झारखंड का विकास
झारखंड में विकास जोरों पर है. इसका पता झारखंड जाने वाली ट्रेन में ही लग जाता है. अधिकतर जवान..लेकिन तोंद निकली हुई. छोटे बच्चों से बोगी भरी हुई है. कोई ठेकेदारी करता है तो कोई ट्रकों का धंधा. कोई कोयले की दलाली में है तो कोई सूदखोरी में. सच में विकास जोरों पर है.
मोबाइल फोन पर लगातार बजते हुए गाने साबित करते हैं कि रांची के बच्चे भी छम्मक छल्लो और रा वन से आगे निकल कर रिहाना और लेडी गागा तक पहुंच सकते हैं. लेकिन हिंदी की चार पंक्तियां भी सही सही बोल लें वही बहुत है.
सत्यमेव जयते का फैन क्लब यहां भी है. लोग रिकार्ड कर के लैपटॉप पर आमिर से ज्ञान ले रहे हैं. दहेज पर. दहेज में लैपटॉप भी मिलता है ऐसा बिहार झारखंड के लोग कहते हैं. दहेज के लैपटॉप पर आमिर का ज्ञान कितना अच्छा लगता है. बोलने में अच्छा लगता है दहेज नहीं लेना चाहिए लेकिन लेने में बुरा किसी को नहीं लगता. दहेज नहीं वो तो विवाह खर्च होता है. बड़े घर में शादियां ऐसे ही होती है. सच में विकास जोरों पर है.
लैपटॉप पर फिल्में चल रही है. कुछ दिन पहले रिलीज हुई इश्कजादे. कोई फोन पर कह रहा है. हमारा पैसा क्यों नहीं दिए. कल आके ठोक देंगे तो ठीक लगेगा. बढ़ी तोंद वाला यह जवान ठेका पाने की खुशी में दारु-मुर्गा का न्योता भी दे चुका है. मसूरी से लौटता यह दंपत्ति दुखी है कि मसूरी में गर्मी थी और गुस्से में कि मसूरी से आगे कुछ देखने के लिए ही नहीं था. मसूरी में गर्मी की छुट्टियां बेकार हो गई हैं. उन्हें कौन बताए कि मसूरी से आगे देखने के हज़ारों खूबसूरत नज़ारे हैं. लेकिन झारखंड की जनता मसूरी जा रही है तो निश्चित है विकास ज़ोरों पर है.
शहर से गांव कस्बों की दूरी झारखंड में अधिक नहीं है. जमशेदपुर में बस से उतरते ही एक ऑडी, एक बीएमडब्ल्यू देखते ही मैं समझ जाता हूं कि मैं एक ऐसे शहर में हूं जो दिल्ली मुंबई के आगे हो जाना चाहता है. मैं मोटरबाइक पर ही निकलता हूं अपने घर की तरफ. छोटे छोटे गांवों से होते हुए कॉलोनी तक पक्की सड़क है लेकिन सड़क पर कारों की भरमार है. सूमो, बोलेरो और कभी कभी स्कार्पियो को भी साइड देना पड़ रहा है. छोटे वाहनों और पैदल चलने वालों की औकात ही नहीं है. ज़ाहिर है विकास जोरों पर है.
सड़क के दोनों ओर तैनात जंगल अब कट गए हैं. टाटा बढ़ रहा है. कटे जंगलों की जगह विकास के सबसे बड़े मॉडल फ्लैट बन रहे हैं. फ्लैट में रहने का पहला मतलब है आप विकसित हैं. बचपन में हम ऐसे घरों को दड़बा कह कर हंसा करते थे. हमें नहीं पता था कि ये हमारा भविष्य है. भले ही इन फ्लैटों के बनने में जंगल के जंगल तबाह हो जाएं लेकिन यही हमारा विकास है. यही झारखंड की प्रगति है.
फ्लैट कम होते जाते हैं और गांव आने लगते हैं. मैं सूकून पाता हूं हरियाली में लौटते ही. सड़कों के किनारे मिट्टी और पत्थरों को मिला कर बनाए गए आदिवासियों के घर मेरे बचपन की यादों का अहम हिस्सा रहे हैं. इतनी सपाट तो सीमेंट की दीवारें नहीं होती. यदा कदा चारखाने की धोती दिखती है. काली गठीली देह पर यह छोटी धोती फबती खूब है. वैसे शर्ट पैंट पतलून का विकास तो पहले ही हो चुका था. अब लोग जूते भी पहनते हैं. मोजे के साथ. सच में विकास जोरों पर है.
