इस विषय के अंतर्गत रखें जुलाई 2012

इंसाफ का समोसा

क़िस्सा ये है कि लाहौर के लोकल एडमिनिस्ट्रेशन ने एक पुराने क़ानून के तहत अबसे तीन बरस पहले समोसा बनाने वालों को हुक्म दिया कि ख़बरदार अगर किसी ने आज के बाद एक समोसा छह रूपए से ज़्यादा का बेचा तो उसपर कड़ा जुर्माना किया जाएगा.

समोसा बनाने वाले इस हु्क्म से डरने के बजाए हाई कोर्ट में चले गए.

मगर हाई कोर्ट ने सरकार और समोसा बनाने वालों की दलील सुनने के बाद ये फैसला दिया कि चुंकि ख़ुद समोसा इस मुकदमे में अपना बचाव करने के काबिल नहीं लिहाजा ये मुकदमा खारिज किया जाता है.

लेकिन समोसा साज़ों ने हार नहीं मानी और इस फैसले के ख़िलाफ़ जस्टिस इफ्तिख़ार चौधरी की सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया.

अदालत ने फैसला सुनाया कि समोसे पर पंजाब फूड स्टफ कंट्रोल एक्ट 1958 लागू नहीं होता लिहाज़ा पंजाब हुकुमत समोसे की कोई फिक्स क़ीमत मुकर्रर नहीं कर सकती.समोसा किस क़ीमत पर बिकता है ये मामला समोसे और उसे बेचनेवाले का मसला है लिहाजा हुकुमत पंजाब आइंदा इस तरह के मामले में अपनी टांग न अड़ाए तो बेहतर है.

ये फैसला आने की देर थी कि समोसा मारे ख़ुशी के छह रूपए की सीढ़ी से बारह रूपए की छत पर कूद गया और अब वो पकौड़ो, कचौरियों और जलेबियों को हिक़ारत से देख रहा है जिनकी क़ीमत और अवक़ात कोई पूछने वाला नहीं.

सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला इस लिहाज़ से अहम है कि दो-ढ़ाई साल पहले वो चीनी और पेट्रोल की क़ीमत तय करने के बावजूद अपने फैसले पर अमल नहीं कर सकी. न ही किसी प्रधानमंत्री से राष्ट्रपति आसिफ ज़रदारी के ख़िलाफ़ स्विस कोर्ट को ख़त लिखवा सकी.

इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने यक़ीनन समोसे के हक़ में फैसला करते हुए सोचा होगा कि चूंकि समोसे को किसी प्रधानमंत्री की तरह पद से नहीं हटाया जा सकता है इसलिए इज्ज़त इसी तरह बचाई जा सकती है कि समोसे को बरी कर दिया जाए.

मेरे एक वकील दोस्त का कहना है कि अदालत के इस फैसले के पीछे ज़बरदस्त बुद्धिमत्ता है.

समोसे के हक़ में फैसले से साबित हो गया है कि इंसान और समोसा बराबर हैं.

ये बात यक़ीनन अदालत के सामने रही होगी कि समोसा सिर्फ़ लाहौर या पंजाब का मसला नहीं है बल्कि ग़ालिब, बॉलीवुड, मेंहदी हसन, बासमती चावल और आम की तरह पूरे दक्षिणी एशिया की धरोहर है.ये काबुल से कन्याकुमारी तक, मुल्ला उमर से नरेंद्र मोदी तक सबको पसंद है.

इसे जितने शौक़ से मुस्लिम लीग और जमाएते इस्लामी वाले खाते हैं उतने ही शौक़ से जनसंघी, सीपीआईएम और कांग्रेस वाले भी ख़रीदते हैं.

सोवियत यूनियन टूट गया, बर्लिन की दीवार गिर गई, इस्लामाबाद में मुशर्फ़, दिल्ली में बावपेयी और बिहार में लालू न रहा मगर समोसे में आज भी आलू है और कल भी रहेगा.

इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने समोसे को क़ीमत के बंधन से आज़ाद करके जो ऐतेहासिक फै़सला किया है उसकी ज़बरदस्त सराहना होनी चाहिए.

अलबत्ता इंसाफ़ से जलने वाले कुछ लोग ये ज़रूर कहते हैं कि इस वक़्त पाकिस्तान की अदालतों में ऊपर से नीचे तक तक़रीबन दस लाख मुक़दमे कई बरस से सुनवाई का इंतज़ार कर रहे हैं. क़ाश ये मुक़दमा करने और लड़ने वाले भी समोसा होते तो कितना अच्छा होता...

