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युवराज का स्वर्णिम मौन

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|मंगलवार, 01 जनवरी 2013, 13:52 IST

पिछले दिनों नाराज़ प्रदर्शनकारियों और शाब्दिक बाणों से दूर राहुल गाँधी एक आदर्श पारिवारिक इंसान की भूमिका निभाते नज़र आए.

राहुल गाँधी दिल्ली की फैशनेबिल ख़ान मार्केट में अपनी माँ , बहन, बहनोई, भाँजे और भाँजी के लिए क्रिसमस उपहार खरीदने पहुँचे.. अपनी माँ के लिए उन्होंने दो किताबें खरीदीं. बच्चों के लिए उन्होंने खिलौने और चॉकलेट्स लिए और बाकी लोगों के लिए परफ़्यूम.

ग्राहक के तौर पर उन्होंने एक से एक बेहतरीन चीज़ों पर हाथ रखा और ज़रा भी मोल भाव नहीं किया. अपने परिवार को तो उन्होंने खुशी दे दी लेकिन 125 करोड़ लोगों को जिनके एक दिन वह नेता बनने के सपने देखते हैं, वह मायूस कर गए.

दिल्ली में बलात्कार के बाद लोगों के गुस्से को शुरू में ही शाँत किया जा सकता था अगर राहुल बाहर आकर लोगों को गले लगाते, उन्हें दिलासा देते और उन्हें आश्वस्त करते कि वह उनके साथ हैं. लेकिन वह लोगों की भावनाओं के पढ़ पाने मे असफल रहे और वह मौका उनके हाथ से जाता रहा.

उनको इसका गुमान तक नहीं हुआ कि हज़ारों युवा जिनका कि वह कथित रूप से प्रतिनिधित्व करते हैं, सड़कों पर उतरे हुए हैं और उनका खुद का कहीं अता पता नहीं है.

मनमोहन सिंह ने भी लोगों का मिजाज़ पढ़ने में पाँच दिन लगा दिए. इसके बाद भी उन्होंने रस्मी तौर पर एक लिखित वकतव्य पढ़ा जो लोगों को निहायत सतही और असंवेदनशील लगा. खुद मनमोहन सिंह भी अपनी बातों से इतने अप्रभावित दिखे कि उन्होंने कैमरामैन से ही पूछ लिया कि क्या जो उन्होंने कहा वह 'ठीक है?'

कांग्रेस नेतृत्व की सबसे ध्यान आकर्षित करने वाली चीज़ है उसकी चुप्पी. मनमोहन सिंह से लेकर सोनिया गांधी और 'युवराज' राहुल गाँधी सबके पास कहने के लिए बहुत कम शब्द हैं.

चाहे कोयला घोटाले का मामला हो या खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश या फिर कुडनकुलम परमाण संयंत्र की अहमियत, राहुल गाँधी के पास इनके बारे में कहने के लिए कुछ भी नहीं है. अभी बहुत दिन नहीं हुए जब प्रख्यात पत्रिका द इकॉनोमिस्ट ने राहुल गाँधी के बारे में कहा था, 'किसी को पता नहीं उनमें क्या कुछ करने की क्षमता है और अगर उन्हें सत्ता और ज़िम्मेदारी मिली तो वह क्या कुछ करना चाहेंगे.'

किसी भी संवाददाता सम्मेलन में वह कोई सवाल नहीं लेते और अगर लेते हैं भी तो एक या दो सवालों से ज्यादा नहीं.

चुनाव सभा में हाथ हिला देने या पहले से तैयार किए गए भाषण दे देने भर से किसी इंसान की राजनीतिक क्षमताओं का आकलन नहीं किया जा सकता.

एक लोकोक्ति है कि 'मौन स्वर्णिम होता है.' लेकिन राजनीति में ज़रूरत से अधिक लंबा मौन घातक हो सकता है.

अपने विरोधी का चुनावी घोषणा पत्र फाड़ने और एक गरीब इंसान के घर में अपने यूरोपीय मित्र के साथ खाना खा लेने भर से 125 करोड़ लोगों को नेता बनने का सपना नहीं देखा जा सकता.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 17:52 IST, 01 जनवरी 2013 chan:

    भगवान हमारे राजनेताओं, प्रशासन, पुलिस और दुराचारियों को संवेदना और सदबुद्धि दे.

