यूरोपीय संघ में सौर पैनल और इलेक्ट्रिक कारों समेत सस्ते सामानों की आपूर्ति को रोकने के लिए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को चेतावनी दे सकती हैं.

क्या है चीन का बेल्ट एंड रोड परियोजना

बीआरआई प्रोजेक्ट की अवधारणा ऐतिहासिक दौर के सिल्क रूट को फिर से बनाने की कल्पना पर आधारित है. इसके जरिए एशिया में मौजूद चीन, यूरोप और दूसरे मुल्कों से जुड़ना चाहता है.

ईसा पूर्व 130 से लेकर साल 1453 तक यानी क़रीब 1,500 सालों तक पूर्वी एशिया और यूरोप के मुल्कों के लिए व्यापारी इन्हीं रास्तों का इस्तेमाल करते थे.

सिल्क रूट कोई एक सड़क या रास्ता नहीं था, बल्कि ये रास्तों का एक नेटवर्क था जिसके ज़रिए न केवल व्यापार होता था बल्कि संस्कृति का आदान-प्रदान भी होता था.

साल 2013 में इसी अवधारणा को हकीकत में बदलने के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बेल्ट एंड रोड परियोजना की शुरुआत की. इसके तहत चीन पूरी दुनिया में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में निवेश करता है, जिनके जरिए सामान ले जाना-लाना संभव हो.

चीन के आलोचक मानते हैं कि ये महत्वाकांक्षी योजना चीन का हथियार है जिसके ज़रिए वो भू राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.

चीन का मकसद बीआरआई के जरिए पूरे एशिया और यूरोप में करीब एक ट्रिलियन डॉलर का निवेश करना है.

चीन ने बीआरआई की परियोजनाओं से लगभग 100 से ज्यादा देशों को जोड़ लिया है.

दुनिया भर में बीआरआई की करीब 2600 परियोजनाएं चल रही हैं. इस परियोजना के तहत जिन देशों ने चीन से करार किया है, उनमें यह 770 अरब डॉलर से ज़्यादा निवेश कर चुका है.

भारत का विरोध

चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा भी चीन के महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट बीआरआई का हिस्सा है. इस आर्थिक गलियारे को चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर भी कहा जाता है.

यह करीब तीन हजार किलोमीटर लंबा मार्ग है, जो चीन के उत्तर पश्चिम से पाकिस्तान के पश्चिमी प्रांत बलूचिस्तान में ग्वादर बंदरगाह को जोड़ता है.

पाकिस्तान की मदद से चीन ग्वादर बंदरगाह को विकसित करने की कोशिश भी कर रहा है, ताकि वह समुद्र के रास्ते यूरोप तक आसानी से सामान भेज पाए.

भारत शुरू से ही चीन के इस प्रोजेक्ट का विरोध करता आया है, क्योंकि मार्ग पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है.

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