कहां गया भ्रष्टाचार का मुद्दा?

सुशील झासुशील झा|शुक्रवार, 27 जुलाई 2012, 16:58

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भ्रष्टाचार के ख़िलाफ आंदोलन अब आंदोलन की बजाय अपने अंतर्विरोधों के लिए सुर्खियां बटोर रहा है.

साल भर पहले रामलीला मैदान में जिस तरह से जनसैलाब उमड़ा था वो भीड़ इस बार अभी तक देखने को नहीं मिली है.

जो मीडिया पिछले साल तक अन्ना के समर्थन में दिख रहे थे वो भी अब आलोचना करने में लगे हुए हैं.

बहुत कुछ ऐसा हो गया है कि भ्रष्टाचार का मुद्दा पीछे छूट गया सा लगता है. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक ख़बर को मानें तो अन्ना टीम अब अन्ना के नाम पर टोपी और गुड़िया बेच रही है.

कल तक जो मीडिया, अन्ना और भ्रष्टाचार के अलावा किसी और मुद्दे पर बात नहीं करता था वहीं आज भ्रष्ट नेताओं और भ्रष्टाचार के स्थान पर बात होने लगती है अरविंद केजरीवाल की, बाबा रामदेव की और उनके सहयोगी बालकृष्ण की.

इतना ही नहीं जंतर मंतर पर इस बार अन्ना पीछे दिखे. अरविंद केज़रीवाल आगे दिखे. कई लोग शायद इस बात से ही नाराज़ हैं क्योंकि उनका भरोसा अन्ना पर है अरविंद पर नहीं.

जंतर मंतर पर भीड़ है. कितनी इस पर बहस हो सकती है. मंच के ऊपर लिखा है बड़े बड़े अक्षरों में www.facebook.com/indiaagainstcorruption यानी सोशल मीडिया को पूरी तरज़ीह दी जा रही है.

मजे़ की बात यही है कि जहां सोशल मीडिया पर पिछले अन्ना आंदोलन के समर्थन में कई लोग दिखे थे आज वो भी उतने ज़ोरदार समर्थन में सामने नहीं आ रहे हैं.

कई लोग ऐसे भी हैं जो अन्ना के साथ हैं लेकिन उन्हें रामदेव का साथ पसंद नहीं. कुछ महीने पहले ही अरविंद केजरीवाल और रामदेव के बीच मंच पर ही मतभेद की बात सामने आ गई थी.

जंतर मंतर पर शुक्रवार को भी बाबा रामदेव के समर्थक शाम के समय बड़ी संख्या में जुटे लेकिन इससे पहले अन्ना के लिए समर्थन अत्यंत कम ही दिख रहा था.

हालांकि अभी इस आंदोलन के बारे में कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी लेकिन एक बात तय है कि आंदोलन पीछे छूटता जा रहा है. अन्ना, अरविंद, रामदेव आगे आ गए हैं और मीडिया की मगजमारी में भ्रष्टाचार का मुद्दा इतना हास्यास्पद सा लगने लगा है कि आम आदमी सोच रहा है- इससे अच्छा ही था कि नेता भ्रष्टाचार कर रहे थे कम से कम कोई नाटक तो नहीं था.

राष्ट्रपति प्रणब का सपना

विनोद वर्माविनोद वर्मा|बुधवार, 25 जुलाई 2012, 15:19

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एक क़िस्सा है. एक गड़रिया था. वह भेड़ चराते हुए जब एक टीले पर जाकर बैठ जाता था तो उसका बातचीत करने का अंदाज़ बदल जाता था. वह जनहित और न्याय की बातें करने लगता था.टीले से उतरता तो फिर वही गड़रिया का गड़रिया.

धीरे-धीरे वह लोकप्रिय होता गया. एक दिन लोगों को शक हुआ कि टीले में ही कुछ है. उन्होंने टीले को खुदवाया तो उसने नीचे से विक्रमादित्य का सिंहासन निकला.

लोगों को समझ में आ गया कि अनपढ़ गड़रिया उस टीले पर बैठकर इतनी ज्ञान की बातें क्यों किया करता था.

वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने एक बार कहा था कि जिस तरह उस टीले के नीचे विक्रमादित्य का सिंहासन था, उसी तरह से रायसीना की पहाड़ी को खोद के देखा जाए तो किसी पुराने राजा का सिंहासन निकलेगा.

