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मनमोहन सिंह का मौन

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|बुधवार, 29 अगस्त 2012, 23:58 IST

मनमोहन सिंह अच्छी उर्दू जानते हैं. यहाँ तक कि उनके स्वतंत्रता दिवस के भाषण भी उर्दू में लिखे जाते हैं. अपने कई बजट भाषणों में (जब वह वित्त मंत्री थे), उन्होंने कई बार उर्दू के शेर पढ़े हैं. लेकिन कोयला आवंटन के मुद्दे पर उन्होंने बहुत देर से अपनी चुप्पी तोड़ी और वह भी उर्दू के एक लाजवाब शेर के साथ-

"हज़ारों जवाबों से अच्छी है ख़ामोशी मेरी,
न जाने कितने सवालों की आबरू रखे."

राजनैतिक हल्कों में मनमोहन सिंह के शाँत स्वभाव का सम्मान भी किया जाता है और उसकी खिल्ली भी उड़ाई जाती है. राजनीतिक विरोधियों पर शाब्दिक बाण चलाने के लिए उन्हे कभी नहीं जाना गया. संसद में भी जब कभी कभार नोकझोंक के मौके आते हैं और उन पर व्यक्तिगत हमले भी हो रहे होते हैं तब भी वह चुप रहना ही पसंद करते हैं.

गरमागरम बहस में भी उन्हें हस्तक्षेप करते यदाकदा ही देखा गया है. शायद मनमोहन सिंह को अब तक का सबसे 'चुप्पा' प्रधानमंत्री कहा जाए तो गलत नहीं होगा. उनकी रोबोटनुमा चाल और किसी मुद्दे पर कोई राय न रखने की वजह से अक्सर यह सवाल भी पूछे जाते हैं कि कहीं वह भावनाशून्य इंसान तो नहीं हैं. भारत में अक्सर चुप्पी का मतलब कमजोरी से लगाया जाता है.

मौन रहने वाले व्यक्ति की आम छवि यही बनती है कि उसमें निर्णय लेने की क्षमता नहीं है. एक और प्रधानमंत्री जिन्होंने चुप रहने को एक कला बना दिया था वह थे नरसिम्हा राव. कई मौको पर जब वह कुछ भी बोलना पसंद नहीं करते थे तो अक्सर अपने दोनों होठों को एक खास अंदाज़ में आगे बढ़ा कर 'पाउट' की मुद्रा में गहन चिंतन करते देखे जाते थे. उसकी वजह से उन्हें फ़ैसला लेने का थोड़ा समय भी मिल जाता था और उनके विरोधी भी मुद्दे के प्रति थोड़ा लापरवाह हो जाया करते थे.

नरसिम्हा राव के एक सहयोगी तो यहाँ तक कहा करते थे कि किसी मुद्दे पर कोई फ़ैसला न लेना भी एक फ़ैसला है. भारत में अक्सर प्रधानमंत्री की काबलियत को इस बात से भी आंका जाता है कि वह कितना अच्छा वक्ता है.

प्रणव मुखर्जी ने कई बार स्वीकार किया है कि वह इसलिए प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं हो पाए क्योंकि वह हिंदी के अच्छे वक्ता नहीं हैं. इस मापदंड पर भारत के दो पूर्व प्रधानमंत्री पूरी तरह से खरे उतरते हैं - एक तो जवाहरलाल नेहरू और दूसरे अटल बिहारी वाजपेई.

संसदीय परंपराओं के निर्वाह, ज्वलंतशील मुद्दों पर अपनी राय रखने और विरोधियों को भी अपनी बात कह देने में नेहरू का कोई सानी नहीं था. 1957 में जब वाजपेई पहली बार लोक सभा में चुन कर आए थे तो नेहरू उनसे इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने ऐलान किया कि एक दिन यह व्यक्ति भारत का प्रधानमंत्री बनेगा. लगभग चालीस साल बाद यह बात सच हुई. भारत की राजनीति में आज कितने लोग हैं जो अपने विरोधी के बारे में इतनी ऊँची राय रखते हों, और उससे बढ़ कर उसे सार्वजनिक रूप से कहने की हिम्मत रखते हों.

