वर्ल्ड कप की यादें: जब गावस्कर का 36 नॉट आउट रहना नासूर बन गया

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पहले वर्ल्ड कप में भारतीय टीम के ख़राब प्रदर्शन के आसार शुरू से ही दिखने लगने लगे थे.
जून, 1975 में इंग्लैंड में होने वाले विश्व कप के लिए स्पिनर वेंकट राघवन को भारत का कप्तान बनाया गया था.
उन दिनों वेंकट राघवन डर्बीशायर काउंटी के लिए खेल रहे थे इसलिए वो पहले ही इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए थे.
इंग्लैंड रवाना होने से पहले मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में पाँच दिन के लिए भारतीय टीम की नेट प्रैक्टिस रखी गई थी.
नेट प्रैक्टिस में भाग लेने के लिए सिर्फ़ छह खिलाड़ी मौजूद थे क्योंकि पाँच खिलाड़ी पहले ही इंग्लैंड में थे.
टीम के रवाना होने से पहले सैयद किरमानी और मोहिंदर अमरनाथ ने वानखेड़े स्टेडियम में अपनी हाज़िरी लगाई थी.
व्यवस्था की गई थी कि सभी खिलाड़ी स्टेडियम में ही रहें लेकिन स्थानीय खिलाड़ियों सुनील गावस्कर और एकनाथ सोल्कर को भारतीय मैनेजर रामचंद ने रात को अपने घर जाने की अनुमति दे दी थी.

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क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष हुए नाराज़
एक सुबह वानखेड़े स्टेडियम में क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष पीएम रूंगटा अचानक पहुँच गए.
जब वो खिलाड़ियों के साथ नाश्ता कर रहे थे तभी सुनील गावस्कर अपने घर से वहाँ पहुंचे.
रूंगटा ने गावस्कर को देखते ही उनसे पूछा, "क्या तुम रोज़ स्टेडियम में ही रुक रहे हो या अपने घर जा रहे हो?"
गावस्कर अपनी आत्मकथा ‘सनी डेज़’ में लिखते हैं, "मैंने उन्हें बताया कि मैं रात में अपने घर चला जाता हूँ. इस पर वो नाराज़ हो कर बोले, क्या तुम्हें मालूम है कि सभी खिलाड़ियों की वानखेड़े स्टेडियम में रहने की व्यवस्था क्यों की गई है ताकि खिलाड़ियों के बीच टीम भावना पैदा हो सके."
"तुम्हें भी यहाँ रहना चाहिए. तुम टीम के उप-कप्तान हो. तुम्हें टीम के सामने उदाहरण पेश करना चाहिए. मैंने सफ़ाई दी कि मैंने घर जाने के लिए मैनेजर की अनुमति ले ली थी."
रूंगटा ने एकनाथ सोलकर से भी वही सवाल पूछा कि 'क्या तुम भी रात को घर चले जाते हो?'
गावस्कर लिखते हैं, "सोलकर ने इस सवाल के जवाब में कहा कि वो स्टेडियम में ही रुक रहे हैं. ये साफ़ झूठ था. हर एक को पता था कि सोलकर रोज़ रात को अपने घर चला जाता था."
"मुझे समझ में नहीं आया कि मैनेजर रामचंद ने जो वहाँ मौजूद थे हमें रात को घर जाने की अनुमति देने की बात क्यों नहीं स्वीकार की?"
"मुझे इस बात से भी धक्का लगा कि सोलकर के स्तर के क्रिकेट खिलाड़ी को क्रिकेट प्रशासक के सामने झूठ बोलने की ज़रूरत क्यों पड़ रही है?"

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गावस्कर का बल्ला हुआ फेल
वर्ल्ड कप का पहला मैच इंग्लैंड और भारत के बीच लॉर्ड्स में खेला गया.
नौ जून, 1975 को लॉर्ड्स में भारत-इंग्लैंड मैच देखने जाने वाले भारतीय प्रशंसकों के लिए बहुत ख़राब दिन साबित हुआ.
जैसे-जैसे खेल बढ़ता गया पिच धीमी होती चली गई. इंग्लैंड ने निर्धारित 60 ओवरों में 4 विकेट खोकर रिकॉर्ड 334 रन बनाए.
जब भारत की बल्लेबाज़ी शुरू हुई तो जियोफ़ आर्नल्ड की दूसरी ही गेंद पर कट करने के चक्कर में गेंद ने उनका बल्ला हल्के से छुआ लेकिन इंग्लैंड के किसी भी खिलाड़ी ने कैच की अपील नहीं की.
गावस्कर चाहते तो ईमानदारी दिखाते हुए पविलियन लौट सकते थे लेकिन उन्होंने पिच नहीं छोड़ी. इसके बाद जो हुआ उसका गावस्कर को ख़ासा दुख हुआ होगा.
इसके बाद गावस्कर ने एक क्रॉस बैटेड शॉट लगाया. इसके बाद गावस्कर के बल्ले से रन निकलने ही बंद हो गए.
इंग्लैंड के गेंदबाज़ पेशेवर गेंदबाज़ी कर रहे थे और एक भी ढीली गेंद नहीं फेंक रहे थे.
वो जो भी शॉट लगा रहे थे वो सीधे फ़ील्डरों के पास जा रहे थे.
इस बीच दर्शकों ने गावस्कर की धीमी बल्लेबाज़ी से नाराज़ होकर अपने बियर के केन बजाने शुरू कर दिए थे.

