इस विषय के अंतर्गत रखें नवम्बर 2012

किसे ऐतबार होगा?

विनोद वर्माविनोद वर्मा|गुरुवार, 29 नवम्बर 2012, 14:56

टिप्पणियाँ (14)

दो पत्रकारों को कथित धन उगाही के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है.

पत्रकार बिरादरी बँट गई है. आमतौर पर पत्रकारों के संपन्न समुदाय का तर्क है कि ये प्रेस की आज़ादी का मामला है और इसकी जाँच पत्रकारों के ही किसी संगठन को करनी चाहिए. जबकि वंचित पत्रकारों का समुदाय इस मामले में बहुत से सवाल उठा रहा है.

इन दोनों के बीच भी एक वर्ग है. वो संपन्न है और वंचित दिखना चाहता है. वो दोनों नावों में सवार है.

पत्रकार और उनके संस्थान को इस बात से इनकार नहीं है कि उन्होंने उद्योगपति से मोलभाव किया था. उनका तर्क है कि वे उद्योगपति की पोल खोलना चाहते थे.

दिलचस्प है कि जिसे पोल खोलनी था उसने स्टिंग ऑपरेशन नहीं किया. स्टिंग ऑपरेशन किया उसने, जिसकी पोल खुलने वाली थी.

ये पेंचदार बात है. आम लोगों को सिर्फ़ कील का माथा दिख रहा है, कील के भीतर के पेंच नहीं दिख रहे हैं.

ये पूरा मामला औद्योगिक-व्यावसायिक और मीडिया संस्थानों की कार्यप्रणाली से जुड़ा हुआ है.

एक अख़बार के मालिक और संपादक ने कहा है कि कंपनियों के जनसंपर्क अधिकारियों और उनके लिए काम करने वाली जनसंपर्क कंपनियों के प्रतिनिधियों का भी स्टिंग ऑपरेशन करना चाहिए जिसमें वे कंपनी की ख़बरें रुकवाने के लिए आते हैं.

बात सही है. उम्मीद करनी चाहिए कि वे ऐसा करेंगे क्योंकि वे एक मीडिया संस्थान के मालिक भी हैं.

ऐसा करना किसी संपादक के बूते की बात नहीं है. अख़बार या टीवी कंपनी का मालिक ऐसा करने नहीं देगा. सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को समझदार व्यक्ति मार ही नहीं सकता.

एक संपादक मित्र की सलाह है कि संपादकों और ब्यूरो प्रमुखों के लिए हर साल अपनी संपत्ति का ब्यौरा देना ज़रुरी कर देना चाहिए.

वे ये सलाह देने से चूक गए कि मीडिया संस्थानों के मालिकों को ऐसा करना चाहिए.

'पेड न्यूज़' यानी ख़बरों को अपने पक्ष में छपवाने/चलवाने के लिए भुगतान किए जाने का मामला पिछले कुछ समय से गर्म है. राजनेता कथित रूप से चिंतित हैं.

लेकिन इससे बड़ा मामला ख़बर को ना छापने या रोकने के लिए होने वाले भुगतान का है. जितना मीडिया व्यवसाय दिखता है उससे तो बस रोटी का जुगाड़ होता है, उस रोटी पर घी तो ख़बर रोकने या तोड़ने-मरोड़ने के धंधे से चुपड़ी जाती है.

विज्ञापन से लेकर ज़मीनें सरकारें ख़बर छापने के लिए नहीं, न छापने के लिए देती हैं.

ये आपराधिक सांठगांठ है. उद्योग-व्यवसाय और मीडिया के बीच. राजनीतिक वर्ग और मीडिया के बीच.

दरअसल जो ख़बर दिखती हैं, वो तीन तरह की होती हैं.

एक वो जिसमें मीडिया संस्थान की लाभ-हानि का सवाल ही नहीं होता, दूसरी वो जिससे मीडिया संस्थान का कोई राजनीतिक या आर्थिक हित सधता है और तीसरी वो जो राजनीतिक-आर्थिक लाभ सधने की आस टूटने के बाद प्रकाशित-प्रसारित होती है.

यक़ीन मानिए कि असल में जो ख़बर है, वो नदारद है. कुछ अपवाद हो सकते हैं. लेकिन वो सिर्फ़ अपवाद हैं.

मीडिया पर समाज अब भी बहुत भरोसा करता है. लेकिन मीडिया क्या इसको बरकरार रख पा रहा है?

शायद नहीं. ये एक मामला गवाह है. इससे पहले राडिया के टेप ने कई गवाहियाँ दी थीं.

