इंडिगो संकटः कुछ के पैसे ख़त्म तो कई एयरपोर्ट पर ही सोने को मजबूर

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में सबसे ज़्यादा घरेलू उड़ानों वाली एयरलाइन इंडिगो में जारी संकट का असर दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल एक पर साफ़ नज़र आता है.
यहां कई यात्री परेशान हैं. कुछ की फ़्लाइट रद्द हो गई है तो कुछ को नहीं पता कि अगली फ्लाइट कब रिशेड्यूल होगी.
इंडिगो ने एक बयान जारी कर अपने नेटवर्क के बहाल होने का दावा करते हुए कहा है कि सोमवार को 1800 से अधिक उड़ानें चलीं जो पिछले दिन की तुलना में 150 अधिक हैं.
हालांकि ये संख्या भी इंडिगो की सामान्य उड़ानों से 30 फ़ीसदी कम है.
इंडिगो ने 90 प्रतिशत उड़ानों के समय पर उड़ने और रद्द हुई उड़ानों के बारे में यात्रियों को पहले से ही जानकारी देने का दावा भी किया.
वहीं, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इंडिगो ने डीजीसीए के कारण बताओ नोटिस के जवाब में वर्तमान उड़ान संकट को मामूली तकनीकी ख़राबी, सर्दियों के शेड्यूल में परिवर्तन, प्रतिकूल मौसम, एयर ट्रैफिक और नए फ़्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (एफ़डीटीएल) नियमों के “चक्रवृद्धि प्रभाव” का नतीजा बताया है.
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दिसंबर के पहले सप्ताह में इंडिगो की दो हज़ार से अधिक उड़ानें रद्द हुई हैं जिसका असर भारत के विमानन उद्योग पर नज़र आ रहा है.
इस संकट के बीच भारत सरकार ने एयरलाइन को किरायों को भी नियंत्रित किया है.
सरकार ने 6 दिसंबर को घरेलू किरायों पर 11 दिसंबर तक के लिए 7500 रुपए से 18000 रुपए तक का कैप लगा दिया. इस संकट की समीक्षा के लिए डीजीसीए ने एक चार सदस्यीय समिति गठित की है जो 15 दिनों में रिपोर्ट देगी, वहीं रेल मंत्रालय ने 89 विशेष ट्रेनें चलाई हैं. बावजूद इसके ये संकट जारी है.
सोमवार को भी दिल्ली और बैंगलुरू जैसे प्रमुख एयरपोर्टों पर ही इंडिगो की ढाई सौ से ज़्यादा उड़ानें प्रभावित हुईं.
उड़ानें रद्द होने की वजह से दिल्ली हवाई अड्डे के टर्मिनल-एक पर भीड़ तो बहुत अधिक नहीं थी लेकिन जो लोग टर्मिनल पर आए थे, वो बहुत परेशान थे.
टर्मिनल एक पर कई यात्री ऐसे भी थे जिनकी कनेक्टिंग फ्लाइट या तो रद्द हो गई या कई दिनों के लिए आगे बढ़ा दी गई.
रहने को कमरा नहीं, एयरपोर्ट पर सोने को मजबूर

मणिपुर के रहने वाले खुमकचा शोभामणि गोवा के एक होटल में साढ़े बाहर हज़ार रुपए महीना की पगार पर नौकरी करते हैं. वो महीनों से पैसा इकट्ठा करके घर जा रहे थे.
शोभामणि को चार दिसंबर को इंफाल पहुंच जाना था लेकिन वो अभी तक दिल्ली एयरपोर्ट पर फंसे हैं. उनके पास जो भी पैसे थे खर्च हो गए हैं.
रुआंसी आवाज़ में वो कहते हैं, “दोस्त से कुछ पैसे मंगवाए थे, अब सिर्फ़ पांच सौ बचे हैं. अब तक होटल में रह रहा था, अब नहीं रह पाऊंगा.”