भाषण देने की कला में अटल बिहारी वाजपेई का कोई सानी नहीं था. भाषण के दौरान एक लंबा ठहराव और फिर एक गूढ़ टिप्पणी या फिर एक मज़ेदार फ़िकरा- इसे वाजपेई से बेहतर कोई नहीं कर सकता था. उनके प्रधानमंत्रित्व काल के आखिरी दिनों में जब लाल कृ्ष्ण आडवाणी का नाम उनके विकल्प के तौर पर लिया जा रहा था तो उन्होंने 'न मैं टायर्ड हूँ और न रिटायर्ड' वाला भाषण दे कर सबको निरुत्तर कर दिया था. लेकिन सिर्फ इस बात पर ही किसी की नेतृत्व क्षमता को नहीं आंका जा सकता कि वह कितना अच्छा वक्ता है. मनमोहन सिंह की 'मौनी बाबा' की अदा को एक बार नजरअंदाज कर भी दिया जाए तब भी उनका राजनीतिक प्राणी न होना और बड़े निर्णय न ले पाना उनके काम में अड़चन जरूर पैदा करता है.

भष्टाचार और घोटालों को बर्दाश्त करने और प्रतिभावान लोगों को आगे न ला पाने की कमजोरी ने उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया है. सोनिया गाँधी के साथ सत्ता में भागीदार होने की मजबूरी ने न सिर्फ उनके हाथ बाँध दिए हैं बल्कि कहीं-कहीं यह आभास भी दिया है कि पार्टी नेतृ्त्व के खिलाफ जाने की न तो उनमें इच्छा शक्ति है और न ही क्षमता.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 02:24 IST, 30 अगस्त 2012 Anuj:

    मनमोहन सिंह चाहे कितने अच्छे इकोनोमिस्ट हो और चाहे जितने अच्छे और ईमानदार व्यक्ति , लेकिन अगर उनकी लीडरशिप में देश लुट रहा है तो ये उनकी काबिलियत नही है .ग़लत काम होते देखना और उस पर चुप रहना , खुद दूसरो (सोनिया गाँधी ) के इशारे पर काम करना और कोई फैसला न ले पाना घटिया सोच और बुजदिली की निशानी है .....कायर और डरपोक होने से अच्छा है इस्तीफा दे कर अपनी और देश कि इज्ज़त रखे .

  • 2. 05:35 IST, 30 अगस्त 2012 अनन्त सिँह:

    रेहान जी इतने दिनो बाद ब्लाग लिखे धन्यवाद
    . मनमोहन सिँह की यह पद लोलुपता कि वे पद पर बने हुए हैं ,उन्हें त्यागपत्र बहुत (2 जी व कोल से भी) पहले दे देनी चाहिए क्योकि इस पद पर व्यक्तिगत के साथ राजनितिक ईमानदारी भी चाहिए.

  • 3. 09:02 IST, 30 अगस्त 2012 mrityunjay bhardwaj:

    रेहान जी बचपन से आपको खेल और खिलाड़ी में सुनते आया हूँ .आज बीबीसी हिंदी पर आपका ब्लॉग पढ़कर काफी अच्छा लगा. अगले ब्लॉग के इंतजार में.

  • 4. 11:26 IST, 30 अगस्त 2012 vimal:

    बहुत अच्छा लेख आपने लिखा . पीएम की चाभी को बहुत खूबसूरती से बताया है. कोई चुप रहे तो इसे उसकी कमजोरी समझी जाती है , जो गलत है.