इस समय तो इक़बाल के एक शेर का एक मिसरा याद आता है, "यही अगर कैफ़ियत है तेरी तो फिर किसे ऐतबार होगा"

रोटी तोड़ने का अंदाज़

Neil CurryNeil Curry|गुरुवार, 29 नवम्बर 2012, 13:46

टिप्पणियाँ (4)

ऐसी बहुत सारी चीज़ें है जो विदेशियों को स्थानीय लोगों से अलग करती हैं. ये बात मुझे हमेशा कौतूहल में डालती है कि किसी स्थिति में खुद को ढालने या उससे बचे रहने का फ़ैसला लोग कैसे करते हैं. और शायद दुनिया इसी प्रश्न पर विभाजित भी है.

ये सही है कि कुछ विदेशी स्थानीय संस्कृति में ढलने से बचते हैं. मैंने अपनी यात्राओं के दौरान देखा है कि ब्रितानी और अमरीकी लोग तो स्थानीय संस्कृति में समा जाने के उद्देश्य से पहला क़दम तक नहीं उठाते.

और इस बात का सबसे बड़ा संकेत ये है कि ये लोग अंग्रेज़ी बोलने वाले हिस्से में भी ज़ोर-ज़ोर से बोलते हैं. शायद सिंद्धात ये है कि इससे लोग उन्हें बेहतर ढंग से समझ लेंगे.

और हां एक अन्य ब्रितानी बोझ जो इस ग्रह की बाक़ी प्राणियों पर लादा गया है वो है -अधेड़ मर्दों का दूसरों को सैंडल के साथ लंबे मौज़े पहनने पर मजबूर करना.

आह! और फिर वो खान-पान की आदतें.

मेरा मतलब आपने दिल्ली, रोम, मैक्सिको सिटी या सिडनी में कितने अमरीकियों को मैक्डोनाल्ड या केएफ़सी में देखा है? बहुतों को ना?

लेकिन मुझे ये कहना पड़ेगा कि ब्रिटेन आने वाला एक औसत भारतीय पर्यटक भारतीय रेस्तरां ही खोजता है और पब में भी उसे भारतीय व्यंजन ही चाहिए होते हैं.

व्यक्तिगत तौर में जिस जगह जाता हूं वहीं के खाने को अपना लेता हूं. और मुझे ये यात्रा का सबसे अच्छा पहलू लगता है. हां, इस आदत की वजह से आपकी प्लेट में नाइजीरिया में बैल के पैरों का शोरबा हो सकता है!

खुद को दूसरी जगहों के खान-पान में ढालने में सबसे बड़ा सहायक होता है खाना मूंह तक पहुंचाने के स्थानीय तरीके के इस्तेमाल से.

तो जनाब हाल के दिनों में मेरे सर पर रोटी तोड़ने की तकनीक में दक्ष होने का जुनून छाया है. क्योंकि भारत में लगभग हर विदेशी रोटी को दो हाथों से तोड़ता है, जैसे वो किसी कागज़ को फाड़ रहा हो.

मैं तो यही कहूंगा कि मुझे ये तरीका काफी भद्दा लगता है लेकिन हो सकता है कि मैं ग़लत होऊं.

बहरहाल मैं दिल्ली में अपने दफ़्तर के साथियों के खान-पान को देखता रहा हूं. और अब हम इस बारे में सार्वजनिक रूप से बात करते हैं. इसी के आधार पर मुझे लगता है कि रोटी एक हाथ से तोड़ने के कई तरीके हो सकते हैं.


तो बीते शुक्रवार मेरा सामना एक, दो और तीन उंगलियों से रोटी तोड़ने के तरीके से हुआ. और हां एक आधुनिक तरीके से भी जिसमें छोटी उंगली के रोटी में धंसा दिया जाता है.

अब बड़े ही सलीके से रोटी तोड़ने वाले एक सहयोगी का क़िस्सा. इनके बचपन की सबसे बड़ी टेंशन दरअसल रोटी तोड़ने का तरीका ही थी.

इन जनाब को रोटी तोड़ने के लिए दोनों हाथों का इस्तेमाल करना भाता था लेकिन इनके पिताश्री उन्हें एक हाथ से रोटी तोड़ने वाला बनाने के प्रति दृढ़संकल्प थे.

अब मैं कुछ ज्यादा ही जुनूनी दिख रहा होउंग लेकिन मुझे सलीके से, एक दुरुस्त आकार में तोड़ी गई रोटी देखना बहुत अच्छा लगता है.

और मैं अब इसी की खोज में हूं - मैं रोटी को बेहतरीन ढंग से तोड़ने की किसी भी तकनीक या टिप का स्वीकार करने के लिए तैयार बैठा हूं.

तो क्या है आपकी रोटी तोड़ने की बेहतरीन तकनीक?

क्यो दी कसाब को फाँसी?

