इस विषय के अंतर्गत रखें जनवरी 2013

पत्रकारिता की दुविधाएं

शालू यादवशालू यादव|मंगलवार, 29 जनवरी 2013, 17:20

टिप्पणियाँ (1)

जब मेरे संपादक ने मुझसे पूछा कि क्या मैं बदायूँ जाकर दिल्ली गैंगरेप के नाबालिग अभियुक्त के परिवार से मिलना चाहूंगी, तो मेरे मन में कई सवाल उठे.
मेरे अंदर के पत्रकार ने मुझसे कहा कि ये दौरा काफ़ी रोमाँचक होगा, लेकिन मेरे अंदर की महिला ने कहा कि मैं कतई उस इंसान के घर नहीं जाना चाहती, जिसने एक लड़की के साथ बर्बर दरिंदे की तरह बलात्कार किया और फिर उसके शरीर पर कई आघात किए.
मैं दिल्ली में पली-बढ़ी हूं और चाहे कोई कुछ भी कहे, मुझे इस बात पर फख़्र है कि दिल्ली वो शहर है जिसने देश के हर तबके को पनाह दी है.
मुझे कभी अपने शहर में असुरक्षित महसूस नहीं हुआ और अगर हुआ भी है तो मैंने उसका हमेशा डटकर उसका सामना भी किया.
ऐसा नहीं है कि ये घटनाएं दिल्ली में ही होती हैं. मुझे लंदन जैसे शहर में भी छेड़-छाड़ का सामना करना पड़ा.
फिर भी लंदन में मुझे उन टिप्पणियों से शर्मिंदा होना पड़ा जिनमें दिल्ली को 'बलात्कार की राजधानी' कहा जा रहा था.
जो 16 दिसंबर की रात उस लड़की के साथ हुआ, उसने हर देशवासी की तरह मेरी भी अंतरात्मा को झिंझोड़ कर रख दिया था.
उन छह लोगों के प्रति मेरे मन में बहुत गुस्सा था और मैंने भी सभी देशवासियों की तरह यही दुआ की कि दोषियों को कड़ी से कड़ी सज़ा हो.
ये तो रही उस आम लड़की की भावनाओं की बात, जो हर बलात्कारी को बेहद गुस्से से देखती है.
लेकिन जहां तक पत्रकारिता की बात है, तो मैं इस बात से दुविधा में पड़ गई थी कि जिस लड़के के प्रति मेरे अंदर इतनी कड़ुवी भावना है, उसके परिवार से जुड़ी ऐसी कहानी मैं कैसे कर पाउंगी जो संपादकीय तौर पर संतुलित हो.
मुझे लगा कि भले ही पुलिस ने इस नाबालिग को सबसे ज़्यादा बर्बर बताया हो, लेकिन मुझे अपने भीतर का पक्षपात निकाल कर उसके परिवार से बातचीत करनी चाहिए.
लेकिन जब उस नाबालिग अभियुक्त के गांव पहुंची और उसके परिवार से मिली, तो मन की दुविधा और बढ़ गई.
उनकी दयनीय हालत देख कर मेरे अंदर का गुस्सा खुद-ब-खुद काफूर हो गया.
नाबालिग अभियुक्त की मां बेसुध हालत में बिस्तर पर पड़ी थी. जब मैंने उनसे पूछा कि अपने बेटे के बारे में सुन कर कैसा लगता है, तो बोली कि 'मैं तो मां हूं...क्या एक मां अपने बच्चे को ये सिखा कर बाहर भेजती है कि तू गलत काम कर? हमारी इन सब में क्या गलती है? हमें मिली तो बस बदनामी.'
उनकी ये बात सुन कर मेरे मन में गुस्से के साथ-साथ पक्षपात की भावना भी खत्म हो गई.
मैं ये नहीं कहूंगी कि उस परिवार की गरीबी देख कर ही मेरा मन बदला. मेरा मन तो बदला उस सच्चाई के बारे में सोच कर जो लाखों भारतीय गरीब बच्चों की कहानी है.
रोज़गार की तलाश में अकेले ही वे शहर चले जाते हैं और अपनी ज़िंदगी के सबसे महत्त्वपूर्ण साल अकेले रहकर ज़िंदगी की कठिनाइयों का सामना करने में गुज़ारते हैं.
इस नाबालिग लड़के की भी यही कहानी थी. मां-बाप से दूर, बिना किसी भावनात्मक सहारे के उसने दिल्ली शहर में अपने तरीके से संघर्ष किया.
मैं उस अभियुक्त के घर में बैठ कर ये सब सोच ही रही थी कि मां दूसरे कोने से बोली कि मेरे बेटे ने ज़रूर बुरी संगत में आकर ऐसा काम किया होगा...
खैर उसकी हैवानियत के पीछे वजह जो भी हो, मेरे अंदर की महिला उसे कभी माफ नहीं कर सकती.

पत्रकारिता की दुविधाएं

शालू यादवशालू यादव|मंगलवार, 29 जनवरी 2013, 17:20

टिप्पणियाँ (11)

