भारतीय पुरुषों के पाँव
महान पत्रकारिता को जो चीज़ आम पत्रकारिता से अलग करती है वो उसमे उकेरी छवियाँ या शब्दों के बिंब. ख़बरों में कैद शब्द आपके मन पर जड़ जाते हैं और फिर दिनों, हफ़्तों, सालों तक आपके मन के भीतर संभले रहते हैं.
ऐसा ही कुछ मुझे मिला चंद रोज़ पहले, दिल्ली के लोधी गार्डन में घूमते हुए. लोधी गार्डन शर्तिया दुनिया के सबसे खूबसूरत सार्वजनिक बगीचों में से एक है.
खैर, मूल बात यह है कि उस रोज़ एक चर्चित अंग्रेजी अखबार में एक खेल पत्रकार का लिखा हुआ कमाल का लेख पढ़ा. ठीक वही शब्दों का जादू जिसका ज़िक्र मैंने किया.
उस लेख में इस बात का ज़िक्र था कि इन सज्जन ने एक टेनिस का मैच देखा और उन्हें वो ज़रा भी पसंद नहीं आया.
जैसा की होता है, डेविस कप में भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच एक मैच में दो खिलाड़ी भिड़े.
खेल पेचीदा था.
भारत के एक युवा खिलाड़ी ने एक उलटे-सीधे, लड़खड़ाते, सड़ियल सर्विसों और गड़बड़ बैकहैण्ड से भरपूर प्रदर्शन में पांच सैटों के मैच को जीत लिया.
बकौल लेखक, न्यूज़ीलैंड के खिलाड़ी को देख कर उन्हें ऐसा अहसास हुआ कि वो भला आदमी घर पर घोडे़ बेच सो रहा था कि अचानक अलार्म बजा वो हड़बड़ा कर उठा, भागते हुए हवाई ज़हाज़ में घुसा और बेचारा वहां से निकल ही नहीं पाया. ग़रीब खेला बस खेलने के लिए.
खैर, लेखक की जिस बात ने मुझे धर दबोचा वो था भारतीय खिलाड़ी के बारे में किया गया उसका वर्णन. लिखने वाले ने कमाल की तस्वीर खींची थी कि किस तरह से भारतीय खिलाड़ी को उस बेचारे दुर्भाग्य के मारे न्यूजीलैंड के खिलाड़ी को हराने संघर्ष करना पड़ा.
पढ़ कर मालूम हुआ कि सारा मसला भारतीय खिलाड़ी के पाँवो में था.
लेखक, ने यहीं बात ख़त्म नहीं की. उसने कहा की भारतीय टेनिस की सबसे बड़ी समस्या "पाँव" हैं. उसका कहना था कि भारतीय खिलाड़ियों के पास "दुनिया में सबसे उम्दा हाथ हैं लेकिन दुनिया में सबसे घटिया पाँव."
बस यह बात टंक गयी मेरे मन में और उस रोज़ लोधी गार्डन में घूमते हुए मुझे अचानक वहां टहलते मर्दों के केवल पाँव दिखने लगे.
यह घूमते, सरकते लुड़कते पुड़कते और यदा कदा दौड़ते दक्षिणी दिल्ली के लोग थे.
यकीन जानिये एक भी तराशी हुई मज़बूत दिखने वाली पिंडली पर मेरी निगाह नहीं पड़ी. हाँ, यह ज़रूर हुआ कि पांवो पर किस्म-किस्म की अलग-अलग जगहों पर बंधी हुई पट्टियां ज़रूर दिखीं.
मैं यह मानता हूँ कि दक्षिण दिल्ली में रहने वाले वो लोग जो ज़्यादातर अपने बैठकखाने से लेकर घर के चौके तक ही चक्कर लगते हैं उनके पांवों के देख कर कर मैं आम भारतीय के पाँवो का अंदाज़ नहीं लगा सकता.
लेकिन मैं तय नहीं कर पा रहा हूँ कि माजरा क्या है.
क्या भारतीय पुरुषों के पांवों में दिक्कत है या फिर यह मसला केवल भारतीय टेनिस खिलाडियों तक ही सीमित है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
पता नहीं नील क्या लिखना चाह रहे थे, या फिर उनका मकसद मजाक उड़ाना था. नील आपको मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है.
भारत में खेलों को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता जितना यूरोप और अमरीका में, हालाँकि भारत में बदलाव आ रहे हैं, लेकिन बदलाव की रफ्तार कम है. भारत में बड़ी संख्या में लोगों को अभी भी अच्छा आहार उपलब्ध नहीं है.
आपने वही बात कही है जिसे मैं बहुत समय से देखता रहा हूँ. भारतीयों के पाँव मजबूत नहीं होते. पता नहीं ऐसा क्यों है.
लिखते तो आप भी अच्छा हैं. भारत के बारे में इतनी पैनी नजर काबिले तारीफ है मगर मेरा भारतीय मन इससे इत्तेफाक नहीं रखता क्योंकि बहुत से कारण हैं, और सबसे बड़ा कारण ये कि मैं भी एक भारतीय हूँ.
बिल्कुल सही सर. सिर्फ टेनिस खिलाड़ियों और दिल्ली के लोगों का ही नहीं, सभी का यही हाल है.
भाई साहब, ये एक मजाक है या फिर आपने ये शोध किया है?