मिल गई मिल गई...
कहते हैं ना भगवान् के यहाँ देर है अंधेर नहीं. मुझे आज समझ में आया जब अखबार पढ़ा.
अखबारों को यूँ ही कोई ज्ञान का पुलिंदा, दुनिया की कुंडली और भविष्य का द्वार नहीं कहते.धन्य है उस दिन को जिस दिन मैंने अखबार पढ़ना सीखा.
दरअसल आज अखबार पढ़ा तो ख़बर मिली की बीसीसीआई ने एक निजी कंपनी को चमकाया है क्योंकि उसने भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों का इस्तेमाल बुरे ढंग से अपने एक विज्ञापन में किया था.
मामला यह था कि राशन बेचने की एक नई कंपनी आई है उसने अपना गल्ला बेचने के लिए भारतीय खिलाड़ियों से बड़ी नौटंकी कराई थी. क्रिकेट के भगवान् मरघट की मटकी लिए चक्कर काट रहे थे. क्रिकेट के हनुमान व्हीलचेयर को लोगों की झोलियों से बदल रहे थे. क्रिकेट के राजकुमार स्ट्रेचर के साथ लोगों को डरा रहे थे की हमें पैसे देने वाली दुकान का सामान नहीं लिया तो बेटेराम यही होगा तुम्हारे साथ.
बुरी बात थी. लेकिन कहते हैं अच्छाई बुराई की कोख से निकलती है.
सो कई भले मानुसों की तरह बीसीसीआई को भी यह नागवार गुजरा और उसने तय किया कि अब वो और बर्दाश्त नहीं करेगें आखिर नाक का सवाल है, छवि का सवाल है क्रिकेट की, बीसीसीआई की.
जी हाँ वही नाक जिसके बारे में टी-20 वर्ल्ड कप और वीवीएस लक्ष्मण के संन्यास के समय दुरपिटे मुहँ लोग कहते थे कि बीसीसीआई ने अपनी नाक दफ़न कर दी है उनके मुहों पर बीसीसीआई ने मिट्टी मल दी.
बीसीसीआई ने कंपनी को झाड़ा है कहा है अपना इश्तेहार सुधारों.
वाह वाह वाह...बीसीसीआई को अपनी खोई हुई नाक ठीक उसी तरह मिल गई जैसे रामानंद सागर के राम को सीता, हिंदी फिल्मों की सीता को गीता और बीआर चोपड़ा की गीता को कृष्ण मिल गए थे.
अब बीसीसीआई यहाँ नहीं रुकेगी वो छोटे झूठे लांछन लगाने वाले लोगों का मुहँ बंद करने के लिए अपने एक लाड़ले खिलाड़ी को कहेगी कि ऐसी किसी कंपनी का मकान ना बेचो जो ग्राहकों को समय और सही गुणवत्ता वाले आशियाने नहीं देती.
वो अपने एक दूसरे नटखट खिलाड़ी को कहेगी की शराब का विज्ञापन बंद करो और जाओ पद्मश्री लेने. वो अपने तीसरे देवता को कहेगी कि ओये चिरकुट भगवान जी अब ज़मीन पर उतरो और अपनी विदेशी कार पर टेक्स की चोरी करने के 50 बहानों वाली किताब लिखना बंद करो.
वो जल्द ही खेल मंत्री को फटकारेगी और कहेगी कि बकवास बंद मैं आरटीआई के तहत केवल अब जानकारी ही नहीं दूंगी बल्कि अपना सारा हिसाब किताब इंटरनेट पर सार्वजनिक कर दूंगी.
अब से मेरे सारे काम महात्मा गाँधी के जीवन की तरह खुली किताब में दर्ज किए जायेगें. ऐसी किताब जिसे कोई अनपढ़ भी पढ़ सके और जिन पर गूंगे भी टिपण्णी कर सकें.
