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कहां गया भ्रष्टाचार का मुद्दा?

सुशील झासुशील झा|शुक्रवार, 27 जुलाई 2012, 16:58 IST

भ्रष्टाचार के ख़िलाफ आंदोलन अब आंदोलन की बजाय अपने अंतर्विरोधों के लिए सुर्खियां बटोर रहा है.

साल भर पहले रामलीला मैदान में जिस तरह से जनसैलाब उमड़ा था वो भीड़ इस बार अभी तक देखने को नहीं मिली है.

जो मीडिया पिछले साल तक अन्ना के समर्थन में दिख रहे थे वो भी अब आलोचना करने में लगे हुए हैं.

बहुत कुछ ऐसा हो गया है कि भ्रष्टाचार का मुद्दा पीछे छूट गया सा लगता है. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक ख़बर को मानें तो अन्ना टीम अब अन्ना के नाम पर टोपी और गुड़िया बेच रही है.

कल तक जो मीडिया, अन्ना और भ्रष्टाचार के अलावा किसी और मुद्दे पर बात नहीं करता था वहीं आज भ्रष्ट नेताओं और भ्रष्टाचार के स्थान पर बात होने लगती है अरविंद केजरीवाल की, बाबा रामदेव की और उनके सहयोगी बालकृष्ण की.

इतना ही नहीं जंतर मंतर पर इस बार अन्ना पीछे दिखे. अरविंद केज़रीवाल आगे दिखे. कई लोग शायद इस बात से ही नाराज़ हैं क्योंकि उनका भरोसा अन्ना पर है अरविंद पर नहीं.

जंतर मंतर पर भीड़ है. कितनी इस पर बहस हो सकती है. मंच के ऊपर लिखा है बड़े बड़े अक्षरों में www.facebook.com/indiaagainstcorruption यानी सोशल मीडिया को पूरी तरज़ीह दी जा रही है.

मजे़ की बात यही है कि जहां सोशल मीडिया पर पिछले अन्ना आंदोलन के समर्थन में कई लोग दिखे थे आज वो भी उतने ज़ोरदार समर्थन में सामने नहीं आ रहे हैं.

कई लोग ऐसे भी हैं जो अन्ना के साथ हैं लेकिन उन्हें रामदेव का साथ पसंद नहीं. कुछ महीने पहले ही अरविंद केजरीवाल और रामदेव के बीच मंच पर ही मतभेद की बात सामने आ गई थी.

जंतर मंतर पर शुक्रवार को भी बाबा रामदेव के समर्थक शाम के समय बड़ी संख्या में जुटे लेकिन इससे पहले अन्ना के लिए समर्थन अत्यंत कम ही दिख रहा था.

हालांकि अभी इस आंदोलन के बारे में कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी लेकिन एक बात तय है कि आंदोलन पीछे छूटता जा रहा है. अन्ना, अरविंद, रामदेव आगे आ गए हैं और मीडिया की मगजमारी में भ्रष्टाचार का मुद्दा इतना हास्यास्पद सा लगने लगा है कि आम आदमी सोच रहा है- इससे अच्छा ही था कि नेता भ्रष्टाचार कर रहे थे कम से कम कोई नाटक तो नहीं था.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 17:47 IST, 27 जुलाई 2012 anish:

    सुशील बाबू, सही बात ये है कि अरविंद केजरीवाल अन्ना की टीम को डूबा देगा.पिछले बार भी कम पब्लिक आती अगर अन्ना हज़ारे को गिरफ्तार नहीं किया जाता तो. अनीस

  • 2. 17:56 IST, 27 जुलाई 2012 Naveen Kumar:

    इसके पीछे मीडिया का हाथ है. मीडिया बिका हुआ है कांग्रेस पार्टी के हाथों

  • 3. 18:46 IST, 27 जुलाई 2012 स्वराज सौरभ :

    आप ने बहुत सही कहा आज यह आन्दोलन बिलकुल फीका पर गया है ,यह टीम अब राजनीति कर रही है ,ये लोग घमंड से चूर हो गए हैं ,अन्ना एक महान व्यक्ति है ,पर उनके साथ के लोग सस्ती राजनीति पर आमादा हैं ,जैसे कुमार विश्वाश कवि हैं, पर ये अपने मंच पर दूसरों पर आरोप लगते समय अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं ,एक तरफ तो ये लोग खुद को गांधीवादी कहते हैं,पर इनके व्यवहार और भाषा मैं गांधीवाद कहीं नज़र नहीं आता .जनता अब बेवकूफ नहीं बनेगी ,रही बात श्री 1008 राम देव की तो उनके प्रिय सखा बाल क्रिशन कितने सच्चे हैं सब जान चुके हैं .अब जनता बेवकूफ नहीं बनेगी, भरष्टाचार केवल हम ही मिटा सकते हैं,अपनी जागरूकता से , अच्छी शिक्षा और अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देकर