जब मेरे संपादक ने मुझसे पूछा कि क्या मैं बदायूँ जाकर दिल्ली गैंगरेप के नाबालिग अभियुक्त के परिवार से मिलना चाहूंगी, तो मेरे मन में कई सवाल उठे.
मेरे अंदर के पत्रकार ने मुझसे कहा कि ये दौरा काफ़ी रोमाँचक होगा, लेकिन मेरे अंदर की महिला ने कहा कि मैं कतई उस इंसान के घर नहीं जाना चाहती, जिसने एक लड़की के साथ बर्बर दरिंदे की तरह बलात्कार किया और फिर उसके शरीर पर कई आघात किए.
मैं दिल्ली में पली-बढ़ी हूं और चाहे कोई कुछ भी कहे, मुझे इस बात पर फख़्र है कि दिल्ली वो शहर है जिसने देश के हर तबके को पनाह दी है.
मुझे कभी अपने शहर में असुरक्षित महसूस नहीं हुआ और अगर हुआ भी है तो मैंने उसका हमेशा डटकर उसका सामना भी किया.
ऐसा नहीं है कि ये घटनाएं दिल्ली में ही होती हैं. मुझे लंदन जैसे शहर में भी छेड़-छाड़ का सामना करना पड़ा.
फिर भी लंदन में मुझे उन टिप्पणियों से शर्मिंदा होना पड़ा जिनमें दिल्ली को 'बलात्कार की राजधानी' कहा जा रहा था.
जो 16 दिसंबर की रात उस लड़की के साथ हुआ, उसने हर देशवासी की तरह मेरी भी अंतरात्मा को झिंझोड़ कर रख दिया था.
उन छह लोगों के प्रति मेरे मन में बहुत गुस्सा था और मैंने भी सभी देशवासियों की तरह यही दुआ की कि दोषियों को कड़ी से कड़ी सज़ा हो.
ये तो रही उस आम लड़की की भावनाओं की बात, जो हर बलात्कारी को बेहद गुस्से से देखती है.
लेकिन जहां तक पत्रकारिता की बात है, तो मैं इस बात से दुविधा में पड़ गई थी कि जिस लड़के के प्रति मेरे अंदर इतनी कड़ुवी भावना है, उसके परिवार से जुड़ी ऐसी कहानी मैं कैसे कर पाउंगी जो संपादकीय तौर पर संतुलित हो.
मुझे लगा कि भले ही पुलिस ने इस नाबालिग को सबसे ज़्यादा बर्बर बताया हो, लेकिन मुझे अपने भीतर का पक्षपात निकाल कर उसके परिवार से बातचीत करनी चाहिए.
लेकिन जब उस नाबालिग अभियुक्त के गांव पहुंची और उसके परिवार से मिली, तो मन की दुविधा और बढ़ गई.
उनकी दयनीय हालत देख कर मेरे अंदर का गुस्सा खुद-ब-खुद काफूर हो गया.
नाबालिग अभियुक्त की मां बेसुध हालत में बिस्तर पर पड़ी थी. जब मैंने उनसे पूछा कि अपने बेटे के बारे में सुन कर कैसा लगता है, तो बोली कि 'मैं तो मां हूं...क्या एक मां अपने बच्चे को ये सिखा कर बाहर भेजती है कि तू गलत काम कर? हमारी इन सब में क्या गलती है? हमें मिली तो बस बदनामी.'
उनकी ये बात सुन कर मेरे मन में गुस्से के साथ-साथ पक्षपात की भावना भी खत्म हो गई.
मैं ये नहीं कहूंगी कि उस परिवार की गरीबी देख कर ही मेरा मन बदला. मेरा मन तो बदला उस सच्चाई के बारे में सोच कर जो लाखों भारतीय गरीब बच्चों की कहानी है.
रोज़गार की तलाश में अकेले ही वे शहर चले जाते हैं और अपनी ज़िंदगी के सबसे महत्त्वपूर्ण साल अकेले रहकर ज़िंदगी की कठिनाइयों का सामना करने में गुज़ारते हैं.
इस नाबालिग लड़के की भी यही कहानी थी. मां-बाप से दूर, बिना किसी भावनात्मक सहारे के उसने दिल्ली शहर में अपने तरीके से संघर्ष किया.
मैं उस अभियुक्त के घर में बैठ कर ये सब सोच ही रही थी कि मां दूसरे कोने से बोली कि मेरे बेटे ने ज़रूर बुरी संगत में आकर ऐसा काम किया होगा...
खैर उसकी हैवानियत के पीछे वजह जो भी हो, मेरे अंदर की महिला उसे कभी माफ नहीं कर सकती.

पनीर मोमोज़

विधांशु कुमारविधांशु कुमार|शुक्रवार, 25 जनवरी 2013, 17:29

टिप्पणियाँ (11)

पिछली बार जब ''गंगनम' ' मुझसे मिला तो वो बहुत गुस्से में था.

ये यूट्यूब ख्याति वाला 'गंगनम' नहीं, बल्कि मेरा एक दोस्त है. 'गंगनम' का असली नाम कुछ और है लेकिन क्योंकि वो पूर्वोत्तर भारत से है और हम शेष भारत में वहां के बाशिंदों को तरह तरह के नाम से बुलाते हैं, उसका नाम भी ''गंगनम' ' रख दिया गया है.

वैसे तो कभी चीन अपने नक्शे में अरुणाचल प्रदेश या पूर्वोत्तर भारत के किसी दूसरे हिस्से को दिखा दे, या फिर वहां अलग देश की मांग हो तो हमारे जैसे देशभक्त भारतीयों का खून खौल उठता है. लेकिन हम वहां के लोगों को खुद से कुछ कम समझते हैं और तिरछी आंखों वाले और कुछ बेहद भद्दे नामों से पुकारने में कोई हिचक नहीं रखते हैं, ये हमारा 'बड़प्पन' है.

'गंगनम' को भी इन चीज़ों से ऐतराज़ है लेकिन इस बार उसका गुस्सा किसी और वजह से था.

दरअसल बीती रात वो दफ्तर से लंबी शिफ्ट के बाद घर के लिए निकला तो उसे बड़ी भूख लगी थी. चौराहे पर उसे ठिठुरती सर्दी में खड़ा एक लड़का मिला जो मोमो बेच रहा था. उसने एक प्लेट ऑर्डर दिया लेकिन जब उसने पहला ही मोमो मुंह में डाला तो, बकौल उसके, "पूरा स्वाद किरकिरा हो गया. ये कोई मटन या चिकन मोमो नहीं पनीर मोमो था. छी:"

उसने बताया, "मैंने उससे पूछा ये क्या डाल रखा है तो उसने जवाब दिया, बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद. अब बताओ उसने एक तो ऐसी चीज़ खिलाई जो कहीं से मोमो से मेल नहीं खाती और दूसरा मुझे बंदर कह दिया."

मैनें पानी का ठंडा गिलास उसे बढ़ाते हुए कहा कि वो लड़का पढ़ा लिखा था, एक मुहावरा कह रहा था ओर तुम्हें बंदर नहीं कहा उसने.

इस पर 'गंगनम' और भड़क उठा. वैसे यहां ये भी बता दूं कि मैं उसे उसके नाम से पुकारना पसंद करता हूं और 'गंगनम' कतई नहीं कहता. लेकिन यहां उसे 'गंगनम' कहना ज़रूरी है क्योंकि उस रात उसने कुछ ऐसी बात कह दी की अगर उसकी पहचान मालूम हो जाए तो वो कई नर्म श्रद्धालुओं के गर्म गुस्से के हत्थे चढ़ जाए.

'गंगनम' कहने लगा तुम दिल्ली वाले भी हर चीज़ में पनीर डाल देते हो- पनीर परांठा तो समझ में आता है - ये पनीर दोसा, पनीर बिरयानी, पनीर अप्पम क्या चीज़ है?

पनीर का नाम सुनकर मेरे मुंह में पानी आ गया लेकिन जिस तरह उसने पनीर को स्वछंद गाली दी थी, दिल्ली के कई सौ क्विंटल पनीर पानी-पानी हो गए होंगे.

मैने पनीर के डिफेंस में कहा , "अरे देवों का आहार है पनीर. जैरी माउज़ से लेकर लिटिल प्रिंस तक, कश्मीर से कन्याकुमारी तक बच्चे बूढ़ों की पसंद है पनीर. फिर ये भी तो देखों कितना प्रोटीन मिलता है इससे वो भी बिना हिंसा किए हुए."

मु्झे अपनी ही दलील पर गर्व महसूस हो रहा था कि मैने 'गंगनम' से बाज़ी मार ली कि उसने एक और शिगूफ़ा छोड़ा.

कहने लगा, "अरे देवों की बात तो तुम छोड़ ही दो. वहां शिलॉन्ग में मैं भी कभी कभी हनुमान जी के मंदिर में जाता था. लेकिन अब तो हर जगह साईं बाबा के मंदिर नज़र आते हैं. वैसे भारत में मोमो ने समोसे को और साईं बाबा ने हनुमान जी को पीछे छोड़ दिया है."

