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कोयला तो कोयला है...

सुशील झासुशील झा|सोमवार, 20 अगस्त 2012, 12:15 IST

बचपन की अधमुंदी आंखों से अभी भी याद है कि घर में कोयला प्लास्टिक के छोटे से बोरे में आता था.

एक चूल्हा हुआ करता था लोहे और मिट्टी का बना हुआ जिसमें लकड़ी और कोयला डाल कर हवा करने पर आग जलती थी. कोयला गोल नहीं होता था. उसका मुंह हम लोगों जैसा ही था. टेढ़ा मेढ़ा बिना किसी आकार का.

जब कोयला जलता तो उसमें से सफेद धुआं उठता और उस धुएं से आंख जलती थी. उस धुएं में हम परियां बनाते और सोचते बड़े होने पर इन परियों से शादी करेंगे.

रात में जलते लाल कोयले पर रोटियां फूल जाया करती थीं. रोटी का वो स्वाद हीटर औऱ गैस पर बनी रोटियों में कभी नहीं आया. सर्द रातों में ये चूल्हा बड़ा काम आता गर्माहट के लिए, कोयला एक बार जलता है तो देर लगती है बुझने में उसे.

कोयले के बोरे में कोयला टकराकर चूरा बन जाता था. मां उस चूरे में भूसी मिलाकर एक पेस्ट जैसा कुछ बनाती और फिर उस पेस्ट से पकोड़े जैसी चीज़ बनती थी. उन काले पकोड़ों को धूप में सुखाकर फिर से कोयले की तरह इस्तेमाल किया जाता था. कोयले का कण-कण काम आता था.

कोयले की कालिख से हम डरते भी नहीं थे क्योंकि वो कालिख हमारे काले बदन पर दिखती नहीं थी. बचपन में एक फिल्म आई थी जिसमें अमिताभ बच्चन कोयला मज़दूर थे. उसके बाद से हमारे पिताजी हमारे लिए अमिताभ बच्चन हो गए थे.

फिर हीटर आया, गैस आई, कोयला छूटा, शहर छूटा और हम शहर में कोशिश करने लगे अपने देह की कालिख छुड़ाने की. हमें क्या पता था कि कोयला उड़ कर राजधानी तक आता है लेकिन बारह सौ किलोमीटर की दूरी तय करने में कोयले का रंग सफेद हो जाता है.

लुटयन की गलियों और नरीमन प्वाइंट पर पहुंचते ही कोयले का रंग बदला-सा लगता है. हमारे लिए कोयला काला था. राजपथ और नरीमन प्वाइंट पर कोयले का रंग झक सफेद. यहां कोयले से लोग न तो रोटी बनाते थे और न ही उसका धुआं देखकर उनके बच्चे नाचते हैं.

यहां कोयले का धुआं फेरारी और मर्सिडीज़ की शक्ल में उड़ता है. पांच सितारा होटलों में बड़े-बड़े सम्मेलनों में कोयले का नाम कोल हो जाता है और इस पर जब रोटियां सेंकी जाती है तो उसे राजनीतिक रोटी कहते हैं.

मुझे बदला हुआ कोयला अच्छा नहीं लगता. मेरा काला कोयला ठीक था. यहां कोयले का सफेद रंग आंखों में चुभता है. कोई कोयले का नाम भ्रष्टाचार और घोटाले से जोड़े तो मेरा दिल कटता है. कोयला मेरे बचपन का खिलौना है. मेरे बाप की मेहनत है. मेरे मुंह का पहला निवाला है और मेरी मां की मांग का सिंदूर रहा है.

कोयला बदनाम हो ये मुझे गवारा नहीं होता लेकिन मैं क्या कर सकता हूं.

हम तो कोयले के साथ काले हो गए. जो ताकतवर थे उन्होंने कोयले को अपने साथ सफेद करने की कोशिश की लेकिन कोयला तो कोयला है......कोयले की दलाली में मुंह काला ही हो सकता है सफेद नहीं रह सकता.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 13:53 IST, 20 अगस्त 2012 vinay shankar:

    ये तो हमारा कोयला है. जिसे लूट कर दिल्ली, मुंबई, गुड़गांव बंगलौर जैसे मेट्रो शहर बन गए और हम मुह तकते रह गए. जीने के लिए इन्ही मेट्रो में हम दोयम दर्जे की जिन्दगी जी रहे है और अपने कोयलों को लुटते देख रहे है.