  • 4. 21:17 IST, 27 जुलाई 2012 दुर्गेश गुप्त ‘राज’:

    महोदय, इस बार अन्ना जी के आन्दोलन में भीड़ न जुटने के कई कारण है, उनमें से सबसे पहला और महत्वपूर्ण कारण तो यही है कि जनता को पिछले आन्दोलन का कोई विशेष सकारात्मक परिणाम देखने को नहीं मिला, जिसकी कि वह उम्मीद लगाये बैठी थी. सरकार आज भी अपनी गति से उसे जो करना है कर रही है. जब कि पिछले आन्दोलन को देश-भर से भारी संख्या में जन-समर्थन इस आशा में देखने को मिला था कि शायद अन्ना जी का ये आन्दोलन कोई नया परिवर्तन लेकर आयेगा. भीड़ एकत्रित नहीं होने का दूसरा सबसे बड़ा कारण है, नेतृत्व. यही पता नहीं चल पा रहा कि इस आन्दोलन का वास्तविक नेतृत्व कौन कर रहा है ? मंच से बदल-बदल कर आ रहे बयान भी भ्रम पैदा कर रहे हैं. यदि ये आन्दोलन केवल अन्ना जी का आन्दोलन होता, तो संभव था ये स्थिति न होती, लेकिन इसमें अन्य नेतृत्व सीधे सामने आने के कारण भी संभवतः ये स्थिति निर्मित हो रही है. आज की स्थिति में वास्तविकता तो ये है कि सारे देश में जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले कार्यकर्ता ये आन्दोलन पर्याप्त संख्या में नहीं जुटा पाया है. यही कारण है कि सरकार के नुमाइन्दे निश्चिंत हो अपनी गति से निडर हो कर अपना कार्य कर रहे हैं. अन्ना जी को यदि अपना विशाल जन-आन्दोलन खड़ा करना है तो पहले जमीनी तौर पर जनमत तैयार करना होगा, जो सारे देश में एक साथ इस आन्दोलन को समर्थन दें, तभी कुछ हो सकता है. मैंने पहले पत्र में लिखा था कि यदि देश से भ्रष्टाचार समाप्त करना है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा एवं अन्य अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों का सहयोग लेना चाहिये. ये वह वर्ग है जो यदि दृढ़ निश्चय कर ले तो इस देश से अवश्य भ्रष्टाचार समाप्त हो सकता है. आशा है मेरे सुझाव पर विचार करेंगे.

  • 5. 00:14 IST, 28 जुलाई 2012 SHIV LAKHAN:

    कैसा आन्दोलन ? कोन सा भ्रष्टाचार ? यही है लोकाचार ! फ़िर क्यों करें प्रचार , क्योंकि अन्त मे हो जायेंगे लाचार,बेकार, गुनेहगार, (सरकार झूंठे केसों मे फ़ंसा देगी) या झूंठे वादे करके आन्दोलन तोड़ देगी , इसीलिये तो शायद ठंडे पड़े हैं हम सब मेरे यार.परन्तु जरूरत पडी़ तो मै फ़िर से पुनः इस आन्दोलन मे कूद पडूंगा.

  • 6. 01:03 IST, 28 जुलाई 2012 रवीँद्र कुमार:

    अन्ना के आंदोलन की गत सविनय अवज्ञा जैसी हो गई है ; परन्तु आंदोलन असफल नही हो सकता क्योँकि भारतीय समाज पर इसका व्यापक असर हुआ है . जन्तर -मंतर पर भीङ न होना अलग बात है.

  • 7. 01:06 IST, 28 जुलाई 2012 Arvind Yadav:

    पहली बार बीबीसी पर ऐसा लेख देख कर शर्म आ रही है. "कि आम आदमी सोच रहा है- इससे अच्छा ही था कि नेता भ्रष्टाचार कर रहे थे कम से कम कोई नाटक तो नहीं था." क्या ये सच है ? क्या सच में नेता नाटक नही करते और क्या सच में अन्ना , टीम अन्ना नाटक कर रही है. जरा बताऐ कि ऐसा क्या कर दिया अन्ना ने जो हमारे नेता नही करते.