  • 5. 14:13 IST, 30 अगस्त 2012 Vivek Vikram Kushawaha:

    किस तंत्र से करें गुहार, हो सत्ता प्रमुख और मूक हो तुम,
    गाँधी के तीन बंदरों का, संज्ञान तो है पर अर्थ है गुम,
    देखो ना सत्य, न सुनो, न बोलो, हो किस अभिमान में तुम,
    कौन सा गठबंधन धर्म निभाते, कहती जनता अकर्मण्य हो तुम।

    शर्मसार ना करो राष्ट्र को, सत्ता के शीर्ष पर बैठे हो तुम,
    शर्मसार ना हो जौहर उनका, जिस समुदाय को शीर्ष पे पहने हो तुम,
    ना रहो तुम इतने मूक असहाय, करोड़ों के सरदार हो तुम,
    ये राष्ट्र तुम्हारे साथ है, सत्य, सबल हो, शान्ति का आवाहन करो तो तुम।

  • 6. 15:29 IST, 30 अगस्त 2012 Amit Ranjan:

    रेहान फज़ल जी हमारे लिए आपकी पहचान हमेशा लाजवाब और एकदम अलग रही है. आपका बात रखने का अंदाज दिलकश और अनूठा है.यूं कहें तो मनमोहन सिंह की चुप्पी जितनी घनी है उतनी ही आपका हर शब्द मुखर, कशिश भरा. विवेचना वाले दिनों की याद ताजा हो जाती है.
    चुप्पापन खतरनाक साबित होता है जब सत्य को ढकने या छुपाने के लिए ओढा जा रहा हो.शायद यह मनमोहन सिंह की बेबसी और बेकसी की मार है.मगर प्रधानमंत्री जी को खुल कर सामने आना चाहिए. चाहे अंजाम कुछ भी हो. प्रधानमंत्री देश की जनता के प्रति जिम्मेवार पहले होता है ना कि किसी पार्टी या अन्य व्यक्ति के स्वार्थ के लिए.

  • 7. 15:48 IST, 30 अगस्त 2012 BINDESHWAR PANDEY BHU:

    कक्षाओं में तो हमे यही पढाया जाता है कि प्रधान मंत्री को भाषण कला का पंडित होना चाहिए. किन्तु अब लगता है कि हमे अपनी पाठ्य पुस्तकों से उन वाक्यों को डिलीट कर देना चाहिए क्यों कि "हज़ारों जवाबों से अच्छी है ख़ामोशी मेरी,
    न जाने कितने सवालों की आबरू रखे."

  • 8. 16:34 IST, 30 अगस्त 2012 BHEEMAL Dildarnagar:

    काफी अंतराल के बाद एक विचारशील , चिंतन योग्य ब्लॉग लेख पढने को मिला , अन्यथा लगता था कि लोग डॉलर या कागज़ के टुकडो के लिए मौसी जी , मौसा जी का कीर्ति काव्य ( अभिनन्दन ) लिख रहे हैं . पदलिप्सा + धनलिप्सा के लिए सिर्फ मौन रहना ही आवश्यकता हो , फिर ये बुरा सौदा नहीं है . मौसी तेरी कृपालु है - चूको मत मनमोहन

  • 9. 16:39 IST, 30 अगस्त 2012 PRAVEEN SINGH:


    हमारा नेता कैसा हो, मौन मोहन जैसा हो. हमारी मौसी कैसी हो, रिमोट कंट्रोल जैसी हो.

  • 10. 16:57 IST, 30 अगस्त 2012 Naval Joshi:

