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परिवार में दरार....

पंकज प्रियदर्शीपंकज प्रियदर्शी|शनिवार, 30 जून 2012, 22:48 IST

कहते हैं यात्रा शिक्षा का बड़ा माध्यम होती है. यात्रा के दौरान मिलने-जुलने के क्रम में आप काफी कुछ देखते हैं, सीखते हैं और समझते हैं. सौ फीसदी सच.

इस गर्मी की छुट्टी में घर जाते समय टुकड़ों-टुकड़ों में कई शहरों की यात्रा की. ट्रेन से, बस से और टैक्सी से भी. अनजान भी मिले और कुछ जान-पहचान वाले भी.

पुराने मित्र भी मिले और नए भी. कुछ नए रिश्ते बने, तो कुछ रिश्तों पर जमीं गर्द को हटाकर उन्हें तरोताजा करने की कोशिश भी हुई.

लेकिन इन सबके बीच जिन कुछ कटु सच्चाइयों ने दिल को थोड़ा हैरान-परेशान और लाचार कर दिया, जब कई परिवारों को टूटते देखा.

पता चला एक पुराने सहपाठी ने अपने बूढ़े माँ-बाप को अपने से अलग कर दिया है. उसके माँ-बाप जब किसी परिचित से मिलते हैं, तो उनका रुदन रुकता नहीं.

एक मित्र के पास गया, तो तीनमंजिला इमारत वाली घर में पारिवारिक गठबंधन में इतनी दरारें दिखीं, तो वहाँ से निकल गया.

एक परिचित अपने भाई की बात आने पर कुछ यूँ बोले- तीन साल से घर नहीं आया. माँ-बाप की फिक्र भी नहीं है उसे. जब से शादी हुई है, अपनी नई जिंदगी में ऐसे रमा है कि माँ-बाप भूली-बिसरी कहानी हो गए हैं.

ट्रेन में एक अधेड़ महिला से सामना हुआ. पता चला भाई ने आम खाने के लिए बुलाया है. बातचीत का क्रम चला तो परिवार की बात छिड़ी. लेकिन बहुओं पर बात आकर रुक गई. उन्होंने बहुत कोशिश की ये बताने की कि उन्हें आजकल की बहुओं से ऐतराज है.

लेकिन उनके चेहरे की शिकन बता रही थी कि सब कुछ ठीक नहीं है. दिल्ली में भी कई बार ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं. एक दिन टीवी पर एक बूढ़ी माँ को रोते देखा. पता चला बेटे ने संपत्ति के विवाद के कारण माँ को घर में घुसने नहीं दिया. माँ घर के बाहर बैठकर रोए जा रही है.

बात ये नहीं कि माँ-बाप गलत है या बेटे-बहू. अलग-अलग परिस्थितियों के सच अलग-अलग हो सकते हैं. लेकिन एक बात तो तय है कि आधुनीकिकरण की दौड़ में पारिवारिक रिश्ते गौड़ होने लगे हैं.

हर कोई अपनी अलग दुनिया बनाना चाहता है. अच्छा है. लेकिन रिश्तों की गर्माहट बनी रहे, इसका ख्याल तो उन्हें रखना ही चाहिए. अपना घर और अपनी दुनिया अपने बीवी-बच्चों के आसपास बनाने की होड़ ऐसी है कि अपने माँ-बाप दूर बैठे सिसकते रहते हैं. ऐसी आधुनिकता से क्या फायदा?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 08:47 IST, 01 जुलाई 2012 test:

    बिलकुल सटीक. मैं भी इसी दौर से गुज़र रहा हूँ.

  • 2. 08:53 IST, 01 जुलाई 2012 Naval Joshi:

    पंकज जी ,आपने भारतीय परिवारों के विघटन को आधुनिकीकरण से जोडा है, हो सकता है कि आपका आकलन ठीक हो लेकिन मुझे इस संदर्भ में आपसे अपनी असहमति रखते हुए यह कहना है कि इसका आधुनिकीकरण से कुछ लेना-देना नहीं है. आधुनिकीकरण हर युग की सतत प्रक्रिया है इसके बिना तो जीवन और समाज की गति ही रूक जाएगी. कहा जा सकता है कि अंधानुकीकरण ही इसका कारण है,आधुनिकीकरण से तात्पर्य यह है कि हम अपनी जमीन पर खडे होकर नयी सोच को जॉचें परखें और बेहतर को आत्मसात करें, अंगीकार करें लेकिन अंधानुकीकरण का आजकल मतलब यह हो गया है कि हम पूरी तरह गलत हैं और दूसरे ही सही हैं. जॉच-परख और सोच-विचार की प्रक्रिया ही समाप्त हो गयी है. यह इस युग की मानसिकता है जबकि हम विदेशी आक्रमणकारियों के सामने लगातार परास्त होते जो रहे थे. आश्चर्य है कि मुठ्ठी भर घुडसवार लुटेरे आकर हमारे सम्राट बन गये, इसका कारण सम्भवतः यही रहा कि हम अपनी जडों से कट चुके थे ठीक वही स्थिति आज भी होती जा रही है. हमारा समाज और परिवार जिस टूटन का शिकार है उसके मूल में व्यक्तित्व की टूटन है, ऐसा नहीं है कि बहू ही खराब है या लडका ही खराब है, कोई सास गलत है या फिर परिवार के किसी सम्बन्ध विशेष का इस टूटन से लेना-देना हो. कहा जा सकता है कि हर व्यक्ति,का व्यक्तित्व खण्डित हो गया है. आज व्यक्ति तो दिखाई देते हैं लेकिन उनका व्यक्तित्व खंडित है. हम भूल-चूक से परिवार के सम्बन्ध विशेष को कटघरे में खडा कर देते हैं यह तरीका ठीक नहीं है. क्या हमें सारे पुत्रों के खिलाफ संघर्ष छेड देना चाहिए, या वे सारे पुत्र माता-पिता का तिरस्कार करके बडे सुखी हो गये है. यदि उन्हें ऐसा भरम है भी तो यह सुख भी दस पन्द्रह वर्षों तक का ही है इसके बाद वे भी तिरस्कार भुगतने वालों की श्रेणी में ही आ जाते हैं. इस समस्या का सम्बन्ध से कुछ भी लेना-देना नहीं हैं. इसका सम्बन्ध व्यक्तित्व से है हमें उन कारणों का तलाशना होगा जिनके कारण हम व्यत्विविहीन होते जा रहे हैं. इसका मतलब पर्सनॉल्टी से भी नहीं है. पर्सनॉल्टी आधुनिकीकरण की शब्दावली है और इसका केवल बाहरी प्रभाव है जबकि व्यक्तित्व का मतलब आत्मा से है यह पूरी तरह भारतीय है. हमारी आत्मा मरती जा रही है मेरी समझ से इसका यह कारण भी हो सकता है. ज्ञानियों ने कहा है कि आत्मा मरती नहीं हैं. लेकिन आत्मा के बोध को तो मारा ही जा सकता है लगभग यही स्थिति हमारी भी है.

  • 3. 11:12 IST, 01 जुलाई 2012 Ravi Gupta:

    पंकज जी, एकदम सही कहा आपने. किताबों में पढ़ा था, लोगों से सुना था. बूढ़े माँ बाप की सेवा करनी चाहिए.
    मैंने भी किया, लेकिन मेरी घरवाली ने मुझे छोड़ दी और बेटी को भी साथ ले गयी.
    बोलती है पहले माँ-बाप को छोड़ो , फिर मेरे पास आओ.
    अगले जन्म में भगवन जानवर बना दे लेकिन इंसान न बनाये....

  • 4. 13:58 IST, 01 जुलाई 2012 Kapil Batra:

    बात आधुनिकता की नहीं है पंकज जी, बात मानसिकता की है. पश्चिमी संस्कृति के अंधे अनुसरण ने सामाजिक मूल्यों को गायब कर दिया है और बच्चों को बूढ़े होते मां-बाप बोझ लगने लगे हैं. तेज़ी से होते शहरीकरण ने आर्थिक विकास तो दिया है लेकिन सामाजिक रूप से हमें हाशिए पर धकेल भी दिया है.

  • 5. 20:24 IST, 01 जुलाई 2012 नमिता पाठक:

    यह वास्तविकता मन को झकझोरने वाली है.

  • 6. 17:34 IST, 02 जुलाई 2012 lalit kumar:

    आज कल आधुनिकता का मतलब छोटे कपड़े , दिखावा करना ही है. आधुनिकता संवेदना और विज्ञान की होनी चाहिए. माता-पिता को भी बच्चों को साधारण ड्रेस और सोचने के लिए अच्छे विषय देने चाहिए.