हाड़तोपा के पास तिलका मांझी की एक प्रतिमा मेरे सामने ही लगी होगी. तिलका मांझी चौक बाबा तिलका चौक हो गया है. तिलका मांझी को बाबा तिलका होने में ज्यादा समय नहीं लगा है.. इतने ही कम समय में झारखंड का विकास भी हो गया है.
आगे ही एक मैदान है जहां फुटबॉल के मैच देखने हर रविवार को आया करते थे. मैदान भी है. गोल पोस्ट भी है. खिलाड़ी भी हैं लेकिन फुटबॉल गायब है. क्रिकेट खेला जा रहा है. विकास हो रहा है निश्चित रुप से. फुटबॉल से क्रिकेट तक आना विकास ही कहा जाएगा क्योंकि क्रिकेट तो भद्र लोगों का खेल है. फुटबॉल तो लातिन अमरीका और अफ्रीका के बर्बर देश भी खेलते हैं. मेरा शक सुबहा अब यकीन में बदल गया था कि झारखंड में विकास ज़ोरों पर है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
झा बाबू, आपका झारखण्ड के विकास पर व्यंग्य पढ़ कर मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जिस ट्रेन के सफ़र का आप वर्णन कर रहे हैं वो एसी क्लास है और पता नहीं किस बदलाव की बात कर रहे हैं. मुझे नहीं लगता कि बुनियादी रूप से कुछ बदलाव आया है ऊँचे दर्जे में सफ़र करने वाले कल भी ऐसे ही थे जैसे आज हैं केवल नई तकनीक ने हाथ में मोबाइल और लैपटॉप थमा दिए हैं बाकी उनकी रईसी पहले भी ऐसी ही थी. बेशक कुछ नए लोग इस रईसों कि सूची में शामिल हो गए हैं पर ये जोड़- घटाव तो हमेशा से लगा रहा है. इसी तरह से साधारण श्रेणी में सफ़र करने वाले कल भी वैसे ही आज ही सफ़र करते हैं जैसे कल किया करते थे एक दूसरे पर पड़े हुए बोगी में ठुसे हुए लड़ते झगड़ते, बातें करते, ताश खेलते, हर स्टेशन पर रुक कर पानी के बहाने थोड़ी हवा तलाशते, चोरों पाकेटमारों और ज़हरखुरानों से अपनी कमाई बचाते हुए किसी तरह सफ़र ख़त्म होने का इंतज़ार करते वो आज भी नज़र आते है जैसे कल थे. और रही बात शहर के बढ़ने और गाँव के सिकुड़ने की तो टाटा तो तब से बढ़ रहा है जब से टाटा ने साकची गाँव में 1908 से अपना प्लांट बनाना शुरू किया है और 1919 में तो टाटा ने साकची का नाम भी छीन लिया शहर तो तभी से लगातार बढ़ रहा है फिर अचानक आपको क्या नया नज़र आने लगा और मुझे नहीं लगता कि जितना आपको ये बदलाव परेशान कर रहा है उतने ही परेशान आम लोग भी हैं इस विकास से. हालाँकि आप लेखक हैं आपकी लेखनी कौन रोक सकता है परंतु आप जैसे लेखक और पत्रकार से आशा है कि आप किसी भी विषय पर ऐसा जड़ विचार न प्रदर्शित करें.
हर शहर की यही कहानी है . रिटेल सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है , बड़ी बिल्डिंग, लेकिन यदि आप शहरों से बाहर आ जाएं तो आप विकास की असलियत देख पाएगे. न सड़क , न पानी , न बिजली .
सच में भारत में विकास और अमीर होने का पैमाना बदलता जा रहा है. अब तो बस एक ही चीज की होड़ लगी है कि जेब भर लो.चाहे ये तरीके जायज हो या फिर नाजायज. पर दोष किसका दें जब शुरुआत ही सड़ी-गली सिस्टम से हो तो फिर कहना ही क्या.
बढ़िया लेख. झारखंड में हो रहे बारीक परिवर्तनों पर पैनी नजर.
बहुत ही सुंदर झा जी. आप छा गए. साधुवाद आपको.
यदि यही विकास है तो मै पूरे यकीन के साथ कह सकता हूँ की आनेवाले समय में झारखण्ड में "जड़ , जोरू, जमीन" की लड़ाई चरम पर होगी.
वाह सुशीलजी. विकास नहीं हुआ है तो बस सोच और संतुष्टि का.
आजकल सब इसी को विकास समझ रहे हैं.
