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आम आदमी की कौन सुने

सुशील झासुशील झा|शुक्रवार, 03 अगस्त 2012, 17:09 IST

मैंने अन्ना के आंदोलन का कभी समर्थन नहीं किया. आलोचना करता रहा हूं. लेकिन आज लगता है कि कहीं कुछ टूट गया है. कहीं कुछ छूट सा गया है.

जिसका डर था शायद आज वही हुआ है. जिस राजनीति को गालियां दी जा रही थी वही करने की घोषणा हो चुकी है तो फिर लोग ठगे हुए से क्यों न महसूस करें.

असल में आम आदमी कभी अन्ना या आंदोलन के साथ नहीं था. वो हमेशा भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ था और उसे लगता था कि अन्ना के नाम की टोपी लगा लेने से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा.

मुझे पूरी सहानुभूति है उन लोगों से जो समझते थे कि जंतर मंतर पर अनशन करने से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा...उन लोगों से भी जिन्हें लगता था कि भारत माता की जय बोलने से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा.......जो अन्ना के सामने हाथ जोड़ कर ऐसे सर झुका रहे थे मानो वो अन्ना नहीं भगवान का अवतार हों...और सर झुकाने से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा......मुझे उन सभी लोगों से भी सहानुभूति है जो वोट करने नहीं निकले थे लेकिन जंतर मंतर पर आए थे क्योंकि उन्हें आंदोलन से एक उम्मीद जगी थी......इस उम्मीद से मेरी सहानुभूति है..

कई लोगों को लगता है कि अन्ना की टीम ने इस उम्मीद के साथ दगा किया है. कई लोगों को लगता है कि ये एक विश्वासघात है और लोगों को मझधार में छोड़ दिया गया.

रामलीला मैदान में जहां साफ साफ कहा गया कि राजनीति के मैदान में उतरना उद्देश्य नहीं है आंदोलन का. मुझे याद है कि आम जनता ने किस उत्साह से समर्थन दिया था.

कहां तो बात हुई थी कि ये आज़ादी का दूसरा आंदोलन होगा. अगस्त क्रांति यही कहा था न अन्ना ने. कहां बात हुई थी व्यवस्था बदल देने की और आज लगता है अन्ना खुद बदल गए.

आज अन्ना और उनके साथी भी उसी जमात में खड़े होने को चल दिए, जिस जमात को गालियां देते अन्ना टीम की जुबान नहीं थकती थी

वो तालियों की गड़गड़ाहट, वो भारत माता के जयकारे, वो तिरंगे का हिलाना, वो जनता का जुनून और वो टीवी वालों की चीखो पुकार. मुझे तो नहीं लेकिन आम जनता को लगा था कि कुछ तो बदलेगा.


लोग गांवों से पैदल चल कर आए थे आपका समर्थन करने. भूखे प्यासे लोगों ने आपके साथ अनशन भी किया था.

लेकिन फिर क्या हो गया. साल भर में ही ऐसा क्या हो गया कि अन्ना भी उनके साथ ही खड़े होने को राज़ी हो गए. माना कि नेता लोगों के पास पैसे हैं गाड़ी है लेकिन कहते हैं कि अन्ना को तो कुछ नहीं चाहिए.

तो क्या अन्ना के साथ के लोगों को कुछ चाहिए. आम लोगों को भ्रष्टाचार के बिना जीवन चाहिए.

लेकिन शायद गलती आम जनता की थी. वो शायद ये भूल गया था कि आम आदमी आखिरकार आम आदमी ही है और आम आदमी की बात नेता क्या टीम अन्ना भी नहीं सुनती.


मैं मानता हूं कि ये आने वाले दिनों में किसी भी जनांदोलन के लिए एक बड़ा धक्का है. चाहे जो भी हो कम से कम अन्ना के नाम पर लोग अपने घरों से निकले थे. लोगों ने ईमानदार होने की एक छोटी सी कोशिश की भी होगी अपने अपने स्तर पर.

अब वो शायद कभी किसी पर विश्वास न करें और मान लें कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता. मैं नहीं मानूंगा कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता. मैं अपने स्तर पर जो संभव है करुंगा. मैं अपना अन्ना खुद बनूंगा और ईमानदार रहने की हर कोशिश करुंगा.

