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इसराइल ग़ज़ा: ज़मीन पर जारी जंग के बीच सोशल मीडिया पर फर्जी मौतों के झूठे दावे क्यों किए जा रहे हैं?
- Author, ओल्गा रॉबिंसन और शायान सरदारिज़ादेह
- पदनाम, बीबीसी वेरिफ़ाई
दिसम्बर के पहले सप्ताह में युद्धविराम ख़त्म होने के बाद दोबारा शुरू हुए संघर्ष के दौरान एक अस्पताल के सामने पांच महीने की फ़लस्तीनी बच्ची मोहम्मद हानी अल-ज़ाहर के शव को लेकर उनकी मां और दादा खड़े थे.
लेकिन अपनी बच्ची का शव हाथों में लिए परिवार का फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो एक इसराइली अख़बार ने मोहम्मद की एक फ़ोटो जारी करते हुए लिखा कि उनके हाथों में एक गुड़िया थी.
तीखी आलोचनाओं के बाद अख़बार ने अपनी वेबसाइट से इस लेख को हटा लिया और सोशल मीडिया पर खेद व्यक्त करते हुए लिखा कि "यह लेख ग़लत स्रोतों के आधार पर लिखा गया था".
कुछ सप्ताह पहले इसराइली किशोर रोटेम माथियास (16) और उनकी दो बहनों शाक्केड और शीर का एक वीडियो वायरल हुआ. रोटोम ने बयान दिया था कि सात अक्टूबर को हमास के हमले में उनके माता पिता मारे गए थे. हमले के समय वे ग़ज़ा की सीमा से लगे किबुत्ज़ के अपने घर में थे.
हमले के कई दिन बाद अमेरिकी मीडिया एबीसी और सीएनएन को इन बच्चों ने साक्षात्कार दिया था. इस साक्षात्कार का एक एडिटेड क्लिप वायरल हो रहा है, जिसमें झूठा दावा किया गया और कहा गया कि वीडियो में वो एक्टिंग कर रहे थे और अपने माता पिता की मौत के बारे में झूठ बोल रहे थे. वो कैमरे के सामने अपनी हंसी छिपाने की कोशिश कर रहे थे.
ये सिर्फ दो उदाहरण हैं, जिन्हें दसियों लाख लोगों ने सोशल मीडिया देखा. यह ग़ज़ा युद्ध को लेकर सोशल मीडिया में गहरे विभाजन को दिखाता है.
'पैलीवुड' के इस्तेमाल में अभूतपूर्व उछाल
ग़ज़ा में मानवीय त्रासदी को नकारने या कम दिखाने के लिए एक शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है- ‘पैलीवुड’ जिसे पैलेस्टाइन और हॉलीवुड को मिलाकर बनाया गया है.
इसे फैलाने वालों का दावा है कि हताहतों के हालात को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने के लिए फ़लस्तीनी क्राइसिस एक्टर बनावटी फुटेज प्रसारित करते हैं.
इस दावे को ऑनलाइन लगातार शेयर किया जाता है ताकि जनमानस को प्रभावित किया जा सके और अंतरराष्ट्रीय मीडिया को गफ़लत में डाला जा सके.
बीबीसी वेरिफ़ाई के विश्लेषण से पता चलता है कि अकेले एक्स पर ही, पिछले 10 दिनों में 'पैलीवुड' शब्द के इस्तेमाल में सबसे अधिक वृद्धि हुई है.
इससे पहले जब 2014, 2018 और 2021 में इसराइल और फ़लस्तीन के बीच संघर्ष भड़का था, उस वक्त एक्स पर एक महीने में ही 'पैलीवुड' के इस्तेमाल में लगातार वृद्धि देखी गई, मसलन एक महीने में ये 9,500 से 13,000 बार तक.
सात अक्टूबर के बाद नवंबर में 'पैलीवुड' शब्द का इस्तेमाल 2.2 लाख बार किया गया.
