मनमोहन सिंह का मौन
मनमोहन सिंह अच्छी उर्दू जानते हैं. यहाँ तक कि उनके स्वतंत्रता दिवस के भाषण भी उर्दू में लिखे जाते हैं. अपने कई बजट भाषणों में (जब वह वित्त मंत्री थे), उन्होंने कई बार उर्दू के शेर पढ़े हैं. लेकिन कोयला आवंटन के मुद्दे पर उन्होंने बहुत देर से अपनी चुप्पी तोड़ी और वह भी उर्दू के एक लाजवाब शेर के साथ-
"हज़ारों जवाबों से अच्छी है ख़ामोशी मेरी,
न जाने कितने सवालों की आबरू रखे."
राजनैतिक हल्कों में मनमोहन सिंह के शाँत स्वभाव का सम्मान भी किया जाता है और उसकी खिल्ली भी उड़ाई जाती है. राजनीतिक विरोधियों पर शाब्दिक बाण चलाने के लिए उन्हे कभी नहीं जाना गया. संसद में भी जब कभी कभार नोकझोंक के मौके आते हैं और उन पर व्यक्तिगत हमले भी हो रहे होते हैं तब भी वह चुप रहना ही पसंद करते हैं.
गरमागरम बहस में भी उन्हें हस्तक्षेप करते यदाकदा ही देखा गया है. शायद मनमोहन सिंह को अब तक का सबसे 'चुप्पा' प्रधानमंत्री कहा जाए तो गलत नहीं होगा. उनकी रोबोटनुमा चाल और किसी मुद्दे पर कोई राय न रखने की वजह से अक्सर यह सवाल भी पूछे जाते हैं कि कहीं वह भावनाशून्य इंसान तो नहीं हैं. भारत में अक्सर चुप्पी का मतलब कमजोरी से लगाया जाता है.
मौन रहने वाले व्यक्ति की आम छवि यही बनती है कि उसमें निर्णय लेने की क्षमता नहीं है. एक और प्रधानमंत्री जिन्होंने चुप रहने को एक कला बना दिया था वह थे नरसिम्हा राव. कई मौको पर जब वह कुछ भी बोलना पसंद नहीं करते थे तो अक्सर अपने दोनों होठों को एक खास अंदाज़ में आगे बढ़ा कर 'पाउट' की मुद्रा में गहन चिंतन करते देखे जाते थे. उसकी वजह से उन्हें फ़ैसला लेने का थोड़ा समय भी मिल जाता था और उनके विरोधी भी मुद्दे के प्रति थोड़ा लापरवाह हो जाया करते थे.
नरसिम्हा राव के एक सहयोगी तो यहाँ तक कहा करते थे कि किसी मुद्दे पर कोई फ़ैसला न लेना भी एक फ़ैसला है. भारत में अक्सर प्रधानमंत्री की काबलियत को इस बात से भी आंका जाता है कि वह कितना अच्छा वक्ता है.
प्रणव मुखर्जी ने कई बार स्वीकार किया है कि वह इसलिए प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं हो पाए क्योंकि वह हिंदी के अच्छे वक्ता नहीं हैं. इस मापदंड पर भारत के दो पूर्व प्रधानमंत्री पूरी तरह से खरे उतरते हैं - एक तो जवाहरलाल नेहरू और दूसरे अटल बिहारी वाजपेई.
संसदीय परंपराओं के निर्वाह, ज्वलंतशील मुद्दों पर अपनी राय रखने और विरोधियों को भी अपनी बात कह देने में नेहरू का कोई सानी नहीं था. 1957 में जब वाजपेई पहली बार लोक सभा में चुन कर आए थे तो नेहरू उनसे इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने ऐलान किया कि एक दिन यह व्यक्ति भारत का प्रधानमंत्री बनेगा. लगभग चालीस साल बाद यह बात सच हुई. भारत की राजनीति में आज कितने लोग हैं जो अपने विरोधी के बारे में इतनी ऊँची राय रखते हों, और उससे बढ़ कर उसे सार्वजनिक रूप से कहने की हिम्मत रखते हों.
भाषण देने की कला में अटल बिहारी वाजपेई का कोई सानी नहीं था. भाषण के दौरान एक लंबा ठहराव और फिर एक गूढ़ टिप्पणी या फिर एक मज़ेदार फ़िकरा- इसे वाजपेई से बेहतर कोई नहीं कर सकता था. उनके प्रधानमंत्रित्व काल के आखिरी दिनों में जब लाल कृ्ष्ण आडवाणी का नाम उनके विकल्प के तौर पर लिया जा रहा था तो उन्होंने 'न मैं टायर्ड हूँ और न रिटायर्ड' वाला भाषण दे कर सबको निरुत्तर कर दिया था. लेकिन सिर्फ इस बात पर ही किसी की नेतृत्व क्षमता को नहीं आंका जा सकता कि वह कितना अच्छा वक्ता है. मनमोहन सिंह की 'मौनी बाबा' की अदा को एक बार नजरअंदाज कर भी दिया जाए तब भी उनका राजनीतिक प्राणी न होना और बड़े निर्णय न ले पाना उनके काम में अड़चन जरूर पैदा करता है.
भष्टाचार और घोटालों को बर्दाश्त करने और प्रतिभावान लोगों को आगे न ला पाने की कमजोरी ने उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया है. सोनिया गाँधी के साथ सत्ता में भागीदार होने की मजबूरी ने न सिर्फ उनके हाथ बाँध दिए हैं बल्कि कहीं-कहीं यह आभास भी दिया है कि पार्टी नेतृ्त्व के खिलाफ जाने की न तो उनमें इच्छा शक्ति है और न ही क्षमता.




