मिस्ड कॉल की राजनीति
आचार्य ने चहककर कहा, "सुना तुमने, सरकार अब हर ग़रीब को मुफ़्त मोबाइल देगी."
पलटकर कृपाचार्य ने पूछा, "हाँ, सुना तो, लेकिन इससे क्या होगा?"
आचार्य ने थोड़ा तमककर कहा, "अरे दिन फिर जाएँगे उनके, तुम तो निराशावादी ही हो गए हो."
दोनों की बातचीत आगे चल निकली.
"निराशावादी तो नहीं हुआ हूँ लेकिन इसका मतलब समझ में नहीं आया."
"अरे, सोचो, फ़ोन होगा तो ग़रीब क्या-क्या नहीं कर सकेंगे."
कृपाचार्य थोड़ी देर चुप रहे, फिर कहा, "बात तो सही है, वह मौसम विभाग से फ़ोन करके पूछ सकेगा कि साहब, आपने तो कहा था समय पर पूरी बारिश होगी, लेकिन ये बादल कहाँ गए. फिर कृषि मंत्री को फ़ोन करके पूछ सकेगा कि साहब, सूखा कब घोषित कर रहे हो?"
आचार्य कुछ कहते इससे पहले कृपाचार्य ने फिर बातचीत का सिरा थाम लिया.
"हाँ, वो मनरेगा के अफसर से पूछेगा कि साहब जी, पिछले काम का पैसा आठ महीनों से मिला नहीं, कोई उम्मीद है या नहीं? फिर वो सरपंच से पूछेगा कि पिछली बार हमारी बीबी और बेटे के नाम से पता नहीं किसे काम दिया था, इस बार जो भी लेना देना हो पहले कर लो लेकिन दोनों का नाम मस्टर रोल में चढ़ाओ तो काम भी दे देना."
"वो राशन वाले को फ़ोन करके कह सकेगा कि भैया वो दो रुपए किलो वाला चावल तीन महीनों से आया ही नहीं, बीडीओ दफ़्तर तो कहता है कि हर महीने का कोटा जा रहा है. तो हम तक कब पहुंच सकेगा ये अनाज?"
"बच्चा बीमार पड़ेगा तो किसी पाँच सितारा अस्पताल में फोन करके उसके लिए बिस्तर बुक करवा सकेगा."
"हां, वो योजना आयोग के उपाध्यक्ष को फ़ोन करके कह सकेगा कि साहब 26 रुपए रोज़ से ज़्यादा कमा रहे हैं फिर भी गरीब के गरीब हैं, कोई तरकीब बता दो तो हम भी इस जंजाल से छूट जाएँ."
आचार्य और कृपाचार्य की बातचीत चल ही रही थी कि एक रुदन सा व्याप गया.
दोनों ने झाँककर देखा कि भंग हो गई टीम अन्ना के कुछ सदस्य समर्थकों से गले मिलकर रो रहे हैं. एक सद्स्य ने दूसरे से कहा, "सरकार कितनी षडयंत्रकारी है. पहले ग़रीबों को मोबाइल दिया होता तो हम उन्हें भी एसएमएस करके आंदोलन में बुलाते. किसान आते, ग़रीब आते तो दृश्य ही बदल जाता. अन्ना अकेले बेचारे से नहीं दिखते, ढेर सारे बेचारे हो जाते. और फिर जब हम पूछते कि राजनीति करें या न करें तो करोड़ों ग़रीब हमें एसएमएस करके बताते कि भैया, और कोई चारा तो दिख नहीं रहा है, अब ये भी आजमा लो."
एक दूसरे सदस्य ने कहा, "अगर ज़्यादा भीड़ आती तो अन्ना कुछ दिन और अनशन कर लेते या ज़्यादा मैसेज आते तो अन्ना शायद टीम को भंग भी न करते."