बीबीसी वेरिफ़ाई ने पाया कि एक्स, फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर जो लोग बड़े पैमाने पर 'पैलीवुड' शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं, उनमें इसराइली सरकार के अधिकारी, सेलिब्रिटी और अमेरिका और इसराइल के मशहूर ब्लॉगर हैं.
दूसरी तरफ़ सात अक्टूबर को हमास के अत्याचार को खारिज करने वाले फ़लस्तीनी समर्थकों द्वारा किसी एक शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है.
हालांकि सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्टों पर दसियों लाख व्यूज़ हैं. कुछ झूठा दावा करते हैं कि हमास ने उस दिन नागरिकों की हत्या नहीं की थी, कुछ कहते हैं कि हताहतों की संख्या को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया गया.
कुछ तो यहां तक झूठे दावे करते हैं कि अधिकांश पीड़ितों को इसराइली सेना ने मारा था, हमास ने नहीं.
सुलह कराने के लिए होमे वाली बातचीत का अनुभव रखने वाले एक्सपर्ट आशंकित हैं कि दूसरी तरफ़ के नुकसान को कम दिखाने वाले वायरल दुष्प्रचार का असर दोनों पक्षों के बीच संबंध सामान्य बनाने की दीर्घकालिक संभावनाओं पर पड़ सकता है.
संघर्षों, राजनीतिक हिंसा और चरमपंथी कार्रवाईयों के पीड़ितों का समर्थन करने वाली एनजीओ ‘टिम पैरी एंड जोनाथनल बाल फ़ाउंडेशन फ़ॉर पीस’ में प्रोग्राम प्रमुख हैरिएट वाइकर्स ने कहा, "सबसे बड़ा ख़तरा है भरोसे और सहानुभूति का खत्म होना."
वो कहती हैं, "यह सुलह समझौते की कोशिशों के शुरू होने में भी बड़ी बाधा पैदा करता है."
उन्होंने कहा कि ‘ग़लत सूचनाएं और अमानवीय जुमलेबाज़ियों’ का हिंसा से पड़ने वाले सीधे प्रभावों से भी ज़्यादा असर पड़ सकता है और ये पीड़ितों को और नुकसान पहुंचा सकते हैं.
‘क्राइसिस एक्टर’ के दावे
जो लोग ग़लत सूचनाओं के बारे में अध्ययन करते हैं, उनके लिए दुष्प्रचार या अत्याचार को नकारने की घटनाएं नई नहीं हैं.
‘क्राइसिस एक्टर’ उन्हें कहते हैं जो संकट ग्रस्त होने का नाटक करते हैं या पैसे के बदले ऐसा करते हैं. कांसपिरेसी थ्योरी को बढ़ावा देने वालों के बीच ‘क्राइसिस एक्टर’ शब्द काफ़ी प्रचलित है.
इस शब्द का इस्तेमाल अमेरिका में सैंडी हुक स्कूल शूटिंग में मारे गए बच्चों के मात-पिता के लिए इस्तेमाल किया गया था, जिनके बारे में दावा किया गया था कि वो घटना को लेकर दिखावा कर रहे थे.
पिछले कुछ सालों में ऐसे वायरल दावे बूचा में यूक्रेनी नागरिकों के मारे जाने और सीरियाई युद्ध के पीड़ितों के बारे में किये गए.
लेकिन इस युद्ध में जिस पैमाने पर ऑनलाइन जुमलेबाज़ियों की बाढ़ आई है उसने उन लोगों को भी हैरान कर दिया है जो रोज़ाना इस तरह की सामग्रियों पर नज़र रखते हैं.
खोजी वेबसाइट बेलिंगकैट के संस्थापक इलियट हिगिंस ने हाल के सालों में सीरिया और यूक्रेन के युद्धों को कवर कर चुके हैं.
