ट्रंप के टैरिफ़ का सांस थामे कर रही है दुनिया इंतज़ार, जानिए तीन बातें जिनकी है कम जानकारी

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इमेज कैप्शन, बुधवार से अमेरिका व्यापक टैरिफ़ की घोषणा करने जा रहा है.
    • Author, नताली शेरमैन
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि टैरिफ़ आने जा रहा है. यही वो संदेश है जो अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से लगातार दिया जा रहा है.

लेकिन ये टैरिफ़ कैसा होगा और कब लागू होगा? जबसे वह राष्ट्रपति बने हैं, आयात शुल्क इतनी तेज़ी से और इतना अधिक बढ़े हैं कि इसका अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल हो गया है.

ट्रंप ने पहले ही चीन से होने वाले आयात, स्टील, एल्युमीनियम और कनाडा और मैक्सिको से आने वाली कुछ वस्तुओं पर टैरिफ़ बढ़ा दिया है. अब इसी हफ़्ते से कारों पर भारी टैरिफ़ यानी आयात शुल्क प्रभाव में आने जा रहा है.

हालांकि टैरिफ़ के व्यापक दायरे के बारे में ट्रंप की उस पूरी योजना के सामने आने का अभी भी सबको इंतज़ार है, जिसका ख़ाका बनाने में उनकी टीम ने पिछले कुछ हफ़्तों में काफ़ी मेहनत की है.

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व्हाइट हाउस इसे लिबरेशन डे कह रहा है. तो, बुधवार से क्या होने जा रहा है? तीन बड़ी बातें जिनके बारे में किसी को कोई अंदाज़ा नहीं.

1. ये टैरिफ़ कितने बड़े हैं?

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व्हाइट हाउस ने ये नहीं बताया है कि टैरिफ़ कितना अधिक हो सकता है, हालांकि विश्लेषकों ने कई संभावित दरों के बारे में अनुमान लगाया है.

पिछले साल राष्ट्रपति चुनाव प्रचार अभियान के दौरान ट्रंप ने अमेरिका में आने वाले सभी प्रकार की वस्तुओं पर 10% टैरिफ़ लगाने की वक़ालत की थी और ये भी कहा था कि चीन से आने वाले सामान पर 20% तक और यहां तक कि 60% तक टैरिफ़ लगाया जा सकता है.

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जब ट्रंप ने राष्ट्रपति पद का कार्यभार ग्रहण किया तो उन्होंने रेसीप्रोकल टैरिफ़ का विचार रखा था और सुझाव दिया था कि ये टैरिफ़ अलग अलग देशों के लिए अलग अलग हो सकते हैं.

अधिकारियों से इस योजना को बनाने का आदेश देने से पहले फ़रवरी में उन्होंने कहा था, "सरल शब्दों में कहें तो अगर वे हमसे शुल्क (टैरिफ़) लेंगे तो हम भी उनपर शुल्क लगाएंगे."

लेकिन इसके तुरंत बाद ही व्हाइट हाउस ने इस तस्वीर को और जटिल बना दिया और कहा कि उनके सुझाव केवल टैरिफ़ पर ही लागू नहीं होंगे बल्कि वैल्यू एडेड टैक्स (वैट) जैसी उन नीतियों पर भी लागू होंगे, जिनके बारे उन्हें लगता है कि ये अमेरिकी व्यापार के लिए अनुचित हैं.

इसने उहापोह को और बढ़ा दिया क्योंकि व्यवसाय और राजनीतिक नेतृत्व ये अंदाज़ा लगाने की कोशिश करने लगे कि नए टैक्स कितने अधिक हो सकते हैं, और बुधवार को जो भी एलान किया जाता है, उसका अन्य आयात शुल्कों पर क्या असर पड़ता है, क्योंकि ट्रंप स्टील और एल्यूमीनियम पर पहले ही टैरिफ़ की घोषणा कर चुके हैं.

उदाहरण के लिए यूरोप के अधिकारी अपने निर्यातों पर दहाई अंक तक के टैरिफ़ का सामना करने की तैयारी कर रहे हैं.

इसी साल की शुरुआत में ट्रंप ने कहा था कि उनकी योजना यूरोप पर 25% आयात शुल्क लगाने की है.

2. किन देशों पर पड़ सकता है असर?

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ट्रंप प्रशासन ने अभी तक यह पुष्टि नहीं कि है कि कौन से देश इससे प्रभावित होंगे, हालांकि बताया जा रहा है कि बुधवार की घोषणा का दायरा बहुत व्यापक होगा.