उसकी आखिरी लाइन सुनकर मैं सकते में आ गया. मैनें कहा तुम 'गंगनम' ही ठीक हो. छुपे रहना, कहीं वायरल हो गए तो पता नहीं क्या क्या बदल डालोगे और अगर पकड़ में आ गए तो लोग ही तुम्हें बदल डालेंगे.

मैनें इधर उधर देखा, किसी ने सुना तो नहीं, फिर हाथ पकडकर उसे सीढ़ियों से नीचे ले गया.

घर से थोड़ी दूरी पर साईं बाबा के मंदिर के पास मैंने उसे रिक्शे पर बिठाया, बाबा के दरबार में सर नवाकर दुआ मांगी और फिर लपककर सड़क की दूसरी तरफ एक ठेले की तरफ बढ़ा और बीस का एक नोट बढ़ाते हुए कहा, "एक प्लेट पनीर मोमोज़ देना, लाल चटनी के साथ!"

एक्टिंग या मजबूरी?

कल्पना शर्माकल्पना शर्मा|शुक्रवार, 25 जनवरी 2013, 16:52

टिप्पणियाँ (24)

क्या आपने कभी किसी को मजबूरी में एक्टिंग करते हुए देखा है? मैंने देखा है, इमरान खान को.

'मटरू की बिजली का मंडोला' देखने के बाद सबसे पहला ख़्याल यही आया कि ये इमरान एक्टिंग करते क्यों हैं? भला ऐसी भी क्या मजबूरी? जब पर्दे पर इमरान को एक्टिंग की कोशिश करते देखती हूं तो लगता है अंदर ही अंदर चिल्ला रहे हों, "मुझे बचा लो मुझसे ये नहीं होगा!"

उनके कॉमेडी सीन में भी एक अजीब सी उदासी नज़र आती है.

वैसे बॉलीवुड में इमरान खान पहले शख्स नहीं है जो अपने अभिनय से कम, अपनी किस्मत और कनेक्शन के बल पर ज़्यादा चल रहे हैं. ये तो बहुत पहले से चला आ रहा है.

राजेंद्र 'जुबली' कुमार याद हैं ना? हर फिल्म में राजेंद्र मुझे एक जैसे ही नज़र आए हैं. अगर गौर से देखा जाए तो राजेंद्र की फिल्म को जुबली बनाने में उनसे ज़्यादा उनकी फिल्मों के गानों का अधिक योगदान रहता था.

उस दौर में उनकी फिल्मों को लेकर ऐसी हवाएं भी उड़ी थी कि राजेंद्र अपनी फिल्म के टिकट खुद ही खरीद लेते हैं. हालांकि ये बातें उतनी ही ग़लत हो सकती हैं जितनी गलत राजेंद्र साहब की एक्टिंग होती थी.

वैसे इसी दौर में और भी कई नामी स्टार आए जो अपनी अदाकारी के लिए कम और स्टाइल के लिए ज़्यादा चर्चित रहे जैसे राजेश खन्ना या देव आनंद.

मुझे लगता है कि ये कुछ भी हो सकता है लेकिन एक्टिंग नहीं.

फिर स्टार का मैडल पहने संजय दत्त याद आते हैं जिनके कई प्रशंसक शायद मुझे माफ नही करेंगे पर सच तो ये है कि संजू बाबा अपनी हर फिल्म में एक ही भाव में नज़र आते हैं और शायद आगे भी आते रहेंगे. ठीक है कि बॉलीवुड में उनके 'मुन्ना भाई' की कसम खाई जाती हैं लेकिन ये बात तो खुद संजू भी जानते हैं कि उन्होने इस फिल्म का कल्याण किया या फिल्म ने उनका.

वैसे अभिषक बच्चन को लेकर भी मेरे कुछ ऐसे ही विचार हैं.

इस मामले में हीरो से ज़्यादा हीरोइनों ने बाज़ी मारी है ख़ासतौर से मौजूदा दौर में कटरीना कैफ तो सबसे ऊपर आती हैं. पिछले 12 सालों में वो हिंदी नहीं सीख पाईं लेकिन निर्देशकों का तांता लगा हुआ है.

कैसे भी करके उन्हें लंदन या अमरीका बेस्ड लड़की का रोल दे दिया जाता है ताकि उनकी गिरती पड़ती हिंदी को सही ठहराया जा सके. आज कटरीना के पास गाड़ी हैं, बंगला है, बैंक बैलेंस है, अवार्ड्स हैं, सलमान की दोस्ती है, यश राज की फिल्में हैं पर अफसोस की एक्टिंग नहीं है!

मज़ेदार बात ये है कि आज के दौर में जहां मेरे और आपके बॉस, हमसे 200 प्रतिशत परफॉर्मेंस की अपेक्षा करते हैं, वहीं एक इंडस्ट्री ऐसी भी है जहां औसत दर्जे और कभी कभी औसत से भी कम दर्जे का काम करने वालों को स्टार का ओहदा देने के साथ साथ अवॉर्ड भी थमाया जाता है.

हालांकि बाहर से ये सितारे कितने भी टिमटिमाएं, अंदर से एक्टिंग ना कर पाने की टीस शायद इन्हें भी कचोटती होगी तभी तो शाहरुख़ ख़ान ने एक इंटरव्यू में कहा था "मुझे बुरा लगता है जब समीक्षक मेरी फिल्म की बात करते हैं, मेरी एक्टिंग की नहीं."

क्या आप शाहरुख़ ख़ान की एक्टिंग की बात करना चाहेंगे?

इज़हारे मोहब्बत की बीमारी

वंदनावंदना|गुरुवार, 17 जनवरी 2013, 13:10

टिप्पणियाँ (23)


"मैं तुमसे मोहब्बत करता हूँ .." ये मेरा नहीं यश चोपड़ा की फिल्म चाँदनी का शुरुआती डायलॉग है.

दरअसल हाल ही में मैं गोवा घूमने गई. वहाँ की संस्कृति, पहनावा, साफ़-सफ़ाई, फ़िज़ा, हर अंदाज़ जुदा था जो मन को भा गया. कभी-कभी लगता ही नहीं था कि भारत में हूँ. लेकिन ये एहसास तब तक ही था जब तक मैं वहाँ के पुराने किलों और इमारतों तक नहीं पहुँची थी.

कहने को तो वो गोवा में बनाया पुर्तगालों का पुराना किला था. पर इसकी दीवारें इज़हारे-मोहब्बत से पटी पड़ी थीं..लग रहा था कि यश चोपड़ा की रोमांटिक फिल्मों के किरदारों ने अपनी सारी मोहब्बत यहीं उड़ेल दी है.

भारत में जहाँ-तहाँ से आए लोगों ने गोवा के इस किले में अपना प्यार दीवार पर कुरेद-कुरेद कर अंकित किया था. मानो आने वाला समय इनके प्यार को इसी कसौटी पर परखेगा कि किसने कितनी गहराई से दीवार पर नाम कुरेदा है.

भारत में जितनी जगह घूमी हूँ शायद ही कोई ऐतिहासिक धरोहर ऐसी देखी है जिसकी दीवारों, दरवाज़ों को लोगों ने नाम खुरच-खुरच कर खराब न किया हो.