उनके अनुसार, "मौजूदा इसराइल-ग़ज़ा युद्ध में दुष्प्रचार का पैमाना इस ‘संघर्ष की एक अनोखी’ विशेषता है."
उन्होंने बीबीसी को बताया, "जिस तरह वे महिलाओं और बच्चों के साथ सुलूक कर रहे थे उसके बारे में सीरिया और यूक्रेन में इसी तरह की ज़हरीली और घिनौनी प्रतक्रियाएं और दुष्प्रचार चल रहे थे लेकिन अब ये बहुत अधिक लोग कर रहे हैं."
कौन लोग हैं दुष्प्रचार के पीछे?
हिगिंस का कहना है कि इस संघर्ष में किसी पक्ष के बारे में मज़बूत धारणा रखने वाले कई लोग इस तरह की चीज़ें इसलिए साझा करते हैं क्योंकि यह उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ होता है.
वो कहते हैं, "वे परवाह नहीं करते कि ये सच है या नहीं, क्योंकि उनके लिए यही सच है."
बीते नवंबर में अरब जगत में इसराइली प्रधानमंत्री के प्रवक्ता ओफ़िर गेंडलमैन ने एक्स पर एक वीडियो साझा किया जिसमें देखा गया कि एक बाल अभिनेता के चेहरे पर नकली खून से मेकअप किया जा रहा है.
इस पोस्ट को डिलीट किए जाने तक दसियों लाख लोगों ने इसे देखा. इसमें गेंडलमैन ने कहा, "कैमरे के सामने झूठे ज़ख़्म और घायल नागरिकों के बारे में अभिनय आप खुद देखिए. एक बार फिर 'पैलीवुड' बेनक़ाब हुआ."
असल में यह ग़ज़ा के लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए बनी 45 सेकेंड की लेबनानी फ़िल्म का फुटेज था जिसे अक्टूबर में ऑनलाइन पोस्ट किया गया था.
डायरेक्टर महमूद रैमज़ी ने खुद सोशल मीडिया पर आकर अपने फ़िल्म के बारे में इस झूठे दावे का खंडन किया. उन्होंने बीबीसी को बताया कि आख़िर में इस दुष्प्रचार का उलटा असर पड़ा और इस विवाद ने उनकी फ़िल्म को अधिक लोगों तक पहुंचा दिया.
बीबीसी ने गेंडेलमैन से टिप्पणी के लिए संपर्क किया लेकिन रिपोर्ट लिखे जाने तक उनसे कोई जवाब नहीं मिला.
ऑनलाइन दुष्प्रचार का ख़ामियाज़ा
ऐसे लोग भी हैं जो इस ऑनलाइन दुष्प्रचार युद्ध के बीच खुद को फंसा हुआ पाते हैं.
रोटेम और उनकी बहनों का साक्षात्कार लेने वाले एबीसी के संवाददाता जेम्स लोंगमैन ने बताया कि अपने माता-पिता की मौत के बारे में रोटेम को सुनते हुए उनके कैमरामैन और उनकी आंखों में आंसू आ गए थे.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "उनकी और उनकी बहनों की आंखों में आंसू थे. उनके दादा, हमारे कैमरामैन, असप्ताल की नर्सें, डॉक्टर और मैं खुद आंसुओं में भीगा था. हम सभी उनकी उन पर जो गुजरी थी, उसे सुन रहे थे."
लोंगमैन ने कहा कि उनके साक्षात्कार को लेकर जब झूठे दावे किए गए तो उन्होंने एक्स पर आकर खुद इसका खंडन किया.
उनकी पोस्ट को बहुत सारे लोगों ने साझा किया और इसकी वजह से जिस व्यक्ति ने उनसे संबंधित वायरल मैसेज पोस्ट किया था, उसको उसे डिलीट करना पड़ा.
लोंगमैन कहते हैं, "ेकिन इससे रोटेम के परिवार का दुख कम नहीं हो जाता."
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