प्रभाष जोशी ने कहा कि कुछ तो ऐसा है जिसकी वजह से वहाँ पहुँचकर हर व्यक्ति की भाषा एक जैसी हो जाती है.

रायसीना पहाड़ी वही बड़ा सा टीला है जिस पर राष्ट्रपति भवन स्थित है.

ये किस्सा याद आया राष्ट्रपति के रूप में कार्यभार ग्रहण करते हुए दिए गए प्रणब मुखर्जी के भाषण को सुनकर.

इस भाषण में प्रणब मुखर्जी ने कहा, " हमारा राष्ट्रीय मिशन वही बने रहना चाहिए जिसे महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, अंबेडकर और मालौना आज़ाद की पीढ़ी ने भाग्य स्वरुप हमारे सुपुर्द किया था, ग़रीबी के अभिशाप को ख़त्म करना और युवाओं के लिए रोजगार के ऐसे अवसर पैदा करना, जिससे वे भारत को तीव्र गति से आगे ले जाएँ."

उन्होंने कहा कि भूख से बड़ा अपमान कोई नहीं है और वे चाहते हैं कि ग़रीबों का इस तरह से उत्थान किया जाए कि जिससे ग़रीबी शब्द आधुनिक भारत के शब्दकोश से मिट जाए.

प्रणब मुखर्जी चार दशकों से भी अधिक समय से भारतीय राजनीति की मुख्य धारा में हैं.

वे उस समय भी सत्ताधारी दल का हिस्सा थे, जब प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी ने 'ग़रीबी हटाओ' का नारा दिया था.

वे उस घटना के भी गवाह हैं जब प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गांधी ने कहा था कि केंद्र से भेजे गए एक रुपए में से जनता तक 15 पैसे ही पहुँचते हैं.

वे उस समय भी सत्ता प्रतिष्ठान का हिस्सा थे, जब वित्तमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह देश के दरवाज़े आर्थिक उदारीकरण के लिए खोल रहे थे और महात्मा गांधी को उद्धरित करते हुए आखिरी आदमी की बात कर रहे थे.

वे उस समय भी सरकार में थे जब योजना आयोग की एक रिपोर्ट बता रही थी कि देश में 80 प्रतिशत लोग 20 रुपए प्रतिदिन से भी कम में गुज़ारा कर रहे हैं.

संयोगवश वे उस समय भी सत्ता से जुड़े हुए थे जब योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र देकर कहा कि जो शहरी 32 रुपए और जो ग्रामीण 26 रुपए रोज़ कमाता है, वह ग़रीब नहीं है.

इन चार दशकों में कई और ज़िम्मेदारियों के अलावा एक बार वित्त राज्यमंत्री, दो बार वित्तमंत्री और एक बार योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके प्रणब मुखर्जी को ग़रीबी और भूख पर इस तरह द्रवित होते किसी ने नहीं देखा.

उनके पेश किए हुए बजटों में किसी ने ग़रीबी और भूख़ को ख़त्म करने के क्रांतिकारी उपायों की झलक नहीं देखी.

बल्कि उनकी छवि देश के कॉर्पोरेट प्रतिष्ठानों के प्रिय मित्र की ही रही और यह कोई संयोग नहीं है कि कॉर्पोरेट प्रतिष्ठानों की छवि कम से कम ग़रीबों के हितचिंतकों की नहीं है. यह भी संयोग नहीं है कि टीम अन्ना उनके ख़िलाफ़ आरोपों का एक मोटा पुलिंदा लिए घूम रही है.

पहले प्रणब मुखर्जी ऐसी जगहों पर थे जहाँ से वे सरकार की नीतियों को प्रभावित कर सकते थे, चाहते तो ग़रीबों का भला कर सकते थे, भूख को मिटा सकते थे, लेकिन अफ़सोस कि वे ऐसा न कर पाए न ऐसा करने की कोशिश करते हुए दिखे.

अब वे जहाँ हैं वहाँ से वे ज्ञानोपदेश ही दे सकते हैं और आज के बाद वही कह सकेंगे जिस पर मंत्रिमंडल की स्वीकृति की मुहर लगी होगी.

ऐसे में उनके भाषण का एक और वाक्य याद आता है, जिसे उनके प्रायश्चित की तरह देखा जा सकता है, "कभी-कभी पद का भार व्यक्ति के सपनों पर भारी पड़ जाता है."

क्या कहें कि प्रणब मुखर्जी पर चार दशकों में एक भी ऐसा मौक़ा नहीं आया जब उनका सपना उनके पद भार के बोझ तले दबा न हो.