अब मैं किसी भी स्टेडियम का नाम किसी आदमी के नाम पर महज़ इसलिए नहीं रख दूंगी जिसने बहुत खर्चा किया हो मेरे लिए.
बस इंतज़ार करो ऐसा ही होने वाला है. कोई यह कहने की जुर्रत ना करना कि बीसीसीआई और राशन की दुकान वाले में खटपट हो गई थी बस इसलिए यह सब हो रहा है और आगे जब सब ठीक हो जाएगा तो तो खिलाड़ी पहले आईपीएल के चीयर लीडरों की तरह झूम झूम के पैसे की ताल पर लटके झटके दिखा सकेगें.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
काश अविनाश जी आपका सपना सच हो और बीसीसीआई ऐसा करे. आपके इस अच्छे ब्लॉग के लिए शुक्रिया.
''हंगामा कॉमिक बुक स्टाइल''
माफ कीजिए आपने इतना उलझा दिया है कि क्या कहना चाहते हैं पता नहीं. और एक विज्ञापन फिल्म पर इतना बवाल जो कि मिलावट के खिलाफ एक शुरुआत हो सकती थी.
आपने क्या लिखा है समझ से परे है. बीबीसी वाले तो इस तरह नहीं लिखते.
क्या ऐसा होगा मेरे महान चरित्रवान भारत में जहां सब कुछ बिकने को तैयार है.
अविनाश जी, बहुत खूब! मुझे क्रिकेट के भगवान की आलोचना बस एक-दो मौकों पर ही पढ़ने को मिली थी. पता नहीं क्यों मीडिया केवल उनकी उपलबध्यियों को बढ़ाचढ़ाकर पेश करना ही अपना काम समझता है. यह किसी डर या दबाव के कारण भी हो सकता है! आपका ब्लॉग पढ़कर मुझे बहुत खुशी हुई. आपने जो बेबाक लेखन किया है उसके लिए आपकी जितनी तारीफ की जाए वह कम है.
इसका विषय और आपके इस लेख की शैली कुछ कुछ ,प्याज के छिलके और रुसी गुडिया की तरह परत दर खुलती गयी और अंत में चक्करदार सांप सीढ़ी खेल की तरह अंत में 99 पर सांप ने निगला और आप पहुंचे वापस 1 पर. ठांय ठांय फिस्स!! बधाई हो! समय की बरबादी के इस नायाब तरीके को पेश करने के लिए.
अविनाश जी
आप सहारा , बी सी सी आई और क्रिकेट खिलाडियो के बारे मे क्या जानते है ? कम से कम आपके लेख से तो यही लगा की आप बहुत कम जानते है.
1- सहारा - एक बिजनेस करने वाली कम्पनी है चिट फंड से अपना धन्धा शुरु किया था , पिछले 15 साल से उपर से भारतीय क्रिकेट टीम को स्पांसर कर रही है और सहारा सिटी मे सबको घर दिया है वो भी तब जब हार गये थे जान राईट को भी दिया है.
2- बी सी सी आई - राशन की दुकान है जहा खिलाडी और इमोसन बिकते है खरीददार और उंची बोली वाले को ये लोग पूजते है
3- क्रिकेटर - पैसा है बी सी सी आई है सहारा है और बाकी भारतीय जनता.
हो सकता है कि खिलाडी़ इस भी बात से सहमत हों कि मिलावट हमारे देश की बड़ी समस्या है. एक पहल जो इसके खिलाफ है उसका साथ देना चाहिए.
बहुत अच्छा लेख, बधाई.
क्या खूब लिखा है . हमारे देश के ये खिलाडी दौलत के लिए क्या क्या नहीं कर सकते है . क्यों की ये लोग दौलत के लिए अपना जमीर तक बेच सकते है .बीसीसीआई से क्या शिकायत करना . सब एक ही थाली के चट्टे -बट्टे है ,
कड़वा सच कहने का मीठा अंदाज, आपकी काबलियत को सलाम.
धन्यवाद आपका इतने अच्छे लेख के लिए