सुशील झासुशील झा|गुरुवार, 22 नवम्बर 2012, 14:11

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इससे पहले कि 26 नवंबर 2012 को मुंबई हमलों का सालाना जलसा शुरु होता, इन हमलों के दोषी अजमल कसाब को चुपके-चुपके सबेरे-सबेरे यरवदा जेल में फांसी दे दी गई.

ख़बर देखी और सोशल मी़डिया पर लोगों की टिप्पणियां देखने के दौरान जॉर्ज ऑरवेल की लिखी कहानी 'शूटिंग द एलिफ़ेंट' बार-बार याद आई.

बात पुरानी है ऑरवेल उन दिनों पुलिस अधिकारी थे बर्मा में. बर्मा के लोग ऑरवेल से घृणा करते थे. इसी दौरान एक हाथी के पागल होने की खबर आई और ऑरवेल हाथी को देखने पहुंचे. ऑरवेल के पीछे करीब दो हज़ार लोग. खेत में हाथी, सामने हाथ में बंदूक लिए ऑरवेल और पीछे हज़ारों लोग. ऑरवेल लिखते हैं कि वो हाथी को मारना नहीं चाहते थे लेकिन उन्हें डर था कि अगर उन्होंने हाथी को नहीं मारा तो लोग उन पर हंसेंगे.

गोली चली और हाथी मारा गया.

कसाब भी मुझे ऑरवेल की कहानी का हाथी लगता है. जो जेल में पड़ा हुआ था और पड़े रहने में कोई बुराई नहीं थी. लेकिन सरकार डर रही थी लोगों के हंसने से. कहीं सरकार का मज़ाक न उड़ाया जाए, सॉफ्ट स्टेट न कहा जाए. इसी डर और भ्रम में हाथी को फांसी दे दी गई.

मुझे पता है कि तथाकथित देशभक्त लोगों को लगेगा कि मैं पागलपन की बात कर रहा हूं.

ऐसे लोगों को एक और स्थिति बताता हूं.

किसी ने ट्विटर पर लिखा कि सोचिए बीस साल के बाद कसाब यरवदा जेल में सूत कात रहा होता और उस सूत से बना कुर्ता पाकिस्तान के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को भेंट किया गया होता.

सोचिए कि कसाब टीवी चैनलों पर सूत कातते हुए कहता कि मैं आज भी पश्चाताप कर रहा हूं लोग मुझे माफ करें.

सोचिए वो कितनी बड़ी नैतिक जीत होती भारतीय मूल्यों की पूरी दुनिया में. लेकिन ऐसा करने के लिए सरकारों के पास सोच और दृष्टि चाहिए जो शायद ही मिलती है.

डरपोक सरकारें ऐसी ही होती हैं. जो जनता की आलोचना से, जनता की हंसी से और जनता के मजाक से भी डरती है.

और रहा सवाल जनता का तो जनता का काम है हंसना. जनता ने तो कब का सोचना छोड़ दिया है. सही किया जाता था रोम में, जब माहौल परेशानी का हो, कष्ट का हो, तो ग्लैडिएटर खेल कराए जाते थे ताकि जनता उन्माद में डूब जाए.

भ्रष्टाचार और मंहगाई से त्रस्त जनता को उन्माद की अच्छी दवा मिली है तो फिर देर किस बात की है, आप भी कहिए, "कसाब को सार्वजनिक फांसी दी जानी चाहिए थी."

क्यो दी कसाब को फाँसी?

सुशील झासुशील झा|गुरुवार, 22 नवम्बर 2012, 14:11

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इससे पहले कि 26 नवंबर 2012 को मुंबई हमलों का सालाना जलसा शुरु होता, इन हमलों के दोषी अजमल कसाब को चुपके-चुपके सबेरे-सबेरे यरवदा जेल में फांसी दे दी गई.

ख़बर देखी और सोशल मी़डिया पर लोगों की टिप्पणियां देखने के दौरान जॉर्ज ऑरवेल की लिखी कहानी 'शूटिंग द एलिफ़ेंट' बार-बार याद आई.

बात पुरानी है ऑरवेल उन दिनों पुलिस अधिकारी थे बर्मा में. बर्मा के लोग ऑरवेल से घृणा करते थे. इसी दौरान एक हाथी के पागल होने की खबर आई और ऑरवेल हाथी को देखने पहुंचे. ऑरवेल के पीछे करीब दो हज़ार लोग. खेत में हाथी, सामने हाथ में बंदूक लिए ऑरवेल और पीछे हज़ारों लोग. ऑरवेल लिखते हैं कि वो हाथी को मारना नहीं चाहते थे लेकिन उन्हें डर था कि अगर उन्होंने हाथी को नहीं मारा तो लोग उन पर हंसेंगे.

