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अच्छे बच्चे परे हटो

अविनाश दत्तअविनाश दत्त|शुक्रवार, 06 जुलाई 2012, 15:08 IST

मैं इन दिनों बड़ा चिंतित हूँ. आप कहेंगे तो मैं क्या करूँ?

वैसे आप कुछ कर भी नहीं सकते, जो कर सकते थे वो नकारा कर दिए गए और जो नहीं कर सकते थे वो कर गुज़रे.

मतलब?

क्या कहूं भाई. मेरे बड़े बुजुर्ग यह हमेशा कहते थे कि बिना सोचे कोई काम ना करना पर क्यों कहते थे यह अब समझ में आया.

किस्सा यह है कि मेरी एक पौने दो साल की बेटी है.

नहीं, मुझे उसके दहेज़ की या अपने कुल के नाम को आगे बढ़ाने की कोई चिंता नहीं है. मेरी चिंता उससे बड़ी है.

मैं सुबह अखबार पढ़ता था और मेरी बेटी तस्वीर पर उंगली रख कर पूछती थी कि यह किसकी तस्वीर है मैं बिना सोचे समझे बता देता था और आगे अखबार पढ़ने लगता था. नतीजा यह हुआ कि मेरी बेटी ममता बनर्जी और बराक ओबामा टाइप लोगों को पहचानने लगी.

आप कहेंगे कि ठीक तो है सब बच्चे ऐसा ही करते हैं. पर दादा यह सामान्य हो सकता है अच्छा नहीं. ना केवल उसके लिए बल्कि मेरे लिए भी. कहीं मुझ पर कोई पुलिस केस ना करवा दे किसी रोज़.

संदर्भ सहित व्याख्या करूँ?

पिछले दिनों एक ख़बर छपी कि मानव संसाधन मंत्री ने आदेश दिया है कि एनसीईआरटी की किताबों में छपे कई आपत्तिजनक गंभीर राजनीतिक और सामाजिक टिप्पणियों वाले कार्टून निकाल दिए जाएं.

अंदेशा है कि इनकी वजह से किताब को पढ़ने वालों के बाल मन कहीं राजनीति से कलुषित ना हो जाएं, वो तुके बेतुके सवाल ना पूछने लगें. बच्चे सामाजिक धाराओं में बह रहे काले, सफ़ेद और मटमैले मिले जुले रंगों को पहचानने के फेर में ना पड़ जाएं.

इतिहास गवाह है कि बात निकलती है तो दूर तलक जाती ही है.

जिस अंग्रेज़ टीसी ने गाँधी जी को ट्रेन से धकेला था उसे ग़रीब को यह अंदाज़ तो ना होगा कि यही आदमी सल्तनते बर्तानिया ले डूबेगा. ट्यूनीशिया में जिस अफसर ने एक ग़रीब फल बेचने वाले मोहम्मद बुआज़ीज़ी को लप्पड़ रसीद कर उसका सामान झटक लिया था उसे यह तो अंदाज़ ना होगा कि इस झापड़ के चलते कई सरकारें चल बसेंगीं.

मैं आपको अंदर की ख़बर दूं अगर आपका बच्चा छोटा है तो गाँठ बांध लीजिएगा. इसी तरह से यह कार्टून को निकलने की बात यहाँ नहीं खत्म होगी.

अब आगे होगा यह कि परीक्षाओं में बच्चों को बुलाया जाएगा और सवाल पूछे जाएंगे और जो बच्चे हर सवाल का सही उत्तर दे देंगे उन्हें भगा दिया जाएगा. और जो बच्चे आम और केले में फ़र्क नहीं कर पाएंगे और उन्हें तत्काल स्कूलों में दाखिला दे दिया जाएगा और अगली कक्षा में पहुंचा दिया जाएगा.

जो बच्चे हर सवाल के उत्तर में केवल हाँ कहेंगे उन बच्चों को सरकार वजीफ़ा देगी और बड़ा होने के बाद सीधे भारतीय प्रशासनिक सेवा में डाल दिया जाएगा.

जो बच्चे ज़्यादा ही क्यों-क्यों का मुरब्बा खाते पाए जाएंगे उनके माँ-बापों को जेल भेज दिया जाएगा अपने बच्चों के मन में सामाजिक समरसता को बिगाड़ने के लिए ज़हर के बीज बोने के जुर्म में.

