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दुनिया का है बुश हाउस

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|गुरुवार, 12 जुलाई 2012, 18:23 IST

इमारत जिसे बनाया गया था ट्रेड सेंटर के तौर पर, मगर उसकी क़िस्मत में लिखा था 70 वर्षों तक दुनिया भर के करोड़ों लोगों से हर रोज़ पचासों भाषाओं में बात करना.

वह इमारत अब अचानक चुप हो गई है, स्टूडियो के बाहर जलती लाल बत्तियाँ बुझ गई हैं, घड़ी अब भी टिक-टिक चल रही है, याद दिला रही है कि वक़्त चलता और बदलता रहता है.

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बुश हाउस कोई ताज महल या बकिंघम पैलेस नहीं है जिसकी शान में क़सीदे पढ़े जाएँ, बुश हाउस एक विचार है, एक संस्कृति है. विश्व बंधुत्व की मिसाल, भाषाओं और देशों की सीमाओं से परे.

1920 के दशक में सफ़ेद पत्थर से बनी एक आठ मंज़िला इमारत है बुश हाउस, उस जैसी और उससे भी भव्य इमारतें मध्य लंदन में न जाने कितनी हैं, मगर किसी की आवाज़ इतने कानों और इतने दिलों तक नहीं पहुँची.

अंतरराष्ट्रीय रेडियो प्रसारण का पर्याय बन चुके बुश हाउस को छोड़ना बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के ज़्यादातर पत्रकारों के लिए व्यक्तिगत सदमे जैसा रहा है, वे जिस नई इमारत में गए हैं वह अधिक सुविधा संपन्न और आधुनिक है, मगर मेरे ज़्यादातर सहकर्मी यही कहते हैं-- 'लेकिन बुश हाउस की बात ही कुछ और थी.'

यह 'बात ही कुछ और' क्या है, इसे बुश हाउस में काम किए बग़ैर समझना ज़रा कठिन है.

26 अगस्त 1997 को जब मैं लगभग पचास फुट ऊँचे खंभों के नीचे से गुज़कर मुख्य दरवाज़े तक पहुँचा तो इमारत ने जैसे धीरे से कान में कहा, "मैंने बहुत कुछ सुना और कहा है." बुश हाउस के कोने-कोने में दुनिया की युगांतकारी घटनाओं की स्मृतियाँ बिखरी थीं.

जॉर्ज ऑरवेल, वीएस नॉयपाल से लेकर बलराज साहनी जैसे लोगों ने यहाँ से प्रसारण किया, दूसरे विश्व युद्ध से लेकर इराक़ के युद्ध तक हर बड़ी घटना का हाल यहीं से पूरी दुनिया को सुनाया गया.

मगर इन सबके ऊपर एक बात थी, वह थी बुश हाउस के संस्कार और उसकी संस्कृति. ईमानदारी और लगन से काम करने वाले पत्रकार हर संस्थान में मौजूद हैं, पर बुश हाउस का माहौल ऐसा था कि उसमें पक्षपातपूर्ण या तथ्यों से परे जाकर बात कहने की गुंजाइश ही नहीं थी.

यह माहौल यूँ ही नहीं बना था, दशकों तक अनेक पत्रकारों ने कड़ी मेहनत, अनुशासन और कई बार तकलीफ़देह ईमानदारी की पूंजी लगाकर यह माहौल तैयार किया था. करोड़ों लोगों का विश्वास जीतने के क्रम में दुनिया भर के शक्तिशाली लोगों को नाराज़ भी किया था, जिनमें पूर्व ब्रितानी प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर भी शामिल थीं.

बुश हाउस में काम करने वाले लोगों के बारे में मेरा एक अफ़ग़ान दोस्त कहता था, 'जिस तरह काबुल में भी गधे होते हैं, उसी तरह बुश हाउस में भी हैं, मगर यहाँ गधों को लात चलाने की तमीज़ सिखा दी जाती है.'

24 घंटे जागने वाली इमारत, जिसमें हर रंग, रूप, वेश भाषा के लोग न सिर्फ़ काम करते थे बल्कि एक तरह से अपनी ज़िंदगी जीते थे. किसी दूर देश से ठंडे लंदन आने वाले एकाकी व्यक्ति के लिए सुखद टापू की तरह था बुश हाउस.