  • 8. 01:32 IST, 28 जुलाई 2012 Avinash Kumar:

    सबसे पहले ब्लॉग के अंत से शुरू करे, अपने लिखा की अभी कहना जल्दबाजी होगा , सुशील जी आपने तो सब कह दिया अब बचा क्या है? अरविन्द केजरीवाल ने एक इंटरव्यू में प्रभु चावला से कहा था कि उन्हें झुकाने के लिए राजनितिक पार्टियों ने करोडो रुपये खर्च किये . अब आप ही बताइए कि वो पैसे किसे दिए गए?
    मीडिया को दिए गए. तभी तो सोशल नेटवर्क पर जब लोगों की भीड़ कम दिखी तो वो आप के लिए मजे की बात हो गयी (जैसा की आपने लिखा है- "मजे की बात तो ये है..."). बेहतर यही होगा कि राजनेताओं को खुश खबरी देना बंद करें और भ्रष्टाचार पर निशाना साधे. यही हमारे-आपके एवं देश के हित में होगा.

  • 9. 08:14 IST, 28 जुलाई 2012 dkmahto:

    सुशील भाई , कई महीनो से दो सवाल मेरा पीछा कर रहा है ? एक सवाल जो मेरे आठ साल के बेटे ने मुझसे पूछा और दूसरा सवाल एक कामयाब दोस्त ने जिसकी सैलरी . एक लाख प्रति महीना है ?
    पहला सवाल मेरे बेटे वाला , रामदेव ने जिस तरह से लोगो से पैसा इकठा कर आपने बिज़नस को करोड़ों में पहुचाया क्या वो ठगी जैसा नही है (काले धन जैसा ?)?
    दूसरा मेरे दोस्त का सवाल - अन्ना , केजरीवाल , किरण बेदी .... के पास कौन सा कुबेर का खजाना है जो वो एसी गाडियो में यहाँ वह जाते हैं , एसी मकानों में ही रहते हैं ? ( इनमे से कुछ को पेंसिओं पर तो कुछ को बेरोजगारी में जीना पर रहा है ?). जबकि इस महगाई में मेरे जैसा लाख रूपया महीना कमाने वाले को घर चलाने भर में पसीना छूट जाता है ?

  • 10. 10:45 IST, 28 जुलाई 2012 BHEEMAL Dildarnagar:

    अन्ना और केजरीवाल एक फायदे वाला सौदा कर रहे हैं .आप लोग मुझे माफ़ करें , कल तक मुलायम को बदनाम करने के लिए बच्चों की हड्डियो को मीडिया उछलता था , आज वो राजपरिवार के मामा हैं . कल तक राजकुवंर उप्र में ड्रामा करते थे , आज माया उनकी सगी मौसी बन चुकी हैं . आज मीडिया का शब्दार्थ है जी महारानी जी .
    आने वाले कल को येदियुरप्पा , महारानी जी के सलाहकारों में होगे , कोई आश्चर्य नहीं होगा , मीडिया उनके कसीदे गायेगा . बस उनको रानी से मिल जाना चाहिए , और भाजपा को लात मर देना चाहिए . जगनमोहन भी यह रास्ता अपना सकते हैं , सीबीआई उनको माफ़ कर देगी . काम की बात है मिल कर खाना और स्वर्ग में जाना . घूस लेते पकडे गया , घूस दे कर छूट जा . मुझको मोटा माल मिले तो फज़लगुरु को , कसाबजी , जिन्दालजी को अर्जुन अवार्ड दिला दूंगा.

  • 11. 11:49 IST, 28 जुलाई 2012 सतपाल:

    एक तरफ़ पूरा सरकारी तंत्र है दूसरी तरफ़ ये लोग. सरकार जो चाहती थी सो हो गया. लोग रोजी-रोटी के जुगाड़ में व्यस्त हैं, मंत्री भ्रष्टाचार में. भारत की जनता सुस्त है ,कोई इनके हक़ की भी अगर बात करे ये तो भी साथ नहीं देती। ये लोग अच्छे-बुर जैसे भी हैं ,आम आदमी की बात कर रहे हैं. तो इनका साथ क्यों न दिया जाए. मीडिया भी बिका हुआ ,बंटा हुआ है ,सरकार को तो सब जानते ही हैं,लोग ऊब चुके हैं,अब कोई भगत सिंह जैसा पैदा हो तो ये बहरी सरकार जागेगी.