आदर्श बच्चा कैसा होगा?

आदर्श बच्चा वह होगा जो सवाल पूछने पर चुप हो जाएगा, मंद-मंद मुस्कुराने लगेगा और उत्तर के हर विकल्प को सही बता देगा.

तो प्यारेमोहन लग जाओ काम से और घर में अगर कोई बच्चा हो तो उसे ढंग से सिखाओ पढ़ाओ और वैसे एक बात कहूं अगर यह सफलता की यह संजीवनी बूटी खुद भी घोल कर पी जाओ तो कोई हर्ज़ नहीं.

जहाँ आँख खुले वहीं सबेरा समझो.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 16:25 IST, 06 जुलाई 2012 Saptarshi:

    ये आपने व्यंग्य में लिखा है, लेकिन ये डरावनी है.

  • 2. 18:10 IST, 06 जुलाई 2012 dipendra mishra:

    वाह क्या लेखनी है आपकी. वास्तव में मेरा देश किस ओर जा रहा है, ये मेरे राजनीतिज्ञों को समझ में नहीं आ रहा है. अगली पीढ़ी गांधी जी के तीन बंदर ही होंगे.

  • 3. 14:28 IST, 07 जुलाई 2012 Bheemal Dildar Nagar:

    काफी उत्तम प्रयास किया है आपने. जी हुजूरियों की सभ्यता को उकेरने का. 1980 में मनमोहन सिंह के बॉस थे प्रणब. जी हुजूरी ने मनमोहन को उनके बॉस का बॉस बना दिया. एकदम प्रत्यक्ष उदाहरण है. ये तो ठीक, लेकिन जी महारानी, जो आज्ञा महाराज के कारण भारत राष्ट्र 600 साल तक गुलामी की बंदिश भुगत चुका है. आगे राम जाने.

  • 4. 17:43 IST, 07 जुलाई 2012 Naval Joshi:

    अविनाश जी,आपने बच्चों के बहाने महत्वपूर्ण सवाल उठाये हैं, शिक्षा व्यवस्था हो या बच्चों के प्रति हमारा रवैया हो हर जगह स्थिति विकट होती जा रही है. हम उन सवालों पर तो बात कर लेते हैं जो ‘व्यवस्था‘ की अव्यवस्था से उपजते हैं लेकिन इससे हममें समझ पैदा हो जाती है यह नहीं कहा जा सकता है. हमारी ‘समझ‘ हमारा साथ कभी नहीं छोडती है और बहुत से दुख इसी ‘समझ‘ के कारण हमें घेरे रहते हैं.
    बच्चे और हमारे बीच में व्यवस्था बहुत अधिक हस्तक्षेप नहीं कर पाती है लेकिन हम अवसर चूक जाते हैं और अच्छे माता-पिता भी साबित नहीं होते हैं. अक्सर हम बच्चे को बहुत अधिक ढंग से पढाने-सिखाने लगते हैं, हम भूल ही जाते हैं कि बच्चे का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है, सभी लोगों के बारे में यह नहीं कहा जा सकता है लेकिन अधिकाशं लोग बच्चों को अपने अनुसार ढालने की काशिश करते हैं जो अपने जीवन में करने की हसरत पूरी न हो सकी उसे पूरा करने के लिए बच्चे को ही माध्यम बनाते हैं.
    थ्री ईडिएट फिल्म में इस मानसिक विकृति को फरहान कुरैशी नामक पात्र और उसके परिवार के बीच चले संघर्ष के जरिए अच्छे ढ्रंग से चित्रित किया गया था. बहुत सी बातों के लिए व्यवस्था दोषी नहीं भी होती है दोष हममें होता है और हम उस ओर देखना ही नहीं चाहते और कोई इसे दिखाना भी चाहे तो बुरी तरह बुरा मान जाते हैं.आप इस बारे में भी कुछ कहते तो अच्छा होता.
    आपने कहा है कि बडे बुजुर्ग कहते हैं कि कोई भी काम सोच विचार कर ही करना , आपके अनुसार यह बात आपकी समझ में आ गयी है कृपया इस पर कभी विस्तार से बताईएगा क्योंकि यह बात मुझसे भी बडे लोगों ने कही थी लेकिन आज तक मेरी समझ में यह बात नहीं आयी कि अधिक सोच विचार कर कैसे काम किया जा सकता है. हम उतना ही सोच पाते हैं जितनी हमारी सीमा होती है हम कितनी ही कोशिश करें और कितनी ही बार विचार करें नतीजा वही निकलेगा ,इससे बाहर सोच पाने का हमारे पास कोई रास्ता नहीं होता है.
    इसलिए अधिक सोच विचार करने से भी कुछ लाभ नहीं है. केवल एक ही रास्ता है कि अपने सोचने समझने का दायरा बढाया जा सकता है. और हम यह नहीं करते हैं. आप तो जानते ही हैं कि बच्चे हमारी तानाशाही से विकसित नहीं होते हैं और हम ऐसा करना छोडते नहीं. हम जैसा बनने चले थे लगभग बन ही चुके हैं अब विकास की कोई सम्भावना दिखाई नहीं देती है. लेकिन बच्चों पर यह हमारी कृपा होगी कि हम होशो-हवाश में ही उनसे व्यवहार करें.
    बच्चे हमसे अधिक संवेदनशील हैं जब हम उन्हें पढाने की कोशिश करते हैं तब वे विद्रोह करते हैं और जब हम उनके प्रति सावधान नहीं होते वे उसी समय हमसे पढते हैं. अपने बच्चों को पढाने की कोशिश में बापू तक बुरी तरह असफल हुए फिर हमारी बिसात ही क्या है.