बुश हाउस में लगातार ट्रेनिंग चलती रहती थी, नए प्रसारकों को लगातार ट्रेनिंग के दौर से गुज़रना होता था, ट्रेनिंग में अक्सर दस-बारह लोग साथ होते जो अलग-अलग देशों से आते थे. नए देश और नए माहौल में साथ समय बिताने की वजह से उनके बीच गहरा जुड़ाव हो जाता था, कई बार इश्क़ मोहब्बत भी.

हर प्रसारक एक-दूसरे की समझ और जानकारी सहज भाव से कैंटीन की गपशप में बढ़ा रहा होता था, जो निश्चित रूप से हमारे प्रसारणों को अधिक समृद्ध बनाती रही है.

अपने-आप में एक छोटा संयुक्त राष्ट्र, जिसकी कैंटीन ऐसा खाना परोसा जाता जिसमें हर किसी को अपनी पसंद की कोई-न-कोई चीज़ आसानी से मिल जाए, किसी टेबल पर चीनी, तो किसी पर सोमालियाई, तो किसी पर ऐसी भाषा सुनाई देती जिसे पहचानना मुश्किल होता.

अक्सर कोई हमारे टेबल पर आकर पूछता, या हम किसी और टेबल पर जाकर पूछते, "आप लोग किस भाषा में बात कर रहे हैं?" उर्दू बोलने वाले चीनी, हिंदी बोलने वाले सोमालियाई और ममता-माया-जलललिता जैसी महिला नेताओं पर गहरी नज़र रखने वाला ईरानी दोस्त सब यहीं मिले.

किरगिज़, अज़ेरी, किरूंडी और किनयारवांडा ऐसी भाषाएँ हैं जिनमें बीबीसी वर्ल्ड सर्विस आज भी प्रसारण करती है मगर ईमानदारी की बात कहूँ तो बुश हाउस आने से पहले मैंने उनका नाम तक नहीं सुना था.

बुश हाउस में सूडान, सोमालिया, सऊदी अरब, बर्मा और उज़्बेकिस्तान जैसे देशों से आए प्रसारकों के साथ बैठकर बातें करने से दुनिया की जो तस्वीर मेरे मन पर अंकित हुई है, वह न सिर्फ़ प्रामाणिक है बल्कि जनभावनाओं से जुड़ी है, जाने कितनी किताबें पढ़कर भी ये समझ हासिल नहीं हो सकती.

आंग सान सू 'ची' की स्पेलिंग में 'के वाई आई ' क्यों है, यह जानने के लिए मुझे अपने बर्मी सहकर्मी की जो मदद हासिल है वह किस प्रसारक के नसीब में है? बर्मी में दो तरह के 'च' हैं जैसे हिंदी में 'श' और 'ष', ऐसी असंख्य छोटी-छोटी जानकारियाँ बुश हाउस के प्रसारकों से मेलजोल की देन है.

मेरे पास पाकिस्तानी लतीफ़ों का ख़ज़ाना है जिन्हें यहाँ लिखना ठीक नहीं होगा. जमैका का जर्क चिकेन, इंडोनेशिया का नासी गोरेंग और तुर्की के बकलावा पहली बार बुश हाउस में ही चखे.

मेरे भीतर, मेरे उन सारे दोस्तों के भीतर जो कभी यहाँ काम कर चुके हैं, एक बुश हाउस है, हमारी सोच में, हमारी समझ में, हमारी रगों में दौड़ता बुश हाउस है, जो हमेशा रहेगा.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 01:38 IST, 13 जुलाई 2012 Amit Ranjan:

    वक़्त के साथ बीबीसी सदा बदलती रही है.अब बीबीसी ने अपना घर भी बदल लिया.राजेश प्रियदर्शी जी जब हम चाहते है वक़्त यही ठहर जाये. मगर पल में रुत बदल जाती है. आप काफी भावुक हो रहे है. हम भी है. फिर भी कुछ है जो नहीं बदलता. वो है बीबीसी, उसके प्रसारको और श्रोताओं/पाठकों का अटूट सम्बन्ध.

