एक टुच्ची सी आत्मकथा
हुआ यूं कई कि साल पहले अपनी करारी जवानी के दिनों में मैं मार्केटिंग का काम करता था. मुंबई में कंप्यूटर बेचता था. बेचते-बेचते लगा कि बहुत हुआ यार, ज़िन्दगी खराब हुई जा रही है घूस दे दे कर.
सो एक दिन अचानक बोरिया बिस्तरा बांधा और जा पहुंचे एक अखबार के दफ्तर में जहाँ किसी दोस्त ने नौकरी दिलवाई थी. यूं तो वो सड़ियल सा अखबार था और तनख्वाह भी मरियल थी लेकिन हम भी कौन से बड़े तीस मार खां थे सो कर ली.
तो यूं मैं पत्रकार हो चला. ना मैं यूपीएससी फेल हो कर आया, ना ही मैं समाज को बदलने और सच का सिपाही बनने.
लगा लोगों से मिलने-जुलने गपियाने का शौक है, घूमने फिरने के पैसे और कहाँ मिलेंगे तो यही धंधा बढ़िया है. पर दस से ज़्यादा सालों और कई नौकरियों के बाद अब जा कर डर लग रहा है कि बेटेराम कहीं पासा उलटा ना पड़ जाये.
आये थे मन के राजा बनने लेकिन कहीं ऐसा ना हो कि रक्कासा बन जाएँ कि जिसकी जेब में पैसे हों उसी पर हर अदा निछावर करनी पड़े. या कहो कि भैंस बन जाएँ कि जिसके हाथ में लाठी हो उसके पीछे-पीछे बंधे चले जाओ.
हो सकता है यह करना पड़े. करना ही पड़ेगा क्योंकि बीबीसी अपने बाप की नहीं है. कहीं टीवी या अखबार में बाहर जा कर नौकरी करना पड़े तो बेशक यही करूँगा और अपनी ताकत भर करूँगा क्योंकि वेतन चाहिए. मेरे एक प्यारे दोस्त ने मुझे एक नगीना दिया था मेरी छाती में जड़ा है कि बेटे नाचो तो घुंघरू बाँध कर.
बाल ठाकरे जी सिधार जायेगें तो कम से कम उस दिन तो उनको भावुक हो कर याद करना ही पड़ेगा. क्योंकि उनके मध्यमवर्गीय समर्थकों के पास पैसा है और उनके दूसरे भक्तों के पास लाठी.
कल को नरेन्द्र जी मोदी जी लश्कर चल निकला तो फिर यही तर्क होगा की वो हरदिल अज़ीज़ हैं, विकास के पुरोधा और करोड़ों दिलों की धड़कन हैं.
पाकिस्तान में होउंगा तो हाफ़िज़ जी सईद को भजना पड़ेगा. कहना होगा आदमी अलग है उसकी राजनीति अलग. उन्होंने कितने भले और मज़े के काम किए थे, वो निजी ज़िन्दगी में बड़े यारबाज़ थे.
क्यों कि हर दिल अज़ीज़ होने का पैमाना अगर सबसे बड़ा हो गया तो तय है कि इस पैमाने में पत्रकारिता को डूब कर मरना ही होगा.
और जब पत्रकारिता का जहाज़ डूबेगा तो मेरे जैसे चूहे डूबने की जगह कूदेंगे और बाज़ार के, दर्शकों की पसंद के, सदा तैरते रहने वाले तख्तों पर चढ़ जायेगें और रोटियाँ कुतरेंगें, खुद पलेगें और बाल बच्चों को भी पालेंगे.
कुछ चूहे तो कूद भी गए हैं. मैं उन पर हंस नहीं रहा. डर रहा हूँ और डरते डरते ऐसा ही कोई तख्ता तलाश भी रहा हूँ.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
अविनाश जी ज़रा ये भी बताने का कष्ट करें कि आपको तख्ता कब तक मिल जाएगा और बीबीसी खुद किस तख्ते की तलाश कर रही है.
ये आपके ब्लॉग्स में से एक है. बहुत अच्छा लिखा है आपने. धन्यवाद.
अच्छा है, कच्चा है पर सच्चा है. बस कृपा कर यूपीएससी फ़ेल होनेवालों को इतने ताने न मारें. मैंने भी दो बार यूपीएससी की मुख्य परीक्षा दी है. एक का परिणाम अटका है और एक प्रयास अभी बाकी है. पर फेल होनेवालों की लाइन हमेशा बगल में दिखती है तो थोड़ा दुख होता है और आपके ताने से तो दुख दोगुना हो गया.
अविनाश जी आपने बहुत अच्छा लिखा है.
बहुत अच्छा लिखा है और ये बातें बिल्कुल सही हैं.
आपने अच्छा मुद्दा उठाया है. मीडिया और मीडिया वाले भी प्रभावित होते हैं. ये तब ज़ाहिर हुआ जब बाल ठाकरे की मृत्यु पर मीडिया ने उनकी तारीफ में गाने गाए और उन्हें ऐसा कवरेज दिया जैसे वो कोई राष्ट्र नायक हों. उस बात को पूरी तरह छिपा लिया गया कि वो हिंसा और ज़हर में लिपटी सांप्रदायिक, जातिवादी और वर्गवादी राजनीति करते थे.
सचमुच अत्यंत ही टुच्ची है ये आत्मकथा. कभी सोचा नहीं था कि इंडिया बोल पर इतना धाँसू बोलने वाले की आत्मकथा इतनी भी टुच्ची होगी.
करारी जवानी के दिनों में सड़ियल अखबार से शुरू नौकरी के बाद रक्कासा बनने तक का सफ़र....
आत्मकथा की तारीफ़ करना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुकिन।
लिखना है तो कुछ सर्जनात्मक लिखें. कलम फिजूल की बातें लिखने के लिए नहीं होता. आपको पत्रकारिता के बारे में कुछ अंदाज़ा ही नहीं है.
अविनाश जी आपने बहुत अच्छा लिखा है. पर कृपा कर यूपीएससी फ़ेल होनेवालों को इतने ताने न मारें.
अविनाश भाई जिस दर्द से आप गुजर रहे है मैं भी उसी दर्द से रुबरु हूं.बेकारी के आलम में न कोई खोजा और न कोई नौकरी के लिए कड़ी मेहनत की.लिखने पढ़ने के शौक में बस पत्रकार बनने के लिए कदम उठाया.