शायद अब यही एकमात्र रास्ता बचा है हर आम आदमी के लिए कि वो उसके अधिकारों के लिए किसी दूसरे का मुंह देखना बंद कर करे और खुद अपनी राह तय करे.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 11:59 IST, 04 अगस्त 2012 swaraj saurabh:

    आपने एकदम सही कहा कि केजरीवाल, अन्ना, बेदी, ये सभी शुरू से ही राजनीति कर रहे थे. वे जनता को बेवकूफ बना रहे थे. केजरीवाल कहते थे कि अगर जनलोकपाल न आया तो जंतर-मंतर से उनकी लाश ही उठेगी. वो जंतर-मंतर से उठे और नेता बन गए जो कि उनकी असल हसरत थी.

  • 2. 12:54 IST, 04 अगस्त 2012 shishir kumar:

    हर कोई आपकी तरह सोचता है, आप कुछ नया नहीं कह रहे हैं. कोई एक आदमी समाधान के साथ नहीं आता है. हर कोई समस्या पैदा कर रहा है और कहता है देखते हैं कैसे अन्ना और उसकी टीम यह करती है. आप कहते हैं कि लोग अन्ना को भगवान की तरह देखते हैं. मै कहता हूँ कि लोगों को उनसे बहुत उम्मीद है इसलिए ऐसा करते हैं. जब आमिर खान अपने शो ''सत्यमेव जयते'' के साथ आए तो बहुत सारे लोगों ने सवाल उठाए कि वह तो पैसे के लिए काम करते हैं, लोगों से उसे क्या लेना-देना. सब आन्दोलन सफल नहीं होते हैं. तो क्या हमें आवाज़ नहीं उठानी चाहिए? सब कुछ अपने आप नहीं बदल जाएगा, बदलना पड़ेगा. कोई तो बदलने का जरिया होगा. हो सकता है वह अन्ना ही हो. क्या आपको लगता नहीं कि सरकार तानाशाह हो गयी है? क्या अंतर है इनमें और ख़राब राजतंत्र में.

  • 3. 14:46 IST, 04 अगस्त 2012 Aakansha Bariar:

    असल में आम आदमी कभी अन्ना या उनके आंदोलन के साथ नहीं था. वो हमेशा भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ था और उसे लगता था कि अन्ना के नाम की टोपी लगा लेने से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा.
    मैं मानती हूं कि आम आदमी बस भ्रष्टाचार के खिलाफ था इसलिए अन्ना के साथ था. पर ब्लॉगर से पूछना चाहती हूं कि अन्ना के इस फैसले को इस तरह से क्यों देखा जा रहा है कि अब वो भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं रहे? लड़ाई का तरीका बदल लेने से, मकसद बदल जाए ज़रूरी तो नहीं.
    हमें ये समझना होगा कि हर लड़ाई का एक मकसद होता है. टीम अन्ना के आंदोलन और जनता के पुरज़ोर समर्थन को भी अगर ये तानाशाह सरकार अनदेखा कर रही है तो टीम के पास क्या विकल्प बच रहा था? क्या चाहते हैं लोग कि अपना डेडिकेशन साबित करने के लिए केजरीवाल मर जाते तो अच्छा होता? ये सरकार तो इतनी खुदगर्ज़ और दंभ में चूर है कि अनशनकारी मर भी जाएं तो सुध न ले.
    ऐसे में अपने मकसद को हासिल करने के लिए अगर अन्ना ने लड़ाई का तरीका बदलने का फैसला लिया, पार्टी बनाने का ऐलान किया, तो क्या ग़लत किया? हमें उनपर विश्वास रखना होगा, और याद रखना होगा, कि सिर्फ तरीका बदला है, मक़सद नहीं !

  • 4. 16:03 IST, 04 अगस्त 2012 बिन्देश्वर पाण्डेय, बी.एच.यू.:

    सुशील जी, पूरे ब्लॉग को पढ़ने के बाद बचपन के दिनों में पढ़ी गई एक कहानी याद आ गई जिसका शीर्षक था " हार की जीत ". आज बाबा भारती रूपी अन्ना से सरकार रूपी खड़ग सिंह जीत गया है. किन्तु इस कहानी में बाबा का घोड़ा (जनता का विश्वास ) क्या फिर से लौट पाएगा. शायद नहीं. सुशील जी आपने सच कहा है कि ये आने वाले दिनों में किसी भी जनांदोलन के लिए यह बहुत बड़ा धक्का है.