गोली चली और हाथी मारा गया.

कसाब भी मुझे ऑरवेल की कहानी का हाथी लगता है. जो जेल में पड़ा हुआ था और पड़े रहने में कोई बुराई नहीं थी. लेकिन सरकार डर रही थी लोगों के हंसने से. कहीं सरकार का मज़ाक न उड़ाया जाए, सॉफ्ट स्टेट न कहा जाए. इसी डर और भ्रम में हाथी को फांसी दे दी गई.

मुझे पता है कि तथाकथित देशभक्त लोगों को लगेगा कि मैं पागलपन की बात कर रहा हूं.

ऐसे लोगों को एक और स्थिति बताता हूं.

किसी ने ट्विटर पर लिखा कि सोचिए बीस साल के बाद कसाब यरवदा जेल में सूत कात रहा होता और उस सूत से बना कुर्ता पाकिस्तान के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को भेंट किया गया होता.

सोचिए कि कसाब टीवी चैनलों पर सूत कातते हुए कहता कि मैं आज भी पश्चाताप कर रहा हूं लोग मुझे माफ करें.

सोचिए वो कितनी बड़ी नैतिक जीत होती भारतीय मूल्यों की पूरी दुनिया में. लेकिन ऐसा करने के लिए सरकारों के पास सोच और दृष्टि चाहिए जो शायद ही मिलती है.

डरपोक सरकारें ऐसी ही होती हैं. जो जनता की आलोचना से, जनता की हंसी से और जनता के मजाक से भी डरती है.

और रहा सवाल जनता का तो जनता का काम है हंसना. जनता ने तो कब का सोचना छोड़ दिया है. सही किया जाता था रोम में, जब माहौल परेशानी का हो, कष्ट का हो, तो ग्लैडिएटर खेल कराए जाते थे ताकि जनता उन्माद में डूब जाए.

भ्रष्टाचार और मंहगाई से त्रस्त जनता को उन्माद की अच्छी दवा मिली है तो फिर देर किस बात की है, आप भी कहिए, "कसाब को सार्वजनिक फांसी दी जानी चाहिए थी."

क्यो दी कसाब को फाँसी?

सुशील झासुशील झा|गुरुवार, 22 नवम्बर 2012, 14:11

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इससे पहले कि 26 नवंबर 2012 को मुंबई हमलों का सालाना जलसा शुरु होता, इन हमलों के दोषी अजमल कसाब को चुपके-चुपके सबेरे-सबेरे यरवदा जेल में फांसी दे दी गई.

ख़बर देखी और सोशल मी़डिया पर लोगों की टिप्पणियां देखने के दौरान जॉर्ज ऑरवेल की लिखी कहानी 'शूटिंग द एलिफ़ेंट' बार-बार याद आई.

बात पुरानी है ऑरवेल उन दिनों पुलिस अधिकारी थे बर्मा में. बर्मा के लोग ऑरवेल से घृणा करते थे. इसी दौरान एक हाथी के पागल होने की खबर आई और ऑरवेल हाथी को देखने पहुंचे. ऑरवेल के पीछे करीब दो हज़ार लोग. खेत में हाथी, सामने हाथ में बंदूक लिए ऑरवेल और पीछे हज़ारों लोग. ऑरवेल लिखते हैं कि वो हाथी को मारना नहीं चाहते थे लेकिन उन्हें डर था कि अगर उन्होंने हाथी को नहीं मारा तो लोग उन पर हंसेंगे.

गोली चली और हाथी मारा गया.

कसाब भी मुझे ऑरवेल की कहानी का हाथी लगता है. जो जेल में पड़ा हुआ था और पड़े रहने में कोई बुराई नहीं थी. लेकिन सरकार डर रही थी लोगों के हंसने से. कहीं सरकार का मज़ाक न उड़ाया जाए, सॉफ्ट स्टेट न कहा जाए. इसी डर और भ्रम में हाथी को फांसी दे दी गई.

मुझे पता है कि तथाकथित देशभक्त लोगों को लगेगा कि मैं पागलपन की बात कर रहा हूं.

ऐसे लोगों को एक और स्थिति बताता हूं.

किसी ने ट्विटर पर लिखा कि सोचिए बीस साल के बाद कसाब यरवदा जेल में सूत कात रहा होता और उस सूत से बना कुर्ता पाकिस्तान के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को भेंट किया गया होता.

सोचिए कि कसाब टीवी चैनलों पर सूत कातते हुए कहता कि मैं आज भी पश्चाताप कर रहा हूं लोग मुझे माफ करें.