  • 2. 18:36 IST, 01 जनवरी 2013 Ranjeet sharma:

    मैं नहीं समझता कि राहुल गाँधी में भारत की युवा पीढ़ी के नेतृत्व या अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता है. उनमें नेतृत्व के गुण नहीं है. मेरी नज़र में अखिलेश कुमार यादव भी उनसे अधिक प्रतिभावान हैं. वह सिर्फ राजनीति कर रहे हैं. भारत के125 करोड़ लोगों के वास्तविक मुद्दों को उन्होंने कभी उठाने की कोशिश नहीं की.

  • 3. 19:29 IST, 01 जनवरी 2013 kaushal kishore:

    रेहान जी,
    सटीक लेख. कांग्रेस को शायद लगता होगा कि गैंगरेप को जल्दी ही जनता भूल जाएगी और 2014 के लोकसभा चुनाव में इसका फर्क नहीं पड़ेगा. फिर क्यों युवराज ठंड में निकलें. आखिर लाखों, करोड़ों के घोटाले हिमाचल चुनाव में उसे जीतने से नहीं रोक सके. गुजरात में भी प्रदर्शन बुरा नहीं कहा जा सकता तो काहे को पसीना बहाएं. फिर वैसे भी हमारे देश में चुनाव जाति, धर्म को सामने रखकर होते हैं. इनसान इसमें कहीं पीछे छूट जाता है.

  • 4. 20:03 IST, 01 जनवरी 2013 Vibhoti Mani Tripathi:


    यह वाकई दुखदाई है. हर भारतीय दुखी है सिवाए कुछ लोगों के.

  • 5. 21:06 IST, 01 जनवरी 2013 देवाराम बिश्नोई:

    राहुल गाँधी की ये चुप्पी उनके मौन व्यक्तित्व को अतीत में न धकेल दे,इससे पहले उनको जनता के सामने प्रत्येक मामले पर न केवल राय जाहिर करनी चाहिए बल्कि उन पर अमल भी शुरू कर देना चाहिए.

  • 6. 22:04 IST, 01 जनवरी 2013 vinay shankar:

    राहुल गाँधी क्या 70-80 के दशक के बाद भारत में कोई नेता है ही नहीं हुआ जो मुल्क की सोच को प्रतिनिधित्व दे सके और राहुल गाँधी वैसे भी थोपे हुए नेता है.

  • 7. 22:25 IST, 01 जनवरी 2013 naval joshi:

    रेहान साहब, आपके ब्लॉग की पहली पंक्ति समझ में नही आ पायी. आपने राहुल को एक आदर्श पारिवारिक इंसान की भूमिका निभाते पाया जबकि वे केवल खरीददारी कर रहे थे. एक सत्तासीन पार्टी के कर्णधार होने के नाते उनका देश के प्रति भी कुछ दायित्व बनता था जिनका कि आपने आगे जिक्र भी किया है. चॉकलेट आदि तो वे किसी से भी मॅगवाकर अपने घर ले जा सकते थे चॉकलेट की खरीददारी में किसी कौशल की जरूरत नहीं पडती है केवल जेब में पैसा होना चाहिए. सही मायनों में आदर्श पारिवारिक इंसान की भूमिका वे लोग निभा रहे थे जो कि एक बेहतर समाज के लिए अपना संकल्प व्यक्त कर रहे थे और शासन से लड रहे थे. समाज अच्छा और सुरक्षित बनाने का जो लोग सपना देख रहे हैं और इसके लिए अपना योगदान दे रहे हैं वास्तव में वे ही आदर्श पारिवारिक इंसान हैं. इनके लिए तो राजनीति जस्ट फॉर फन है, इससे अधिक कुछ नहीं।आपने व्यंग में ही यह पंक्ति लिखी होगी .कम से कम आपसे तो यह उम्मीद नहीं है कि आप इस तरह कोई चूक कर सकते हैं.

