इस विषय के अंतर्गत रखें सितम्बर 2011

सचिन और शोएब.....

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|सोमवार, 26 सितम्बर 2011, 00:38

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मैं उस दिन सेंचुरियन मैदान सुबह आठ बजे ही पहुँच गया था. भारत और पाकिस्तान विश्व कप के सुपर सिक्स में पहुँचने के लिए महत्वपूर्ण मैच खेल रहे थे. स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था.
पाकिस्तान ने टॉस जीतकर पहले खेलने का फ़ैसला किया था.
सईद अनवर ने जिस तरह बुलेट ट्रेन वाली पारी खेली थी,पवेलियन में मौजूद भारतीय दर्शकों की बॉडी लेंग्वेज बिगड़ गई थी.
राज सिंह डूँगरपुर कह रहे थे लड़के थके हुए नज़र आ रहे हैं.पाकिस्तान ने 273 रन बनाए थे और ज़्यादातर विशेषज्ञ कह रहे थे कि मैच भारत के हाथ से निकल चुका था.सचिन तेंदुल्कर और वीरेंद्र सहवाग क्रीज़ पर उतरे.आम तौर से सहवाग पहली गेंद खेलते हैं.
उस दिन सचिन ने पहले स्टॉन्स लिया. वसीम अकरम की तीसरी गेंद पर उन्होंने चौका लगाया. दूसरे ओवर में शोएब अख़्तर गेंद फेंकने आए.
शोएब के ओवर की चौथी गेंद ऑफ़ स्टंप से दो फ़ुट बाहर थी लेकिन उसकी गति थी 151 किलोमीटर प्रति घंटा ! सचिन अगर उस गेंद को छोड़ देते तो शर्तिया वाइड होती. लेकिन उन्हें शोएब से अपना हिसाब चुकता करना था. उन्होंने पूरी ताक़त से उसपर अपर कट लगाया और गेंद छह रनों के लिए डीप बैक्वर्ड प्वाएंट बाउंड्री पर जा उड़ी.

शोएब ने अपने मील भर लंबे रन अप से बेन जॉन्सन के अंदाज़ में दौड़ना शुरू किया. इस बार गति थी उससे भी तेज़ ....154 किलोमीटर प्रति घंटा ! सचिन ने इस बार गेंद को स्कवायर लेग बाउंड्री की तरफ़ ढ़केला. इस शॉट ने शोएब को इतना हतोत्साहित कर दिया कि लगा कि वह अपने बॉलिंग मार्क पर ही नहीं पहुंचना चाह रहे. लेकिन अभी कहानी ख़त्म नहीं हुई थी.

शोएब की अंतिम गेंद को सचिन ने ऑफ़ स्टंप पर शफल करते हुए महज़ ब्लॉक भर किया. कोई बैक लिफ़्ट नहीं, कोई फ़ौलो थ्रू नहीं.... किसी की शायद ज़रूरत भी नहीं थी. कोई अपनी जगह से हिल भी पाता इससे पहले गेंद मिड ऑन बाउंड्री के रस्से को छू रही थी. अब तक दर्शक पागल हो चुके थे.
शोएब अख़्तर के जले पर नमक छिड़का उन्हीं के कप्सान वकार यूनुस ने जब उन्होंने अगले ही ओवर में शोएब को गेंदबाजी से हटा लिया. हाँलाकि अंतत: शोएब ने थके हुए रनर के सहारे खेल रहे सचिन तेंदुल्कर को एक शॉर्ट पिच गेंद से आउट किया लेकिन तब तक सचिन 75 गेंदों पर 98 रन बना चुके थे और भारत जीत की ओर बढ़ रहा था.

शोएब अख़्तर ने दस ओवरों में 72 रन दिए थे जो उनका एक दिवसीय क्रिकेट में अब तक का सबसे कीमती स्पेल था. 32 के स्कोर पर जब सचिन का एक मुश्किल कैच अब्दुल रज़्ज़ाक ने मिस किया तो मैदान पर ही चिल्ला कर वसीम अकरम ने उनसे कहा था, 'जानता है किसका कैच तूने छोड़ा है.'

जब सचिन लंगड़ाते हुए पवेलियन लौटे तो स्टेडियम का एक एक आदमी अपने स्थान पर खड़ा था. मैं भी उनमें से एक था. मेरे ख़्याल से उसी दिन चेतन शर्मा की आख़िरी गेंद पर जावेद मियाँदाद द्वारा लगाए गए छक्के का बदला ले लिया गया था.