सोचिए वो कितनी बड़ी नैतिक जीत होती भारतीय मूल्यों की पूरी दुनिया में. लेकिन ऐसा करने के लिए सरकारों के पास सोच और दृष्टि चाहिए जो शायद ही मिलती है.

डरपोक सरकारें ऐसी ही होती हैं. जो जनता की आलोचना से, जनता की हंसी से और जनता के मजाक से भी डरती है.

और रहा सवाल जनता का तो जनता का काम है हंसना. जनता ने तो कब का सोचना छोड़ दिया है. सही किया जाता था रोम में, जब माहौल परेशानी का हो, कष्ट का हो, तो ग्लैडिएटर खेल कराए जाते थे ताकि जनता उन्माद में डूब जाए.

भ्रष्टाचार और मंहगाई से त्रस्त जनता को उन्माद की अच्छी दवा मिली है तो फिर देर किस बात की है, आप भी कहिए, "कसाब को सार्वजनिक फांसी दी जानी चाहिए थी."

क्यो दी कसाब को फाँसी?

सुशील झासुशील झा|गुरुवार, 22 नवम्बर 2012, 14:11

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इससे पहले कि 26 नवंबर 2012 को मुंबई हमलों का सालाना जलसा शुरु होता, इन हमलों के दोषी अजमल कसाब को चुपके-चुपके सबेरे-सबेरे यरवदा जेल में फांसी दे दी गई.

ख़बर देखी और सोशल मी़डिया पर लोगों की टिप्पणियां देखने के दौरान जॉर्ज ऑरवेल की लिखी कहानी 'शूटिंग द एलिफ़ेंट' बार-बार याद आई.

बात पुरानी है ऑरवेल उन दिनों पुलिस अधिकारी थे बर्मा में. बर्मा के लोग ऑरवेल से घृणा करते थे. इसी दौरान एक हाथी के पागल होने की खबर आई और ऑरवेल हाथी को देखने पहुंचे. ऑरवेल के पीछे करीब दो हज़ार लोग. खेत में हाथी, सामने हाथ में बंदूक लिए ऑरवेल और पीछे हज़ारों लोग. ऑरवेल लिखते हैं कि वो हाथी को मारना नहीं चाहते थे लेकिन उन्हें डर था कि अगर उन्होंने हाथी को नहीं मारा तो लोग उन पर हंसेंगे.

गोली चली और हाथी मारा गया.

कसाब भी मुझे ऑरवेल की कहानी का हाथी लगता है. जो जेल में पड़ा हुआ था और पड़े रहने में कोई बुराई नहीं थी. लेकिन सरकार डर रही थी लोगों के हंसने से. कहीं सरकार का मज़ाक न उड़ाया जाए, सॉफ्ट स्टेट न कहा जाए. इसी डर और भ्रम में हाथी को फांसी दे दी गई.

मुझे पता है कि तथाकथित देशभक्त लोगों को लगेगा कि मैं पागलपन की बात कर रहा हूं.

ऐसे लोगों को एक और स्थिति बताता हूं.

किसी ने ट्विटर पर लिखा कि सोचिए बीस साल के बाद कसाब यरवदा जेल में सूत कात रहा होता और उस सूत से बना कुर्ता पाकिस्तान के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को भेंट किया गया होता.

सोचिए कि कसाब टीवी चैनलों पर सूत कातते हुए कहता कि मैं आज भी पश्चाताप कर रहा हूं लोग मुझे माफ करें.

सोचिए वो कितनी बड़ी नैतिक जीत होती भारतीय मूल्यों की पूरी दुनिया में. लेकिन ऐसा करने के लिए सरकारों के पास सोच और दृष्टि चाहिए जो शायद ही मिलती है.

डरपोक सरकारें ऐसी ही होती हैं. जो जनता की आलोचना से, जनता की हंसी से और जनता के मजाक से भी डरती है.

और रहा सवाल जनता का तो जनता का काम है हंसना. जनता ने तो कब का सोचना छोड़ दिया है. सही किया जाता था रोम में, जब माहौल परेशानी का हो, कष्ट का हो, तो ग्लैडिएटर खेल कराए जाते थे ताकि जनता उन्माद में डूब जाए.

भ्रष्टाचार और मंहगाई से त्रस्त जनता को उन्माद की अच्छी दवा मिली है तो फिर देर किस बात की है, आप भी कहिए, "कसाब को सार्वजनिक फांसी दी जानी चाहिए थी."