  • 7. 12:51 IST, 03 जुलाई 2012 A Rahman:

    1 - परिवार के सदस्यों में उचित शिक्षा का अभाव.
    2 - इसके अलावा स्कूल के पाठ्यक्रम में कमी.
    3 - स्कूल पाठ्यक्रम, नौकरी पाने के लिए और अपने व्यापार में सुधार और अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए केवल डिजाइन.
    4 - अपने परिवार के सदस्यों के साथ कैसे समन्वय करें इसके लिए कोई भी अध्याय नहीं.

  • 8. 15:25 IST, 03 जुलाई 2012 yogesh dubey:

    प्रिय प्रियदर्शी जी, आपका ब्लॉग देखकर अच्छा लगा. आपने आधुनिक समाज की अच्छी तस्वीर खींची है. ये जानकर दुख हुआ कि हमारी युवा पीढ़ी आधुनिक युग में अपने परिवार की अहमियत नहीं समझती. अगली पीढ़ी े लिए परिवार के महत्व को समझना बहुत जरूरी है. धन्यवाद.

  • 9. 19:33 IST, 03 जुलाई 2012 Mohd Anis:

    बात एकदम सही है पंकज की, बात एकदम दिल की गहराई में उतर गई.

  • 10. 22:48 IST, 03 जुलाई 2012 Umesh Yadav:

    परिवार की टूटन का आधुनिकता से लेना-देना नहीं है, जैसा कि नवल जोशी जी ने लिखा है. उन्होंने पारिवारिक टूटन और उसकी परिस्थितियों की बहुत ही सटीट विवेचना की है. सभी कहते हैं कि ये पश्चिम की अंधी नकल का नतीजा है, लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता. ये भौतिक सुख और बिना मेहनत किए धन की लालच का फल है. अमरीका में माँ-बाप बच्चों के जीवन होते ही उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने के लिए उत्साहित करते हैं, बच्चे अपने जीवन की जिम्मेदारी स्वयं लेते हैं. खुद कमाना, अपना घर बसाना और अपना जीवन स्वयं बनाना उनकी जिम्मेदारी होती है. हाँ, माता-पिता इसमें सहायक हो सकते हैं और होते भी हैं. कई नौजवान इसमें असफल हो जाते हैं और सड़क पर आ जाते हैं, गिरते-पड़ते संभलते जी लेते हैं. लेकिन वहाँ का यही संस्कार है. वहाँ पर माता-पिता को घर से निकालने जैसी परंपरा नहीं या बहुत ही कम है, क्योंकि ऐसी स्थिति आती ही नहीं. तो भारत में ऐसा होना यहाँ की अपनी अंदरुनी सांस्कृतिक कमजोरी को दर्शाता है. किसी एक का दोष नहीं है ये. परिवार की इस टूटन के लिए हम सब सामूहिक रूप से जिम्मेदार हैं. और हमें ही अपने बच्चों में पारिवारिक संस्कार, बड़ों का सम्मान और आदर, परिवार के मूल्यों और विशेषताओं के बारे में सिखाना चाहिए. हमें अपनी बेटियों को सिखाना चाहिए कि ससुराल में अपने घरों में रिश्तों को मजबूत करें ना कि कमजोर. पैसे की अहमियत परिवार के लिए है और परिवार को पैसे के लिए तोड़ना रुकना चाहिए. आज हम अपने माता-पिता को बाहर करेंगे, तो कल हमारे बच्चे यही प्रक्रिया दोहराएँगे. इसे हम रोक सकते हैं, थोड़ी जिम्मेदारी से और थोड़े प्यार से. बच्चों के साथ ज्यादा समय गुजारें और उनके मित्र बन कर हर कदम पर उनका सामर्थ्य स्तंभ बनें और ये अनवरत चलती प्रक्रिया रुक जाएगी. धन्यवाद.

  • 11. 15:20 IST, 04 जुलाई 2012 चन्द्रवीर सिंह राठौड :

    पंकज जी समय बहुत तेजी से बदल रहा है. हर व्यक्ति अपने आप को सिर्फ भौतिक सुख-सुविधायों से परिपूर्ण चाहता हैं और इस अंधी दौड़ में सब कुछ पीछे छोड़ने को तैयार रहता हैं. इसी का नतीजा यह है कि वो अपनों को भी काफी पीछे छोडता जा रहा हैं.