रविवार को राष्ट्रपति ने कहा था कि नए टैरिफ़ 'सभी देशों' पर लागू हो सकते हैं और जिससे यह संकेत मिलता है कि ये टैरिफ़ सभी देशों पर लागू हो सकते हैं जिसका वादा उन्होंने अपने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान किया था.

इसने ब्रिटेन समेत कुछ देशों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है, जिन्होंने सोचा था कि वे कोई न कोई उपाय निकाल लेंगे, हालांकि अधिकांश देश अभी भी किसी न किसी तरह के समझौते होने की आस लगाए हुए हैं.

लेकिन यह अभी भी साफ़ नहीं है कि ये टैरिफ़ किस हद तक सार्वभौमिक रूप से लगाए जाएंगे या और कुछ विशेष वस्तुओं तक सीमित होंगे.

पिछले महीने, ट्रेज़री सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने कहा था कि ये कोशिशें 'डर्टी 15' पर केंद्रित हैं यानी वे 15% देश जिनका अमेरिका के साथ व्यापार बहुत बड़ा है और जिनके टैरिफ़ या अन्य क़ानूनों से अमेरिकी कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ता है.

सुझाव तैयार करने वाले यूएस ट्रेड रिप्रेज़ेंटेटिव विभाग ने उन देशों की पहचान की है, जिनको लेकर 'विशेष दिलचस्पी' है.

इनमें शामिल हैं- अर्जेंटिना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, कनाडा, चीन, यूरोपीय संघ, भारत, इंडोनेशिया, जापान, कोरिया, मलेशिया, मैक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ़्रीका, स्विट्ज़रलैंड, ताईवान, थाईलैंड, तुर्की, ब्रिटेन और वियतनाम.

ट्रंप ने सबसे कठोर आलोचना अपने ऐतिहासिक सहयोगियों और बड़े ट्रेड पार्टनर्स को लेकर की है, जैसे कि कनाडा और यूरोप.

पिछले हफ़्ते उन्होंने कहा था, "अक्सर, दोस्त दुश्मनों से भी बुरे रहे हैं."

3. टैरिफ़ का क्या असर होगा?

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इमेज कैप्शन, टैरिफ़ से अमेरिका और बाकी देशों में आर्थिक मंदी का ख़तरा बढ़ने वाला है.

टैरिफ़, आयात पर लगने वाला शुल्क है. तो सबसे बड़ा सवाल है कि इसका भुगतान कौन करेगा?

तकनीकी रूप से देखा जाए तो इसका बहुत सरल जवाब हैः वो अमेरिकी कंपनियां जो आयात करती हैं उन्हें बढ़ी दरों का भुगतान करना होगा, ख़ासकर, अगर व्हाइट हाउस 'तुरंत' टैरिफ़ वसूल करना शुरू कर दे, जैसा कि मंगलवार को प्रवक्ता कैरोलाइन लीविट ने सुझाया था.

लेकिन टैरिफ़ जितना अधिक होगा, अधिक से अधिक कंपनियां इसका बोझ अपने ऊपर से कम करने की कोशिश करेंगी, या तो आपूर्तिकर्ताओं से शुल्क लेकर बिज़नेस साझीदारों से बोझ साझा करने दबाव बनाकर या अमेरिकियों के लिए दाम बढ़ाकर.

कई फ़र्मों ने कहा है कि वे इस तरह के क़दम उठाने की तैयारी कर रही हैं. लेकिन यह जोख़िम भरा खेल है क्योंकि अगर कंपनियां दामों में बहुत अधिक बढ़ोत्तरी करती हैं तो ख़रीददार उनसे दूर हो जाएंगे.

इस घटनाक्रम ने अमेरिका और इसकी सीमा से बाहर उन जगहों पर आर्थिक मंदी के ख़तरे को बढ़ा दिया है, जहां कंपनियों की निर्भरता अमेरिका में निर्यात पर अधिक है.

ट्रंप का कहना है कि जो कंपनियां टैरिफ़ से बचना चाहती हैं वो अपना बिज़नेस अमेरिका में कर सकती हैं, लेकिन फ़ैक्ट्री स्थापित करना और भर्तियों की ऊंची लागत को देखते हुए यह कोई तत्काल या आसान समाधान नहीं है.

अगर इसमें करेंसी में उतार चढ़ाव और अन्य देशों की जवाबी कार्रवाई को शामिल कर लें तो वैश्विक व्यापार संतुलन को फिर से 'रिसेट' करने की ट्रंप की कोशिशों के नतीजों का अंदाज़ा, बुधवार की घोषणा के काफ़ी समय बाद भी लगाना मुश्किल होने वाला है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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