राष्ट्रपति प्रणब का सपना
एक क़िस्सा है. एक गड़रिया था. वह भेड़ चराते हुए जब एक टीले पर जाकर बैठ जाता था तो उसका बातचीत करने का अंदाज़ बदल जाता था. वह जनहित और न्याय की बातें करने लगता था.टीले से उतरता तो फिर वही गड़रिया का गड़रिया.
धीरे-धीरे वह लोकप्रिय होता गया. एक दिन लोगों को शक हुआ कि टीले में ही कुछ है. उन्होंने टीले को खुदवाया तो उसने नीचे से विक्रमादित्य का सिंहासन निकला.
लोगों को समझ में आ गया कि अनपढ़ गड़रिया उस टीले पर बैठकर इतनी ज्ञान की बातें क्यों किया करता था.
वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने एक बार कहा था कि जिस तरह उस टीले के नीचे विक्रमादित्य का सिंहासन था, उसी तरह से रायसीना की पहाड़ी को खोद के देखा जाए तो किसी पुराने राजा का सिंहासन निकलेगा.
प्रभाष जोशी ने कहा कि कुछ तो ऐसा है जिसकी वजह से वहाँ पहुँचकर हर व्यक्ति की भाषा एक जैसी हो जाती है.
रायसीना पहाड़ी वही बड़ा सा टीला है जिस पर राष्ट्रपति भवन स्थित है.
ये किस्सा याद आया राष्ट्रपति के रूप में कार्यभार ग्रहण करते हुए दिए गए प्रणब मुखर्जी के भाषण को सुनकर.

उन्होंने कहा कि भूख से बड़ा अपमान कोई नहीं है और वे चाहते हैं कि ग़रीबों का इस तरह से उत्थान किया जाए कि जिससे ग़रीबी शब्द आधुनिक भारत के शब्दकोश से मिट जाए.
प्रणब मुखर्जी चार दशकों से भी अधिक समय से भारतीय राजनीति की मुख्य धारा में हैं.
वे उस समय भी सत्ताधारी दल का हिस्सा थे, जब प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी ने 'ग़रीबी हटाओ' का नारा दिया था.
वे उस घटना के भी गवाह हैं जब प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गांधी ने कहा था कि केंद्र से भेजे गए एक रुपए में से जनता तक 15 पैसे ही पहुँचते हैं.
वे उस समय भी सत्ता प्रतिष्ठान का हिस्सा थे, जब वित्तमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह देश के दरवाज़े आर्थिक उदारीकरण के लिए खोल रहे थे और महात्मा गांधी को उद्धरित करते हुए आखिरी आदमी की बात कर रहे थे.
वे उस समय भी सरकार में थे जब योजना आयोग की एक रिपोर्ट बता रही थी कि देश में 80 प्रतिशत लोग 20 रुपए प्रतिदिन से भी कम में गुज़ारा कर रहे हैं.
संयोगवश वे उस समय भी सत्ता से जुड़े हुए थे जब योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र देकर कहा कि जो शहरी 32 रुपए और जो ग्रामीण 26 रुपए रोज़ कमाता है, वह ग़रीब नहीं है.
इन चार दशकों में कई और ज़िम्मेदारियों के अलावा एक बार वित्त राज्यमंत्री, दो बार वित्तमंत्री और एक बार योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके प्रणब मुखर्जी को ग़रीबी और भूख पर इस तरह द्रवित होते किसी ने नहीं देखा.
उनके पेश किए हुए बजटों में किसी ने ग़रीबी और भूख़ को ख़त्म करने के क्रांतिकारी उपायों की झलक नहीं देखी.
बल्कि उनकी छवि देश के कॉर्पोरेट प्रतिष्ठानों के प्रिय मित्र की ही रही और यह कोई संयोग नहीं है कि कॉर्पोरेट प्रतिष्ठानों की छवि कम से कम ग़रीबों के हितचिंतकों की नहीं है. यह भी संयोग नहीं है कि टीम अन्ना उनके ख़िलाफ़ आरोपों का एक मोटा पुलिंदा लिए घूम रही है.
पहले प्रणब मुखर्जी ऐसी जगहों पर थे जहाँ से वे सरकार की नीतियों को प्रभावित कर सकते थे, चाहते तो ग़रीबों का भला कर सकते थे, भूख को मिटा सकते थे, लेकिन अफ़सोस कि वे ऐसा न कर पाए न ऐसा करने की कोशिश करते हुए दिखे.
अब वे जहाँ हैं वहाँ से वे ज्ञानोपदेश ही दे सकते हैं और आज के बाद वही कह सकेंगे जिस पर मंत्रिमंडल की स्वीकृति की मुहर लगी होगी.