  • 12. 15:50 IST, 04 जुलाई 2012 E A Khan, Jamshedpur (Jharkhand):

    जिस मुद्दे को प्रियदर्शी जी ने उठाया है, उस पर अपना कमेंट देने के लिए कंप्यूटर पर उंगुली अपने आप चलने लगती है. यह बड़ा ही सटीक मुद्दा है जो देश के सामने मुंह बाए खड़ा हुआ है. जो बूढ़े और लाचार हो गए हैं और पूरी ज़िंदगी और ज़िंदगी की कमाई अपने लाडलों पर लुटा चुके हैं उनके साथ उनके लाडलों और इन लाडलों की लाडलियां हर गाँव शहर कस्बों में इस तरह के व्यवहार करते दिखते मिल रहे हैं जिससे कलेजा काँप उठता है. ज़िंदगी के आखरी पड़ाव पर अधिकतर बुज़ुर्ग अपने परिवार के हाथों घोर उपेक्षा के शिकार होते गली कूचों में नज़र आते हुए मिलेंगे. भारत सरकार के पास बुजुर्गों की देख रेख के लिए बहुत दिनों से राग अलापने के अलावा आज तक कोई ठोस नीति सामने नहीं आई. सवाल यह है की सरकार चाहे कुछ करे या न करे लोग अपने लाचार माँ-बाप के साथ इस तरह के अमानवीय व्यवहार करते क्यों हैं. मेरा तो सुझाव है कि माँ-बाप की देख-रेख में कोताही करना अपराध की उस श्रेणी में आना चाहिए जहाँ जेल के अलावा कोई विकल्प नहीं होना चाहिए. मेरी जानकारी में एकाध केस इस तरह का भी हैं जहाँ बुज़ुर्ग दादा-दादी अपने पोतों और पोतियों से नहीं मिल सकते क्योंकि उनकी लाडली बहुएं इस तरह का मत बना रखी हैं कि दादा-दादी बच्चों का संस्कार ख़राब कर देंगे. सुनकर थू-थू करने का मन कहता है.

  • 13. 22:29 IST, 04 जुलाई 2012 Sandeep Kumar Mahato:

    पंकज जी बिल्कुल कड़वा सच लिखा आपने. मैंने भी ऐसा कई बार महसूस किया. वास्तव में अभी हम विकास और आधुनिकता की दौड़ में इतनी तेजी से भाग रहे हैं कि हमें अपनों के खोने का अहसास ही नहीं हो रहा है. मैं भी इसी सच्चाई से गुजर रहा हूँ, आज मुझे नौकरी के लिए घर से दूर रहना पड़ रहा है और साल में दो बार से अधिक घर नहीं जा पाता. हालाँकि मेरे माता-पिता ने यह बदलाव स्वीकार किया, लेकिन मुझे अहसास होता है कि पर्व-त्यौहार या किसी खुशी और गम के मौकों पर उनको मेरी कमी का अहसास होता है, कभी सोचता हूँ क्या सिर्फ चंद रुपए घर भेज देना ही पर्याप्त है. माता-पिता ही नहीं वो सभी रिश्तेदार चाचा-चाची, फूफा-फूफी, मामा-मामी और गाँव के बहुत सारे लोगों का वो प्यार जो उन्होंने बचपन में मुझे दिया मैंने उनको कितनी निर्दयता से भुला दिया, मैंने कैसे भुला दिया कि कभी गाँव कि एक दादी जो मुझे कभी अपनी गोद में हमेशा खेलाती थी क्या उसके उस प्यार का अब मेरे लिए कोई मोल नहीं रहा...उफ्फ कितना निर्दय हो गया हूँ मैं. लेकिन मैं क्या करूँ कैसे चुनाव करूँ कि मैं सगे संबंधियों के उस नि:स्वार्थ प्रेम के साथ जिऊँ, जिसने मुझे इस मक़ाम तक पहुँचने में मदद कि या फिर उस नौकरी के साथ जो मुझे और मेरे परिवार को आनेवाले समय में आर्थिक रूप से सहायता प्रदान करने वाला है.

  • 14. 13:10 IST, 05 जुलाई 2012 BHEEMAL Dildarnagar:

    प्रियदर्शी जी, एक दूरबीन से देख कर लिखना ठीक नहीं. सिर्फ छींटाकशी से हटकर आम जन को अपने सर्वेक्षण में शामिल करें, फिर निष्कर्ष निकालें.

  • 15. 16:54 IST, 05 जुलाई 2012 minakshi:

    परिवारों का टूटना और आधुनिकता अलग-अलग बात है.