  • 2. 10:21 IST, 13 जुलाई 2012 BHEEMAL Dildarnagar:

    काफ़ी रोचक जानकारी पढ़ी, लगा कि एक अंतर्राष्ट्रीय भेलपुरी -पानीपुरी वाले के खोमचे पर पहुँच गए हों हम. स्वाद परिवर्तन के लिए धन्यवाद. आप मेरी बात को अनुचित न समझो, हम भारतीयों को इम्पोर्टेड गुड्स के लिए काफ़ी दीवानगी और है. बड़ी शान से कहते हैं हम, घड़ी इम्पोर्टेड है, टाई, ब्लेज़र, पैंट, शेविंग क्रीम,और रेज़र आदी आदी. हमको तो अपनी महारानी और युवराज भी इम्पोर्टेड कहने मैं गर्व होता है. हमारी मानसिकता बदलना असंभव है. कभी समय मिले तो विविध भारती पर भी कुछ लिखने कि चेष्टा करियेगा, मेरी गुज़ारिश है. बुश हाउस को आप भली प्रकार जानते हैं, पर भारत को नहीं जानते, ठीक ठीक.

  • 3. 10:36 IST, 13 जुलाई 2012 Bhawesh Jha:

    वैसे हम सब भी कम भाग्यशाली नहीं हैं जिन्हें ऐसी जगह से आने वाली आवाज हमेशा सुनाई देती रही. आप को हम तक इसकी झलक पहुँचाने के लिए धन्यवाद.

  • 4. 10:36 IST, 13 जुलाई 2012 Mohd Anis:

    राजेश जी जैसा आप ने 12 जून के प्रसारण में बताया वह वाकई हम लोगों के लिए बहुत ज्यादा दुर्लभ और रोमांचकारी ज्ञान था, समस्त बीबीसी टीम को यकीन आए ना आए पर मैं पूरी ईमानदारी से कह रहा हूँ पूरी रिपोर्टिंग सुनने के बाद मैं बहुत ही रोमांचित हूँ उतहा और समस्त बीबीसी टीम को तहे दिल से शुक्रिया.

  • 5. 10:43 IST, 13 जुलाई 2012 vineeta:

    बहुत अच्छा लिखा है आपने. एकदम दिल से और दिल को छूनेवाला.

  • 6. 10:55 IST, 13 जुलाई 2012 avinash yadav:

    वाह राजेश जी मुझे कंप्यूटर के सामने बैठकर ऐसा महसूस हो रहा है कि मैंने सारी दुनिया कि सैर कर ली. किसी जगह पर बिताये गए पल हमेशा जेहन में रहते हैं. धन्यवाद इतनी सारी बातें बताने के लिए. ये सब बीबीसी ही बता सकती है.

  • 7. 11:49 IST, 13 जुलाई 2012 Iqbal Fazli, Rampur (UP):

    सच बुश हाउस महान था. बीबीसी की निष्पक्षता बुश हाउस में ही फली फूली है. “परिवर्तन सनासर का नियम है” फिर भी बुश हाउस बीबीसी के लाखो करोड़ों श्रोताओं के के दिल में बुश हाउस हमेशा रहेगा. खुदा हाफ़िज़ बुश हाउस

  • 8. 15:13 IST, 13 जुलाई 2012 kanj kumar:

    सचमुच एक स्वर्णिम युग का अंत है बुश हाउस से प्रसारण का बंद होना.

  • 9. 20:26 IST, 13 जुलाई 2012 kuldeep kumar jain:

    राजेश जी, आपने भावुक कर दिया, मुझे वो दिन याद है जब आपसे बुश हाउस में मुलाक़ात हुई थी, आपको नए दफ्तर के लिए शुभकामनाएँ.

  • 10. 20:22 IST, 15 जुलाई 2012 विजय:

    बीबीसी का बुश हाउस छोड़ना वाकई में भावुक करने वाला समाचार था. मै आपके अंतर्मन में उठने वाले विचारों और उनकी गहराई को समझ सकता हूँ. बुश हाउस की यादें साझा करने के लिए आपका शुक्रिया.
    उम्मीद है की कार्यालय बदलने के बावजूद बीबीसी की प्रसारण शैली वैसी ही रहेगी. बीबीसी के बाकी लोगों से भी मेरा अनुरोध है की वे भी कृपया अपने विचार शेयर करें.

  • 11. 02:32 IST, 05 अगस्त 2012 ashish kumar jha:

    बहुत अच्छा लगा आपका ये लेख. दिल को छू लिया.

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