भारतीय जनता पार्टी के गाँधी?

राजेश जोशीराजेश जोशी|मंगलवार, 20 सितम्बर 2011, 17:40

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लगभग एक दशक बाद दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय कार्यालय 11, अशोक रोड पहुँचा तो कई चीज़ें बदली हुई नज़र आईं.


Godse books

भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय में गोडसे की किताबें.

अब वाहन बाहर फ़ुटपाथ पर ही खड़ा करना होता है. अंदर जाने के लिए मैटल डिटेक्टर से होकर गुज़रना होता है. जिस लॉन में अक्सर नरेंद्र मोदी या गोविंदाचार्य टहलते हुए नज़र आ जाते थे, उसके चारों ओर नए कमरे और पास में एक विशाल ऑडिटोरियम बना दिया गया है.

पार्टी कार्यालय के अंदर किताबों की एक नई दुकान भी खुल गई है जिसमें किताबों के साथ साथ पार्टी के झंडे और पोस्टर भी बिकते हैं.

किताबों को सरसरी तौर पर देखना शुरू किया: अटल बिहारी वाजपेयी का कविता संग्रह, डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के भाषणों का संकलन, दीनदलाय उपाध्याय की किताबें, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार और माधव सवाशिव गोलवलकर का साहित्य, लालकृष्ण आडवाणी की किताबें, हिंदुत्व, विभाजन, सावरकर साहित्य.... इन सब किताबों से होते हुए नज़र एक किताब पर जम गई:

'गाँधी वध क्यों?' लेखक: नाथूराम गोडसे.

किताब के कवर पर एक तोप से निकले लाल रंग के विस्फोट के बीच गाँधी का चित्र बना है. विस्फोट के बग़ूले के नीचे रक्त टपकता दिखाया गया है. इस किताब के साथ एक और किताब देखता हूँ:

'गाँधी वध और मैं'. लेखक: गोपाल गोडसे.

काउंटर पर किताबें बेच रहे कार्यकर्ता से बेसाख़्ता सवाल करता हूँ: "ये किताबें... यहाँ?" तुरंत इस प्रश्न की निरर्थकता का एहसास हो जाता है क्योंकि ये किताबें तो कहीं भी हो सकती हैं. भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय में भी !

क्या गाँधी के हत्यारे की किताबें छापना या बेचना कोई अपराध है? एकदम नहीं.

किताबें बेच रहे कार्यकर्ता ने ख़ारिज करने के अंदाज़ में मुझे ऊपर से नीचे तक भरपूर घूरा और फिर कहा: "आपने ये सवाल पूछा ही क्यों?"

"हाँ, पूछने का दरअसल कोई अर्थ नहीं है", मैंने क़िस्सा रफ़ा दफ़ा करने के अंदाज़ में कहा.

किताबों की अलमारियों पर एक बार फिर ग़ौर से नज़र दौड़ाता हूँ. क्या महात्मा गाँधी की जीवनी या उनसे जुड़ा साहित्य उपलब्ध होगा बीजेपी कार्यालय में? अगर नाथूराम गोडसे की किताबें यहाँ मिल सकती हैं तो गाँधी की तो मिलेंगी ही. आख़िर भारतीय जनता पार्टी को महात्मा गाँधी से कोई एतराज़ तो है नहीं !

अटल बिहारी वाजपेयी ने ही तो गाँधीवादी समाजवाद को एक ज़माने में भारतीय जनता पार्टी का मूल दर्शन बताया था. हिंदुत्व के नए शिखर पुरुष नरेंद्र मोदी ने अपने आलीशान अनशन स्थल पर न हेडगेवार की तस्वीर लगाई गई थी, न गोलवलकर की. उन्होंने गाँधी की विशाल तस्वीर के नीचे ढाई दिन का "सदभावना" अनशन किया.

किताबें बेच रहे कार्यकर्ता की निगाहें मुझपर ही लगी थीं. मेरी निगाहें भारतीय जनता पार्टी के दफ़्तर में गाँधी साहित्य को ढूँढ रही थीं.

"क्या यहाँ महात्मा गाँधी की जीवनी या उनका साहित्य उपलब्ध है?" मैंने फिर पूछा.