अब जो पद उनके पास है वह सपने तो दिखा सकता है लेकिन उसे पूरा करने में रत्ती भर भी मदद नहीं कर सकता.

जब मैं 'काका' से मिला...

ज़ुबैर अहमदज़ुबैर अहमद|गुरुवार, 19 जुलाई 2012, 21:12

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कई साल पहले जब मैं राजेश खन्ना से उनके घर मिलने गया तो वो अपनी लुंगी कस रहे थे और बाल काले कर रहे थे. दिल्ली आए उन्हें कुछ ही हफ्ते हुए थे - नई दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने. मैं एक छोटे शहर का रहने वाला अदना सा रिपोर्टर.

मेरे सामने उनकी छवि थी एक बड़े सुपर स्टार की लेकिन सिल्क लुंगी और बनियान में लिपटे राजेश खन्ना एक साधारण आदमी नज़र आ रहे थे. उनके इर्द गिर्द युवा कांग्रेस के नेता चक्कर लगाया करते थे जिनपर उन्हें बिलकुल भरोसा नहीं था. वो खुद को दिल्ली में तनहा महसूस करते थे.

मैंने पूछा अब भी आप खुद को तनहा महसूस करते हैं तो उन्होंने कहा सियासत अभिनेताओं की समझ से बाहर की चीज़ है. उनकी निजी ज़िन्दगी की अनिश्चित्ता उनकी सियासी ज़िन्दगी में भी दिखती थी.

एक बार युवा कांग्रेस के नेताओं के कहने पर वो दिल्ली के तिलक मार्ग पर धरना देने बैठ गए, उनकी मांग थी वो दिल्ली पुलिस कमिश्नर से बात करना चाहते हैं. सड़क पर ट्रैफिक जाम हो गया. मैं महसूस कर रहा था की वो अपने इस फैसले से खुश नहीं हैं.

उन्होंने मेरे कान में कहा क्या मैं ठीक कर रहा हूँ. मैंने कहा नहीं. तो वो वहां से फौरन उठ गए और सामने तिलक मार्ग पुलिस स्टेशन जा कर अपनी मांग दोहराई. सन 2004 में जब मेरा तबादला मुम्बई हुआ तो इत्तफाक से मैं उनका पड़ोसी बन गया.

उनकी कोठी आशिर्वाद से हर रोज़ गुज़रता था और सोचता था क्या आज हमारी मुलाक़ात हुई तो वो हमें पहचानेंगे. और एक दिन हमारी मुलाक़ात हुई उनके घर पर और उन्होंने मुझे पहचान लिया. बिलकुल उसी अंदाज़ में मुझसे मिले जैसे दिल्ली में हम मिला करते थे. खुल कर.

दिल्ली की सियासत के अखाड़े में वो एक अनाड़ी खिलाडी थे. मेरी पहली मुलाक़ात के दौरान ही ट्रिपुल 5 सिगरेट फूंकते हुए उन्होंने कहा था वो यहाँ तनहा महसूस कर रहे हैं. वो सुपर स्टार के अपने स्टेटस के कारण अपनी दुनिया में रहना पसंद करते थे. तन्हाई से उनका चोली दामन का साथ था. लेकिन सबसे हंस कर गरमजोशी से मिलते थे.

मुझसे खुल कर बातें करते थे. पता नहीं मुझ पर उनके भरोसे का कारण किया था. शायद उन्हें मालूम था कि हमारी बातें किसी खबर का रूप धारण नहीं करेंगी. मुझे उनसे मिल कर हमेशा महसूस हुआ उन्हें एक ऐसे साथी की तलाश है जिस पर वो पूरी तरह से विश्वास कर सकें. उनसे मेरी आखिरी मुलाक़ात वर्ष 2009 में हुई थी. उस समय वो काफी दुबले और कमज़ोर नज़र आ रहे थे. लेकिन पहले से भी ज्यादा तनहा. शायद तन्हाई ही उन्हें मार गई.

ज़िया ज़िंदा है

मोहम्मद हनीफ़मोहम्मद हनीफ़|रविवार, 15 जुलाई 2012, 14:45

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न कहीँ मातमी जलसा, न कोई स्मृति टिकट, न किसी बड़े चौक पर उनकी प्रतिमा, न किसी पार्टी झंडे पर उनकी तस्वीर, न उनकी मज़ार पर प्रशंसकों की भीड़, न किसी को यह पता कि मज़ार के नीचे क्या दफ़न है.