  • 2. 21:04 IST, 20 अगस्त 2012 prashant chahal amroha u.p.:

    सुशील भाई, मुसीबत ये है कि पूरे मुल्क का कोयलीकरण हो गया है. जब मैं किसी बाबू को 50 रुपए देता हूं तो उस बेचारे के साथ खुद का भी कोयलीकरण करता हूं.दर साल सिस्टम बदलने के लिए चरित्र की ज़रुरत होती है.जो अपनी जनता में कम पाया जाता है. जिन थोड़े लोगों में बचा है उनके पास दो ही विकल्प बचते हैं या तो जूता खाइए या जूता फेंक मारिए.

  • 3. 10:08 IST, 21 अगस्त 2012 pankaj kumar srivastava.:

    सुशीलजी कोयला से कोल तक का सफर एक ओर दिल को छु गयी तो दुसरी ओर देश के नेताओं के लिए नफरत की लकीर खीच गयी.

  • 4. 13:12 IST, 21 अगस्त 2012 Padmanabh:

    कोयला किसी जमाने में हमारी संस्कृति थी. आज लगता है अभिशाप है. कोयले का सफ़ेद होना आपने बहुत खूब पहचाना है. बांकी बी.बी.सी. के ब्लोगर की तुलना में, पहली बार आपका ब्लॉग अच्छा लगा. इसमे ह्यूमर है, रचनात्मकता है और दिल को झकझोर देने वाला हकीकत भी.

  • 5. 21:50 IST, 21 अगस्त 2012 Sandeep Kumar Mahato:

    बहुत अच्छा ब्लॉग. लगता है हमारे देश के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री शायद भूल गए की कोयले को दलाली में हाथ ही नहीं मुँह भी काला होता है.कोयला तो अब भी काला है, कोयले से अब भी धुआँ निकलता है शायद वो भूल गए थे.मगर कोयले की कालिख लुटीयेंस की बनायीं 144 स्तंभों की चारदीवारी को पार कर डायरेक्ट सेंटर में लगेगी इसका अंदाजा नहीं था मुझे. इसकी कालिख सफ़ेद कपड़ों को भी पार कर जायेगी इसका अंदाजा नहीं था मुझे. लेकिन उनको शायद इतनी फिकर ना हो क्योंकि "सर्फ एक्सेल है ना".

  • 6. 03:32 IST, 22 अगस्त 2012 suyog yadav:

    बहुत अच्छा !!!बेहद संजीदा चित्रण किया है आपने ... कोयले और उसके रूपांतरण का .......दलाली करने वाले कहाँ से कहाँ पहुंचे और मजदूर--- मजदूर ही रहे .....
    देश को रोशन करके खुद अँधेरे में रहने वाले प्रदेश (झारखण्ड ) की शायद यही नियति है .....पर इन अंधेरों में भी कुछ शोले हैं , शरारें हैं ......याद आती है कुछ पंक्तियाँ ....
    है शहर ये कोयले का ,,ये मगर मत भूल जाना ---लाल शोले भी इसी बस्ती में रहते हैं युगों से ................

  • 7. 18:01 IST, 22 अगस्त 2012 Nimesh:

    मुझे भी याद आता है कि किस प्रकार ठेले में भर कर कोयले वाला मोहल्ले के बीच अपनी गाडी खड़ा किया करता था और कैसे टीन के डब्बे पर सरिया लगा कर और मिटटी लीप कर चूल्हा तैयार किया जाता था.

    पुरानी यादें ताज़ा करने के लिए धन्यवाद.

    और जहाँ तक व्यंग्य का प्रश्न है.....कोयले का रंग भले ही काला हो..... आपकी अभिव्यक्ति का रंग तों झक सफ़ेद ही है ....

  • 8. 23:31 IST, 22 अगस्त 2012 राकेश:

    "जो ताकतवर थे उन्होंने कोयले को अपने साथ सफेद करने की कोशिश की लेकिन कोयला तो कोयला है......कोयले की दलाली में मुंह काला ही हो सकता है सफेद नहीं रह सकता." --> वाह.... बिलकुल सत्य.