"........", किताबें बेचने वाला कार्यकर्ता चुप रहा और फिर बहुत देर तक सोचने समझने के बाद कुछ व्यस्त सा दिखते हुए बोला, "गाँधी साहित्य लेना हो तो आप गाँधी स्मृति चले जाइए या फिर काँग्रेस के कार्यालय में भी वो किताबें आपको मिल जाएँगी."

नरेंद्र मोदी अपना "सदभाव मिशन" गाँधी की तस्वीर तले शुरू करते हैं, हेडगेवार या गोलवलकर या सावरकर या गोडसे की नहीं. लेकिन उनकी पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में गाँधी की हत्या के पीछे का "तर्क" प्रस्तुत करने वाली किताबें आसानी से मिलती हैं, गाँधी का साहित्य नहीं. आख़िर क्यों?

आपके पास है कोई जवाब?

पश्चात्ताप और पाखंड

अपूर्व कृष्णअपूर्व कृष्ण|शनिवार, 17 सितम्बर 2011, 21:14

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नरेंद्र मोदी उपवास कर रहे हैं, शंकरसिंह वाघेला भी जवाबी उपवास कर रहे हैं, इससे पहले अन्ना हज़ारे कर रहे थे, उससे पहले बाबा रामदेव कर रहे थे.

राजनीति का विद्यार्थी इन सारी घटनाओं को मीडिया के चश्मे से देख रहा है, समझने का प्रयास कर रहा है.

मगर उसे एक प्रश्न पीड़ित कर रहा है. बौद्धिक बहस की रोज़ाना की ख़ुराकें उस पीड़ा का शमन नहीं कर पा रहीं हैं.

वो प्रश्न दो भावनाओं से जुड़ा है - पश्चात्ताप और पाखंड.

दंगों के दौरान एक सरकार का मुखिया रहने की ज़िम्मेदारी को स्वीकार करते नरेंद्र मोदी अगर पश्चात्ताप कर लें तो वो अधिक कारगर होगा या उपवास का पाखंड?

उपवास के पहले ही दिन पौन घंटे बोलकर शारीरिक ऊर्जा को ख़र्च करनेवाले मोदी केवल तीन शब्दों से काम चला सकते थे - आई एम सॉरी - मुझे खेद है - लेकिन वो ऐसा नहीं करते, और ना लगता है कि कभी करेंगे भी.

राजनीति का विद्यार्थी इस प्रश्न से पीड़ित है - कि मोदी को पश्चात्ताप से अधिक पाखंड क्यों प्यारा है?

ऐसा ही एक प्रश्न उस क्षण भी खड़ा हुआ था जब कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने पहले बुज़ुर्ग अन्ना हज़ारे पर हिंदी शब्दबाणों से प्रहार किए और बाद में मजबूरी में उसपर अंग्रेज़ी में मलहम लगाकर मौन हो गए.

राजनीति का विद्यार्थी जानना चाहता था - लुधियाना के स्मार्ट सांसद को क्या पश्चात्ताप और पाखंड का अंतर नहीं पता था?

पश्चात्ताप के स्वर बाबा रामदेव के मुख से भी आ सकते थे. हालाँकि सत्य अभी अस्पष्ट है, लेकिन जिसप्रकार उनके डेपुटी बालकृष्ण सारे परिदृश्य से ओझल हो चुके हैं, उससे सामान्य जनों के मन में संदेह के बीज अवश्य पड़ चुके हैं.

मगर बाबा रामदेव की बोलियों में भी पश्चात्ताप का भाव लुप्त है.

पश्चात्ताप के बोल स्वामी अग्निवेश को भी बोलने चाहिए थे, मगर वो पहले मिथ्याजाल बुनने के प्रयास करते रहे, और अब मूक हैं.

पश्चात्ताप भरी और भी कई वाणियाँ सुनाई दे सकती थीं. अपनी सत्ता में लोकतंत्र की आत्मा का गला घोंटने के बराबर काम करनेवाले मदांध नेता, अन्ना आंदोलन के समय लोकतंत्र की रक्षा की गुहार लगाते रहे, मगर उनकी वाणियों से उनके पिछले कर्मों के लिए अपेक्षित पश्चात्ताप ओझल रहा.

पश्चात्ताप और पाखंड के इस प्रश्न के सामने खड़े राजनीति के विद्यार्थी की सहायता बौद्धिक बहस नहीं कर पाते.