  • 8. 02:29 IST, 02 जनवरी 2013 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:


    रेहान साहब, राहुल गाँधी आप के और बीबीसी और कांग्रेसियों के युवराज हो सकते हैं मेरे नहीं क्योंकि 125 करोड़ लोगों में मैं भी शामिल हूँ. इसलिए आपका यह कहना कि 125 करोड़ लोगों के युवराज राहुल गाँधी हैं सरासर बेमानी है. बीबीसी और आपने कांग्रेसियों का चश्मा लगा रखा होगा हमने नहीं.

  • 9. 09:08 IST, 02 जनवरी 2013 ashish yadav,hyderabad:


    रेहान सर, आज के नेताओं की संवेदनाएं मर चुकी हैं. जब मंत्री, साँसद और विधायकों पर बलात्कार का आरोप लगा हो, उस जमात का कोई प्रतिनिधि ऐसे मुद्दों पर अपनी चुप्पी क्यों तोड़ेगा. राहुल गाँधी सिर्फ बातों के शेर हैं. बनावटी आक्रामकता दिखा कर जनता का दिल नहीं जीता जा सकता. कुछ करना होगा. सरकार कोरे वादे ही करती है. दिल्ली गैंग रेप की घटना पूरी दुनिया में छा गई, लेकिन इस देश के पीएम चुप, युवराज चुप, सोनिया चुप. बस आम आदमी ही चिल्ला रहा है और हमेशा की तरह उसकी आवाज़ भी नक्कारखाने में तूती की आवाज बन कर रह जाएगी.

  • 10. 09:32 IST, 02 जनवरी 2013 BHEEMAL Dildarnagar:


    रेहान भाई, मुझे माफ़ करना इन शब्दों में टिप्पणी लिखने के लिए. ऐसा लगा पढ़ कर कि मीडिया/ बीबीसी/रेडियो और डिग्गी राजा को कॉन्ट्रेक्ट मिल गया है येन केन प्रकारेण राहुल जी को युवराज पद पर प्रतिष्ठित करने के लिए.

  • 11. 10:22 IST, 02 जनवरी 2013 mundepi:

    ठीक है ????

  • 12. 11:25 IST, 02 जनवरी 2013 अमित भारतीय:

    सही कहा, मैं सहमत हूँ. लेकिन सर यही चीज़ तो आमजन को नहीं दिखाई देती. इतना सब होने के बाद आज भी जब मैं लोगों से उनकी एक-दो अच्छाइयों के बारे में पूछता हूँ तो बस गाँधी-नेहरु परिवार का त्याग मुझे याद दिला दिया जाता है. कहते हैं ऐसे ही राजीव गाँधी थे लेकिन उन्होंने देश को कहाँ से कहाँ तक पहुंचा दिया.

  • 13. 13:15 IST, 02 जनवरी 2013 vineeta:

    आप सभी पाठकों की संवेदनाओं को पूरी तरह समझते हुए बस यह कहना है मुझे कि इस (या किसी भी)ब्लॉग के भाव को समझिये, सिर्फ शब्दों पर मत जाइये .'युवराज' शब्द का इस्तेमाल व्यंग्यात्मक रूप में हुआ है . यह ब्लॉग कांग्रेस के लोकतंत्र की आड़ में चलाये जा रहे राजतंत्र का और नेताओं की संवेदनहीनता पर बहुत सटीक प्रहार है . अब यह मुद्दा अलग है कि ऐसी संवेदनहीन राजनीति को हम और आप (यानी कि आम जनता ही) जाने अनजाने प्रश्रय दे रहे हैं.

  • 14. 17:49 IST, 02 जनवरी 2013 asu:

    रेहान जी, मैं ऐसा मनता हूँ कि मनुष्य जन्म से नही कर्म से महान बनता है. ये कहना बेमानी नही नही होगा कि आज तक के राजनीतिक सफर में राहुल गांधी ने देश के किसी भी अहम मुद्दे पर न के बराबर अपने विचार व्यक्त किए हैं. चाहे 2g हो. कोयला घोटाला या फिर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और अब चाहे दिल्ली में महिला के साथ दुष्कर्म का मामला ही क्यों न हो . 60 साल से बुरी बात है कि हमारे देश में भाई भतीजावाद जारी है.

  • 15. 18:01 IST, 02 जनवरी 2013 COMMON MAN:

    रेहान आपने बेहतरीन लिखा है.राहुल एक पोस्टर बॉय के अलावा कुछ नहीं है.

