पोप फ़्रांसिस किस बीमारी से पीड़ित हैं और किन लोगों को होता है इससे सबसे ज़्यादा ख़तरा

पोप फ़्रांसिस बायलेटरल निमोनिया से पीड़ित हैं

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पोप फ़्रांसिस के दोनों फेफड़ों में निमोनिया हो गया है और उनकी हालत गंभीर बनी हुई है.

88 साल के पोप पिछले एक सप्ताह से सांस की समस्या से जूझ रहे थे, जिसके बाद उन्हें रोम के जेमेली अस्पताल में भर्ती कराया गया.

डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि उनके दोनों फेफड़ों में निमोनिया है और इसके लिए उन्हें ख़ास इलाज की ज़रूरत है. उनका कहना है कि उन्हें बायलेटरल निमोनिया है.

आइए जानते हैं बायलेटरल निमोनिया क्या होता है और सबसे अधिक ख़तरा किसे है?

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बायलेटरल निमोनिया क्या है?

निमोनिया एक तरह का संक्रमण है, जो फेफड़ों के अंदर मौजूद एयर सैक्स (छोटे-छोटे वायु थैले) में सूजन पैदा कर देता है. जब यह सूजन बढ़ती है तो एयर सैक्स में लिक्विड भर जाता है, जिससे मरीज़ को सांस लेने में दिक्कत होती है. इसके अलावा, खांसी, बुखार, ठंड लगना, बदन दर्द और कमज़ोरी जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं.

निमोनिया बैक्टीरिया, वायरस या फ़ंगस से हो सकता है. ये किसी संक्रमित व्यक्ति की खांसी या छींक से हवा में मौजूद ड्रॉपलेट्स (बूंद, कण) के ज़रिए फैल सकता है, या फिर संक्रमित सतह को छूने के बाद मुंह, नाक या आंखों को छूने से शरीर में जा सकता है.

जब संक्रमण एक के बजाय दोनों फेफड़ों में हो जाए तो इसे 'बायलेट्रल निमोनिया' कहा जाता है. हालांकि यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी सिडनी के रिसर्चर्स के अनुसार, बायलेट्रल निमोनिया गंभीर ही हो ऐसा ज़रूरी नहीं है.

ग्लोबल बर्डन ऑफ़ डिज़ीज़ स्टडीज़ के अनुसार, 2021 में दुनिया भर में निमोनिया के 34.4 करोड़ मामले सामने आए और 21 लाख लोगों की मौत हो गई, जिनमें पांच साल से कम उम्र के 5,02,000 बच्चे थे.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार 2021 में लोअर रेस्पिरेटरी इंफ़ेक्शन्स (निचली सांस नली में होने वाले संक्रमण) उस साल होने वाली मौतों का पांचवां सबसे बड़ा कारण था. इससे ज़्यादा मौतें सिर्फ़ इस्केमिक हार्ट डिज़ीज़, कोविड-19, स्ट्रोक और क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पलमनरी डिज़ीज़ से ही हुई थी.

निमोनिया कैसे फैलता है और इससे सबसे ज़्यादा ख़तरा किन्हें
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शारीरिक जांच के बाद जब किसी डॉक्टर को लगता है कि मरीज़ निमोनिया से पीड़ित हो सकता है तो वो इसकी पुष्टि के लिए रक्त जांच कराने को कह सकते हैं और वो ये पता लगाने की कोशिश करते हैं कि ऐसा किस वजह से हो रहा है.

अमेरिका की मायो क्लीनिक इस बारे में कहती है कि इस तरह हमेशा निमोनिया का पता लगा जाए ये संभव नहीं होता है. संक्रमण कहां है और इसका स्रोत क्या है इसका पता लगाने के लिए चेस्ट एक्स रे और बलगम की जांच की सलाह दी जाती है.

ब्लड ऑक्सीजन का स्तर भी ऑक्सीमीटर से मापा जाता है क्योंकि निमोनिया फेफड़े को रक्तप्रवाह में पर्याप्त ऑक्सीजन पहुंचाने से रोकता है.

निमोनिया गंभीर भी हो सकता है लेकिन पोप की इतनी उम्र के व्यक्ति में ये ख़तरा और भी बढ़ जाता है.

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, निमोनिया किसी को भी हो सकता है, लेकिन बुज़ुर्गों और कमज़ोर इम्यूनिटी वाले लोगों को इससे ज़्यादा ख़तरा होता है. 65 साल से ज़्यादा उम्र के लोग, दो साल से कम उम्र के बच्चे, फेफड़ों से जुड़ी बीमारी वाले लोग या कमज़ोर इम्युनिटी वाले मरीज़ों में इसका असर ज़्यादा हो सकता है.

पोप फ़्रांसिस पहले से ही सांस की बीमारियों से जूझते रहे हैं और वे जब युवा थे, तब उन्हें 'प्लुरिसी' नाम की बीमारी हुई थी, जिससे उनके एक फेफड़े का हिस्सा निकालना पड़ा था, इस वजह से उन्हें ये ख़तरा और भी बढ़ गया है.

पहले पोप को 14 फ़रवरी को ब्रोंकाइटिस के इलाज और जांच के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उन्हें इसके लक्षण नज़र आ रहे थे और इस वजह से उन्होंने हाल के कार्यक्रमों में खुद की जगह अपने संबोधन के लिए अधिकारियों को तय किया था.

निमोनिया के गंभीर हो जाने में कई अन्य कारक भी ज़िम्मेदार होते हैं
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निमोनिया का इलाज कैसे होता है?

निमोनिया के इलाज में बैक्टीरिया के संक्रमण को रोकने के लिए एंटीबायोटिक्स या वायरल संक्रमण को दूर करने के लिए एंटीवायरल दवाइयां दी जाती हैं.

अगर संक्रमण कई बैक्टीरिया से हुआ हो तो मरीज़ को ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक दी जाती है.

हालांकि, वायरल निमोनिया का इलाज ज़्यादा चुनौतीपूर्ण है क्योंकि उपलब्ध एंटीवायरल दवाएं न तो बहुत ज़्यादा प्रभावी हैं और न ही ख़ासतौर पर लक्षित हैं.

अस्पताल में निमोनिया के इलाज के दौरान मरीज़ों को फ्लूइड और ऑक्सीजन भी दिया जाता है.

अगर संक्रमण बैक्टीरिया की वजह से है, तो एंटीबायोटिक्स दिए जाते हैं. लेकिन अगर यह वायरस से फैला हो, तो इलाज थोड़ा मुश्किल हो सकता है, क्योंकि वायरल निमोनिया के लिए कोई ख़ास दवा नहीं होती. अस्पताल में मरीज़ों को ऑक्सीजन, फ्लूइड और कभी-कभी फिज़ियोथेरेपी भी दी जाती है ताकि फेफड़ों में जमा लिक्विड हट सके.

वेटिकन के अनुसार, पोप फ़्रांसिस का संक्रमण 'पॉलीमाइक्रोबियल' है, यानी यह कई तरह के बैक्टीरिया और वायरस के कारण हुआ है. इसी वजह से उनका इलाज जटिल है और उन्हें एंटीबायोटिक्स और सूजन कम करने वाली दवाएं दी जा रही हैं. फ़िलहाल, डॉक्टर लगातार उनकी हालत पर नज़र रख रहे हैं और उनका इलाज जारी है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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