शोभामणि बार-बार हेल्पलाइन काउंटर पर जाकर किसी भी तरह कोलकाता या गुवाहाटी की फ़्लाइट उपलब्ध कराने की गुहार लगाते हैं. लेकिन उन्हें ना कोई भरोसा मिलता है ना उम्मीद.
निराश होकर वो कहते हैं, “अब कुछ दिन यहां एयरपोर्ट पर ही सोना पड़ेगा.”
शोभामणि को अगली फ़्लाइट 12 दिसंबर की उपलब्ध करवाई गई है. उन्हें घर पहुंचने का कोई दूसरा रास्ता नहीं नज़र आ रहा है.
शोभामणि कहते हैं, “कब से घर जाने का प्लान बना रहा था. चार दिसंबर को पहुंच जाता, अब लगता नहीं कि 12 दिसंबर को भी पहुंच पाऊंगा."
एक सहयात्री शोभामणि को मदद की पेशकश करते हैं लेकिन वो इनकार कर देते हैं और टर्मिनल पर ही आराम करने या सोने लायक कोने की तलाश में जुट जाते हैं.
हालांकि, एयरलाइन का दावा है कि प्रभावित यात्रियों को होटल के कमरे उपलब्ध करवाए जा रहे हैं.
कंपनी ने दावा किया है कि 1 दिसंबर से 7 दिसंबर के बीच यात्रियों को 9500 होटल कमरे उपलब्ध करवाए गए. कंपनी ने ये भी कहा है कि उसकी कस्मटर सेवा ने दो लाख से अधिक यात्रियों की समस्याओं का समाधान किया.
इसके अलावा कंपनी ने बताया है कि अब तक यात्रियों को 827 करोड़ रुपए रिफंड किए जा चुके हैं जबकि बाक़ी रिफंड को प्रोसेस किया जा रहा है.
हालांकि टर्मिनल पर मौजूद कुछ परेशान यात्री ये दावा करते हैं कि उन्हें एयरलाइन की तरफ़ से होटल या दूसरी सुविधाएं नहीं मिली हैं.
'छुट्टियां बर्बाद हो गईं'

अपने तीन बच्चों और पत्नी के साथ मॉरीशस से भारत घूमने आए पवन कुमार जगन्नाथ के लिए हालात और भी मुश्किल हैं. वो पिछले तीन दिनों से वापस लौटने की कोशिश कर रहे हैं और मजबूरी मे एक होटल में ठहरे हैं.
जगन्नाथ कहते हैं, “शुरू में हमने धीरज रखा लेकिन अब नहीं रहा जा रहा है, पैसा ख़त्म हो रहा है. बच्चे रो रहे हैं, हमारी शुक्रवार रात नौ बजे की फ़्लाइट थी, फ़ोन पर बताया कि फ़्लाइट जाएगी लेकिन जब पहुंचे तो कहा कि उड़ान नहीं है. फिर रविवार को बुलाया लेकिन नहीं जा सके अब आज भटक रहे हैं, आज का भी पता नहीं है.”
जगन्नाथ कहते हैं, “मैं चौथी बार एयरपोर्ट आया हूं, मेरे बच्चे कहां सोएंगे? होटल वाला पानी गरम करने तक के पैसे ले रहा है, समझ नहीं आ रहा है कि क्या करें, बच्चों के साथ कब तक मैं यहां परेशान रहूंगा, हमारा बजट ख़त्म हो गया है, अब रिश्तेदार ने पैसा भेजा है.”
जगन्नाथ पहले भी भारत आए हैं और उन्हें ऐसे अनुभव की उम्मीद नहीं थी. वो कहते हैं, “हम सुनते थे कि इंडिया बहुत आगे बढ़ रहा है लेकिन यहां हमारे साथ इतना ख़राब हुआ है.”
हेल्पलाइन काउंटर के पास ही तमिलनाडु के त्रीची के आरएस चंद्रमोहन ग़ुस्से में दिखे. उनकी पत्नी और एक महिला रिश्तेदार उन्हें समझाने की कोशिश करती हैं. एयरलाइन स्टाफ़ उन्हें पीने का पानी और कुछ खाने के लिए देते हैं लेकिन उनका गुस्सा और झुंझलाहट कम नहीं होती.