  • 5. 01:44 IST, 09 जुलाई 2012 उमेश यादव, टेक्सास, अमेरिका :

    अविनाश जी, आपने व्यंग तो अच्चा लिखा है, आपको साधुवाद, परन्तु इसे व्यंगात्मक के बजे विश्लेशादात्मक लिखते तो आपकी आवाज दूर तक जाती. मुझे कुछ विरोधाभास नजर आया, हो सकता है ये मेरी समझ कि कमजोरी हो. एक तरफ़ तो आपने इतिहास का हवाला देते हुए ये कहा कि व्यवस्था के उलट चलने वालों ने समाज बदल दिया और आपने उदहारण भी दिया है, गांधीजी और मोहम्मद बुअजीजी का, और दूसरी तरफ़ कहते हैं कि जी-हजूरी सीखो और तरक्की करो.
    ये सही है कि हाँ में उत्तर देने से कुच्छ लोगों को सामायिक प्रोन्नति मिलती रही है, पर सामाजिक प्रोन्नति वही कर पाया है जिसने रूढ़िवादी प्रवृत्तियों को रोकने के लिए प्रश्न उठाये हैं, और जो स्वयं के स्वार्थ से आगे बढ़ कर समाज के उत्थान के लिए जेल जाने से नहीं डरे. ऐसे सामाजिक कार्यकर्ताओं और निःस्वार्थी लोगो कि आज भी कमी नहीं है, वर्ना अन्ना हज़ारे के एक आह्वान पर देश भर में लाखों लोग सडकों पर नहीं उतर आते. हम चाहे जैसी शिक्षा दे ले अपने बच्चों को, उन्ही में से कुछ ऐसे निकलेंगे जो देश को नयी दिशा देंगे. स्वतंत्रता से पहले अँगरेज़ भी भारतीयों को शिक्षा मात्र अपनी जड़ों को मजबूती के लिए देते थे, परन्तु उसी शिक्षा ने ऐसे स्वाभिमानी नेता भी तैयार किये जो भारत से अंग्रेजों को खदेड़ भगाया.
    वैसे भी भारतीय सरकारी शिखा तंत्र पहले से ही खोखला है, ये तो कुछ विद्या के द्वीप हैं कही कही जो कमाल कर जाते हैं और करते रहेंगे. सिब्बल अपने आप को लोर्ड मैकाले सिध्ध करने पा लगे हुए हैं जो हमारे बच्चों को सतही सिक्षा डेकर कॉल सेंटर वर्कर से ज्यादा कुछ नहीं बनाना चाहते, ऐसे में हमें नयी सोच वाली नयी पीढ़ी कि जरूरत है जो प्रश्न करे. मैंने कहीं किसी को कहते हुए सुना था, "मेरे नहीं पूछने से प्रश्न खत्म तो नहीं हो जायेंगे".
    मुझे लगता है प्रश्न पूछने वाले कभी खत्म नहीं होंगे और कोई भी जेल उन्हें सदा के लिए कैद नहीं रख सकेगी, क्योंकि प्रश्न शाश्वत हैं और समाज को नयी दिशा और नयी सोच देने के माध्यम हैं. प्रश्न सदैव मानव मस्तिष्क में अवतरित होते रहेंगे जब तक कि उनका सटीक उत्तर न मिले. आज एक प्रश्न करता को चुप करायेंगे तो कल हजार मुह उसी प्रश्न को एक स्वर में दोहराएंगे और तब आप उन्हें शांत नहीं कर पाएंगे. याद करिए यही हुआ था न गाँधी को ट्रेन से धकेलने और बुअजीजी को लप्पड़ मरने के बाद!!!
    इसलिए आपके उलट मैं सबसे कहूँगा कि प्रश्न पूछो, आज नहीं तो कल उत्तर जरूर मिलेगा और समाज को एक नयी दिशा दिलाएगा !!!
    धन्यवाद !!
    उमेश यादव