न किसी राजनीतिक दल के घोषणापत्र में उनके सिद्धांत, न समय उठते राजनीतिक हंगामों में उनकी बात, न बड़े लोगों के ड्राईंग रुमों में उनके साथ खिंचवाई हुई तस्वीर, न किसी पुस्तकालय में उनके हाथ ही लिखा हुआ कोई लेख, न कोई राजनेता छाती पर हाथ मार कर कहता है कि मैं उनका मिशन पूरा करुँगा, न कोई दुआ के लिए हाथ उठाता है कि मौला हमें एक ऐसा ही मुक्ति दिलाने वाला और दे.

यदि ये बच्चों की कहानी होती तो हम यहाँ यह कह सकते थे कि बस सिद्ध हुआ कि अत्याचार को विराम नहीं, अत्याचारी को कोई अच्छे शब्दों में याद नहीं रखता, अपने आप को ख़ुदा समझने वाले रेत की प्रतिमा होते हैं.

इतिहास सबसे बड़ा न्याय दिलाने वाला है और उसकी सबसे बड़ी सज़ा यह है कि वह आपका नाम-ओ-निशान मिटा देता है. जिस व्यक्ति ने पूरे राष्ट्र को टकटकी पर लटकाया, संविधान को कागज़ का चीथड़ा बताया, जनता के नेताओं को सूली पर लटकाया, बाक़ी बचे राजनेताओं को अपने दर का कुत्ता क़रार दिया, जो अपने लोगों को गुलाम बना कर अफ़गानिस्तान, भारतीय पंजाब और कश्मीर को आज़ाद कराने चला, जिसने अपनी इच्छा को अल्लाह का क़ानून क़रार दिया और अल्लाह के क़ानून को गली गली बदनाम किया. आज उनका नाम भी भुला दिया गया.

उनके घर से लाभ उठाने वाले भी उनके ज़िक्र पर यूँ मुँह बनाते हैं जैसे गले में हराम चीज़ आ गई हो.

ज़िया किसी इंसान का नाम होता तो शायद हम भूल गए होते लेकिन वह एक सोच का नाम था, विचारधारा का नाम था, या यूँ कहिए कि एक बीमारी का नाम था जो हमारे ख़ून में रच बस गई और हमें पता भी नहीं चला.

जब भी कभी 'ज़िंदा है भुट्टो ज़िंदा है' का नारा सुनता हूँ तो जी चाहता है कि उन दीवानों को समझाऊँ कि नहीं भुट्टो फाँसी पर झूल गया, आओ तुम्हें दिखाता हूँ कि कौन ज़िंदा है. देखो तुम्हारी सड़कों, चौकों पर, तुम्हारे मोबाईल फोन की रिंगटोन में, जिधर देखो, जिधर सुनो, ज़िया ज़िंदा है.

वह ज़िंदा है हमारे बच्चों को पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में, उनको सुनाई जाने वाली लोरियों में, हमारे संविधान, क़ानून में, उस क़ानून की रक्षा करने वालों के ज़मीर में, उस क़ानून को अल्लाह का क़ानून बनाने का वादा करने वाले के दिमाग़ में. वह ज़िंदा है मस्जिदों में फटने वाले युवाओं के दिलों में, वह ज़िंदा है टीवी के ड्रामों में, टीवी टॉक-शो से मीज़बानों में, हमारे गले से निकली जाली अरबी आवाज़ों में, वह ज़िंदा है हिजाबों में, नक़ाबों में, हीरोइन की दौलत से बने मेहलों में, हराम-हलाल करते बैंक खातों में.

वह ज़िंदा है शादी पर चलाई जाने वाली कलाशनिकोव की आवाज़ में, वह छिपा है उस चौक पर जहाँ 70 वर्षीय बुढ़िया भीख मांगती है और आपको हाजी साहब कह कर पुकारती है, वह ज़िंदा है हर उस पुलिस वाले के सवाल में जब वह कहता है कि निकाहनामा कहाँ है.

वह ज़िंदा और आसिया बीबी की काल कोठड़ी का पहरेदार है. वह हर अहमदी, हर शिया, हर हिंदू, हर ईसाई के सिर पर लटकी तलवार है. (उनमें मज़ार पर धमाल डालने वालों, या रसूल अल्लाह कहने वालों या नंगे सिर नमाज़ पढ़ने वालों को भी शामिल करें).

वह ज़िंदा है हमारे राजनीतिक ढांचे में, हमारी चादर और चार-दीवारी में, हमारे सकारात्मक परिणामों में, हमारे निज़ाम-ए-मुस्तफा की तलाश में, हमारे उम्मत-ए-मुसलमा के सपने में, वह ज़िंदा है हमारे हर अज़ाब (पीड़ा) में.