यूँ तो भारत में आमतौर पर लोगों को 'पब्लिक डिस्प्ले ऑफ एफेक्शन' यानी खुल्ल्म खुल्ला प्यार जताने से ऐतराज़ होता है लेकिन ऐतिहासिक दीवारों पर इनका प्यार उमड़ घुमड़ कर सामने आता है.

वक़्त के साथ भारत में कई बदलाव आए हैं लेकिन बचपन से लेकर अब तक मैंने लोगों की 'दीवारे-मोहब्बत' या 'इज़हारे मोहब्बत' की फितरत में कम ही बदलाव देखा है...कारण?

क्यों न इसका ठीकरा भी युवाओं पर विदेशी संस्कृति के प्रभाव पर डाल दिया जाए...क्योंकि आजकल यही फैशन है.

मैं निजी और किताबी अनुभव से इतना तो कह सकती हूँ कि अपवादों को छोड़ दें तो पश्चिमी देशों ने आम तौर पर अपनी ऐतिहासिक धरोहरों को बहुत ही सहेज कर रखा है. ब्रिटेन में रहते हुए मैंने नहीं देखा कि वहाँ के किलों में लोगों ने कोई छेड़- छाड़ की हो.

वहाँ के कई टूटे-फूटे और मामूली से दिखने वाले किलों को भी सजाकर संभालकर रखा गया है. पर्यटक न जाने कितने पाउंड देकर इन्हें देखने जाते हैं.

ऐसे कई ब्रितानी किलों में घूमने के बाद मुझे कितनी बार हैरानी होती थी कि भारत में इतनी ऐतिहासिक और सुंदर इमारतें होते हुए भी भारतवासी इन्हें पर्यटन लायक नहीं बना सके.

पर मैं भी कैसी बात कर रही हूँ. जहाँ इतने ज्वलंत मुद्दे मौजूद हैं वहाँ ये भी कोई मुद्दा है बहस करने का. ऐतिहासिक धरोहर सहेजकर रखने का वक़्त ही कहाँ है. हाँ ऐसी जगहों पर जाकर वहाँ इश्क की नई इबारत लिखने की फुरसत ज़रूर है.

या हो सकता है कि मैं ही सनकी हो गई हूँ.. प्यार करने वालों का इज़हार मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा. "तैय्यब अली प्यार का दुश्मन हाय-हाय."

संस्कृति का प्रतीक है कुंभ

सुशील झासुशील झा|शनिवार, 12 जनवरी 2013, 07:03

टिप्पणियाँ (11)

इलाहाबाद को मैं दो चीज़ों के लिए जानता हूं कुंभ और नेतराम की कचौड़ी. अर्धकुंभ में पहली बार इलाहाबाद आया था और दूसरी बार जब बीबीसी की ट्रेन में आया तो नेतराम की कचौड़ियां यादों की पोटली में बंध कर चली आई थीं.

एक बार फिर इलाहाबाद में हूं. मौसम साफ है शायद कुंभ के लिए. एक दो दिन पहले तक सर्दी सूरज को आंखें दिखा रही थी. लेकिन अब सूरज दिन में आंखें दिखाने लगा है.

महाकुंभ की तैयारियां लगभग पूरी हैं. कुछ सड़कों की सफाई और तंबूओं की सुविधाएं ठीक होनी बाकी हैं. आस्था का मेला लग चुका है.

इलाहाबाद शहर में प्रवेश करते ही बड़े बड़े विशालकाय बैनर दिखते हैं. नेताओं के, बाबाओं के, स्वयंसेवी संगठनों के और विभागों के. कोई गंगा की सफाई के लिए दौड़ रहा है तो कोई कसम खा रहा है पॉलीथीन नहीं लाएंगे. संगम में कुल्ला नहीं करेंगे.

हर तीसरे पोस्टर में मुख्यमंत्री अखिलेश मुस्कुराते दिखते हैं. नीचे छोटे नेताओं की तस्वीरें हैं. लगता है मानो पीआर की होड़ लगी है. सबको अपना पीआर करना है.

पीआर से याद आया. मीडिया के लिए बनने वाला पास लेने गए तो फाइल में नाम नहीं था. इससे पहले कि हम ज़िद करते कोई बड़े अधिकारी आए और बोले किसी से कोई बद्तमीजी नहीं होगी.

हमारी तरफ देखकर बोले. ऑनलाइन फॉर्म भर दीजिए. पास बन जाएगा. फॉर्म भरे और अधिकारी ने हाथो हाथ ओके किया. इतने सजग और तेज़ सरकारी पीआर के लोगों से कम पाला पड़ा है हमारा. दिल्ली में काम शायद ही इतना तेज़ होता हो.

आस्था लोगों को तेज़ कर देती है. इस तेज़ी से सरकारों में आस्था बन सकती है बशर्ते ये तेज़ी हमेशा हो.
देशी विदेशी सब पहुंच रहे हैं मेला में. इलाहाबाद के बड़े शास्त्री पुल से मेला विहंगम दिखता है. एक छोटा सा कस्बा बसा है मानो. ..ये न गांव है न शहर.....तंबूओं का एक जाल है...जहां बीच में पानी है...पीपे का पुल है...बाबा है....सरकार है....पुलिस है....गरीब हैं ....अमीर हैं.....और इन सबमें घूमती विचरती आस्था है.
मेरी आस्था मेले में है. मॉल के ज़माने में मेले कम ही लगते हैं. ऐसे में इस मेले में देश और विदेश की रुचि से रोमांचित होता हूं. तभी बार बार कुंभ आता हूं.

सोनपुर, पुष्कर और नौचंदी के मेलों का ज़िक्र सुना है लेकिन कुंभ का मेला पहले भी देखा है और इस बार भी देख रहा हूं. बदलते हुए समय में ये मेले केवल आस्था के ही प्रतीक नहीं हैं ये संस्कृति के प्रतीक भी हैं जहां जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोग सेवा में लगते हैं.

कुछ तीखे सवाल

उमर फ़ारुख़उमर फ़ारुख़|शुक्रवार, 11 जनवरी 2013, 16:28

टिप्पणियाँ (34)

भड़काऊ भाषण देने पर मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी की गिरफ़्तारी, गंभीर आरोपों के अंतर्गत उनके ख़िलाफ़ कई नगरों और अनेक पुलिस स्टेशनों में मामले दर्ज होना और अंतत: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के एक जज की ओर से उन्हें लताड़ा जाना देखकर ऐसा लगता है कि देश में क़ानून, न्यायिक और पुलिस व्यवस्था अब एक बिकुल नए दौर में प्रवेश कर गई है.

ऐसा लग रहा है कि अब किसी भी क़ानून तोड़ने वाले के लिए कोई जगह नहीं है चाहे वो कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो.

अकबरुद्दीन और उनकी मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन पार्टी मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधि होने के दावेदार रही है. जब तक वो मुसलमानों की इन शिकायतों को प्रकट कर रहे थे कि उनके साथ अन्याय हो रहा है और पुलिस-प्रशासन उनके साथ भेदभाव करते हैं वहाँ तक तो बात ठीक थी क्योंकि कानून और संविधान भी हर नागरिक को इसका अधिकार देता है.