  • 5. 17:08 IST, 04 अगस्त 2012 Sunil Taneja:

    राजनीति गंदी है इसमें कोई शक नहीं. लेकिन गंदगी की सफाई के लिए कुछ साफ-सुथरे लोग उसमें उतर रहे हैं तो हर्ज़ क्या है? क्या आपके पास कोई बेहतर तरीका है जिससे राजनीति से बाहर रहकर ही इसे ठीक कर दिया जाए.

  • 6. 18:53 IST, 04 अगस्त 2012 anita choudhary:

    कमल की चाहत रखते हैं तो कीचड़ में जाना ज़रूरी है. अन्ना का राजनीति में जाना कमज़ोरी नहीं बल्कि समझदारी है क्योंकि अगर आप व्यवस्था बदलना चाहते हैं तो आपको व्यवस्था के भीतर जाना ही होगा.

  • 7. 18:56 IST, 04 अगस्त 2012 varinder:

    गंदगी को साफ़ करने के लिए गंदगी में उतरना ही पडता है जी.

  • 8. 21:31 IST, 04 अगस्त 2012 kamal kumar joshi:

    ये बिल्कुल सच है कि आम आदमी हमेशा ही अन्ना के साथ उतना नहीं था जितना भ्रष्टाचार के विरुद्ध था. अन्ना के विचारों में अचानक परिवर्तन समझ में नहीं आता लेकिन राजनीति से बचकर रहना कितना सही है? मुझे लगता है कि आज की राजनीति इतनी मैली हो गई है कि उसकी सफाई के लिए उसमें उतरना ही होगा. अब ये टीम अन्ना पर निर्भर है कि वो कीचड़ में कमल की तरह रहती है या खुद गंदी हो जाती है. इसका जवाब आनेवाला कल ही दे सकेगा.

  • 9. 22:49 IST, 04 अगस्त 2012 vikas kushwaha:

    तुम्हारे जैसे लोग गालियाँ देने के अलावा और कुछ कर भी नहीं सकते हैं.

  • 10. 23:49 IST, 04 अगस्त 2012 tushar dwivedi:

    ये देख कर हंसी आती है कि जो लोग अन्ना के आंदोलन को लोकतंत्र के खिलाफ बताते थे और उन्हें राजनीति में आने की सलाह देते थे वो आज कैसे अपनी बात से पलट गए हैं.
    जब आंदोलन चल रहा था तब मीडिया ने उसके बारे में ज्यादा कुछ लिखने की जरूरत नहीं समझी. और अब अचानक शांत बैठी मीडिया को जैसे छूट मिल गई है फिर से अपने विचार व्यक्त करने की. भाई मीडिया में चाहे कुछ भी आए, लोग हकीकत जान चुके हैं. हम तो बस अन्ना की पार्टी का इंतजार कर रहे हैं ताकि समय आने पर उसे वोट दे सकें.

  • 11. 00:38 IST, 05 अगस्त 2012 Tajuddin Khan:

    यह बहुत दुख की बात है कि जो जमात कल तक अपने को अलग कहते नहीं थकती थी वह आज उसी जमात का हिस्सा बन गई है. शुरू से ही अन्ना टीम की महत्वाकांक्षा भारतीय राजनीति में जो एक ठहराव आ गया था उसको भुनाने की थी. इसमें बहुत से संगठन उनको पीछे से मदद कर रहे थे यह सभी जानते हैं. मगर फिर भी ना जाने क्यों युवाओं को लग रहा था कि यह अनशन करने वाले लोग सच में भारत के हितैषी हैं और इनके आंदोलन से भारत में एक नई कौम पैदा होगी जो अलग सोच रखेगी. मगर अन्ना के राजनीति में आने के ऐलान से वो सारे सपने बिखर से गए हैं.