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गावस्कर ने आउट होने की इच्छा प्रकट की
गावस्कर लिखते हैं, "मैंने टीम मैनेजर से पूछा था कि क्या मैं जानबूझ कर अपना विकेट गँवा दूँ. मैनेजर ने मुझसे कहा कि अगर तुम्हें रन बनाने में दिक्कत आ रही है तो तुम सिंगिल्स या दो रन बनाने पर ध्यान दो."
"इंग्लैंड ने आक्रामक फ़ील्ड लगाई थी और वहाँ एक या दो रन लेना भी दूभर हो रहा था. जब हर बार सोचता था कि इस गेंद पर शॉट लगाऊंगा लेकिन मेरे पैर रक्षात्मक शॉट खेलने की मुद्रा में मुड़ जाते."
"दर्शकों के शोर ने भी मुझे विचलित कर दिया था. हमने शुरू से ही मान लिया था कि इस स्कोर का पीछा नहीं किया जा सकता."
गावस्कर आगे लिखते हैं, "ये शायद मेरे जीवन की सबसे ख़राब पारी थी. इस दौरान मैंने कई बार सोचा कि मैं पूरा विकेट छोड़ दूँ और बोल्ड हो जाऊँ. अपनी पीड़ा से छुटकारा पाने का यही रास्ता मुझे सही लग रहा था."
"इस बीच मेरे तीन कैच छोड़े गए, वो भी बहुत आसान कैच. मेरी अजीब-सी हालत थी. न तो मैं रनों की गति बढ़ा पा रहा था और न ही चाह कर आउट हो पा रहा था."
इस पारी के बाद लोगों ने गावस्कर के बारे में कई बातें कहीं जो उन्हें और उनके प्रशंसकों को बहुत बुरी लगीं.
देवेंद्र प्रभुदेसाई गावस्कर की जीवनी ‘एसएमजी’ में लिखते हैं, "कुछ लोगों का मानना था कि गावस्कर ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वो वेंकट राघवन को कप्तान बनाए जाने से नाराज़ थे."

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एक अंग्रेज़ क्रिकेट समीक्षक ने तो यहाँ तक कहा कि इंलैंड के खिलाड़ी जानबूझ कर गावस्कर के कैच छोड़ रहे थे ताकि इंग्लैंड की जीत सुनिश्चित हो जाए.
मशहूर क्रिकेट समीक्षक जॉन वुडकॉक ने ‘द टाइम्स’ में लिखा, "ये समझने के लिए कि भारत और ख़ास तौर पर गावस्कर ने इस तरह की बैटिंग क्यों की, हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि इससे पहले जब भारत की टीम लॉर्ड्स पर खेली थी तो उसका प्रदर्शन कैसा रहा था?"
"पूरी टीम सिर्फ़ 42 रन बनाकर आउट हो गई थी, हालाँकि वो एक टेस्ट मैच था. शायद उनके मन में कहीं न कहीं था कि अगर वो इंग्लैंड के पार नहीं जा सकते तो उनकी कोशिश होनी चाहिए कि वो उस तरह से धराशाई न हों, जैसा वो 1974 में हुए थे."
कुछ हल्कों में ये भी आरोप लगा कि गावस्कर ने 60 ओवर तक अपनी पारी इसलिए जारी रखी ताकि उनका औसत बेहतर हो जाए.
गावस्कर ने इसका जवाब देते हुए कहा, "इससे बेहूदा कोई बात नहीं हो सकती. दूसरे मैंने 60 ओवर अकेले तो नहीं खेले थे. विश्वनाथ को छोड़कर किसी भी भारतीय खिलाड़ी ने हालात को बदलने की कोशिश नहीं की."
भारत की टीम निर्धारित 60 ओवरों में तीन विकेट खोकर केवल 132 रन ही बना सकी, गावस्कर ने 174 बॉल खेलकर कुल 36 रन बनाए और आख़िर तक आउट नहीं हुए.