लेकिन जब कोई इसी बात को ऐसे अंदाज़ में कहने लगे जो हिंसा भड़का सकता है और दो समुदायों के बीच नफ़रत और दूरी पैदा कर सकता है तो फिर वह उसी क़ानून से टकराने लग जाता है.

अकबरुद्दीन के भाषण के जो भाग यू ट्यूब के ज़रिए प्रसारित हुए हैं उससे लगता है कि अकबरुद्दीन ने कानून का कई तरह से उल्लंघन किया.

अकबरुद्दीन की ये शिकायत क़ानून के दायरे में हो सकती है कि मुसलमानों के साथ भेदभाव किया जा रहा है लेकिन पुलिस को हटाकर हिंदुओं को ताक़त दिखाने की चुनौती देने को क़ानून बर्दाश्त नहीं कर सकता. ये बात किसी विधायक के मुंह से अच्छी भी नहीं लगती.

चारमीनार से सटाकर अवैध रूप से मंदिर बनाया जाना और उसके विस्तार की अनुमति देना क़ानून और सुप्रीम कोर्ट दोनों के आदेशों का उल्लंघन है. इस पर आपत्ति समझी जा सकती है लेकिन इसके लिए हिंदू देवी देवताओं का अपमान का हक़ किसी को नहीं दिया जा सकता.

राजनीतिक लड़ाई को सांप्रदायिक रंग देना किसी के हित में नहीं हो सकता.

लेकिन इस मामले ने कई और सवाल खड़े किए हैं जिनका जवाब भी तलाश करना चाहिए.

पहला तो ये कि क्या अकबरुद्दीन पहले व्यक्ति या नेता हैं जिन्होंने भड़काऊ भाषण दिया है? या किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई हो? या कानून और देश को चुनौती दी हो?

ज़ाहिर है कि ऐसा नहीं है. अगर केवल गत एक-दो दशकों की ही बात करें तो बाल ठाकरे, अशोक सिंघल से लेकर प्रवीण तोगड़िया, साध्वी ऋतंभरा, आचार्य धर्मेन्द्र तक न जाने कितने ही नाम हैं जिन्होंने न केवल भड़काऊ भाषण दिए बल्कि कई बार उसका परिणाम बड़े पैमाने पर दंगों और ख़ून ख़राबे की सूरत में निकला. 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा ने पूरे देश में कैसी आग भड़काई थी ये देश के राजनीतिक इतिहास के पन्नों में ठीक तरह से दर्ज है.

अगर 'एक्शन-रिएक्शन' की बात अकबरूद्दीन ने की है तो 1984 में राजीव गांधी ने और 2002 में नरेंद्र मोदी ने क्या ऐसी ही बात नहीं कही थी?

तो क्या इस देश में सबके लिए अलग-अलग क़ानून है?

इसी हैदराबाद नगर में गत सप्ताह ही विश्व हिन्दू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया के ख़िलाफ़ भी भड़काऊ भाषण देने का एक मामला दर्ज किया गया है. तो क्या तोगड़िया को भी हैदराबाद पुलिस उसी तरह गिरफ्तार करेगी और जेल भेजेगी?

इससे पहले आचार्य धर्मेंद्र और साध्वी ऋतंभरा के ख़िलाफ़ दर्ज मामलों में क्या कार्रवाई हुई यह भी आंध्र प्रदेश की पुलिस को बताना चाहिए.

दिलचस्प पहलू ये है कि अकबरुद्दीन के ख़िलाफ़ भी इससे पहले भी इसी तरह के मामले दर्ज हैं तो फिर आज से पहले उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

लगता तो ये है कि मामला क़ानून और व्यवस्था, समाज और समरसता से ज़्यादा राजनीतिक है.

जब तक मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन कांग्रेस के साथ थी तब तक अकबरूद्दीन के भड़काऊ भाषण भी अपराध नहीं था अब जबकि मजलिस ने कांग्रेस के ख़िलाफ़ राजनीतिक युद्ध छेड़ रखा है तो सत्तारूढ़ कांग्रेस की सरकार को ये देशद्रोह का मामला दिख रहा है.

दरअसल ये भड़काऊ भाषण, सांप्रदायिक सौहार्द्र को ख़त्म करने की चेष्टा और इसी तरह की दूसरी कोशिशों पर सरकार और उसकी पुलिस के नज़रिए में एक तरह का दोगलापन दिखता है.

इसी दोगलेपन ने कई उन्मादी नेताओं को लोगों की नज़रों में हीरो बनाया है. इस बार वही अकबरुद्दीन के साथ हो रहा है और वो कुछ मुसलमानों के हीरो बन रहे हैं.

मेरी एक आँख फूट जाए

अविनाश दत्तअविनाश दत्त|गुरुवार, 10 जनवरी 2013, 20:22

टिप्पणियाँ (13)

प्रिय प्रभु जी,
नए साल पर मेरी एक प्रार्थना है. आप बोलोगे प्रभु की तू लेट हो गया बे कई दिन बीत गए हेप्पी न्यू ईयर को.
पर हे जगत के स्वामी साल के पहले दो चार दिन तो बड़े लोगों, महान लोगों, भले लोगों के लिए होते हैं. जब इनकी बारी खत्म हुई तो मैं गरीब अपनी अरज लेके हाजिर हूँ भगवान.
तो शुरू हो जाऊं ....
भगवान, इस नए साल में अगर मुझ पर या मेरे परिवार वालों कोई आपत्ती भेजने वाले हो तो प्रभु बस इतना करना की मेरे ऊपर जो घटना दुर्घटना घटे वो दिल्ली में घटे. ऐसे इलाके में घटे जहाँ मध्यम वर्गीय, उच्च वर्गीय रहता हो. अगर हम लाइन में भी खड़े हो या बस में चल रहे हों तो कम से कम वो बस डीलक्स तो हो ही.
और अगर हम पिच्चर विच्चर देख कर लौट रहे हों तो वो 'जय संतोषी माँ' या 'सरकाई ल्यो खटिया', 'धरती की कसम' या कोई भोजपुरी टाईप की ना हो. अंग्रेजी ना हो तो कम से कम अंग्रेजी टाइप तो हो ही.
हाँ प्रभु इस बात का ज़रूर ध्यान रखना कि जिस दिन मेरे ऊपर विपत्ति का पहाड़ टूटे उस दिन वीकेंड हो. शनिवार या रविवार हो और उसके आस पास भारतीय क्रिकेट टीम कोई बड़ा मैच ना जीते, कोई वर्ल्ड कप ना हो, सलमान की कोई पिच्चर ना रिलीज़ हो रही हो और देश की जागरूक जनता और सजग टीवी चैनलों के पास करने के लिए कोई और काम ना हो.
भगवान, अगर इस बात की गारंटी नहीं दे सकता तो इतना वरदान तो दे ही दे तो जितना मुझे देगा उसका दुगना पड़ोसी को देगा. मुझ पर जो भी विपत्ति दे उसकी दुगनी दिल्ली वालों पर दे डालना.
और कुछ नहीं तो कम से कम इतना तो होगा ही की मुझे राहत नहीं मिली तो न्याय तो मिलेगा. और मेरे कारण जो जागरूकता आएगी तो कुछ रिस छीज कर मेरे गाँव घर में तो पहुंचेगी.
और नहीं भी पहुँची तो कम से कम उतने दिन तक तो मेरे या मेरे भाई बन्दों के दुख की कोई न कोई अखबार टीवी चैनल खबर लेगा ही जितने दिन खबर गरम है चर्चा में है.
मेरे साथ दिल्ली में हुई घटना के बाद जब मेरे बारे में सब छप जाएगा तो तो मेरे जैसे कुछ और दुखियारे ढूंढे जायेंगे जिनकी खबर मेरे जैसी ही हो या मुझसे भी दर्दनाक हो.
भगवान् मैं भोला हूँ भारत में यहां वहां अन्याय या अत्याचार के खिलाफ अगरबत्ती, मोमबत्ती जो भी जब भी मुझसे बन पड़ता है जलाता हूँ.
लेकिन प्रभु मैं गधा नहीं हूँ.
मुझे पता है मेरे दुख तकलीफ तब तक दुख तकलीफ नहीं है जब तक उन बड़े लोगों डर ना लगे कि जैसा मेरे साथ हुआ वैसा उनके साथ भी हो सकता है.
मेरी लाश अगर बस्तर मेरी सड़ी तो चील कव्वे खा जायेगें लेकिन अगर दिल्ली में गिर पडी तो उसकी बदबू सबको आयेगी गंदा दिखेगा और कुछ नहीं तो उसका क्रिया कर्म तो होगा ही बाजे गाजे से वीकेंड पर.
अपने ख्वाबों के छीछ्ड़ों के साथ मैं एक आम भारतीय (किसी राजनीतिक पार्टी से कोइ लेना देना नहीं)