सुशील जी , मैं कहना चाहूँगा कि आप जरा आदित्यपुर की तरफ आइये , विकास दिख जाएगा . याद होगा , शाम 7 बजे अँधेरा हो जाया करता था कभी आज 6 लेन की तैयारी चल रही है . एआईएडीए के प्रयास से उद्योग कई लोगों को रोज़गार दे रहा हैं . काम करने लोग इधर चैबासा उधर झारग्राम से रोजाना आना जाना कर रहे हैं . जिस लैपटॉप और मोबइल की बात आप कर रहे हैं , तकनीक ने उन्हें इतना सस्ता और सुगम बना दिया है कि थोड़े हिसाब से चलें तो हर कोई ले सकता है . बस सब्र करना होगा , लोगों की मानसिकता नहीं बदल सकते . आपकी कुछेक पंक्तियों से मैं सहमत हूँ . थोडा और भ्रमण कीजिये और फिर लिखिए .
लेखकों और पत्रकारों के साथ यही समस्या है . वे चाहते हैं कि पूरा देश बस जंगल , गरीबी और भूख में मरतें रहे और उनकी कलम को कुछ न कुछ लिखने का मसाला मिलता रहे . क्यों ........बुरा लग रहा है न कि दिल्ली से आकर कुछ दिनों की छुट्टियाँ मनाने के लिए गाँव आज बचे नहीं हैं .
बहुत बढ़िया ब्लॉग, मिटटी के घर फ़्लैट में और फुटबाल क्रिकेट में तब्दील हो रहे हैं, अब लोग हिंदी मीडियम स्कूलों में जाने के बजाय इंग्लिश पब्लिक स्कूलों में जाने लगे, अंग्रेजी बोलना और अंग्रेजी पढ़ना शायद विकास की पहचान बन गया है. विकास के इसी अंधी दौड़ में हर कोई भाग रहा है परन्तु क्या हम अपनी पहचान खोते जा रहे हैं या अपनों से दूर जा रहे हैं? क्या इस दौड़ में हम अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी नहीं मार रहे हैं? आपके इस ब्लॉग ने सचमुच सोचने पर मजबूर कर दिया. विकास के नाम पर पहले हमने अपने मिटटी के पुआल से बने घर को तोड़कर उसे फ़्लैट में बदल देते हैं लेकिन वो खुली और ठंडी हवा कहाँ, वो अपनापन कहाँ. मैं विकास के खिलाफ नहीं झारखण्ड में विकास के साधन भी हैं परन्तु जरुरत है एक नायक की जो पथप्रदर्शक बनकर युवाओं को सही राह में विकास की ओर ले चले.
सुशील जी, शायद मेरी बात बेतुकी हो पर अपनी बात कहने का यही मंच है. आज बीबीसी पर पूनम पांडे को भी स्थान मिला देखा. तो विकास तो हो रहा है. झारखंड में भी, बीबीसी हिन्दी पर भी.
बहुत अच्छा लेख, ये बिहार और झारखंड की सच्चाई है. जो स्थितियां आपने बयान की है उन्हें आप किसी भी ट्रेन में आसानी से देख सकते हैं. अधिकांश लोग बिहार से दिल्ली और दिल्ली से बिहार सफर करते हैं.
मुझे नही पता कि हर चीज को इतना गौर से देखते हैं, इन चीजो को मैं भी भूल गया था
आपके इस खूबसूरत पोस्ट का एक कतरा हमने सहेज लिया है साप्ताहिक महाबुलेटिन के लिए , पाठक आपकी पोस्टों तक पहुंचें और आप उनकी पोस्टों तक , यही उद्देश्य है हमारा , उम्मीद है आपको निराशा नहीं होगी ,
सुशील जी दिल्ली वापस जाते समय आगरा होते हुए जाएं.
काफी चेष्टा की है आपने व्यंग्यात्मक चित्रण की मगर लेखन में सावधानी से लेख को रचनात्मक बनाया जा सकता था. नकारात्मकता में भीगा लेख जमता नहीं.
पार्क नहीं पार्किंग बनवाएँ, अपने को विकसित कहलाएँ.
आप क्या चाहते हैं कि हम इसे भी बिहार बना दें.
आपने वाक़ई बहुत बढ़िया चित्रण किया है. ये बातें दिल को छू गईं. बहुत धन्यवाद.
बढ़िया एनालिसिस.
जमशेदपुर का विकास तो आपको नज़र आया लेकिन उस जंगल के साफ़ होने की शर्त पर जिसके काटने से मानसून खतरे में पड़ गया है. जो थोडा भी संवेदनशील हैं उनकी जान निकली जा रही है की पानी नहीं बरसने से क्या हाल होगा इस प्रदेश का.
बेहतरीन. बहुत ही उम्दा. आपने मेरी पुरानी यादें ताज़ा कर दीं.
बहुत बढ़िया
कुछ मामलों में आपका कहना सही है झा जी, पर झारखंड सचमुच विकास कर रहा है.