जब अहमदपुर शरकिया के चनी गोठ चौक पर हज़ारों लोग इकट्ठे होते हैं और एक मलंग पर तेल छड़कना शुरु करते हैं तो वह उस भीड़ में शामिल हर शख़्स के दिल में ज़िंदा है. जब मलंग शख़्स को आग लगाई जाती है और वह चीख़ता तो लोगों की ख़ामोशी में से यही आवाज़ आती है. देखो मैं ज़िंदा हूँ.

दुनिया का है बुश हाउस

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|गुरुवार, 12 जुलाई 2012, 18:23

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इमारत जिसे बनाया गया था ट्रेड सेंटर के तौर पर, मगर उसकी क़िस्मत में लिखा था 70 वर्षों तक दुनिया भर के करोड़ों लोगों से हर रोज़ पचासों भाषाओं में बात करना.

वह इमारत अब अचानक चुप हो गई है, स्टूडियो के बाहर जलती लाल बत्तियाँ बुझ गई हैं, घड़ी अब भी टिक-टिक चल रही है, याद दिला रही है कि वक़्त चलता और बदलता रहता है.

अलग संवाददाताओं की बुश हाउस की यादें पढ़ने के लिए क्लिक करें

बुश हाउस कोई ताज महल या बकिंघम पैलेस नहीं है जिसकी शान में क़सीदे पढ़े जाएँ, बुश हाउस एक विचार है, एक संस्कृति है. विश्व बंधुत्व की मिसाल, भाषाओं और देशों की सीमाओं से परे.

1920 के दशक में सफ़ेद पत्थर से बनी एक आठ मंज़िला इमारत है बुश हाउस, उस जैसी और उससे भी भव्य इमारतें मध्य लंदन में न जाने कितनी हैं, मगर किसी की आवाज़ इतने कानों और इतने दिलों तक नहीं पहुँची.

अंतरराष्ट्रीय रेडियो प्रसारण का पर्याय बन चुके बुश हाउस को छोड़ना बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के ज़्यादातर पत्रकारों के लिए व्यक्तिगत सदमे जैसा रहा है, वे जिस नई इमारत में गए हैं वह अधिक सुविधा संपन्न और आधुनिक है, मगर मेरे ज़्यादातर सहकर्मी यही कहते हैं-- 'लेकिन बुश हाउस की बात ही कुछ और थी.'

यह 'बात ही कुछ और' क्या है, इसे बुश हाउस में काम किए बग़ैर समझना ज़रा कठिन है.

26 अगस्त 1997 को जब मैं लगभग पचास फुट ऊँचे खंभों के नीचे से गुज़कर मुख्य दरवाज़े तक पहुँचा तो इमारत ने जैसे धीरे से कान में कहा, "मैंने बहुत कुछ सुना और कहा है." बुश हाउस के कोने-कोने में दुनिया की युगांतकारी घटनाओं की स्मृतियाँ बिखरी थीं.

जॉर्ज ऑरवेल, वीएस नॉयपाल से लेकर बलराज साहनी जैसे लोगों ने यहाँ से प्रसारण किया, दूसरे विश्व युद्ध से लेकर इराक़ के युद्ध तक हर बड़ी घटना का हाल यहीं से पूरी दुनिया को सुनाया गया.

मगर इन सबके ऊपर एक बात थी, वह थी बुश हाउस के संस्कार और उसकी संस्कृति. ईमानदारी और लगन से काम करने वाले पत्रकार हर संस्थान में मौजूद हैं, पर बुश हाउस का माहौल ऐसा था कि उसमें पक्षपातपूर्ण या तथ्यों से परे जाकर बात कहने की गुंजाइश ही नहीं थी.

यह माहौल यूँ ही नहीं बना था, दशकों तक अनेक पत्रकारों ने कड़ी मेहनत, अनुशासन और कई बार तकलीफ़देह ईमानदारी की पूंजी लगाकर यह माहौल तैयार किया था. करोड़ों लोगों का विश्वास जीतने के क्रम में दुनिया भर के शक्तिशाली लोगों को नाराज़ भी किया था, जिनमें पूर्व ब्रितानी प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर भी शामिल थीं.