  • 12. 02:49 IST, 05 अगस्त 2012 Omair Ahmad Khan:

    सुशील जी, मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ, मैंने भी कभी अन्ना का न तो समर्थन किया और न विरोध. पता नहीं क्यों मुझे लग रहा था कि इस आन्दोलन का आगाज़ तो अच्छा है मगर अंजाम अच्छा नहीं होने वाला. मुझे लगता है कि अब किसी अन्ना की ज़रुरत नहीं है बल्कि आम आदमी को खुद अन्ना बनकर दिखाना होगा. वैसे आपने सही कहा कि आने वाले 30-40 सालों में ऐसा कोई दूसरा आन्दोलन देखने को नहीं मिलेगा. हाँ शायद हमारे बच्चे अपने समय में कुछ कर सकें तो एक अलग बात होगी.

  • 13. 09:44 IST, 05 अगस्त 2012 dheeraj dubey:

    टीम अन्ना चाय बनाने के लिए भैंस खरीदने निकली है. लोगों को जागरुक करना एक बात है और चुनाव लड़ना अलग बात. टीम अन्ना ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक यज्ञ शुरू किया है उसमें हमें भी आहूति देने की जरूरत है.

  • 14. 10:39 IST, 05 अगस्त 2012 PUSHPESH KRANTI:

    बहुत घटिया और अप्रामाणिक लेख है आपका. भगवान आपको सुबुद्धि दे. आप बड़े ही निराशावादी लेखक हैं. इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कहूंगा. ऐसा लगता है कि आप कांग्रेस के महाएजेंट हैं.

  • 15. 11:35 IST, 05 अगस्त 2012 Piyush :

    सुशील जी, आपके पास अगर इससे अच्छा कोई रास्ता हो तो 'इंडिया अगेन्स्ट करप्शन' की साइट पर जाकर अपनी बात ज़रूर रखें. आप चाहें तो उनके दफ्तर में जाकर डॉक्टर कुमार से बात भी कर सकते हैं.

  • 16. 12:02 IST, 05 अगस्त 2012 विपिन कुमार:

    अन्ना धोखेबाज हैं. उन्होंने भारतीय जनता को धोखा दिया है. अन्ना को राजनीति में नहीं आना चाहिए.

  • 17. 12:06 IST, 05 अगस्त 2012 Sandeep Kumar Mahato:

    अन्ना को मैंने भी कभी समर्थन नहीं दिया परन्तु मैंने उस मूवमेंट को जरुर समर्थन दिया जिसने सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ उठने की हिम्मत दिखाई. एक ऐसा समाज जो यह सोचता था की देश की समस्याओं का उसने कोई ठेका नहीं ले रखा है, इस आन्दोलन के बाद कम से कम उसने थोड़ा सोचना शुरू किया था. मैंने इसलिए समर्थन दिया क्योंकि मुझे डर था कि कहीं सरकार इस आन्दोलन को कुचलने के बाद अपने को अजेय घोषित न कर दे और यह साबित कर दे कि अब तो उसी की चलेगी, कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. मैंने यह देखना उचित नहीं समझा, उसे लीड कौन कर रहा है उसकी महत्वाकांक्षा क्या है?
    मगर अब लगता है शायद मैं गलत था. एक मूवमेंट को सही दिशा देने के लिए एक सही लीडर का होना सबसे ज्यादा जरुरी है वर्ना आन्दोलन दिशाहीन हो जायेगा और उसके दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं. लीडर की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं होनी चाहिए. उसमें प्रसिद्धि की स्पर्धा नहीं होनी चाहिए. उसे समझना चाहिए ताकत लोगों को जोड़ने से बनती है उसे तोड़ने से नहीं. लोगों का एक बार विश्वास उठ जाए ऐसे आंदोलनों से तो उस विश्वास को वापस लाना और भी ज्यादा दुष्कर कार्य होगा.

  • 18. 13:19 IST, 05 अगस्त 2012 Bhanwar Pareek:

    क्यों एक भले आदमी का मज़ाक उड़ा रहे हैं आप. खुद से कुछ होता नहीं और कोई अगर नेक नीयत से कुछ करना चाहता है तो आपके जैसे लोग टांग खींचने से बाज नहीं आ रहे. अपनी फिक्र कीजिए, अन्ना को आप क्या समझेंगे.