ऐसे में उनके भाषण का एक और वाक्य याद आता है, जिसे उनके प्रायश्चित की तरह देखा जा सकता है, "कभी-कभी पद का भार व्यक्ति के सपनों पर भारी पड़ जाता है."
क्या कहें कि प्रणब मुखर्जी पर चार दशकों में एक भी ऐसा मौक़ा नहीं आया जब उनका सपना उनके पद भार के बोझ तले दबा न हो.
अब जो पद उनके पास है वह सपने तो दिखा सकता है लेकिन उसे पूरा करने में रत्ती भर भी मदद नहीं कर सकता.

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प्रणब चार दशकों तक राजनीति में अच्छे ओहदों पर रहे हैं. वो चाहते तो बहुत कुछ कर सकते थे लेकिन वो कुछ नहीं कर पाए. जब उनके पास पॉवर था तब कुछ नहीं किया. बच्चा जानता है कि राष्ट्रपति को देश में रबड़ का गुड्डा समझा जाता है. वो सिर्फ़ बड़ी बड़ी बातें कर सकता है वे राष्ट्रपति बनकर देश का कुछ नहीं कर पाएँगे.
अफसोस कि प्रणव मुखर्जी अभी भी आदतन राजनीतिक भाषा ही बोल रहे हैं यह लोगों की इमोशनल प्रताडना है, गरीबी के बारे में इस तरह बात करना दरअसल लोगों का मजाक उडाने जैसा है. लगभग 40 वर्ष के अपने राजनीतिक जीवन में कभी भी प्रणव मुखर्जी ने इतना क्रान्तिकारी वक्तव्य दिया हो इसका कोई भी उदाहरण नहीं है. अब इस तरह के बयानों का मतलब केवल लोगों के जज्बातों से खेलना ही है प्रणव मुखर्जी को यह कहना अब शोभा नहीं देता. वैसे भी राष्ट्रपति के पास केवल सुझाव देने के अतिरिक्त कोई विधाई शक्ति तो है नहीं और न ही न्यायालयों की तरह प्रशासनिक तंत्र को सीधे निर्देश देने की कोई प्रणाली ही है, शपथ ग्रहण करने के कुछ ही घंटों में इतना हृदय परिवर्तन होने का कोई कारण भी नजर नहीं आता और उन्हें कोई युक्ति सूझ गयी हो कि वे रातों रात गरीबी मिटा देगें ऐसा भी नहीं लगता. प्रणव मुखर्जी इतने तो जानकार हैं ही कि वे अच्छी तरह समझते हैं कि गरीबी का मुद्दा इस देश में राजनीति का सबसे बडा पैंतरा है. साड़ी बॉटने से लेकर मनरेगा तक का पूरा तमाशा गरीबी पर ही तो चलाया जा रहा है. वैसे प्रणव मुखर्जी राजनीति से उपर हो चुके हैं इसलिए इनके सामने सवाल रखना उचित नहीं है लेकिन हमारे सामने सवाल तो है ही कि गरीब होती ही क्यों है? लोगों का रोजगार छीन लो, इनकी छँटनी कर दो मंहगाई बढ़ा दो, आदिवासियों और किसानों की जमीनों का हडप लो, पूरी बाजार व्यवस्था को आम आदमी को कानूनन लूटने की व्यवस्था बना दो, फिर उस गरीब पर दया करके गरीबी हटाने का एक बयान जारी कर दो यह तो ज्यादती ही है, प्रणव मुखर्जी चाहे कितने ही बड़े पद पर हों लेकिन एक नागरिक के तौर पर उनकी हैसियत और किसी भी भारतीय की हैसियत में अन्तर नहीं है, कोई भी बडा या छोटा नहीं है अपने लिए इतनी बडी सुरक्षा और दूसरों के लिए निखालिस आश्वासन! ऐसे में राष्ट्रपति भवन में उनके लिए प्रवेश सम्भव कैसे हो गया यह समझ से परे है. महात्मा बुद्ध के बारे में कहावत है कि जब वे स्वर्ग में पहुँचे तो देवता उनकी अगवानी करते हुए उनकी जयजयकार करने लगे लेकिन महात्मा बुद्ध स्वर्ग की और पीठ करके बैठ गये और उन्होने कहा जब तक अन्तिम व्यक्ति स्वर्ग में नहीं आ जाता तब तक मैं स्वर्ग में प्रवेश कैसे कर सकता हूँ. कहा जाता है कि वे आज भी उसी स्थिति में बैठे हैं. देश में इस कदर गरीबी है ऐसे मैं इतने भावुक आदमी का राष्ट्रपति भवन में प्रवेश का क्या औचित्य हो सकता है? माना कि प्रणव मुखर्जी महात्मा बुद्ध नहीं हैं लेकिन उन्होने कभी सोचा कि लोगों की बदहाली उनके राष्ट्रपति भवन में पहुँचने से दूर नहीं होगी गरीबी को मिटाने का मार्ग राष्ट्रपति भवन से नहीं गुजरता है अपने लिए कुछ और और दूसरों को निखालिस नसीहत यह बात ठीक नहीं है.