आरएस चंद्रमोहन को अपने परिवार के साथ चार दिसंबर को वापस त्रीची लौटना था लेकिन उनकी फ़्लाइट रद्द हो गई. वो पिछले तीन दिनों से फ़्लाइट मिलने की उम्मीद में टर्मिनल पर आ रहे हैं लेकिन हर बार निराश होकर लौट जाते हैं.
76 साल के चंद्रमोहन हर्निया से पीड़ित हैं और उन्हें दवाइयों की ज़रूरत है. वो ग़ुस्से में कहते हैं, “हम होटल में रह रहे हैं, रोज़ एयरपोर्ट आने-जाने पर ख़र्च हो रहा है, इतनी परेशानी में अपने परिवार से दूर हैं लेकिन हमारी सुध लेने वाला कोई नही हैं.”
हालांकि, इंडिगो स्टाफ़ उन्हें चिकित्सीय मदद मुहैया कराने की पेशकश करते हुए नज़र आए जिसे लेने से उन्होंने इनकार कर दिया.

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चंद्रमोहन के बगल में ही तमिलनाडु के मदुरै के प्रमोद अपनी अपनी पत्नी के साथ बैठे हैं. वो छुट्टियां मनाकर लौट रहा थे लेकिन पिछले तीन दिनों से एयरपोर्ट पर फंसे हैं.
प्रमोद कहते हैं, “छुट्टियां तो बहुत अच्छी रहीं लेकिन अब घर लौटना मुसीबत बन गया है. फ़्लाइट ना मिले की वजह से हमारा बजट दोगुना हो गया है.”
प्रमोद को उम्मीद नहीं है कि उनका जो अतिरिक्त ख़र्च हुआ है उसका रिफ़ंड मिलेगा, वो बस किसी भी तरह अब घर लौट जाना चाहते हैं.
श्रीनगर से छुट्टियां मनाकर लौट रहे युवा कृष्णा की भी हालत ऐसी ही हैं. उन्हें फ्लाइट ना मिलने के लिए श्रीनगर में दो दिन अतिरिक्त गुज़ारने पड़े. अब वो दिल्ली तो पहुंच गए हैं लेकिन बैंगलुरू कब पहुंचेंगे ये उन्हें पता नहीं है.
कृष्णा कहते हैं, “ट्रिप का बजट पैंतीस हज़ार था लेकिन अब तक सत्तर हज़ार से अधिक ख़र्च हो गए हैं. छुट्टियां भी बढ़ानी पड़ी. बॉस को बताया है कि फ़्लाइट ना मिलने की वजह से फंसा हूं लेकिन काम तो काम हैं. अब लग रहा है कि कहीं वेतन भी ना कट जाए.
कृष्णा को लगता है कि एक ही एयरलाइन पर अधिक निर्भरता इन हालात की वजह है. वो कहते हैं, “घरेलू उड़ानों में एक तरह इंडिगो का एकाधिकार है. उसके अलावा विकल्प कहां हैं. दूसरी एयरलाइन का टिकट देखा तो बहुत महंगा था. सरकार को इन हालात में दख़ल देना चाहिए और ये सुनिश्चित करे कि आगे ऐसा ना हो.”
बैगेज काउंटर पर अफ़रा-तफ़री

बैगेज काउंटर पर अफ़रा-तफ़री का आलम है. स्टाफ़ छूट गए लगेज में पहचान की पर्चियां लगा रहे हैं. भागते हुए आई एक महिला बदहवासी की सी हालत में रोते हुए स्टाफ़ से अपने बैग को खोजने की गुहार लगाती है. स्टाफ़ एक और परेशान यात्री को समझाने की नाकाम कोशिश करते हैं.