  • 12. 12:32 IST, 28 जुलाई 2012 kundan kumar:

    मीडिया इस बार के आन्दोलन को ज्यादा महत्व नही दे रही है .क्योंकि उसे पहले से ही सरकार ने मैनेज कर रखा है. बाक़ी बात रही स्वामी बालकृष्ण की तो उसका सर्टिफिकेट किसी आम आदमी ने देखा है क्या .. हम सब क्यूं नही समझ रहे हैं कि सरकार आम आदमी के आन्दोलन को कमज़ोर कर रही है . वो नही चाहती कि कोई आम आदमी राजनीति में दखल दे . अगर कोई व्यक्ति पारदर्शिता की बात कर रहा है तो उसकी बात दबाना क्या सही है . अगर सरकार वास्तव में ईमानदार है तो आरटीआई के तहत ये बताये कि कोयला आवंटन में किस प्रकार की धाधलियां हुईं . ये बोलना कि मैं बेईमान साबित हुआ तो राजनीति छोड़ दूंगा कहाँ तक सही है . ईमानदारी दिखाने की चीज़ है बोलने कि नही कि मैं ईमानदार हूँ ..पब्लिक को दिखना चाहिए .

  • 13. 13:00 IST, 28 जुलाई 2012 SANTOSH sharma:

    मै यह नाटक और ड्रामा पिछले एक साल से देख रहा हूँ और जैसा मेरा पूर्वानुमान था वैसा ही ये चल रहा है इन लोगो को भ्रष्टाचार और आम जनता से कोई लेना देना नहीं ये लोग सिर्फ एक आधार बनाना चाहते थे अपनी राजनितिक दुकान खोले के लिए इनकी ये मंशा सबके सामने है आम नेताओं के तरह ये लोग भी जनता को मूर्ख समझते है ये लोग नेताओं की कुर्सी चाहिए ताकि ये भी अपनी अपनी जेबे भर सके जब इनकी जेबे भर जएगी सारा भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा

  • 14. 01:57 IST, 29 जुलाई 2012 संत कुमार :

    हमारी मीडिया आज कल चापलूसी जायदा करती है कवरेज कम

  • 15. 02:04 IST, 29 जुलाई 2012 sant kumar:

    इसमे हमको भी पता है कि ऐसी टिपणी कोई नही भेजता जो अपने पर हो लेकिन इस से दुनिया की नजरों मे मीडिया की इज्जत कितनी हे इसका तो अंदाजा होता है न .

  • 16. 02:33 IST, 29 जुलाई 2012 Ashutosh:

    आकडे झूठ नहीं बोलते , पिछली कई बार से अन्ना के सन्दर्भ में मैंने शुशील जी के ब्लॉग पड़े , पर अफ़सोस एक भी ब्लॉग आन्दोलन के पक्ष में नही, ऐसा क्यों हैं पाठक लोग खुद सोचे और कृपया मीडिया के इस स्वाभाव के बारे में जरूर सोचें.

  • 17. 09:16 IST, 29 जुलाई 2012 मनोज:

    इतना जल्दी कुछ भी कह देना बिलकुल उचित नहीं है. 50 साल लगे थे राष्ट्रपिता महत्मा गाँधी जी के नेतृत्व में आज़ादी पाने में .

  • 18. 06:53 IST, 31 जुलाई 2012 RN AWASTHI:

    भीड़ से जागने वाली सरकार जिस तरह कुंभकर्ण तब जागता था जब छह माह की नींद पूरी कर लेता था उसी तरह भारत सरकार भी तब चेतती है जब उसे अपने विरोध में भारी भीड़ नजर आने लगती है. फिलहाल वह जन लोकपाल के लिए जंतर-मंतर पर अनशन कर रहे अन्ना हजारे और उनके साथियों के अनशन पर ऐसा रवैया अपनाए हुए है जैसे कुछ हो ही न रहा हो. इस अनशन पर कोई संतुलित प्रतिक्रिया व्यक्त करने के बजाय केंद्रीय मंत्री आम लोगों को गुमराह करने अथवा चिढ़ाने वाले बयान देने में लगे हुए हैं. कांग्रेस के घोषित-अघोषित प्रवक्ता इस तरह के बयान देने में कुछ ज्यादा ही आगे हैं. अन्ना और उनके साथियों को खलनायक करार देने में माहिर दिग्विजय सिंह नए सिरे से अपने पुराने बयान दोहरा रहे हैं. कांग्रेस और केंद्र सरकार का रवैया यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि वह अपने से असहमत लोगों को देश के लिए खतरा बताने से भी परहेज नहीं करती. कांग्रेस की मानें तो अन्ना हजारे और उनके साथी भाजपा एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंट हैं. क्या इन संगठनों के एजेंटों को यह कहने-मांग करने का अधिकार नहीं है कि लोकपाल विधेयक पारित किया जाना चाहिए? क्या भाजपा और संघ प्रतिबंधित संगठन हैं? क्या उनकी स्थिति सिमी, उल्फा, लिट्टे अथवा लश्कर जैसी है? 25 जुलाई को जब टीम अन्ना के सदस्य अनशन पर बैठे और जंतर-मंतर पर अपेक्षित भीड़ नहीं जुटी तो सरकार और अन्ना विरोधियों को बड़ा सुकून मिला. इन सभी ने यह जाहिर किया कि उन्हें तो पहले से पता था कि ऐसा ही होगा. रविवार, 29 जुलाई को अन्ना के अनशन पर बैठते ही भीड़ उमड़ पड़ी. बावजूद इसके सवाल यह नहीं उठ रहा है कि सरकार अब क्या करेगी या करना चाहिए, बल्कि यह कहा जा रहा है कि देखना है कि सोमवार, मंगलवार, बुधवार. यानी बगैर छुट्टी वाले दिनों में अन्ना के समर्थन में भीड़ उमड़ती है या नहीं? क्या अब इस देश में किसी की तब सुनी जाएगी जब वह अपने पक्ष में भारी भीड़ खड़ी कर लेगा? क्या किसी कानून का निर्माण इस आधार पर होगा कि उसके पक्ष में भीड़ जुटती है या नहीं? यदि ऐसा ही है तो केंद्र और राज्य सरकारें यह भी बता दें कि कितनी बड़ी भीड़ उनकी आंखें खोलने के लिए पर्याप्त होगी-पांच-दस-पचास हजार या फिर दो-चार-छह लाख की भीड़? माना कि लोकतंत्र में संख्या बल का महत्व है, लेकिन यह तो सिर्फ विधायी सदनों तक सीमित है. क्या लोकतंत्र और सभ्य समाज का यह तकाजा नहीं कि यदि इतने बड़े देश में दो लोग भी कोई तार्किक बात कहें तो उस पर गौर किया जाए? आखिर यह कौन सी मानसिकता है जिसके तहत देश का कानून मंत्री यह कहता है कि सोनिया-राहुल गांधी से टकराना हाथी से टकराना है? लोकपाल की मांग करना सोनिया-राहुल से टकराना कैसे हो गया? वैसे हाथी की श्रवणशक्ति तो बड़ी तीव्र होती है. आखिर कांग्रेस के ये कैसे हाथी हैं जो यह भांप नहीं पा रहे हैं कि लोकपाल विधेयक पारित न होने के कारण जनता उद्वेलित है? इसमें दो राय नहीं हो सकती कि किसी भी कानून का निर्माण संसद ही करेगी और अपनी सहमति-समझ के आधार पर करेगी, लेकिन आखिर लोकपाल के मामले में अब भी आम सहमति का राग अलापने का क्या मतलब? क्या संसद के दोनों सदन वह प्रस्ताव पारित नहीं कर चुके जिसमें अन्ना की तीन मांगों पर बहस के बाद सहमति बन गई थी? यह आम जनता से धोखाधड़ी तो नहीं और क्या है कि जो लोकपाल विधेयक लोकसभा से पारित हुआ वह राज्यसभा में अटका दिया गया? यदि यह मान लिया जाए कि कुछ तार्किक आपत्तियों के चलते लोकपाल विधेयक राज्यसभा में अटका तो भी उसकी सुध न लेने का क्या मतलब? पिछले वर्ष शीतकालीन सत्र के अंतिम दिन लोकपाल विधेयक के राज्यसभा में अटकने के बाद उसे इसी सदन की प्रवर समिति को सौंप दिया गया था। तब से उसका कुछ अता-पता नहीं है. संसद का बजट सत्र गुजर गया और लोकपाल विधेयक पारित होने की उम्मीद लगाए लोग गुबार देखते रह गए. यदि अन्ना अनशन पर नहीं बैठते तो शायद मानसून सत्र में भी कोई लोकपाल विधेयक की परवाह करने वाला नहीं था. अभी भी इसके आसार कम हैं कि इस सत्र में लोकपाल विधेयक पर कोई विचार होगा, क्योंकि प्रवर समिति के अध्यक्ष सत्यव्रत चतुर्वेदी कह रहे हैं कि इस तरह के कामों में समय लगता है. नि:संदेह इस तरह का काम आनन-फानन नहीं होते, लेकिन आखिर समय की कोई सीमा है या नहीं? क्या किसी विधेयक पर विचार-विमर्श के लिए छह माह का समय पर्याप्त नहीं? क्या संसद ने इतना ही समय लाभ के पद संबंधी विधेयक में भी लिया था? क्या यह तथ्य नहीं कि लाभ का पद विधेयक तत्काल पारित हो, इसकी चिंता सत्तापक्ष और विपक्ष के साथ प्रधानमंत्री को भी थी? लोकपाल की मांग कर रहे अन्ना हजारे और उनके साथियों के तौर-तरीकों में तमाम खामियां हो सकती हैं, लेकिन इसके आधार पर लोकपाल में देरी करने का कोई मतलब नहीं. मुद्दा यह नहीं है कि अन्ना क्या कह रहे हैं अथवा किसे अपने अगल-बगल बैठा रहे हैं? मुद्दा यह है कि लोकपाल में देरी क्यों हो रही है? चूंकि अन्ना अनशन पर बैठ गए हैं और लोकपाल विधेयक जल्द पारित करने पर जोर दे रहे हैं इसलिए इसके भरे-पूरे आसार हैं कि एक बार फिर यह बेसुरा राग अलापा जाएगा कि संसद सर्वोच्च है-महान है-संप्रभु है और कोई उसे निर्देशित नहीं कर सकता. क्षमा करें, यह निरा झूठ है. जनाकांक्षाओं से मुंह मोड़ने वाली संसद महान नहीं हो सकती? कहीं ऐसा तो नहीं कि संसद उतनी ही जर्जर हो चुकी है जितनी कि उसकी इमारत?