क्या जनता 'गाइडेड मिसाइल' है?

Pawan NaraPawan Nara|शुक्रवार, 04 जनवरी 2013, 13:41

टिप्पणियाँ (16)

दिल्ली में चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार को लेकर मन में कई सवाल उठे.

इन सवालों को सुनने के बाद आप मुझ पर संवेदनहीन होने का आरोप लगा सकते हैं लेकिन फिर भी मैं वो सवाल आपके साथ साझा करना चाहता हूं.

पहला सवाल मेरे मन में आया कि क्या जनता कोई 'गाइडेड मिसाइल' है, जिसे एक घटना ने आंदोलन करने के लिए सुलगा दिया और फिर मीडिया ने उसकी दिशा और दशा तय की.

बलात्कार के प्रति ये गुस्सा साल के 365 दिन कहां होता है? 16 दिसंबर के बाद कितने ही बलात्कार और हुए. क्या मीडिया ने उन्हें इतनी ही गंभीरता से उठाया और क्या जनता ने उनको इतनी गंभीरता से लिया?

सवाल राजनीतिक पार्टियों के रवैये पर भी हैं. राजनीतिक पार्टियां क्या अपनी भी सोच या दिशा रखती हैं या फिर जहां जनता है वहीं राजनीतिक पार्टियां चल देती हैं?

दिल्ली के माहौल में राजनीतिक पार्टियां सोच बदलने का आह्वान करती हैं, जनता की सोच के साथ समर्थन करती हैं. लेकिन ठीक उसके उलट दिल्ली के दायरे से निकलते ही इन्हीं पार्टियों के नेता लड़कियों के पहरावों पर आपत्ति जताते हैं.

तो क्या दिल्ली की जनता और उनके चुनाव क्षेत्र की जनता अलग-अलग है और क्या लड़कियों की सुरक्षा और अस्मिता के पैमाने अलग-अलग हैं?

क्यों हमारे नेता अपने चुनाव क्षेत्र में खुलकर लड़कियों की आज़ादी की वकालत नहीं कर पाते हैं.

राजनीतिक पार्टियों के बयानों पर भी मन में सवाल उठे. एक पार्टी के नेता ने पीड़ित के नाम से क़ानून बनाने की बात की और दूसरी पार्टी के नेता ने पीड़ित को अशोक चक्र देने की मांग की. ये मांग लोगों की वाहवाही लूटने के लिए हैं या इसके कोई मायने भी हैं.

अब दिल्ली से उठाकर उत्तर प्रदेश ले चलते हैं. दिल्ली बलात्कार पीड़ित की मौत के शोक में सेना और सरकार ने नए साल के कार्यक्रम रद्द कर दिए. लेकिन जब देश पीड़ित के गम में शोक में डूबा था तब उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पैतृक गांव सैफई में जश्न हो रहा था जिसमें कई बॉलीवुड की हस्तियों ने कार्यक्रम पेश किए.

मैं ये नहीं कहता कि शोक किसी पर थोपा जा सकता है लेकिन सवाल ये ज़रुर उठा कि जब देश शोक में रो रहा था तो क्या सफैई में महोत्सव आयोजित करना असंवेदनशीलता नहीं थी?

सवाल दिल्ली सरकार द्वारा आयोजित मार्च पर भी उठे.

जनता जब बलात्कार पीड़ित के समर्थन में मार्च करना चाहती थी तो प्रशासन ने लोगों को मार्च नहीं करने दिया. धारा 144 लगा दी गई और मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए. लेकिन ठीक इसके उलट जब बारी सरकार की आई तो ना सिर्फ मार्च बेरोकटोक हुआ बल्कि बाक़ायदा उस मार्च के प्रचार के लिए अख़बार में विज्ञापन भी छपवाए गए.

तो क्या विरोध भी अब हम तभी कर सकते हैं जब सरकार उसका समर्थन करे?

सवाल और भी हैं लेकिन इनके जवाब बड़े विस्फोटक हो सकते हैं.

ना जनता अपनी बुराई सुनना चाहती है और ना सरकार और ना राजनेता और ना पुलिस.... लेकिन आप मेरी बुराई कर सकते हैं.

उम्मीद करता हूं कि आप दिल्ली में बलात्कार और बाकी किसी बलात्कार के बीच कोई फर्क नहीं करेंगे. हमारी मीडिया और नेताओं की तरह.

नीतीश-मोदी का बिहारी मायाजाल!

Manikant ThakurManikant Thakur|मंगलवार, 01 जनवरी 2013, 17:07

टिप्पणियाँ (17)

दिल्ली में वर्षांत एक बर्बर यौन हिंसा के संताप में गुज़रा. बीते बरसों में बिहार ने भी ऐसे दंश झेले हैं.

गए साल और नए साल के बीच आधी रात को जब झटके से घड़ियाँ तारीख़ बदल रही थीं, तब ' हैप्पी न्यू ईयर' का शोर हमारे शहर में इस बार भी हुआ. लेकिन दिल्ली बलात्कार कांड के ताज़ा ज़ख्म से ग़मज़दा माहौल वाली मायूसी प्रायः हर जगह दिखी.