बुश हाउस में काम करने वाले लोगों के बारे में मेरा एक अफ़ग़ान दोस्त कहता था, 'जिस तरह काबुल में भी गधे होते हैं, उसी तरह बुश हाउस में भी हैं, मगर यहाँ गधों को लात चलाने की तमीज़ सिखा दी जाती है.'

24 घंटे जागने वाली इमारत, जिसमें हर रंग, रूप, वेश भाषा के लोग न सिर्फ़ काम करते थे बल्कि एक तरह से अपनी ज़िंदगी जीते थे. किसी दूर देश से ठंडे लंदन आने वाले एकाकी व्यक्ति के लिए सुखद टापू की तरह था बुश हाउस.

बुश हाउस में लगातार ट्रेनिंग चलती रहती थी, नए प्रसारकों को लगातार ट्रेनिंग के दौर से गुज़रना होता था, ट्रेनिंग में अक्सर दस-बारह लोग साथ होते जो अलग-अलग देशों से आते थे. नए देश और नए माहौल में साथ समय बिताने की वजह से उनके बीच गहरा जुड़ाव हो जाता था, कई बार इश्क़ मोहब्बत भी.

हर प्रसारक एक-दूसरे की समझ और जानकारी सहज भाव से कैंटीन की गपशप में बढ़ा रहा होता था, जो निश्चित रूप से हमारे प्रसारणों को अधिक समृद्ध बनाती रही है.

अपने-आप में एक छोटा संयुक्त राष्ट्र, जिसकी कैंटीन ऐसा खाना परोसा जाता जिसमें हर किसी को अपनी पसंद की कोई-न-कोई चीज़ आसानी से मिल जाए, किसी टेबल पर चीनी, तो किसी पर सोमालियाई, तो किसी पर ऐसी भाषा सुनाई देती जिसे पहचानना मुश्किल होता.

अक्सर कोई हमारे टेबल पर आकर पूछता, या हम किसी और टेबल पर जाकर पूछते, "आप लोग किस भाषा में बात कर रहे हैं?" उर्दू बोलने वाले चीनी, हिंदी बोलने वाले सोमालियाई और ममता-माया-जलललिता जैसी महिला नेताओं पर गहरी नज़र रखने वाला ईरानी दोस्त सब यहीं मिले.

किरगिज़, अज़ेरी, किरूंडी और किनयारवांडा ऐसी भाषाएँ हैं जिनमें बीबीसी वर्ल्ड सर्विस आज भी प्रसारण करती है मगर ईमानदारी की बात कहूँ तो बुश हाउस आने से पहले मैंने उनका नाम तक नहीं सुना था.

बुश हाउस में सूडान, सोमालिया, सऊदी अरब, बर्मा और उज़्बेकिस्तान जैसे देशों से आए प्रसारकों के साथ बैठकर बातें करने से दुनिया की जो तस्वीर मेरे मन पर अंकित हुई है, वह न सिर्फ़ प्रामाणिक है बल्कि जनभावनाओं से जुड़ी है, जाने कितनी किताबें पढ़कर भी ये समझ हासिल नहीं हो सकती.

आंग सान सू 'ची' की स्पेलिंग में 'के वाई आई ' क्यों है, यह जानने के लिए मुझे अपने बर्मी सहकर्मी की जो मदद हासिल है वह किस प्रसारक के नसीब में है? बर्मी में दो तरह के 'च' हैं जैसे हिंदी में 'श' और 'ष', ऐसी असंख्य छोटी-छोटी जानकारियाँ बुश हाउस के प्रसारकों से मेलजोल की देन है.

मेरे पास पाकिस्तानी लतीफ़ों का ख़ज़ाना है जिन्हें यहाँ लिखना ठीक नहीं होगा. जमैका का जर्क चिकेन, इंडोनेशिया का नासी गोरेंग और तुर्की के बकलावा पहली बार बुश हाउस में ही चखे.

मेरे भीतर, मेरे उन सारे दोस्तों के भीतर जो कभी यहाँ काम कर चुके हैं, एक बुश हाउस है, हमारी सोच में, हमारी समझ में, हमारी रगों में दौड़ता बुश हाउस है, जो हमेशा रहेगा.

अच्छे बच्चे परे हटो

अविनाश दत्तअविनाश दत्त|शुक्रवार, 06 जुलाई 2012, 15:08

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मैं इन दिनों बड़ा चिंतित हूँ. आप कहेंगे तो मैं क्या करूँ?

वैसे आप कुछ कर भी नहीं सकते, जो कर सकते थे वो नकारा कर दिए गए और जो नहीं कर सकते थे वो कर गुज़रे.

मतलब?