एक टुच्ची सी आत्मकथा

अविनाश दत्तअविनाश दत्त|बुधवार, 21 नवम्बर 2012, 17:03

टिप्पणियाँ (11)

हुआ यूं कई कि साल पहले अपनी करारी जवानी के दिनों में मैं मार्केटिंग का काम करता था. मुंबई में कंप्यूटर बेचता था. बेचते-बेचते लगा कि बहुत हुआ यार, ज़िन्दगी खराब हुई जा रही है घूस दे दे कर.
सो एक दिन अचानक बोरिया बिस्तरा बांधा और जा पहुंचे एक अखबार के दफ्तर में जहाँ किसी दोस्त ने नौकरी दिलवाई थी. यूं तो वो सड़ियल सा अखबार था और तनख्वाह भी मरियल थी लेकिन हम भी कौन से बड़े तीस मार खां थे सो कर ली.
तो यूं मैं पत्रकार हो चला. ना मैं यूपीएससी फेल हो कर आया, ना ही मैं समाज को बदलने और सच का सिपाही बनने.
लगा लोगों से मिलने-जुलने गपियाने का शौक है, घूमने फिरने के पैसे और कहाँ मिलेंगे तो यही धंधा बढ़िया है. पर दस से ज़्यादा सालों और कई नौकरियों के बाद अब जा कर डर लग रहा है कि बेटेराम कहीं पासा उलटा ना पड़ जाये.
आये थे मन के राजा बनने लेकिन कहीं ऐसा ना हो कि रक्कासा बन जाएँ कि जिसकी जेब में पैसे हों उसी पर हर अदा निछावर करनी पड़े. या कहो कि भैंस बन जाएँ कि जिसके हाथ में लाठी हो उसके पीछे-पीछे बंधे चले जाओ.
हो सकता है यह करना पड़े. करना ही पड़ेगा क्योंकि बीबीसी अपने बाप की नहीं है. कहीं टीवी या अखबार में बाहर जा कर नौकरी करना पड़े तो बेशक यही करूँगा और अपनी ताकत भर करूँगा क्योंकि वेतन चाहिए. मेरे एक प्यारे दोस्त ने मुझे एक नगीना दिया था मेरी छाती में जड़ा है कि बेटे नाचो तो घुंघरू बाँध कर.
बाल ठाकरे जी सिधार जायेगें तो कम से कम उस दिन तो उनको भावुक हो कर याद करना ही पड़ेगा. क्योंकि उनके मध्यमवर्गीय समर्थकों के पास पैसा है और उनके दूसरे भक्तों के पास लाठी.
कल को नरेन्द्र जी मोदी जी लश्कर चल निकला तो फिर यही तर्क होगा की वो हरदिल अज़ीज़ हैं, विकास के पुरोधा और करोड़ों दिलों की धड़कन हैं.
पाकिस्तान में होउंगा तो हाफ़िज़ जी सईद को भजना पड़ेगा. कहना होगा आदमी अलग है उसकी राजनीति अलग. उन्होंने कितने भले और मज़े के काम किए थे, वो निजी ज़िन्दगी में बड़े यारबाज़ थे.
क्यों कि हर दिल अज़ीज़ होने का पैमाना अगर सबसे बड़ा हो गया तो तय है कि इस पैमाने में पत्रकारिता को डूब कर मरना ही होगा.
और जब पत्रकारिता का जहाज़ डूबेगा तो मेरे जैसे चूहे डूबने की जगह कूदेंगे और बाज़ार के, दर्शकों की पसंद के, सदा तैरते रहने वाले तख्तों पर चढ़ जायेगें और रोटियाँ कुतरेंगें, खुद पलेगें और बाल बच्चों को भी पालेंगे.
कुछ चूहे तो कूद भी गए हैं. मैं उन पर हंस नहीं रहा. डर रहा हूँ और डरते डरते ऐसा ही कोई तख्ता तलाश भी रहा हूँ.

भारतीय पुरुषों के पाँव

Neil CurryNeil Curry|सोमवार, 19 नवम्बर 2012, 07:35

टिप्पणियाँ (6)

