एक विभाजित देश
राष्ट्रपति पद के चुनाव की कवरेज के लिए मैं डेढ़ साल के बाद अमरीका लौटा हूं.
मुझे ये अच्छी तरह अंदाज़ा था की ये देश दो भाग में बंटा हुआ है. एक उदार दृष्टिकोण रखने वाले यानी डेमोक्रेट्स और दूसरे रूढ़िवादी यानी रिपब्लिकन्स.
अगर विचारधारा की कोई कल्पनात्मक रेखा देश के नक़्शे पर खींची जाए दो दोनों ख़ेमे आधे में बंट सकते हैं.
इस दफ़ा मैं जब यहाँ आया तो ये देख कर हैरानी हुई कि ये दोनों ख़ेमे न केवल एक दूसरे के प्रतिद्वंदी हैं बल्कि ऐसा मालूम होता है एक दूसरे की बात भी नहीं सुनते. बीच के रास्ते पर चलने वालों को चिराग़ ले कर ढूंढना पड़ेगा.
बाहर से शायद लोगों को अंदाज़ा नहीं कि इस देश का समाज कितना विभाजित है.
तूफ़ान सैंडी के दौरान राष्ट्रपति बराक ओबामा और राष्ट्रपति पद के रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी ने, जिनकी एक आँख मंगल के चुनाव पर थी, इस बात पर ज़ोर दिया कि त्रासदी के समय सारे अमरीकी एक जुट हो जाते हैं, सब मिलकर काम करते हैं.
राष्ट्रपति ओबामा ने कहा कि कोई रिपब्लिकन नहीं, कोई डेमोक्रेट नहीं सब अमरीकी हैं.
लेकिन उन्हीं दिनों मैं आम जनता के बीच और इन पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच घूम रहा था. मुझे अमरीकी एकता कहीं नज़र नहीं आई.
कहा जाता है की अमरीका के पिछले सौ वर्ष के इतिहास में देश इतना विभाजित नहीं था जितना आज है.
क्या इसके लिए हॉउस ऑफ़ रेप्रेसेनटेटिव यानी संसद के निचले सदन में रिपब्लिकन्स का बहुमत में होना है जिसने बजट पास करने में बाधा डालने की हर मुमकिन कोशिश की और जिसने प्रशासन का पहैया जाम करके रख दिया?
या फिर इसके लिए ज़िम्मेदार ख़ुद बराक ओबामा हैं जो चार साल पहले एक मसीहा बन कर आए थे और जिन्होंने अमरीका में एकता क़ायम करने और एक उज्जवल भविष्य का वादा किया था?
इससे भी अहम सवाल है कि क्या इस विभाजन को कम करने में नाकामी का ख़मियाज़ा बराक ओबामा को भुगतना पड़ेगा?
दूसरे शब्दों में कहा जाए तो क्या ओबामा हार का मुंह देखेंगे?
ये सवाल डेमोक्रेटिक पार्टी के ख़ेमे में भी दबे शब्दों में उठाये जा रहे हैं.
अगले राष्ट्रपति को आर्थिक संकट और बेरोज़गारी दूर करने जैसी चुनौतियाँ का सामना करना तो होगा ही साथ ही इस बात की भी कोशिश होगी की समाज के विभाजन को कैसे कम किया जाए.
