युवराज का स्वर्णिम मौन
पिछले दिनों नाराज़ प्रदर्शनकारियों और शाब्दिक बाणों से दूर राहुल गाँधी एक आदर्श पारिवारिक इंसान की भूमिका निभाते नज़र आए.
राहुल गाँधी दिल्ली की फैशनेबिल ख़ान मार्केट में अपनी माँ , बहन, बहनोई, भाँजे और भाँजी के लिए क्रिसमस उपहार खरीदने पहुँचे.. अपनी माँ के लिए उन्होंने दो किताबें खरीदीं. बच्चों के लिए उन्होंने खिलौने और चॉकलेट्स लिए और बाकी लोगों के लिए परफ़्यूम.
ग्राहक के तौर पर उन्होंने एक से एक बेहतरीन चीज़ों पर हाथ रखा और ज़रा भी मोल भाव नहीं किया. अपने परिवार को तो उन्होंने खुशी दे दी लेकिन 125 करोड़ लोगों को जिनके एक दिन वह नेता बनने के सपने देखते हैं, वह मायूस कर गए.
दिल्ली में बलात्कार के बाद लोगों के गुस्से को शुरू में ही शाँत किया जा सकता था अगर राहुल बाहर आकर लोगों को गले लगाते, उन्हें दिलासा देते और उन्हें आश्वस्त करते कि वह उनके साथ हैं. लेकिन वह लोगों की भावनाओं के पढ़ पाने मे असफल रहे और वह मौका उनके हाथ से जाता रहा.
उनको इसका गुमान तक नहीं हुआ कि हज़ारों युवा जिनका कि वह कथित रूप से प्रतिनिधित्व करते हैं, सड़कों पर उतरे हुए हैं और उनका खुद का कहीं अता पता नहीं है.
मनमोहन सिंह ने भी लोगों का मिजाज़ पढ़ने में पाँच दिन लगा दिए. इसके बाद भी उन्होंने रस्मी तौर पर एक लिखित वकतव्य पढ़ा जो लोगों को निहायत सतही और असंवेदनशील लगा. खुद मनमोहन सिंह भी अपनी बातों से इतने अप्रभावित दिखे कि उन्होंने कैमरामैन से ही पूछ लिया कि क्या जो उन्होंने कहा वह 'ठीक है?'
कांग्रेस नेतृत्व की सबसे ध्यान आकर्षित करने वाली चीज़ है उसकी चुप्पी. मनमोहन सिंह से लेकर सोनिया गांधी और 'युवराज' राहुल गाँधी सबके पास कहने के लिए बहुत कम शब्द हैं.
चाहे कोयला घोटाले का मामला हो या खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश या फिर कुडनकुलम परमाण संयंत्र की अहमियत, राहुल गाँधी के पास इनके बारे में कहने के लिए कुछ भी नहीं है. अभी बहुत दिन नहीं हुए जब प्रख्यात पत्रिका द इकॉनोमिस्ट ने राहुल गाँधी के बारे में कहा था, 'किसी को पता नहीं उनमें क्या कुछ करने की क्षमता है और अगर उन्हें सत्ता और ज़िम्मेदारी मिली तो वह क्या कुछ करना चाहेंगे.'
किसी भी संवाददाता सम्मेलन में वह कोई सवाल नहीं लेते और अगर लेते हैं भी तो एक या दो सवालों से ज्यादा नहीं.
चुनाव सभा में हाथ हिला देने या पहले से तैयार किए गए भाषण दे देने भर से किसी इंसान की राजनीतिक क्षमताओं का आकलन नहीं किया जा सकता.
एक लोकोक्ति है कि 'मौन स्वर्णिम होता है.' लेकिन राजनीति में ज़रूरत से अधिक लंबा मौन घातक हो सकता है.
अपने विरोधी का चुनावी घोषणा पत्र फाड़ने और एक गरीब इंसान के घर में अपने यूरोपीय मित्र के साथ खाना खा लेने भर से 125 करोड़ लोगों को नेता बनने का सपना नहीं देखा जा सकता.