महान पत्रकारिता को जो चीज़ आम पत्रकारिता से अलग करती है वो उसमे उकेरी छवियाँ या शब्दों के बिंब. ख़बरों में कैद शब्द आपके मन पर जड़ जाते हैं और फिर दिनों, हफ़्तों, सालों तक आपके मन के भीतर संभले रहते हैं.
ऐसा ही कुछ मुझे मिला चंद रोज़ पहले, दिल्ली के लोधी गार्डन में घूमते हुए. लोधी गार्डन शर्तिया दुनिया के सबसे खूबसूरत सार्वजनिक बगीचों में से एक है.
खैर, मूल बात यह है कि उस रोज़ एक चर्चित अंग्रेजी अखबार में एक खेल पत्रकार का लिखा हुआ कमाल का लेख पढ़ा. ठीक वही शब्दों का जादू जिसका ज़िक्र मैंने किया.
उस लेख में इस बात का ज़िक्र था कि इन सज्जन ने एक टेनिस का मैच देखा और उन्हें वो ज़रा भी पसंद नहीं आया.
जैसा की होता है, डेविस कप में भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच एक मैच में दो खिलाड़ी भिड़े.
खेल पेचीदा था.
भारत के एक युवा खिलाड़ी ने एक उलटे-सीधे, लड़खड़ाते, सड़ियल सर्विसों और गड़बड़ बैकहैण्ड से भरपूर प्रदर्शन में पांच सैटों के मैच को जीत लिया.
बकौल लेखक, न्यूज़ीलैंड के खिलाड़ी को देख कर उन्हें ऐसा अहसास हुआ कि वो भला आदमी घर पर घोडे़ बेच सो रहा था कि अचानक अलार्म बजा वो हड़बड़ा कर उठा, भागते हुए हवाई ज़हाज़ में घुसा और बेचारा वहां से निकल ही नहीं पाया. ग़रीब खेला बस खेलने के लिए.
खैर, लेखक की जिस बात ने मुझे धर दबोचा वो था भारतीय खिलाड़ी के बारे में किया गया उसका वर्णन. लिखने वाले ने कमाल की तस्वीर खींची थी कि किस तरह से भारतीय खिलाड़ी को उस बेचारे दुर्भाग्य के मारे न्यूजीलैंड के खिलाड़ी को हराने संघर्ष करना पड़ा.
पढ़ कर मालूम हुआ कि सारा मसला भारतीय खिलाड़ी के पाँवो में था.
लेखक, ने यहीं बात ख़त्म नहीं की. उसने कहा की भारतीय टेनिस की सबसे बड़ी समस्या "पाँव" हैं. उसका कहना था कि भारतीय खिलाड़ियों के पास "दुनिया में सबसे उम्दा हाथ हैं लेकिन दुनिया में सबसे घटिया पाँव."
बस यह बात टंक गयी मेरे मन में और उस रोज़ लोधी गार्डन में घूमते हुए मुझे अचानक वहां टहलते मर्दों के केवल पाँव दिखने लगे.
यह घूमते, सरकते लुड़कते पुड़कते और यदा कदा दौड़ते दक्षिणी दिल्ली के लोग थे.
यकीन जानिये एक भी तराशी हुई मज़बूत दिखने वाली पिंडली पर मेरी निगाह नहीं पड़ी. हाँ, यह ज़रूर हुआ कि पांवो पर किस्म-किस्म की अलग-अलग जगहों पर बंधी हुई पट्टियां ज़रूर दिखीं.
मैं यह मानता हूँ कि दक्षिण दिल्ली में रहने वाले वो लोग जो ज़्यादातर अपने बैठकखाने से लेकर घर के चौके तक ही चक्कर लगते हैं उनके पांवों के देख कर कर मैं आम भारतीय के पाँवो का अंदाज़ नहीं लगा सकता.
लेकिन मैं तय नहीं कर पा रहा हूँ कि माजरा क्या है.
क्या भारतीय पुरुषों के पांवों में दिक्कत है या फिर यह मसला केवल भारतीय टेनिस खिलाडियों तक ही सीमित है.

एक विभाजित देश

ज़ुबैर अहमदज़ुबैर अहमद|सोमवार, 05 नवम्बर 2012, 12:50

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राष्ट्रपति पद के चुनाव की कवरेज के लिए मैं डेढ़ साल के बाद अमरीका लौटा हूं.

मुझे ये अच्छी तरह अंदाज़ा था की ये देश दो भाग में बंटा हुआ है. एक उदार दृष्टिकोण रखने वाले यानी डेमोक्रेट्स और दूसरे रूढ़िवादी यानी रिपब्लिकन्स.

अगर विचारधारा की कोई कल्पनात्मक रेखा देश के नक़्शे पर खींची जाए दो दोनों ख़ेमे आधे में बंट सकते हैं.
इस दफ़ा मैं जब यहाँ आया तो ये देख कर हैरानी हुई कि ये दोनों ख़ेमे न केवल एक दूसरे के प्रतिद्वंदी हैं बल्कि ऐसा मालूम होता है एक दूसरे की बात भी नहीं सुनते. बीच के रास्ते पर चलने वालों को चिराग़ ले कर ढूंढना पड़ेगा.

बाहर से शायद लोगों को अंदाज़ा नहीं कि इस देश का समाज कितना विभाजित है.

तूफ़ान सैंडी के दौरान राष्ट्रपति बराक ओबामा और राष्ट्रपति पद के रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी ने, जिनकी एक आँख मंगल के चुनाव पर थी, इस बात पर ज़ोर दिया कि त्रासदी के समय सारे अमरीकी एक जुट हो जाते हैं, सब मिलकर काम करते हैं.