  • 19. 13:29 IST, 05 अगस्त 2012 KB:

    सुशील, मैंने अन्ना के आंदोलन का कभी समर्थन नहीं किया. आलोचना करता रहा हूं. लेकिन मैं आपसे असहमत हूं. मैं अन्ना के सभी तर्कों से भी सहमत नहीं हूं. लेकिन आपको इस बात की सराहना करनी चाहिए कि उन्होंने सरकार को चुनौती दी.

  • 20. 17:10 IST, 05 अगस्त 2012 Aryaan:

    टीम अन्ना ने सभी भारतीयों को धोखा दिया है. मैं भारत में नहीं रहता लेकिन फिर भी मैंने अन्ना के शुरुआती आंदोलन का समर्थन किया था. लेकिन जब मैंने सुना की टीम अन्ना चुनावों में हिस्सा लेने जा रही है तो बहुत आहत हुआ क्योंकि सभी राजनीतिक दलों में भ्रष्टाचार है.

  • 21. 22:41 IST, 05 अगस्त 2012 Nitin:

    बीबीसी से ऐसी उम्मीद नहीं थी. बड़ा बेवकूफी भरा ब्लॉग है. आप बीबीसी की स्तर गिराने में क्यों लग गए? शर्मनाक है ये ब्लॉग.

  • 22. 01:55 IST, 06 अगस्त 2012 ajay:

    ये एक ऐसा विषय है जिसपर जितना भी बोला, लिखा जाए कम है. वर्तमान परिस्थितियों को देखकर लगता है कि भारत को एक नया राजनीतिक विकल्प तलाशना ही होगा. जब कांग्रेस और बीजेपी फेल हो गई है ऐसे में टीम अन्ना को राजनीति में आने से परहेज क्यों होना चाहिए.
    इस समय देश में राजनीतिक शुन्य सा दिखता है. इन परिस्थितियों में या तो मह सोच लें कि जो चल रहा है वो अच्छा है नहीं तो पुराने को छोड़कर नए को आजमाने में हर्ज क्या है?

  • 23. 11:57 IST, 06 अगस्त 2012 sunjay:

    अन्ना और उनकी टीम ने हमेशा पारदर्शिता के साथ काम किया है, लोगों की राय मांगी है, बहस को बढावा दिया है तभी किसी फैसले पर आए हैं. क्या आप किसी एक राजनीतिक पार्टी का नाम बता सकते है जो ऐसा करती है? सुशील झा के विचार सिर्फ शब्दाडंबर है और हास्यास्पद है.
    वो किसी भी बात को तर्कसंगत दिशा नहीं दिखा पाए हैं. वो उसी तरह धुंधला जैसे कोई भी भ्रष्ट नेता होता है. या तो आप इस आंदोलन को नहीं समझ पाए हैं या फिर आपके खुद के राजनीतिक महत्वाकांक्षा है.
    अन्ना की टीम का राजनीति में आना तर्कसंगत है.
    कोई भी पार्टी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है और एक ऐसे विधेयक को पारित नहीं करेंगे जो उन्हें जेल की सज़ा दिलवाता हो.
    मैं बीबीसी का नियमित श्रोता हूं और मुझे लगता था कि बीबीसी हिंदी निष्पक्ष है लेकिन इस विचार को पढ़कर मुझे दुबारा सोचना पड़ रहा है.

  • 24. 12:12 IST, 06 अगस्त 2012 AMIT RANJAN, :

    इस विचार को देखकर मैं हैरान हूं. मुझे लगता है कि लेखक कांग्रेस पार्टी के बिचौलिए हैं
    हालांकि मैं बहुत व्यस्त व्यक्ति हूं लेकि समय निकालकर अन्ना के आंदोलन में गया था इसलिए मुझे कुछ कहने का हक़ है.
    आज के हालात में अन्ना ने सही फैसला लिया है और अब देश के लोगो पर हैं कि वो हमारे प्रिय राष्ट्र के साथ कैसा बर्ताव करना चाहते हैं.
    मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि वो अन्ना जी शक्ति दे कि वो सही लोगों का चुनाव कर सकें.
    मेरे प्रिय लेखक, सभी प्रणाली सड़ चुके हैं और उसके लिए आप जैसा बुद्धिजीवी वर्ग जिम्मेदार है