  • 6. 11:27 IST, 10 जुलाई 2012 pankaj kumar srivastava.:

    बहुत अच्छी टिप्पणी

  • 7. 21:42 IST, 11 जुलाई 2012 Mohd Anis:

    अविनाश दत्त जी बीबीसी कि सटीक और बेबाक रिपोर्टिंग और आप लोग जैसे सटीक लिखने वाले जो लोगो कि पोल खोल रहे हैं वह वाकई काबिल ए तारीफ है हम आप लोगों का तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हैं

  • 8. 08:49 IST, 12 जुलाई 2012 Dr.Lal Ratnakar:

    अविनाश जी ने अपने 'ब्लॉग' में जो चिंता जाहिर की है वह आज के माहौल की 'शिक्षा की सच्चाई है' नीर क्षीर की कड़वाहट से भागने की प्रवृति ने शिक्षा कों खोखला कर दिया है. शिक्षा में जितने तरह के 'वाद' हैं सब बखूबी पनप रहे है बढ़ रहे हैं यहाँ तक की परवान चढ़ रहे हैं . ऐसे में यह ब्लॉग उसकी जड़ों में प्रहार कर रहा है . अविनाश जी को बधाई .

  • 9. 10:17 IST, 12 जुलाई 2012 BHEEMAL Dildarnagar:

    अविनाश जी आप के दिल में कितना गहरी और कितनी राष्ट्रप्रेम से भरी पीड़ा है, मैं अनुमान कर सकता हूँ, पर आम पाठक शायद ही आप के हृदय पटल को पढ़ पायें. फिलहाल वस्तुस्थिति यह है कि, राज-परिवार का राजभोग जिसको भी खाना हो, उससे परिवार उम्मीद करता है कि वो जी हुज़ूर हो बस. कभी भूल से खुद अविनाश जी ही राजा बन जायें, वो भी यस बॉस सुनना पसंद करेगें. कहीं न राजमद दीन्ह कलंकू ?

  • 10. 18:29 IST, 20 जुलाई 2012 BINDESHWAR PANDEY BHU:

    'अच्छे बच्चे परे हटो' ..इस ब्लॉग को तीन बार पढने के बाद भी जब मैं ठीक से न समझ पाया तो इस पर कोई टिका -टिप्पणी करना मुनासिब न समझा .अविनाश जी से कोई प्रश्न पूछ भी नही सकता क्योंकि इन्हों ने कह रखा है कि..अच्छे बच्चे परे हटो.
    मैं तो उमेश जी की बातों से इतेफाक रखता हूँ कि प्रश्न पूछो
    आज नहीं तो कल उत्तर जरूर मिलेगा और समाज को एक नयी दिशा भी

  • 11. 00:22 IST, 02 अगस्त 2012 shalini:

    kya hum itne neerus ho gaye hain ki humour ko appreciate nahin kar sakte
    .nayi pedhi ko ek rus ke aswadan ki kala se vanchit karna galat hai.alarm bajane ke liye shukriya

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