राष्ट्रपति ओबामा ने कहा कि कोई रिपब्लिकन नहीं, कोई डेमोक्रेट नहीं सब अमरीकी हैं.

लेकिन उन्हीं दिनों मैं आम जनता के बीच और इन पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच घूम रहा था. मुझे अमरीकी एकता कहीं नज़र नहीं आई.

कहा जाता है की अमरीका के पिछले सौ वर्ष के इतिहास में देश इतना विभाजित नहीं था जितना आज है.
क्या इसके लिए हॉउस ऑफ़ रेप्रेसेनटेटिव यानी संसद के निचले सदन में रिपब्लिकन्स का बहुमत में होना है जिसने बजट पास करने में बाधा डालने की हर मुमकिन कोशिश की और जिसने प्रशासन का पहैया जाम करके रख दिया?

या फिर इसके लिए ज़िम्मेदार ख़ुद बराक ओबामा हैं जो चार साल पहले एक मसीहा बन कर आए थे और जिन्होंने अमरीका में एकता क़ायम करने और एक उज्जवल भविष्य का वादा किया था?

इससे भी अहम सवाल है कि क्या इस विभाजन को कम करने में नाकामी का ख़मियाज़ा बराक ओबामा को भुगतना पड़ेगा?

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो क्या ओबामा हार का मुंह देखेंगे?

ये सवाल डेमोक्रेटिक पार्टी के ख़ेमे में भी दबे शब्दों में उठाये जा रहे हैं.

अगले राष्ट्रपति को आर्थिक संकट और बेरोज़गारी दूर करने जैसी चुनौतियाँ का सामना करना तो होगा ही साथ ही इस बात की भी कोशिश होगी की समाज के विभाजन को कैसे कम किया जाए.

मैंने इरोम को नहीं देखा

सुशील झासुशील झा|सोमवार, 05 नवम्बर 2012, 12:29

टिप्पणियाँ (14)

मैंने इरोम को नहीं देखा. मैंने देखी है एक तस्वीर. उलझे बाल. नाक में पाइप. फूली हुई आंखें. लेकिन चेहरे पर एक अजीबोगरीब दृढता मानो हिमालय टकराए तो चूर चूर हो जाए.

एक और तस्वीर जो ज़ेहन में बार बार उभरती है जब कभी उत्तर पूर्व के बारे में सोचता हूं. कई निर्वस्त्र औरतें विरोध करतीं. ये सुरक्षा बलों के अत्याचारों का विरोध कर रही थीं. कोई औरत किसी मुद्दे के लिए अपने कपड़े उतार दे. ऐसा न पहले देखा था न सुना था.

अखबारों की रद्दी में कहीं दब गई है वो तस्वीर भी वैसे ही जैसे राजनीतिक आरोप- प्रत्यारोप में दब जाते हैं असल मुद्दे. असल लोग, आम आदमी और उसका असल विरोध.

रह जाते हैं बयान. पश्चाताप और इधर उधर बिखरे कुछ पन्ने जो हर साल पढ़े जाते हैं. याद किए जाते हैं. जिन पर ब्लॉग लिखे जाते हैं और कोई टटपूंजिया नारा दिया जाता है कि इरोम तुम संघर्ष करो.

इरोम के साथ संघर्ष करने की ज़रुरत किसी को नहीं है. इरोम अकेले काफी है. 12 साल से वो लगातार संघर्ष कर रही है. सरकार कहती है कि वो शर्मिंदा है. (बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लै ने यही कहा था कि इरोम की भूख हड़ताल सरकार के लिए शर्मिंदगी का कारण है)

बात सही है शर्मिंदा सरकारें कदम नहीं उठातीं. अपनी शर्मिंदगी के बोझ में लोगों को मरने के लिए छोड़ देती है.

इरोम ने 12 साल पहले आज के ही दिन ये संघर्ष शुरु किया था. हो सकता है कि 2024 में भी कोई लिखे कि ठीक 24 साल पहले इरोम ने इसी दिन संघर्ष शुरु किया था.

मैं इरोम जैसे लोगों से डरता हूं. उनकी दृढ़ प्रतिज्ञा से डरता हूं. पता नहीं सरकार क्यों नहीं डरती है. सरकार को शर्मिदा होने की बजाय डरना चाहिए. कहीं देश के और लोग भी इरोम शर्मिला न हो जाएं.

लिखते लिखते याद आया अतुल्य भारत (incredible India) के प्रचार में पूर्वोत्तर छाया रहता है....लेकिन पता नहीं इस अतुल्य भारत में इरोम की जगह है या नहीं.

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