  • 19. 12:23 IST, 31 जुलाई 2012 Ramdevaram Jyani:

    पहली बार बीबीसी पर ऐसा लेख देख कर शर्म आ रही है. "कि आम आदमी सोच रहा है- इससे अच्छा ही था कि नेता भ्रष्टाचार कर रहे थे कम से कम कोई नाटक तो नहीं था." क्या ये सच है ? क्या सच में नेता नाटक नही करते और क्या सच में अन्ना , टीम अन्ना नाटक कर रही है.
    एक तरफ़ पूरा सरकारी तंत्र है दूसरी तरफ़ ये लोग. सरकार जो चाहती थी सो हो गया. लोग रोजी-रोटी के जुगाड़ में व्यस्त हैं, मंत्री भ्रष्टाचार में. भारत की जनता सुस्त है ,कोई इनके हक़ की भी अगर बात करे ये तो भी साथ नहीं देती। अन्ना के आंदोलन की गत सविनय अवज्ञा जैसी हो गई है ; परन्तु आंदोलन असफल नही हो सकता क्योँकि भारतीय समाज पर इसका व्यापक असर हुआ है . जन्तर -मंतर पर भीङ न होना अलग बात है.

  • 20. 00:42 IST, 02 अगस्त 2012 avinash kumar:

    सबसे पहले ब्लॉग के अंत से शुरू करे, अपने लिखा की अभी कहना जल्दबाजी होगा , सुशील जी आपने तो सब कह दिया अब बचा क्या है? अरविन्द केजरीवाल ने एक इंटरव्यू में प्रभु चावला से कहा था कि उन्हें झुकाने के लिए राजनितिक पार्टियों ने करोडो रुपये खर्च किये . अब आप ही बताइए कि वो पैसे किसे दिए गए?
    मीडिया को दिए गए. तभी तो सोशल नेटवर्क पर जब लोगों की भीड़ कम दिखी तो वो आप के लिए मजे की बात हो गयी (जैसा की आपने लिखा है- "मजे की बात तो ये है..."). बेहतर यही होगा कि राजनेताओं को खुश खबरी देना बंद करें और भ्रष्टाचार पर निशाना साधे. यही हमारे-आपके एवं देश के हित में होगा

  • 21. 11:29 IST, 04 अगस्त 2012 SHYAM KUMAR:

    राजनीति में आना आसान नहीं. टीम अन्ना राजनीति में पैठ बनाने के लिए ये स्वांग रच रही थी. उनका मक़सद लोगों को अपनी तरफ़ कर फिर राजनीति में जाकर पद हासिल करना था. नहीं तो इतनी जल्दी हार नहीं मानते. बलिदान देने का फैसला झूठा निकला.
    SHYAM KUMAR
    MUZAFFARPUR
    BIHAR

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