बहुत अच्छा लिखा है आपने....शायद आप यकीन करें ना करें कि भाषण सुनते हुए मैं भी बिल्कुल यही सोच रहा था. ये बात सिर्फ़ रायसीना पर ही लागू नही होती. बल्कि कोई भी व्यक्ति ज्ञान भारी बातें तभी करता है जब उसे पता होता है कि उसे इसमें कोई काम नहीं करना है. प्रणव मुखर्जी भी कोई अलग नही हैं. वो कहते हैं ना, "पर उपदेश कुशल बहुतेरे"
विनोद जी आपने गड़रिए की बात से अपना ब्लॉग आरम्भ किया है, गड़रिया तो गड़रिया ही होता है मगर विक्रमादित्य दरअसल उनके वंश वाले ऊपर क्यों नहीं आ रहे हैं क्या सारा दायित्व उन्होंने नेहरू खानदान को सौंप दिया हैं, तभी तो जोड़ तोड़कर यह दायित्व निभाने राहुल गांधी का रास्ता बनाएँगे प्रणब मुखर्जी? पर 'कहीं राहुल गाँधी कांग्रेस के अंतिम नेता न साबित हो जाएँ' देश जिस संकट से जूझ रहा है दरअसल वह संकट ही कांग्रेस की देन है, आज इस नौजवान के लिए सत्ता में बैठे लोग राजतन्त्र की तरह इसके लिए ताज पोशी का ख्वाब देख रहे हैं, पर आश्चर्य होता है जिस नौजवान को यह न पता हो कि भारत देश क्या है, यहाँ की माटी में क्या होता है, क्या नहीं होता है, गरीब के साथ नौटंकी करने से देश का मुखिया बनने का ख्वाब पालना अब संभव नहीं है, जिन मूल्यों पर प्रणब दा राष्ट्राध्यक्ष बने हैं उन्हीं मूल्यों पर देश के अनेक राजनेता यह ख्वाब पाले हैं कि इस अबोध बालक में क्या रखा है, जनता इसे नकार चुकी है, वह बिहार की हो या उत्तर प्रदेश की मध्य प्रदेश की हो या गुजरात की,आज का हर नौजवान समझ चुका है कि इस देश में जब तक ईमानदार आदमी और राष्ट्रप्रेमी (भाजपाइयों) जैसा नहीं, राज्य में नहीं आएगा ये अलग बात है की यहाँ के मनचलों ने गांधी को गोली मारी, मनचलों ने इंदिरा को गोली मारी और क्षेत्रवादियों ने राजीव को गोली मारी. ये सब क्या है? क्यों नहीं सुना गया उन्हें यदि उनकी आवाज़ दबी तो परिणाम क्या होंगे हम सब समझते हैं जनता का भरोसा और ख़त्म हो जाएगा, आज सारे संसाधनों पर जो काबिज़ हैं वो राष्ट्रभक्त नहीं हैं.