क्या कहूं भाई. मेरे बड़े बुजुर्ग यह हमेशा कहते थे कि बिना सोचे कोई काम ना करना पर क्यों कहते थे यह अब समझ में आया.

किस्सा यह है कि मेरी एक पौने दो साल की बेटी है.

नहीं, मुझे उसके दहेज़ की या अपने कुल के नाम को आगे बढ़ाने की कोई चिंता नहीं है. मेरी चिंता उससे बड़ी है.

मैं सुबह अखबार पढ़ता था और मेरी बेटी तस्वीर पर उंगली रख कर पूछती थी कि यह किसकी तस्वीर है मैं बिना सोचे समझे बता देता था और आगे अखबार पढ़ने लगता था. नतीजा यह हुआ कि मेरी बेटी ममता बनर्जी और बराक ओबामा टाइप लोगों को पहचानने लगी.

आप कहेंगे कि ठीक तो है सब बच्चे ऐसा ही करते हैं. पर दादा यह सामान्य हो सकता है अच्छा नहीं. ना केवल उसके लिए बल्कि मेरे लिए भी. कहीं मुझ पर कोई पुलिस केस ना करवा दे किसी रोज़.

संदर्भ सहित व्याख्या करूँ?

पिछले दिनों एक ख़बर छपी कि मानव संसाधन मंत्री ने आदेश दिया है कि एनसीईआरटी की किताबों में छपे कई आपत्तिजनक गंभीर राजनीतिक और सामाजिक टिप्पणियों वाले कार्टून निकाल दिए जाएं.

अंदेशा है कि इनकी वजह से किताब को पढ़ने वालों के बाल मन कहीं राजनीति से कलुषित ना हो जाएं, वो तुके बेतुके सवाल ना पूछने लगें. बच्चे सामाजिक धाराओं में बह रहे काले, सफ़ेद और मटमैले मिले जुले रंगों को पहचानने के फेर में ना पड़ जाएं.

इतिहास गवाह है कि बात निकलती है तो दूर तलक जाती ही है.

जिस अंग्रेज़ टीसी ने गाँधी जी को ट्रेन से धकेला था उसे ग़रीब को यह अंदाज़ तो ना होगा कि यही आदमी सल्तनते बर्तानिया ले डूबेगा. ट्यूनीशिया में जिस अफसर ने एक ग़रीब फल बेचने वाले मोहम्मद बुआज़ीज़ी को लप्पड़ रसीद कर उसका सामान झटक लिया था उसे यह तो अंदाज़ ना होगा कि इस झापड़ के चलते कई सरकारें चल बसेंगीं.

मैं आपको अंदर की ख़बर दूं अगर आपका बच्चा छोटा है तो गाँठ बांध लीजिएगा. इसी तरह से यह कार्टून को निकलने की बात यहाँ नहीं खत्म होगी.

अब आगे होगा यह कि परीक्षाओं में बच्चों को बुलाया जाएगा और सवाल पूछे जाएंगे और जो बच्चे हर सवाल का सही उत्तर दे देंगे उन्हें भगा दिया जाएगा. और जो बच्चे आम और केले में फ़र्क नहीं कर पाएंगे और उन्हें तत्काल स्कूलों में दाखिला दे दिया जाएगा और अगली कक्षा में पहुंचा दिया जाएगा.

जो बच्चे हर सवाल के उत्तर में केवल हाँ कहेंगे उन बच्चों को सरकार वजीफ़ा देगी और बड़ा होने के बाद सीधे भारतीय प्रशासनिक सेवा में डाल दिया जाएगा.

जो बच्चे ज़्यादा ही क्यों-क्यों का मुरब्बा खाते पाए जाएंगे उनके माँ-बापों को जेल भेज दिया जाएगा अपने बच्चों के मन में सामाजिक समरसता को बिगाड़ने के लिए ज़हर के बीज बोने के जुर्म में.

आदर्श बच्चा कैसा होगा?

आदर्श बच्चा वह होगा जो सवाल पूछने पर चुप हो जाएगा, मंद-मंद मुस्कुराने लगेगा और उत्तर के हर विकल्प को सही बता देगा.

तो प्यारेमोहन लग जाओ काम से और घर में अगर कोई बच्चा हो तो उसे ढंग से सिखाओ पढ़ाओ और वैसे एक बात कहूं अगर यह सफलता की यह संजीवनी बूटी खुद भी घोल कर पी जाओ तो कोई हर्ज़ नहीं.

जहाँ आँख खुले वहीं सबेरा समझो.

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