  • 16. 20:13 IST, 02 जनवरी 2013 yogesh dubey:

    रेहानजी इतना बढि़या ब्लॉग लिखने के लिए आपका शुक्रिया

  • 17. 21:07 IST, 02 जनवरी 2013 Suresh:

    मैं नहीं समझता कि राहुल में भारत की युवा पीढ़ी के नेतृत्व या अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता के गुण नहीं है. भारत के125 करोड़ लोगों के वास्तविक मुद्दों को उन्होंने कभी उठाने की कोशिश नहीं की.

  • 18. 22:17 IST, 02 जनवरी 2013 nandkishor:

    बहुत सटीक टिप्पणी है.

  • 19. 09:49 IST, 03 जनवरी 2013 ramesh chandara dhanka:

    राहुलजी वास्तव में चूक गए, वो जनता की भावनाओं को समझ ही नहीं पाए.

  • 20. 12:20 IST, 03 जनवरी 2013 Manoj:

    कैसे युवराज कहां के युवराज?वो सिर्फ कांग्रेस के युवराज हो सकते हैं पूरे देश के नहीं.

  • 21. 20:18 IST, 03 जनवरी 2013 HIMMAT SINGH BHATI:

    मुझे पहली बार लग रहा है कि बीबीसी अपनी साख खोती जा रही है. जिस निष्पक्षता के लिए वो जाना जाता है वो अब नही रहै. लिखते हुए मुझे बहुत दुख हो रहा है क्योंकि मैं पुराने बीबीसी का चाहने वाला हूँ.

  • 22. 21:08 IST, 03 जनवरी 2013 yudhishthir:

    रेहान भाई, आपको क्या हो गया है.हम यही समझ रहे है कि एक वरिष्ठ पत्रकार के नाते आपको वो सब मालूम होना चाहिए, जो दुनिया को पहले से ही मालूम है. आपकी मजबूरी है कि आप भी उन्हें युवराज संबोधित कर रहे है.
    उनकी लॉटरी लगी है, गांधी परिवार मे पैदा होने की . हर परिवार का बेटा युवराज होता है, वो उस गाँव , शहर और राज्य का नहीं होता, देश का तो बिलकुल नही. उन्हें सब कुछ पका पकाया चाहिए. मेहनत बुजुर्गों ने की और फल वो खा रहे है.

  • 23. 23:25 IST, 03 जनवरी 2013 जगत दवे:

    राजनीति मे मुझे तो आज कल के युवा नेताओ में भी बुढ्ढे दिखाई देते है. भारत में एक ऐसा युवा नेता दिखाईए आचार, विचार, और करिश्माई व्यक्तित्व से लबरेज हो. सब सत्ता की लालच में या तो बुढऊ नेताओ या अपने पिताजीओ की नकल के नमूने मात्र है.

  • 24. 11:39 IST, 04 जनवरी 2013 उज्जवल कुमार:

    आपके द्वारा कहे गए लोकोक्ति 'मौन स्वर्णिम होता है' में मै एक बात और जोड देना चाहता हूँ कि 'मौन मूर्खता का ढक्कन है.'

  • 25. 10:07 IST, 05 जनवरी 2013 rajesh kumar:

    युवराज हमेशा ही चुप ही तो रहते हैं, सिवाय वोट मांगने के.

  • 26. 13:41 IST, 06 जनवरी 2013 Deepankar singh:

    क्या कहें अब इस पर. जहां लोग 50 रुपए में अपने पांच साल का भविष्य इन नेताओं के पास गिरवी रख देते हैं वहां राहुल तो युवराज हैं. पैसे फेंककर 2014 का चुनाव जीत जाएंगे.

  • 27. 17:21 IST, 06 जनवरी 2013 kirnesh:

    जब मनमोहन सिंह जैसे आदमी प्रधानमंत्री हो सकते हैं जिसे राजनीति का ककहरा नहीं आता हो तो हम राहुल गांधी से कैसे उम्मीद कर सकते हैं.