राहुल गांधी जितनी उम्र में देश चलाने की बात सोच रहे हैं या उनके चापलूस ऐसा सोच रहे हैं इस देश को लूटने के लिए, उनसे ज्यादा प्रतिभावान आजतक बेरोजगार हैं और अपना घर भी बसाने की नहीं सोच पा रहा है. इस अपढ़ आदमी को चापलूस देश सौपना चाह रहे हैं, मतिभ्रष्ट हो गए हैं जो ऐसा सोच रहे हैं.यदि सवाल कांग्रेस और देश का है तो कांग्रेस पार्टी को प्रतिबंधित कर देना चाहिए की ये किसी भी चुनाव में हिस्सा नहीं लेगी क्योंकि अब यह वो कांग्रेस पार्टी है नहीं है जिसने देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी. अब यह प्राइवेट कंपनी हो गयी हैं, जिसके नए प्रेसिडेंट राहुल गांधी का रास्ता बनायेंगे ! बीबीसी ऐसा लिखे तो उसके मायने होते हैं, इन्हीं मायनों में प्रणब दा ऐसा करें या करेंगे आश्चर्यजनक नहीं है. अब तक का इनका कोई ऐसा इतिहास नहीं रहा है.दुनिया में इनकी क्या छवि है नीचे के लेख में संलग्न है - ब्रिटेन के समाचार पत्र द इंडिपेंडेंट ने हाल ही में प्रधानमंत्री को सोनिया गांधी की कठपुतली कहा, तो अब ब्रिटेन के ही एक समाचार पत्र ने नए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को फिक्सर करार दिया है। समाचार पत्र द टाइम्स ने लिखा है कि नए राष्ट्रपति ने अगली गांधी पीढ़ी का रास्ता खोला शीर्षक से समाचार लिखा है।प्रणब को राष्ट्रपति बनाने के बाद अब इस बात की पूरी संभावना है कि राहुल गांधी को महत्वपूर्ण पद दे दिया जाए। राहुल गांधी चुनाव में जीत दिलाने वाले नेता के रूप में नाकामयाब रहे हैं लेकिन उनके समर्थकों का मानना है कि प्रदेशों के चुनावों में उनकी नाकामयाबी को तब भूलाया जा सकता है, जब उन्हें कांग्रेस का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर उतारा जाएगा।"
यदि हम इस आलेख को ही आधार मान लें तो भी राहुल गांधी से कोई चमत्कार नहीं होने जा रहा है जैसा की अब तक हुआ है एक भी कायदे के कांग्रेसी को इन्होने मौका नहीं दिया है सारे लुटेरे लगाए हैं, जिन्होंने जनता को राजतन्त्र की तरह लूटा है, यह बात जनता जान गयी है अबकी वह इनका इंतजाम करने जा रही है. रही बात की जनता अब पांच वर्षों तक इंतज़ार तो करती है, पर वो जान ही गयी है की ये चाहते ही है की ये जिन्दा कौम ही न रहे इसे मुर्दा बनाकर छोडो, जिससे यह कहावत चरितार्थ न हो कि "जिन्दा कौमें पांच वर्षों का इंतज़ार नहीं करती." यही कारण है की प्रायोजित तरीके से महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और सामजिक असंतुलन को बनाए रखने में ही सारे कांग्रेसी अपना दिमाग खपाते रहते हैं.चाहे जब जातीय जनगणना का सवाल हो या बराबरी का हिस्सा देने का सवाल हो तब तब ऐसे लोग ही लाये जाते हैं और यही घालमेल का जिक्र आपने विस्तार से किया है सुंदर ब्लॉग के लिए आपको और बीबीसी हिंदी को बधाई.
प्रणब साहब का आज का भाषण सुनने से पहले तक वह हमें समझदार व्यक्ति लगते थे। माफ कीजिए शानदार नेता कहना मुनासिब नहीं लग रहा है। लेकिन आज राष्ट्रपति बनने के बाद जब उनकी राय सुनी तो हमारी तमाम गलतफमी दूर हो गईं और वह अपनी पीढ़ी के अन्य नेताओं की जमात में बैठे नजर आए जो केवल बातों के दम पर लोकप्रियता बटोरना चाहता है।
बहुत ही अच्छा लेख लिखा है आपने. यही वो गुण है जिससे बीबीसी इतनी लोकप्रिय बनी हुई है. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद.
लगता है कि प्रणब दा भी उसी परंपरा को 'ढोने' जा रहे हैं जो आम तौर पर राष्ट्रपति के वक्तव्य और भाषणों में झलकता है। रायसीना हिल्स में पहुंचने से पहले उनके पास पावर और अनुभव की कोई कमी नहीं थी। फिर भी दादा आम लोगों की दिल में जगह नहीं बना पाए। गरीबी और नौकरी पर उनका भाषण जरूर अखबारों और टीवी की सुर्खियां बढ़ाएगा पर क्या इससे आम भारतीय कोई हित होने जा रहा है? शायद नहीं.... गांधी के सपनों का जिक्र तो हर कोई माननीय करते हैं, मगर उसे पूरा करने का सच्चा साहस कौन दिखाएगा, यह अभी तक भविष्य में ही तैर रहा है।
"कभी-कभी पद का भार व्यक्ति के सपनों पर भारी पड़ जाता है." इस वाक्य में प्रायश्चित है कि या नहीं लेकिन हाँ अफसोस ज़रूर होगा। प्रणब मुखर्जी ऐसे राष्ट्रपति है जो प्रधानमंत्री से सबसे प्रबल दावेदार थे। उन्हें राष्ट्रपति बना कर लोकतंत्र के राजसी परिवार ने बूढ़े होते युवा नेता की राहों को प्रशस्त कर दिया है। अब चाटुकार दो तरफा खुशियां मना रहे हैं, युवराज के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाओं को लेकर और राष्ट्रपति के रूप में विरोध ना जताने वाले उम्मीदवार को पाकर।
करीब चार दशक पहले इंदिरा गाँधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था...अपने नए राष्ट्रपति ने शपथ लेने के बाद यही नारा दोहराया है ...याददाश्त के धनी होने के बावजूद वह शायद भूल गए कि यह कांग्रेस की चुनावी सभा नहीं थी!