  • 25. 13:26 IST, 06 अगस्त 2012 deep chandra:

    अन्ना शुरू में जिस तरह से लोगो में भ्रष्टाचार को एक मुद्दा बना कर लाए वो वाकई तारीफ के काबिल हैं. दो दशकों के बाद लोगों के मन में लोकनायक की याद आई.. हम लोगो को लगा की कोई है जो राजनीति से इतर भी आम जनता की बात को सुन ही नहीं रहा है बल्कि उसको महसूस कर रहा है. अन्ना का आन्दोलन आम जनता का था पर बाद में इसमें कुछ लोगों की महत्वाकांक्षाओं को जगा दिया वो अपने आप को संसद के ऊपर मानाने लगे ... आखिर हमारी सरकार एक चुनी हुई सरकार है ...अन्ना का राजनीति में आना कोई खराब बात नहीं है लोकतंत्र में राजनीति ज़रुरी है .... अन्ना दल का स्वागत है ..

  • 26. 20:26 IST, 06 अगस्त 2012 वेद प्रकाश राय :

    सुशील जी !! मुझे ये जान कर बहुत निराशा हुई की आपने कभी अन्ना के आंदोलन का समर्थन नहीं किया। अगर आप ये लिखते की आज की स्थिति मे आप उनके कदम का समर्थन नहीं करते है तो शायद मुझे आप पर उतना गुस्सा नहीं आता। आपकी रेपोर्टिंग का मै कायल रहा हू, पर आज मेरी आंखे आपने खोल दी। क्या आप के दिमाग मे भ्रष्टाचार खत्म करने का कोई प्लान है। अगर है तो कृपा करके बताएं, या फिर सिर्फ कुछ लिखने के नाम पर लिखना छोड़ दें ।

  • 27. 01:28 IST, 07 अगस्त 2012 ajay sharma:

    आंदोलन की भाषा इस देश की राजनीति में समझता कौन है..संसद ने अन्ना के सामने विकल्प ही कहां छोड़े हैं..अड़ियल रवैया यहां तक है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जो आंदोलन संसद में मौजूद पक्ष और विपक्ष को करना चाहिए, वो अगर जनता की तरफ से उठता है तो इस पक्ष-विपक्ष की नजर में वो आंदोलन सम्मान के लायक भी नहीं..और इसके लिए पूरी संसद ने जोर लगा दिया..यही राजनीति है क्या..खुद क्या किसी भी राजनीतिक दल में इतनी ताकत रही है कि वह इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर सके..पूरा विपक्ष बुरी तरह बिखरा हुआ नेतृत्वविहीन दिखता है..सत्तापक्ष तो आजादी के बाद नेतृत्वविहीनता की मिसाल बन गया है..एक भी नेता नहीं जिस पर जनता को यकीन हो..असल में अन्ना के आंदोलन से दोनों ही खौफजदा थे..इसलिए दोनों ने कमोबेश एक ही भाषा बोली..दोनों ने टीम अन्ना से दगा किया..और उन्हें उस मोड़ पर ले जाकर खड़ा कर दिया जहां उनके सामने कोई विकल्प नहीं बचा था..या तो इस निर्ममता की हद तक जनविरोधी संसद के आगे जान दे दें या फिर उसके सामने एक ताकत बनकर खड़े हों और उसे उसी राजनीतिक पाठशाला में चुनौती दें..अन्ना ने दूसरा विकल्प चुना तो क्या गुनाह किया.. और ये दूरगामी परिणाम वाली सोच साबित होगी..2014 ही नहीं आगामी तमाम चुनावों में सत्ता और विपक्ष दोनों ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है..

  • 28. 16:42 IST, 07 अगस्त 2012 Sanjay Kareer:

    मैं अपना अन्ना खुद बनूंगा और ईमानदार रहने की हर कोशिश करुंगा... बस!!! यही वो सच्‍चाई है जो सबको समझनी होगी. जिस दिन ऐसा होगा किसी अन्‍ना की, किसी क्रांति या आंदोलन की जरूरत नहीं होगी क्‍योंकि ऐसा होते ही समग्र क्रांति स्‍वयंमेव हो जाएगी. बढि़या ब्‍लॉग सुशील जी!!!