  • 28. 20:14 IST, 06 जनवरी 2013 S.Ravi Shankar:

    आपका यह लेख बहुत ही रोचक है. लगता है कि काँग्रेस को यह भरोसा है कि उसका कोई विकल्प नहीं है. विपक्ष भी हारा हुआ है. जनता के पास कोई चारा नहीं रह जाता.

    काश कोई ऐसा नेता मिले जो देश के कल्याण के बारे ज़रा तो सोचे.

  • 29. 11:21 IST, 07 जनवरी 2013 Sandeep Mahato:

    रेहान जी एक बहुत अच्छा विश्लेषण इस ब्लॉग के जरिये आपने बिलकुल सटीक कहा " राजनीति में ज़रूरत से अधिक लंबा मौन घातक हो सकता है". शायद कांग्रेस के बड़े दिग्गजों का मौन उनपर भारी पड़ रहा है, लोगों का उनपर से विश्वास उठता जा रहा है, संदेह पैदा होता जा रहा है उनकी क्षमता पर, परन्तु वे ऐसा क्यों कर रहे हैं क्या वे किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए हैं या जनता से जुड़ना उन्हें नहीं आ रहा है, कुछ भी हो पर मुझे लगता है कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व दिशाहीन हो चुका है, और उनपर सत्ता का घमंड छा गया है.

  • 30. 14:17 IST, 07 जनवरी 2013 भास्कर मिश्रा:

    रेहान जी सटीक और तीखा लेख..शायद गांधी परिवार इस लेख को पढने के बाद कुछ सीख सकता है...लेकिन यह संभव नहीं है...मै इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि राहुल क्या कर सकते हैं...और क्या नहीं...यहाँ मै भी यही कहना चाहूँगा...इस प्रश्न का उत्तर कभी राहुल बाबा लोगों को दें..क्योंकि उन्हें नहीं पता कि वे क्या कर सकते हैं...उनमें आत्मविश्वास की कमी तो है ही...दूरदर्शिता का अभाव भी है...अगर ऐसा नहीं होता तो वे 125 करोड़ लोगों को जवाब जरूर देते...अगर नहीं भी देते हैं...तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला..क्योंकि वे मुंह में सोने का चम्मच लेकर पैदा हुए है...यदि जनता भूलने की आदत को बरकरार रखती है...तो उनके नेतृत्व में असंजस भरे निर्णयों के लिए भी तैयार रहे

  • 31. 11:45 IST, 08 जनवरी 2013 Sunita gujarat:

    O.
    अब क्या फ़ायदा है. चुनाव तो खत्म हो गया. अच्छा है घर पर ही आराम करें. चुनाव के दिनों में ही ज्यादा लोगों से संबंध रखना पड़ता है.भाई समझा करो.

  • 32. 12:16 IST, 08 जनवरी 2013 E.A.khan, Jamshedpur:

    रेहान साहब राहुल गाँधी इस देश में किस खेत की मूली हैं आज तक मेरी समझ में नहीं आया. उनका चिल्लाना या चुप रहना कोई खास मायने नहीं रखता. दुःख तो उन दस महानुभाओं की तीखी टिप्पड़ी पर हुआ जिसमें आसाराम बापू शामिल हैं जिन्होंने अभागी लड़की को ही दोष दे ड़ाला.आध्यात्मिक धर्म गुरु इस तरह की बात बोल सकते हैं उम्मीद से परे है. औरों की बात करना और उन की बोली पर टिप्पड़ी करना बेगुनाह लड़की की आत्मा को और दुःख पहुँचाना है. आप हम एक जुट होकर न्यायालय और सरकार पर दबाव बनाते रहें की जल्द से जल्द अत्याचारियों को फांसी की सजा मिले. जितनी देर होगी उतना ही इस तरह की अनर्गल टिप्पड़िया आती रहेंगी.

  • 33. 17:21 IST, 08 जनवरी 2013 Sunil:

    मौका बुद्धिमान चूकते हैं, मूर्ख नहीं. हर मुद्दे पर इनका यही हाल है.

  • 34. 05:14 IST, 29 जनवरी 2013 आदित्य नारायण शुक्ला 'विनय':

    जो देश के प्रधानमंत्री बनने के सपने देखता हो उसके लिए इस दर्दनाक हादसे पर मौन धारण किये रखना निस्संदेह अशोभनीय है.

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