बहरहाल, लौटता हूँ अपनी पेशागत ज़िम्मेदारियों की तरफ.

ज़ाहिर है कि बिहार के बारे में ही कुछ बातें करना चाहता हूँ. ख़ासकर इस विषय पर कि वर्ष 2013 में इस राज्य के सियासी समीकरण और संबंधित जन-रुझान बदलने के आसार हैं या नहीं.

मेरे ख़याल में यहाँ न सिर्फ राज्य सरकार से आम लोगों की नाराज़गी बढ़ी है, बल्कि सत्ता साझीदार जनता दल यूनाइटेड (जदयू) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का तालमेल अंदरूनी संकट में फंसा है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य की अपनी पिछली यात्राओं के दौरान जैसा उग्र जन-विरोध झेला, उससे उनको अपने दलीय जनाधार की औकात का सही अंदाज़ा लगा होगा. इसलिए बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग पर जनसमर्थन जुटाने संबंधी उनकी वह यात्रा-मुहिम राज्य की ज्वलंत समस्याओं के हाथों पिट गई.

यही कारण था कि भाजपा से सम्बन्ध-विच्छेद का तेवर बढ़-चढ कर दिखाते आ रहे जदयू नेताओं का रवैया इस बदले माहौल में नरम दिखने लगा.

पर अब जदयू को उस नरमी में गर्मी पैदा करने की मजबूरी सताने लगी है. कारण है कि गुजरात में लगातार तीसरी चुनावी जीत ने नरेन्द्र मोदी को भाजपा में प्रधानमंत्री पद के दावेदार वाली ताक़त दे दी है.

नीतीश कुमार पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि नरेन्द्र मोदी को अगर भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनायेगी तो जदयू बिना देर किये भाजपा से अलग हो जाएगा.

ऐसे में दो ही बातें हो सकती हैं. एक ये कि भाजपा एनडीए को एकजुट रखने के लिए इस बाबत नरेन्द्र मोदी के बजाय अपने किन्हीं और नेता के नाम पर सहमति बना ले.

दूसरी बात कि ऐसा नहीं होने पर नीतीश कुमार को एनडीए से बाहर किसी नए राजनीतिक समीकरण से जुड़ना होगा.

यह मुमकिन नहीं लगता कि हर हाल में नीतीश कुमार भाजपा से चिपके रहेंगे. लेकिन मुमकिन यह ज़रूर लगता है कि जुगाड़ लगाकर भाजपा के बिना भी नीतीश कुमार यहाँ अपनी सरकार बचा लें और वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में अपनी सियासी ताक़त आजमायें.

बिहार विधानसभा में बहुमत के लिए जदयू को सिर्फ चार विधायकों की ज़रुरत है और यहाँ कांग्रेस के कुल चार विधायकों पर जदयू की नज़र है भी. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) भी टूट की शंका से मुक्त नहीं हैं.


लोग ये भी जानते हैं कि भाजपा में नीतीश कुमार के विरोध और समर्थन वाले दो अलग-अलग ख़ेमे बने हुए हैं. उपमुख्यमंत्री और भाजपा नेता सुशील मोदी का अतिशय नीतीश प्रेम किसी से छिपा नहीं है.

मतलब लोकसभा चुनाव से पहले, यानी वर्ष 2013 में बिहार की राजनीति किसी भी आकस्मिक उलटफेर से लोगों को चौंका सकती है.

क्या पता कि यहाँ सत्ता पक्ष में जदयू और मुख्य विपक्ष में भाजपा नज़र आ जाए! हालाँकि इन दोनों दलों के अन्तःपुर से जुड़े कुछ लोग दबी ज़बान एक अलग ही कहानी सुनाते हैं.

उनके मुताबिक़ नीतीश और नरेन्द्र मोदी के बीच का विवाद सत्ता राजनीति के गूढ़ खेल का हिस्सा है. ना तो मोदी प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी बनेंगे और ना ही नीतीश भाजपा का साथ छोड़ेंगे.

उनका निचोड़ यह है कि बिहार में थोक मुस्लिम मतदाता फिर लालू के खाते में ना खिसक जाय, जदयू-भाजपा की बस यही रणनीति है. इसलिए नरेन्द्र मोदी के विरोध का दिखावा जारी रहेगा.

तो क्या कांग्रेस के साथ लालू प्रसाद के राजद का स्वाभाविक-सा दिख रहा संबंध आगामी चुनाव में भी क़ायम रहेगा? या फिर अचानक कांग्रेस के साथ नीतीश की युगलबंदी जैसा कोई नया गुल खिलेगा?

दोनों सवालों का सूत्र इस बात से जुड़ा है कि राज्य के मुस्लिम मतदाताओं का ध्रुवीकरण किस गठबंधन के साथ ज्यादा हो सकता है.

लालू यादव की हालिया जनसभाओं में जुटी अच्छी-ख़ासी भीड़ से उनके विरोधियों के कान खड़े हुए हैं जबकि लालू -राबडी शासन काल का स्याह पक्ष अभी भी पूरी तरह मिट नहीं पाया है.

उधर नीतीश कुमार ने तो कांग्रेस के लिए एक गुंजाइश उछाल ही दी है कि केंद्र का जो सियासी गठबंधन बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देना स्वीकारेगा, जदयू उसका समर्थन करेगा.

सच यह भी है कि नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री पद के योग्य ठहराने के लिए माहौल निर्माण का भरपूर प्रयास हुआ और हो रहा है.

लेकिन राज्य में बढ़ते अपराध, भ्रष्टाचार और अनेक योजनाओं में घपले-घोटालों के आंकड़े सबूत बनकर सामने आ रहे हैं. उन से आँख मिलाना इस सरकार के लिए मुश्किल होता जा रहा है. मार्केटिंग और मीडिया मैनेजमेंट की मदद से जो विकास की सुनहली परत वाली छवि चमकाई गई थी, उसकी कलई पिछले एक साल में तेज़ी से उतरने लगी है .

युवराज का स्वर्णिम मौन

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|मंगलवार, 01 जनवरी 2013, 13:52

टिप्पणियाँ (34)

पिछले दिनों नाराज़ प्रदर्शनकारियों और शाब्दिक बाणों से दूर राहुल गाँधी एक आदर्श पारिवारिक इंसान की भूमिका निभाते नज़र आए.

राहुल गाँधी दिल्ली की फैशनेबिल ख़ान मार्केट में अपनी माँ , बहन, बहनोई, भाँजे और भाँजी के लिए क्रिसमस उपहार खरीदने पहुँचे.. अपनी माँ के लिए उन्होंने दो किताबें खरीदीं. बच्चों के लिए उन्होंने खिलौने और चॉकलेट्स लिए और बाकी लोगों के लिए परफ़्यूम.

ग्राहक के तौर पर उन्होंने एक से एक बेहतरीन चीज़ों पर हाथ रखा और ज़रा भी मोल भाव नहीं किया. अपने परिवार को तो उन्होंने खुशी दे दी लेकिन 125 करोड़ लोगों को जिनके एक दिन वह नेता बनने के सपने देखते हैं, वह मायूस कर गए.