आंखों में आंसू लिए ये महिला यात्री कहती हैं, “फ्लाइट टर्मिनल-तीन पर आई, स्टाफ़ ने बताया लगेज टर्मिनल-एक पर मिलेगा. मैं अपने बच्चों को छोड़कर दौड़कर यहां आई हूं. वहां मेरे बच्चे रो रहे हैं और यहां मेरे लगेज का कोई पता नही है.”
बीबीसी से बात करने वाले कई यात्रियों ने इसी तरह की शिकायतें की.
नोएडा के गौर सिटी में रहने वाली मनीषा मिश्रा लगातार दूसरे दिन अपना लगेज खोजने के लिए एयरपोर्ट पहुंचीं. कई घंटे एयरपोर्ट पर गुज़ारने के बाद भी उनका लगेज नहीं मिल सका था.
मनीषा कहती हैं, “बैग में जूलरी है, दूसरा ज़रूरी सामान है. हेल्पलाइन पर फ़ोन लग नहीं रहा था, मैं आज फिर से अपना बैग खोजने आ गई. लेकिन अभी तक कुछ पता नहीं चला है.”
उज़्बेकिस्तान के संजर भी काफी परेशान दिखे. वो चार दिसंबर को मुंबई से दिल्ली पहुंचे थे. उनका भी सामान अभी तक नहीं मिल सका है.
संजर एयरलाइन स्टाफ़ और सुरक्षाकर्मियों से एयरपोर्ट टर्मिनल में दाख़िल होने की गुज़ारिश करते हैं ताकि वो अपना सामान ख़ुद खोज सके. लेकिन उन्हें निराशा मिलती है.

संजर कहते हैं, “मैंने कई बार इंडिगो की सेवाएं ली हैं, मेरे साथ पहली बार ऐसा हुआ है. चार दिसंबर को मेरी पहली फ़्लाइट रद्द हुई, फिर दूसरी फ़्लाइट दी गई वो भी रद्द हो गई. मुंबई एयरपोर्ट से बीस घंटे बाद में उड़ान भर सका, लेकिन मेरा लगेज फंस गया है.”
संजर कहते हैं, “मैं अंतरराष्ट्रीय यात्री हूं. मेरे सारा सामान कहां हैं मुझे पता नहीं. अंडरवियर से लेकर कपड़े तक रोज़ ख़रीद रहा हूं. मजबूरी में होटल में ठहरा हूं उसका ख़र्च अलग हो रहा है. यहां सुनने वाला कोई नहीं है.”
हालांकि इंडिगो का कहना है कि अब तक पैंतालीस हज़ार यात्रियों का लगेज उन्हें सौंपा जा चुका है और बाकी जितने भी यात्रियों का लगेज फंसा है उसे अगले 36 घंटे में डिलीवर कर दिया जाएगा.
टर्मिनल-एक पर बहुत से लोग ऐसे हैं, होटल लेना जिनके बजट से बाहर है. अरुणाचल प्रदेश से आया 19 यात्रियों का एक समूह फ़्लाइट कैंसल होने के बाद एयरपोर्ट पर ही रात गुज़ारने की तैयारी कर रहा था.
एम नोर्बू कहते हैं, “हम लोगों के पास इतना पैसा नहीं है कि होटल कर सकें, हमें तवांग जाना था लेकिन अब वापस सिलीगुड़ी जाएंगे, वहां से किसी तरह बस से अरुणाचल जाएंगे.”
उनके साथ आई एक 90 साल की बुज़ुर्ग यात्री को इस ठंड में एयरपोर्ट पर ही सोना पड़ेगा.
इन मुश्किल हालात में इंडिगो के कर्मचारी चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश के साथ यात्रियों की मदद करने और भरोसा देने की कोशिश करते हैं. लेकिन ये भरोसा शायद अब टूट गया है.
एक महिला यात्री कहती हैं, “उड़ान भरना हमारे जैसे लोगों के लिए सपने जैसा होता है, लेकिन ये अनुभव इतना ख़राब रहा है कि अब दोबारा फ़्लाइट बुक करने से पहले सोचना पड़ेगा.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.












