क्यो दी कसाब को फाँसी?
इससे पहले कि 26 नवंबर 2012 को मुंबई हमलों का सालाना जलसा शुरु होता, इन हमलों के दोषी अजमल कसाब को चुपके-चुपके सबेरे-सबेरे यरवदा जेल में फांसी दे दी गई.
ख़बर देखी और सोशल मी़डिया पर लोगों की टिप्पणियां देखने के दौरान जॉर्ज ऑरवेल की लिखी कहानी 'शूटिंग द एलिफ़ेंट' बार-बार याद आई.
बात पुरानी है ऑरवेल उन दिनों पुलिस अधिकारी थे बर्मा में. बर्मा के लोग ऑरवेल से घृणा करते थे. इसी दौरान एक हाथी के पागल होने की खबर आई और ऑरवेल हाथी को देखने पहुंचे. ऑरवेल के पीछे करीब दो हज़ार लोग. खेत में हाथी, सामने हाथ में बंदूक लिए ऑरवेल और पीछे हज़ारों लोग. ऑरवेल लिखते हैं कि वो हाथी को मारना नहीं चाहते थे लेकिन उन्हें डर था कि अगर उन्होंने हाथी को नहीं मारा तो लोग उन पर हंसेंगे.
गोली चली और हाथी मारा गया.
कसाब भी मुझे ऑरवेल की कहानी का हाथी लगता है. जो जेल में पड़ा हुआ था और पड़े रहने में कोई बुराई नहीं थी. लेकिन सरकार डर रही थी लोगों के हंसने से. कहीं सरकार का मज़ाक न उड़ाया जाए, सॉफ्ट स्टेट न कहा जाए. इसी डर और भ्रम में हाथी को फांसी दे दी गई.
मुझे पता है कि तथाकथित देशभक्त लोगों को लगेगा कि मैं पागलपन की बात कर रहा हूं.
ऐसे लोगों को एक और स्थिति बताता हूं.
किसी ने ट्विटर पर लिखा कि सोचिए बीस साल के बाद कसाब यरवदा जेल में सूत कात रहा होता और उस सूत से बना कुर्ता पाकिस्तान के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को भेंट किया गया होता.
सोचिए कि कसाब टीवी चैनलों पर सूत कातते हुए कहता कि मैं आज भी पश्चाताप कर रहा हूं लोग मुझे माफ करें.
सोचिए वो कितनी बड़ी नैतिक जीत होती भारतीय मूल्यों की पूरी दुनिया में. लेकिन ऐसा करने के लिए सरकारों के पास सोच और दृष्टि चाहिए जो शायद ही मिलती है.
डरपोक सरकारें ऐसी ही होती हैं. जो जनता की आलोचना से, जनता की हंसी से और जनता के मजाक से भी डरती है.
और रहा सवाल जनता का तो जनता का काम है हंसना. जनता ने तो कब का सोचना छोड़ दिया है. सही किया जाता था रोम में, जब माहौल परेशानी का हो, कष्ट का हो, तो ग्लैडिएटर खेल कराए जाते थे ताकि जनता उन्माद में डूब जाए.
भ्रष्टाचार और मंहगाई से त्रस्त जनता को उन्माद की अच्छी दवा मिली है तो फिर देर किस बात की है, आप भी कहिए, "कसाब को सार्वजनिक फांसी दी जानी चाहिए थी."