आचार्य और कृपाचार्य एक दूसरे का मुंह ताकने लगे थे कि रामलीला मैदान की ओर से शोर शराबा सुनाई पड़ने लगा.
सुना कि फ़र्ज़ीवाड़ा करने के आरोप में जेल चले गए अपने सखा बालकृष्ण को शहीदों के साथ खड़ा करके बाबा रुपी रामदेव हुंकार रहे हैं.
आचार्य और कृपाचार्य ने देखा कि वे इस बार भगवा ही पहने थे, किसी महिला का सफ़ेद सूट नहीं. पिछली बार चार दिन में अस्पताल पहुँचने से सबक लेकर उन्होंने तीन ही दिन का अनशन रखा था.
दस सीढ़ियाँ चढ़कर मंच पर चढ़कर हाँफ़ रहे योग गुरू ग़रीबों को मोबाइल देने की सरकार की घोषणा से ही हकबकाए हुए हैं. वे कह रहे थे, "अगर आप सरकार से काला धन वापस मंगवाना चाहते हो तो हमें मिस्ड कॉल लगाओ."
कृपाचार्य ने कहा, "पिछले साल जून में इसकी एक कॉल सरकार के मोबाइल पर मिस्ड कॉल रह गई थी. इस साल टीम अन्ना की कॉल मिस्ड कॉल रह गई. तो इन्होंने ख़ुद मिस्ड कॉल को फ़ॉर्मूला बना लिया है."
हमारे एक मित्र ने आचार्य और कृपाचार्य के संवाद के बीच में कहा, "यह देश मिस्ड कॉल के ही काल में रह रहा है. अर्थव्यवस्था से लेकर राजनीति तक सब मिस्ड कॉल से चल रही है. अब बाबा मिस्ड कॉल की अपेक्षा कर रहे हैं तो आपत्ति क्यों?"
एक बार ग़रीबों को फ़ोन मिल जाने दीजिए, फिर देखिएगा, हर पाँच साल बाद चुनाव आयोग भी कहेगा, "अपना मत डालने के लिए फलाँ, फलाँ नंबर पर मिस्ड कॉल डालिए."
चुनाव परिणाम आपके मोबाइल पर मिस्ड कॉल से बताए जाएँगे.

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सर, जो बीपीएल कार्ड बन गए हैं क्या आपको लगता है कि वो गरीबों को मिले हैं? हां हो सकता है कि 100 में से शायद एकाध गरीब को भी दिया गया हो. मै पृथ्वीपुर, जिला टीकमगढ़, एमपी में रहता हूं. यहां काग्रेसियों ने कुछ भी नहीं छोड़ा. हमारे पडोसी दो पहिया गाड़ी चलाते हैं और उनके पास बीपीएल कार्ड है.
बात ये नहीं कि क्या सरकार गरीबों को मोबाइल बांट रही है, बात ये है कि सरकार की नजर में गरीब कौन है.
श्री विनोद जी, इस लेख के नीचे एक लाइन और लिखते- एआईसीसी से साभार!
बहुत बढ़िया नहीं है
विनोद जी लेख अच्छा लगा. बहुत कुछ तो कह दिया है आपने लेकिन घोटाले का नाम नहीं लिया. खैर मैं बताना चाहता हूं कि देशवासियों को घोटालों की आदत हो गई है. 2014 से पहले एक मोबाइल घोटाला हो जाए तो क्या बात है.
आम आदमी की बुनियादी ज़रूरतों से ज्यादा मोबाइल फोन को महत्व देने पर ये व्यंग्य बहुत खूब है.
प्रशंसनीय व्यंग्य है.
कुपोषण का क्या हाल है आप देख ही रहे हैं. खाने को भोजन नहीं देगी सरकार लेकिन बात करने के लिए मोबाइल देगी. इस सरकार को ग़रीबों की कोई चिंता नहीं है. ये सब मोबाइल खरीदने में मिलनेवाले कमिशन के लिए हो रहा है.