  • 9. 00:13 IST, 23 अगस्त 2012 Alok mishra:

    विश्वस्तरीय ब्लॉग लेखन की क्षमता पहली बार बीबीसी पर दिखी.

  • 10. 08:59 IST, 23 अगस्त 2012 Dr. Ashutosh Kumar Singh Malaysia:

    मुझे ये लेख पढ़करर लगा कि जैसे मेरा गांव सामने आ गया या सच कहूं कि मेरे पास उपयुक्त शब्द नहीं हैं अपने अंदर की बात कहने के लिए. वैसे भी आज के संदर्भ में लगता है कि सरकार कुछ सुनना नहीं चाहती है. जो भी उसके विरोध में है वो गलत है ऐसा मापदंड बना लिया है सरकार ने.

  • 11. 14:21 IST, 23 अगस्त 2012 BHEEMAL Dildarnagar:

    बहुत अच्छा लिखते हैं. मुझे आपके ब्लॉग में एक सुगंध आती है. आप शौरी साहब के चरण चिन्ह पर चलते हुए कैबिनेट मिनिस्टर तक बन सकते हैं.

  • 12. 08:30 IST, 24 अगस्त 2012 sekhar:

    अच्छा है कि इस बात को सीएजी ने कहा, अगर किसी आम आदमी ने ये बात कही होती तो सरकार उसे आतंकवादी कहती और राष्ट्रीय सुरक्षा या विकास से जोड़कर देशद्रोही भी साबित कर देती.
    किसी संगठन ने अगर कहा होता तो उस पर अब तक प्रतिबंध लग चुका होता या एक और ग्रीन हंट ऑपरेशन हो रहा होता.

  • 13. 10:40 IST, 25 अगस्त 2012 satyapalkatarria:

    कोयले की दलाली में सभी के मुंह काले हैं. वर्ष 2014 के चुनाव में सभी देशवाशी सर्वोत्तम उपलब्ध प्रत्याशी को ही वोट दें तो अच्छे लोग चुन कर आएंगे, तभी देश का भला होगा, किसी भी पार्टी को वोट मत देना.

  • 14. 12:41 IST, 25 अगस्त 2012 anurag goswami:

    दाग अच्छे हैं.

  • 15. 14:13 IST, 28 अगस्त 2012 ziaaul haquue siddique:

    सच बात कही है बहुत सुपर लेख है आपका आप ने जितनी सफाई से अपनी बात कही है काश इन लोगो को भी समझ आ पाती

  • 16. 11:39 IST, 31 अगस्त 2012 Govind:

    मनमोहन सिंह सारे फ़साद की जड़ है, वो प्रधानमंत्री नही पी एम ओ ऑफिस मैं बैठकर सारे कॉंग्रेसी नेता के लिए काम कर रही है.

  • 17. 11:43 IST, 31 अगस्त 2012 govind:

    झारखंड से सांसद होने के नाते एक बार मान भी लें की सुबोध कांत सहाय ने राज्य में औद्योगिकरण को बढ़ावा देने और झारखंड के विकास के लिए इस कंपनी को खदान दिलाने की सिफारिश की ताकि कंपनी राज्य में निवेश करे. लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय का ये पत्र इस बात का खुलासा कर रहा है कि सुबोध कांत सहाय ने पीएमओ से इस कंपनी को छत्तीसगढ़ में भी खदान दिलाने की सिफारिश की, पीएमओ ने इसे कोयला मंत्रालय को बढ़ा दिया और मंत्रालय ने खदान दे भी दी. सवाल उठता है कि आखिर कंपनी को छत्तीसगढ़ में सुबोधकांत सहाय खदान क्यों दिलवाना चाहते थे?

  • 18. 23:50 IST, 05 सितम्बर 2012 L.R.gandhi:

    तोहमतें आएंगी नादिरशाह पर ...आप दिल्ली रोज़ ही लूटा करो

  • 19. 13:28 IST, 14 सितम्बर 2012 Ashwin Singh:

    पढ़ कर आनंद आ गया. लिखते रहें जनाब.

  • 20. 21:10 IST, 15 सितम्बर 2012 उत्तम झा :

    गाँव पर कोयले की धुँएं की आंच में रोटी बनाती माँ की तस्वीर आँखों के आगे आ गई .. शानदार अभिव्यक्ति .

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