    रेहान साहब, मनमोहन सिंह के मौन पर आपने जितनी शालीनता और गरिमामय ढंग से अपनी बात कही यह अंदाज बहुत खूबसूरत है, यह हमारी परम्परा और संस्कार हैं कि हम किसी बुजुर्ग के बारे में चाहे कितने ही बुरे अनुभवों से गुजरे हों, उम्र का लिहाज जरूर करते हैं. अन्यथा जितना नुकसान इस मुल्क का मनमोहन सिंह ने किया उसकी कोई मिशाल नहीं है. उनका मौन महाज्ञानियों का मौन नहीं है, और न ही कठिन परिस्थितियों से जूझते किसी नेता का मौन है जिसका चेहरा अन्तर्मन की पीडा और झंझावातों को बिना बोले ही व्यक्त कर देता हो.स्टीफन हॉकिन्स जैसे लोग चाहे न भी बोल पायें लेकिन सारी दुनियां उनकी ओर देखती है उनकी बात समझती है. लेकिन मानमोहन सिंह का मौन उस श्रेणी का मौन नहीं है . इनका मौन डराता है और भय पैदा करता है कि इतनी कठिन परिस्थितियों में आदमी इतना तृप्त भी हो सकता है? जो जानता है कि बोलने का मतलब है, नई मुसीबत खडी करना. महाज्ञानी भी नहीं बोलते यह सच है, लेकिन दूसरे किस्म के लोग भी नहीं बोलते यह भी सच है. न बोलने वालों ने जितना जीवत रिश्ता लोगों से बनाया है उतना बहुत बोलने वालों का भी नहीं रहा है, जुमलेबाजी, शायराना पुट या हाथों को खास अंदाज नचाना, मुद्रायें बनाना यह अधिक नहीं चलता है. न बोलना मनमोहन सिंह का स्वभाव नहीं रणनीति है. लेकिन रणनीति की अधिक उम्र नहीं होती है. आपने मनमोहन सिंह के किसी सहयोगी के हवाले से कहा है कि किसी चीज पर फैसला न लेना भी एक फैसला है. लेकिन यह कोई नई बात नहीं है आप गलत या सही में एक के साथ खडे होने का विवश है. कोई ऐसा कर ही नहीं सकता कि मैं न तो सही करूंगा और न ही गलत करूंगा . निरपेक्ष रहने का आदमी को भरम हो सकता है निरपेक्ष कोई नहीं होता है , कभी ऐसी परिस्थिति हो कि मेरे सामने कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को प्रताडित कर रहा हो और मैं निरपेक्ष सिद्धांत के तहत चुप रहूँ तो भी मैं एक व्यक्ति को प्रताडित करने का स्पष्ट रूप से अपराधी हूँ. क्योंकि मैं चाहता तो विरोध कर सकता था इससे पीडित की हिम्मत भी बढ सकती थी, या अपराधी की हिम्मत टूट भी सकती थी लेकिन मैने कुछ न करके, जो हो रहा है उस पर अपनी सहमति की मुहर लगायी . यह मेरा अपराध है. मनमोहन सिंह के संदर्भ में बात इससे भी जटिल है.उनमें राजनीतिक कुटिलता इस हद तक है कि आज के राजनीति के बडे-बडे सूरमा उनके आगे पानी भरते नजर आयेगें.इससे आगे जाना ठीक नहीं है इतिहास अपना काम करता ही है. लेकिन जब तक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के रूप में इतिहास बनेगें तब तक गंगा-जमुना में बहुत पानी बह चुका होगा.

  • 11. 20:52 IST, 30 अगस्त 2012 iftekhar Ahmed:

    आपका लेख संतुलित और तथ्यों से भरा है.

  • 12. 23:14 IST, 30 अगस्त 2012 Vivek Vikram Kushawaha:

    किस तंत्र से करें गुहार, हो सत्ता प्रमुख और मूक हो तुम,
    गाँधी के तीन बंदरों का, संज्ञान तो है पर अर्थ है गुम,
    देखो ना सत्य, न सुनो, न बोलो, हो किस अभिमान में तुम,
    कौन सा गठबंधन धर्म निभाते, कहती जनता अकर्मण्य हो तुम.

    शर्मसार ना करो राष्ट्र को, सत्ता के शीर्ष पर बैठे हो तुम,
    शर्मसार ना हो जौहर उनका, जिस समुदाय को शीर्ष पे पहने हो तुम,
    ना रहो तुम इतने मूक असहाय, करोड़ों के सरदार हो तुम,
    ये राष्ट्र तुम्हारे साथ है, सत्य, सबल हो, शान्ति का आवाहन करो तो तुम.

  • 13. 00:54 IST, 31 अगस्त 2012 nikhil:

    मनमोहन सिंह बोलें तो क्या बोलें ? कुछ बोलने का उनके पास हो तब ना. उनके पास सोनिया चालीस पढ़ने या सोनिया के दरबार में हाजिरी लगाने के अलावा क्या है .