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गावस्कर से सफ़ाई माँगी गई
मैच के बाद भारतीय टीम के मैनेजर रामचंद ने गावस्कर से इस प्रदर्शन के लिए लिखित सफ़ाई माँगी जो कि उन्होंने दी.
उस समय गावस्कर को लगा कि वो उनके स्पष्टीकरण से संतुष्ट हो गए थे क्योंकि जब वो उनके और वेंकट राघवन के साथ अगले मैच के लिए भारतीय टीम चुनने के लिए बैठे तो उनकी पिछली पारी के बारे में उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा.
बाद की घटनाओं ने साबित किया कि ये बात सच नहीं थी.
भारत का अगला मैच पूर्वी अफ़्रीका के ख़िलाफ़ था.
वो टूर्नामेंट की सबसे कमज़ोर टीम थी. भारत ने उन्हें आसानी से 10 विकेट से हरा दिया.

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उनकी पूरी टीम 120 रन बनाकर आउट हो गई और भारत के मध्यम तेज़ गेंदबाज़ों आबिद अली, मोहिंदर अमरनाथ और मदन लाल को तीन-तीन विकेट मिले.
गावस्कर और फ़ारूख़ इंजीनयर ने बिना आउट हुए 29.5 ओवर में भारत को जीत दिला दी.
इस पारी में सुनील गावस्कर 65 रन बनाकर नाबाद लौटे. सेमी-फ़ाइनल में स्थान पाने के लिए भारत का अगला मुकाबला न्यूज़ीलैंड से था.
भारत ने पहले खेलते हुए निर्धारित 60 ओवरों में 230 रन बनाए. आबिद अली 70 रन बनाकर टॉप स्कोरर बने.
न्यूज़ीलैंड ने ग्लैन टर्नर के नाबाद 114 रनों की बदौलत भारत को हराकर न्यूज़ीलैंड ने सेमी-फ़ाइनल में प्रवेश कर लिया.
इस पूरे टूर्नामेंट में सुनील गावस्कर ने भारत की तरफ़ से सबसे अधिक 113 रन बनाए. दो बार नॉट आउट रहने के कारण उनका औसत था 113 रन.

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गावस्कर से लिखित स्पष्टीकरण की माँग
जब टूर्नामेंट के बाद यूरोप में एक महीने की छुट्टी बिताकर गावस्कर वापस भारत लौटे तो उन्हें भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष रूंगटा की तरफ़ से एक पत्र मिला जिसमें उनसे इंग्लैंड के ख़िलाफ़ उनकी बल्लेबाज़ी के लिए स्पष्टीकरण देने के लिए कहा गया.
भारतीय टीम के मैनेजर ने बोर्ड अध्यक्ष को दी गई अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 'गावस्कर ने जान-बूझकर टीम के हितों के ख़िलाफ़ धीमी पारी खेली.'
मैनेजर का आरोप था कि 'इसका युवा खिलाड़ियों के मनोबल पर प्रतिकूल असर पड़ा. उनका ये भी कहना था कि गावस्कर ने उप-कप्तान की भूमिका ढंग से नहीं निभाई और अपने-आप को टीम के दूसरे सदस्यों से अलग-थलग रखा.'
गावस्कर को तब जाकर पता चला कि इंग्लैंड में उन्होंने अपनी बैटिंग के बारे में मैनेजर को जो सफ़ाई दी थी उसको संतोषजनक नहीं पाया गया था.
गावस्कर ने बोर्ड अध्यक्ष को इसका जवाब देते हुए लिखा, "टीम के सदस्यों से अलग-थलग रहने और उनको प्रोत्साहित न करने के अलावा, आप मुझे पर कोई भी आरोप लगा सकते हैं.
"अगर 14 सदस्यीय भारतीय टीम के 8 सदस्यों को बुलाया जाए और वो कहें कि मैंने टीम के सदस्यों को प्रोत्साहित नहीं किया तो मैं क्रिकेट से सन्यास ले लूँगा."

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गावस्कर ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "आप किस तरह खेल के मैदान में अच्छा प्रदर्शन न करने के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकते हैं?"
"अगर ऐसा ही है तो अगर गेंदबाज़ की गेंदों पर अधिक रन बनते हैं तो उसको भी इस बारे में सफ़ाई देनी होगी या अगर फ़ील्डर कैच छोड़ता है तो उसे बताना होगा कि उससे ये कैच कैसे छूटा?"
"अगर मेरा प्रदर्शन खराब था तो गेंदबाज़ों का भी प्रदर्शन बहुत साधारण था जिन्होंने अपनी गेंदों पर 334 रन बन जाने दिए. मैं सबसे पहले स्वीकार करता हूँ कि 36 रन बनाना मेरा सबसे ख़राब प्रदर्शन था लेकिन ये कहना कि मैंने ऐसा जानबूझ कर किया, मेरे साथ ज़्यादती है."
बोर्ड अध्यक्ष ने गावस्कर को फिर पत्र लिखकर कहा कि 'उनका स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं है लेकिन उन्हें संदेह का लाभ दिया जाता है और उनके खिलाफ़ सारी कार्रवाई रोकने का फ़ैसला लिया गया है.'
इस पूरे प्रकरण ने गावस्कर और भारतीय क्रिकेट की पूरी दुनिया में किरकिरी कर दी.
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