बिल्कुल प्रासंगिक, इंसान को तभी भजन और भक्ति कि याद आती है जब वो कुछ और करने लायक नहीं रहता. आपने जिन तथ्यों के साथ विश्लेषण किया है उसके बाद इस विषय पर मतभिन्नता की बात ही नहीं रह जाती. क्या प्रणब दा इन बातों को बोलते समय यह नहीं जानते थे कि काश वो थोड़ी सी भी कोशिश करते जब उनके हाथ में कुछ करने को था, वो ये भी जानते हैं कि अब वो संविधान के सर्वोच्च पद पर हैं और उनकी बात को कोई नहीं काट सकता. या शायद इतने ऊँचे पद से जमीन कि असलियत नहीं दिखाई देती. लेकिन अगर वो सचमुच ऐसा चाहते हैं तो कोई रास्ता भी अवस्य ही निकाल सकते हैं. प्रणब दा आप सबसे अनुभवी राजनितिक राष्ट्रपति हो आपने कई बार कॉंग्रेस को संकट से उबारा है एक बार इस देश को भी संकट से उबार लो, मुझे विश्वास है आप के पास कोई ना कोई रास्ता जरुर होगा.
धन्यवाद विनोद जी, साहसपूर्वक आपने भारत के राष्ट्रपति और उनके होने पर सही टिप्पणी की, तमाम लाव लश्कर शायद यही सब बोलने के लिए होता हैं, जिसके पदभार संभालने में ही प्रत्यक्ष-परोक्ष करोड़ों का खर्च हो जाता है, लेकिन हमारे गणराज्य की शोभा हैं,जो सरदार शोभा सिंह के धंधे के लिए जरूरी है...
प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक सभी कठपुतली हैं और इनकी डोर उपरवाले नहीं बल्कि ..खैर आप सब इस बात से अवगत हैं. देश की जनता भी जानती है.
युवराज की ताजपोशी का मार्ग प्रशस्त किया जा रहा है. अन्ना हजारे और उनकी टीम का सूरज हमारी सोयी जनता को जगा नहीं सकेगा, क्योंकि बांग देने वाले मुर्गे सारे के सारे काटे जा चुके हैं. मुहावरा तो सिर्फ घोड़े का है, यहाँ तो लोग कुछ न कुछ बेचकर सोये पड़े हैं.सोये पसरे सब पत्थर के सनम हैं. पत्थरों में क्या खाक कमल खिलेगा.
अगर मैं प्रणव मुख़र्जी की जगह होता तो कभी इस पद को स्वीकार नहीं करता
विनोद जी, हम आप और बाकी लोग भी, चुप रह लेंगे. लेकिन इतिहास, अगर वो कभी बाहर निकला,तो वह ये पड़ताल तो जरूर करेगा कि इस दौर में इस देश में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति का फैसला कौन करता था, किस योग्यता के आधार पर करता था, कैसे उसे सान और सिरे चढ़ाया जाता था, और कैसे उसे बाकी देश के लिए, भरपूर निओलिबरल सेंसरशिप के बूते, माननीय वगैरह बताया जाता था. कैसे अदालतें तारीख दे-देकर इतिहास रचती थीं या रच जाने देती थीं, कैसे किसी पद के लिए किसी व्यक्ति की योग्यता की खुली पड़ताल की अनुमति तो दूर सवाल तक नहीं होता था. कैसे प्र-ण-ब सिर्फ एक स्पैलिंग है, सिर्फ एक नाम है. कैसे प्रक्रिया, उद्देश्य और पद्धति वही प्र-ति-भा शाली है, ज्ञानी है, मनमोहनी है, मजबूरी है, दिक्-विजयी है. कैसे गरीबी या बाकी मसले सिर्फ मीडिया में खपाए जाने के लिए होते हैं.
असली राष्ट्रपति तो तिवारी है- बेशर्मी कम से कम सीनाजोर तो है, उस पर आम और आदमी, एकता और अखंडता, 26 और 32 रुपए, 21 वीं सदी वगैरह का मुलम्मा तो नहीं है. कर लो, जो करते बने.