दिल्ली में बलात्कार के बाद लोगों के गुस्से को शुरू में ही शाँत किया जा सकता था अगर राहुल बाहर आकर लोगों को गले लगाते, उन्हें दिलासा देते और उन्हें आश्वस्त करते कि वह उनके साथ हैं. लेकिन वह लोगों की भावनाओं के पढ़ पाने मे असफल रहे और वह मौका उनके हाथ से जाता रहा.

उनको इसका गुमान तक नहीं हुआ कि हज़ारों युवा जिनका कि वह कथित रूप से प्रतिनिधित्व करते हैं, सड़कों पर उतरे हुए हैं और उनका खुद का कहीं अता पता नहीं है.

मनमोहन सिंह ने भी लोगों का मिजाज़ पढ़ने में पाँच दिन लगा दिए. इसके बाद भी उन्होंने रस्मी तौर पर एक लिखित वकतव्य पढ़ा जो लोगों को निहायत सतही और असंवेदनशील लगा. खुद मनमोहन सिंह भी अपनी बातों से इतने अप्रभावित दिखे कि उन्होंने कैमरामैन से ही पूछ लिया कि क्या जो उन्होंने कहा वह 'ठीक है?'

कांग्रेस नेतृत्व की सबसे ध्यान आकर्षित करने वाली चीज़ है उसकी चुप्पी. मनमोहन सिंह से लेकर सोनिया गांधी और 'युवराज' राहुल गाँधी सबके पास कहने के लिए बहुत कम शब्द हैं.

चाहे कोयला घोटाले का मामला हो या खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश या फिर कुडनकुलम परमाण संयंत्र की अहमियत, राहुल गाँधी के पास इनके बारे में कहने के लिए कुछ भी नहीं है. अभी बहुत दिन नहीं हुए जब प्रख्यात पत्रिका द इकॉनोमिस्ट ने राहुल गाँधी के बारे में कहा था, 'किसी को पता नहीं उनमें क्या कुछ करने की क्षमता है और अगर उन्हें सत्ता और ज़िम्मेदारी मिली तो वह क्या कुछ करना चाहेंगे.'

किसी भी संवाददाता सम्मेलन में वह कोई सवाल नहीं लेते और अगर लेते हैं भी तो एक या दो सवालों से ज्यादा नहीं.

चुनाव सभा में हाथ हिला देने या पहले से तैयार किए गए भाषण दे देने भर से किसी इंसान की राजनीतिक क्षमताओं का आकलन नहीं किया जा सकता.

एक लोकोक्ति है कि 'मौन स्वर्णिम होता है.' लेकिन राजनीति में ज़रूरत से अधिक लंबा मौन घातक हो सकता है.

अपने विरोधी का चुनावी घोषणा पत्र फाड़ने और एक गरीब इंसान के घर में अपने यूरोपीय मित्र के साथ खाना खा लेने भर से 125 करोड़ लोगों को नेता बनने का सपना नहीं देखा जा सकता.

युवराज का स्वर्णिम मौन

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|मंगलवार, 01 जनवरी 2013, 13:52

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पिछले दिनों नाराज़ प्रदर्शनकारियों और शाब्दिक बाणों से दूर राहुल गाँधी एक आदर्श पारिवारिक इंसान की भूमिका निभाते नज़र आए.

राहुल गाँधी दिल्ली की फैशनेबिल ख़ान मार्केट में अपनी माँ , बहन, बहनोई, भाँजे और भाँजी के लिए क्रिसमस उपहार खरीदने पहुँचे.. अपनी माँ के लिए उन्होंने दो किताबें खरीदीं. बच्चों के लिए उन्होंने खिलौने और चॉकलेट्स लिए और बाकी लोगों के लिए परफ़्यूम.

ग्राहक के तौर पर उन्होंने एक से एक बेहतरीन चीज़ों पर हाथ रखा और ज़रा भी मोल भाव नहीं किया. अपने परिवार को तो उन्होंने खुशी दे दी लेकिन 125 करोड़ लोगों को जिनके एक दिन वह नेता बनने के सपने देखते हैं, वह मायूस कर गए.

दिल्ली में बलात्कार के बाद लोगों के गुस्से को शुरू में ही शाँत किया जा सकता था अगर राहुल बाहर आकर लोगों को गले लगाते, उन्हें दिलासा देते और उन्हें आश्वस्त करते कि वह उनके साथ हैं. लेकिन वह लोगों की भावनाओं के पढ़ पाने मे असफल रहे और वह मौका उनके हाथ से जाता रहा.

उनको इसका गुमान तक नहीं हुआ कि हज़ारों युवा जिनका कि वह कथित रूप से प्रतिनिधित्व करते हैं, सड़कों पर उतरे हुए हैं और उनका खुद का कहीं अता पता नहीं है.

मनमोहन सिंह ने भी लोगों का मिजाज़ पढ़ने में पाँच दिन लगा दिए. इसके बाद भी उन्होंने रस्मी तौर पर एक लिखित वकतव्य पढ़ा जो लोगों को निहायत सतही और असंवेदनशील लगा. खुद मनमोहन सिंह भी अपनी बातों से इतने अप्रभावित दिखे कि उन्होंने कैमरामैन से ही पूछ लिया कि क्या जो उन्होंने कहा वह 'ठीक है?'

कांग्रेस नेतृत्व की सबसे ध्यान आकर्षित करने वाली चीज़ है उसकी चुप्पी. मनमोहन सिंह से लेकर सोनिया गांधी और 'युवराज' राहुल गाँधी सबके पास कहने के लिए बहुत कम शब्द हैं.

चाहे कोयला घोटाले का मामला हो या खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश या फिर कुडनकुलम परमाण संयंत्र की अहमियत, राहुल गाँधी के पास इनके बारे में कहने के लिए कुछ भी नहीं है. अभी बहुत दिन नहीं हुए जब प्रख्यात पत्रिका द इकॉनोमिस्ट ने राहुल गाँधी के बारे में कहा था, 'किसी को पता नहीं उनमें क्या कुछ करने की क्षमता है और अगर उन्हें सत्ता और ज़िम्मेदारी मिली तो वह क्या कुछ करना चाहेंगे.'

किसी भी संवाददाता सम्मेलन में वह कोई सवाल नहीं लेते और अगर लेते हैं भी तो एक या दो सवालों से ज्यादा नहीं.

चुनाव सभा में हाथ हिला देने या पहले से तैयार किए गए भाषण दे देने भर से किसी इंसान की राजनीतिक क्षमताओं का आकलन नहीं किया जा सकता.

एक लोकोक्ति है कि 'मौन स्वर्णिम होता है.' लेकिन राजनीति में ज़रूरत से अधिक लंबा मौन घातक हो सकता है.

अपने विरोधी का चुनावी घोषणा पत्र फाड़ने और एक गरीब इंसान के घर में अपने यूरोपीय मित्र के साथ खाना खा लेने भर से 125 करोड़ लोगों को नेता बनने का सपना नहीं देखा जा सकता.

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