  • 16. 20:31 IST, 06 जुलाई 2012 Ketan Purohit:

    ए रहमान जी ने बिलकुल सही कहा. मै उनसे पूरी तरह सहमत हूँ.

  • 17. 14:22 IST, 07 जुलाई 2012 ashok issar:

    आज केवल दो या तीन बच्चे होते हैं और दिन में नहीं रात में कॉल सेंटर आदि में काम करते हैं. घर परिवार के खर्चे भी बहुत हैं. पहले पढ़ाई और कमाई पर इतना जोर नहीं था. अगर बच्चे काम से छुट्टी लेकर घर आ भी जाए, तो घर के काम बहुत होते हैं. बच्चों के पास बूढ़े बीमार माता-पिता के लिए समय नहीं होता. क्योंकि काम के दबाव से हर व्यक्ति के शरीर में कोई न कोई बीमारी है. मैंने अपने पिता तो ओल्ड एज होम में रखा है. उन्हें समय पर दवाई देना, खाना देना, नहलाना, शौचालय ले जाना, उनके परिचितों को संभालना, हर समय सेना करने के बाद अपनी बहनों और रिश्तेदारों से ये सुनना कि हम नालायक माता-पिता की सेवा श्रवण कुमार की तरह नहीं कर रहे हैं और हमें इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा. लेकिन मेरे ख्याल से इन सबका एक ही इलाज है- ओल्ड एज होम.

  • 18. 12:40 IST, 10 जुलाई 2012 Ranjan:

    बढ़िया लेख. भगवान की दया है कि मैं इकलौता पुत्र हूँ अपने माता पिता का. शायद मेरा कोई भाई होता तो मैं भी उससे सम्पत्ति विवाद, माता पिता की सेवा करने के सवाल पर झगड़ा करता. पर यहाँ, "ना इनको ठौर, ना उनको और". पिताजी भी इकलौते ही थे अतः उनको भी झगड़ना नहीं आता. माँ और पत्नी अलबत्ता भरे पूरे खानदानों से हैं.

    यही हाल हमारा है. एक बेटी है, जो पाँच छः साल में ससुराल चली जायेगी. और कोशिश यही रहेगी कि किसी इकलौते से ही उसका विवाह हो. ताकि जैसे निर्विवाद हम जी रहे हैं, वह भी जिये.

    लेकिन गंभीरता से एक बात निवेदन है कि हमारे सभी मौसेरे ममेरे भाई‍बहिनों से अच्छे संबंध हैं. और इसीलिये बेटी चाचा, ताऊ, बुआ, मौसी, मामा वगैरह का महत्व और रिश्ता जानती है. अपने भतीजों भांजों से भी हमारी गहरी छनती है.

    तो अपने सुखी जीवन का सार यही है, "अपना बच्चा एक, कुनबे में अनेक"

  • 19. 17:53 IST, 10 जुलाई 2012 rambhool singh:

    पंकज जी आपने बहुत अच्छा व सटीक लिखा है. पर कुछ मजबूरियाँ भी तो अलग कर देती हैं. मैं सर्विस के बाद आगरा आ गया परन्तु मेरी माँ हरियाणा से आगरा में रहना नहीं चाहतीं. इसलिए 95 % मज़बूरी भी हो सकती हैं. उससे ज्यादा लोग समाज में रहने के लिए तैयार नहीं है . टीवी ने ज्यादा लोगों को सिंगल फैमेली में रहने को मजबूर कर दिया है.

  • 20. 18:05 IST, 16 जुलाई 2012 deepak kumar:

    माँ-बाप भी यही चाहते हैं कि उनके बच्चे आधुनिक बने. वो सब कुछ उन पर लगा देते हैं. बाद में वो खुद ही इसके शिकार हो जाते हैं.

  • 21. 10:46 IST, 19 जुलाई 2012 ziaaul haquue siddique:

    बिल्कुल सही कहा आपने ये एक बड़ी सच्चाई है समाज की. कामयाबी के नशे में हम अपनों से बहुत दूर होते जा रहे हैं. समझ में नहीं आता कि ये कैसी कामयाबी है जिसके दबाव में हम अपने संस्कारों को भूलते जा रहे हैं.

  • 22. 20:55 IST, 27 जुलाई 2012 Biprendra kumar:

    भागम भाग के जीवन में जड से अलग होते लोग. क्योँ ऐसा होता है ?
    हम ही बोलते है कि बाबू न भैया सबसे बडा रुपया.

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