  • 29. 11:57 IST, 08 अगस्त 2012 pankaj:

    मैं आपके सभी बिचारो के साथ सहमत नहीं हूँ। एक बात इस आन्दोलन से साफ़ थी की हम आम जनता ही हमेसा क्यों मरे। अगर अन्ना और टीम अपना आन्दोलन नहीं समाप्त करते तो सवास्थ को परेसानी हो सकती थी। ये एक अच्छा विकल्प है राजनीति में आकर इस देश के लिए कुछ करना। एक काम को करने के लिए कई रास्ते होते है। सायद ये सबसे अच्छा रस्स्ता साबित हो। और इसको साकार करने के लिए हम और तुम दोनों को मिलकर साथ देना होगा। ६० साल से जयादा हम एक ही पार्टी के पीछे चल रहे है हमे क्या मिला ये सब बताने ही जरूरत नहीं है! बदलाब जीवन का नियम है और ये वो समय है जब हम इसका हिस्सा बन सकते है। एक सुरक्षित कमरे में बैठकर आलोचना करना बहुत आसान है। हमने इस अन्दोलम के लिए क्या किया या भ्रष्टाचार से निपटने के लिया क्या किया। अगर हम अपने आप से पूछे तो सायद जबाब मिल जाएगा। अगर आप सभी बुद्दुजीवियो में सच में इस देश से प्रेम है या अपने देश के लिए कुछ करने की इच्छा है तो इस बदलाब का हिस्सा बनिए। एक कोसिस करने में कोई बुरे नहीं है।
    सायद हमारा ये देश फिर ये दोड़ने लगे! भ्रष्टाचार की ओर नहीं, प्रगति की ओर। "कोसिस करने वालो की हार नहीं होती, हिम्मत करने वालो के हार नहीं होती...."

    जय हिंद। जय भारत।

  • 30. 13:55 IST, 10 अगस्त 2012 वेद प्रकाश राय :

    सुशील जी !! मुझे ये जान कर बहुत निराशा हुई की आपने कभी अन्ना के आंदोलन का समर्थन नहीं किया। अगर आप ये लिखते की आज की स्थिति मे आप उनके कदम का समर्थन नहीं करते है तो शायद मुझे आप पर उतना गुस्सा नहीं आता। आपकी रेपोर्टिंग का मै कायल रहा हू, पर आज मेरी आंखे आपने खोल दी। क्या आप के दिमाग मे भ्रष्टाचार खत्म करने का कोई प्लान है। अगर है तो कृपा करके बताएं, या फिर सिर्फ कुछ लिखने के नाम पर लिखना छोड़ दें ।

  • 31. 18:42 IST, 13 अगस्त 2012 Anupam Shrivastava:

    मैं ये नहीं कह सकता कि अन्ना हजारे ने ये आंदोलन राजनैतिक पार्टी बनाने के लिए शुरु की.
    लेकिन उनके लिए ऐसा करना ज़रूरी था क्योंकि केंद्रीय सरकार आंदोलन को नजरअंदाज कर रही थी. कांग्रेस सिर्फ तमाशा देख रही थी. दूसरे शब्दों में कांग्रेस केजरीवाल की मौत का इंतजार कर रही थी क्योंकि केजरीवाल ही अन्ना के आंदोलन की रीढ़ हैं. अब हम सिर्फ उनकी पार्टी की इंतजार कर सकते हैं. हमें कोई जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए . अगर हमें दिखता है कि अन्ना की पार्टी भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है तो हम उनके खिलाफ भी आवाज उठाएंगे.

  • 32. 13:30 IST, 18 अगस्त 2012 ziaaul haquue siddique:

    अन्ना को एक राजनीतिक मंच तैयार करना था. ये शुरुआत से ही पता था कि उनके सहयोगियों की मंशा क्या है. इसमें आश्चर्यचकित होने की ज़रूरत नहीं है.

  • 33. 12:51 IST, 28 अगस्त 2012 Makkhan Lal Poonia:

    राजनीति में सब एक जैसे नही होते, राजनीतिक दल बनाना एस समय बहुत जरुरी हो गया है. कोई विकल्प भी नही था, हम एक या दो नियम लागू करवा सकते हैं. राजनतिक रास्ते से पूरा देश ही बदला जा सकता है.

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