  • 14. 14:30 IST, 31 अगस्त 2012 kanj kumar:

    संस्कृत में एक उक्ति है मौनम् स्वीकृति लक्षणम्. कहीं मन मोहन सिंह की चुप्पी स्वीकारोक्ति तो नही हैं.

  • 15. 14:51 IST, 31 अगस्त 2012 BHEEMAL Dildarnagar:

    एक चुप सौ सुख, अच्छा मनोरंजन हो जाता है.

  • 16. 16:19 IST, 31 अगस्त 2012 E.A.Khan, Jamshedpur - Jharkhand :

    मेरे चाचा कहा करते थे "एक ख़ामोशी हजार बला टली" लेकिन इस बार लगता है यह बला टलने वाली नहीं है. सवाल है हग लोग इस तरह की लूट खसोट की बातें कब तक सुनेंगे. क्या हम लोग इसी लिए पैदा हुए हैं और इन्हीं सब बातों को सुनने के लिए हिंदुस्तान में जिंदा हैं.

  • 17. 18:12 IST, 31 अगस्त 2012 Deep Chand Raja, Pithoragarh, Uttrakhand:

    हमारे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन को देखकर ऐसा लगता है कि आत्मा ही मर गई है.

  • 18. 19:55 IST, 31 अगस्त 2012 B K Singh:

    मैं मानता हूं कि प्रधान मंत्री जी की चुप्पी कुछ लोंगो को अच्छा नही लग रहा है पर मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि जब मनमोहन जी संसद में बोल रहे थे तो विपक्ष क्या भारत के प्रधान मंत्री के पद की गरिमा रखते हुए उनकी बातों को शांति से सुनी ? मैं समझता हूँ की वे लोग जो भारतीय संसद और संविधान को इज़्ज़त नही देते हैंऔर सड़क पर हल्ला करते हैं उन्हें इस तरह का बयान दे कर देश की जनता को गुमराह करने का कोई अधिकार नही है.

  • 19. 23:38 IST, 31 अगस्त 2012 Bansi Butta :

    सोनिया का वफादार, बेकार पीएम

  • 20. 02:20 IST, 01 सितम्बर 2012 Rakesh:

    मदारिन सोनिया : बेटा मनमोहन मेरा दामाद को रस्तरिया दामाद घोसित करवाया ?
    मनमोहन : माता जी रस्तरिया दामाद घोषित तो किया ही सारे इंटरनैशनल एयर पोर्ट पर लिखित आदेश भी दे दिया है, रस्तरिया दामाद का कोई चेकिन नही कर सकता है.
    सोनिया : वाह बेटा मनमोहन, मेरा लूटा हुआ पैसा वो ही लेकर चला जाएगा !

  • 21. 03:22 IST, 01 सितम्बर 2012 Anuj:

    मनमोहन सिंह को अब तक का सबसे भ्रष्ट प्रधानमंत्री कहा जाना चाहिए.

  • 22. 12:28 IST, 06 सितम्बर 2012 Guddu babu:

    मनमोहन सिंह अच्छे प्रधानमंत्री नही हैं उन्हें नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे देना चाहिए.

  • 23. 22:00 IST, 08 सितम्बर 2012 swapnesh chauhan:

    फ़ज़ल साहब, आपने तो भारतीय संसद के स्वर्णिम दिन याद करा दिये...
    और वाकई तबस्सुम बिखर गई वो भाषण याद करके जब वाजपेई साहब ने कहा था लोकपाल के मुद्दे पर राव साहब को घेरते हुए कि उनका फैसला ना लेना भी एक फैसला है... और वाकई कांग्रेस का वह फैसला ना लेने का फैसला आज भी कायम दिखता है...।

  • 24. 15:33 IST, 09 सितम्बर 2012 rash bihari jha:

    मनमोहन सिंह क्या आज के समय में लगभग हर नेता बेईमान,चोर,भ्रष्ट है. चोरों की भीड़ में से ईमानदार !

    कैसे सोच सकते हैं.

  • 25. 15:35 IST, 09 सितम्बर 2012 rash bihari jha:

    शुक्रिया रेहान जी

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