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असल में पागल कौन?

मोहम्मद हनीफ़मोहम्मद हनीफ़|सोमवार, 03 सितम्बर 2012, 13:04 IST

जब भी कोई 14 वर्षीय बच्ची रिम्शा के मानवाधिकारों के बारे में दलीलें देते हुए उसकी मानसिक स्थिति का जिक्र करता है तो मुझे खुद अपनी दिमागी हालत पर संदेह होने लगता है.

पाकिस्तान में गैर मुस्लिमों की संख्या इतनी कम है कि हममें से ज्यातार कुफ्र के खिलाफ जंग के लिए तो हर वक्त तैयार रहते हैं, लेकिन हममें से बहुत कम ने काफ़िर देखे हैं. शायद इस कमी को पूरा करने के लिए हम अच्छे भले मुसलमानों को भी काफ़िर करार देने के लिए हर वक्त तैयार रहते हैं.

हमने काफ़िर ज्यादातर या तो फिल्मों में देखें हैं या फिर अपनी सड़कों पर झाड़ू देते हुए. हालांकि इसमें भी थोड़ी गलतफ़हमी है क्योंकि जमीन पर कूड़ा इतना बढ़ गया है और नौकरियां इतनी कम है कि अब हज़ारों सफाई कर्मचारी मुसलमान हैं. हम अलबत्ता कलमे के पाबंद इन भाइयों को भी अछूत ही समझते हैं.

तो हमने कभी किसी गैर मुसलमान से सलाम दुआ की हो या ना की हो, लेकिन हमें ये यकीन है कि पाकिस्तान में हर ईसाई, हर हिंदू हर रात को सोने से पहले सोचता है कि कल उठ कर कौन सी ऐसी गुस्ताखी करूं कि सोई हुई उम्मत ए मुसलमान गफ़लत के ख्वाब से जग जाए, क्या ऐसा करूं कि मुहल्ले में रहने वाले मुसलमान मेरे घर पर चढ़ाई कर दें, मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से मेरे खिलाफ फतवे जारी होने लगें. मुझे मेरी अपनी हिफाजत के लिए जेल में डाल दिया जाए.

अगर कोई ऐसा सोचता है कि तो उसकी मानसिक स्थिति संदेह के दायरे में है. और अगर हम उनके बारे में ये सोचते हैं तो हमारी दिमागी हालत का सर्टिफिकेट कौन जारी करेगा.

आपने जिंदगी में कभी काफ़िर देखा हो या न देखा हो, 14 साल के बच्चे तो देखे होंगे. अगर आपके अपने बच्चे नहीं हैं तो बहन भाइयों के होंगे, मुहल्ले में खेलते देखा होगा.

जो खुश नसीब होते हैं, उन्हें सुबह सुबह स्कूल की वर्दी पहने गाडियों और बसों में स्कूल जाते देखा होगा. जो कम नसीब हैं उन्हें चाय के होटलों पर और मोटर वर्कशॉप पर डांट खाते सुना होगा. ट्रैफिक सिग्नल पर भीख मांगते देखा होगा या फिर अपने से बड़े आकार वाले थैले उठाए कचरे के ढेरों से कचरा उठाते देखा होगा.

क्या कभी इनको देख कर ऐसा लगा कि ये इस्लाम धर्म को नुकसान पहुंचा सकते हैं. खुदा की खुदाई में बाधा डाल सकते हैं या पैगंबर इस्लाम की शान में कोई गुस्ताखी कर सकते हैं. दुनिया के हर धर्म, हर राजनीतिक व्यवस्था और हर दर्शन में बच्चे मासूम समझे जाते हैं.

तो फिर हम इस हाल में कैसे पहुंचे कि 14 साल की रिम्शा को मासूम साबित करने के लिए पहले ये जरूरी है कि उसे मानसिक रोगी साबित किया जाए. जो जज और डॉक्टर साहेबान रिम्शा के 14 वर्षीय दिमाग की खराबी ढूंढ रहे हैं, उन्हें एक नजर हमारे दिमाग पर भी डालनी चाहिए और हमें बताएं कि असल में मानसिक रोगी कौन है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 17:41 IST, 06 सितम्बर 2012 Abhishek:

    बहुत अच्छे विचार हैं.

  • 2. 23:42 IST, 07 सितम्बर 2012 murari das:

    धन्यवाद!
    यदि आपको इस बारे में जानकारी है तो ऐसे बहुत से मुसलमान भाई भी इस प्रकार के विचार रखते ही होंगे दुनिया को मुसलमान से नहीं कट्टरपंथियों से डर है! इस डर को आप लोग जैसे लोग ही मिटा सकते हैं.

  • 3. 12:11 IST, 08 सितम्बर 2012 Anuj:

    ऐसे धर्म के ठेकेदार खुद नफरत फैलाते हैं और दूसरों पर निशाना साधते हैं. असली पागल वही हैं.

  • 4. 09:37 IST, 20 सितम्बर 2012 makhan:

    काश ऐसी ही सोच उन लोगो की हो जो नफरत का जहर फैलाते हैं , तो सब तरफ शांति हो जाएगी.

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