उसकी उलझन को दूर करती है स्कूल की उसकी पाठ्य पुस्तक में राष्ट्रकवि दिनकर की एक कविता की पंक्तियाँ -

सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके जब पीछे जगमग है.

पश्चात्ताप भी सहनशीलता, क्षमा, दया की तरह मानव के भीतर की गहराई में बसी एक कोमल भावना है.

तो क्या मोदी, मनीष तिवारी, बाबा रामदेव सरीखे लोग बलशाली नहीं हैं? क्या वे सहनशीलता, क्षमा, दया और पश्चात्ताप जैसी भावनाओं का भार नहीं उठा सकते?

बेशक बलशाली होंगे, मगर उनमें शायद आत्मबल नहीं - वे शायद इसलिए पश्चात्ताप नहीं कर पाते.

आत्मबल होता तो वे उसके दर्प से जगमगाते, और पूजे ना सही, प्रतिष्ठा अवश्य पाते.

सदियों पहले मौर्य साम्राज्य के सम्राट अशोक ने कलिंग के मैदान में हुए रक्तपात को देख पश्चात्ताप का प्रण लिया था, पश्चात्ताप किया था.

उनके कार्यकाल में बना चार शेरों वाला निशान आज भारत राष्ट्र की पहचान है.

इतिहास में दर्ज होने का मौक़ा

विनोद वर्माविनोद वर्मा|बुधवार, 14 सितम्बर 2011, 11:33

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इतिहास एक मौक़ा देता है. वह कुछ देर ठहरकर देखता है कि उस मौक़े का इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है. इसके बाद वह निष्ठुरता के साथ फ़ैसला करता है.

इन निर्मम फ़ैसले में कभी ये होता है कि एक दुर्बल सा व्यक्ति शिखर पर जा खड़ा होता है. कभी एक सक्षम व्यक्ति गर्त में चला जाता है. और कभी शिखर पर पहुँचता सा दिखता व्यक्ति भी मौक़ा गँवाकर निचली पायदान पर जा खड़ा होता है.

महात्मा गांधी से लेकर बाबा साहब अंबेडकर तक कई उदाहरण हैं जिन्होंने मौक़े को पहचाना और इतिहास रचा. लेकिन ऐसे भी बहुत से उदाहरण हैं जो इसके ठीक विपरीत हैं.

अपने समकालीन इतिहास में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो चेतावनी देते हैं कि मौक़ा गँवाना कितना ख़तरनाक साबित हो सकता है.

विश्वनाथ प्रताप सिंह के पास एक मौक़ा था जब वो इतिहास बना सकते थे. चाहे राजनीतिक मजबूरी में सही लेकिन मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करके उन्होंने एक पहल तो की. लेकिन भ्रष्टाचार के जिस मुद्दे पर वो प्रधानमंत्री बने थे, उस पर उन्होंने कुछ नहीं किया.

पीवी नरसिंहराव के पास मौक़ा पिछले दरवाज़े से आया था. लेकिन मौक़ा तो मौक़ा होता है. वे भी राजनीतिक गुणा गणित में चूक गए. वे बाबरी मस्जिद का विध्वंस नहीं रोक सके और अनजाने ही लालकृष्ण आडवाणी को एक वर्ग का हीरो बनने का मौक़ा दे दिया.

कहा जाता है कि इंद्रकुमार गुजराल ने भी अवसर गँवाया.

अटल बिहारी वाजपेयी ने अगर गुजरात दंगों के समय नरेंद्र मोदी को राजधर्म का पालन करने की हिदायत देने भर को ही अपना राजधर्म न माना होता तो वे देश के सांप्रदायिक सद्भाव के इतिहास में एक नया पन्ना जोड़ सकते थे. वे चूक गए.

एक मौक़ा ज्योति बसु के पास था कि वे देश के प्रधानमंत्री बनते. लेकिन उनकी पार्टी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने इस अवसर को गँवा दिया. बाद में उन्होंने माना कि ये एक 'ऐतिहासिक भूल' थी.

इतिहास ने एक मौक़ा सोनिया गांधी को भी दिया. प्रधानमंत्री का पद स्वीकार न करने के बाद दुनिया का एक बड़ा हिस्सा उन्हें 'संत' और 'त्याग की मूर्ति' की उपाधि दे रहा था. लेकिन यूपीए के सात वर्षों के कार्यकाल में वे उम्मीदों के आगे पराजित सी खड़ी दिख रही हैं.

मनमोहन सिंह के पास भी देश के इतिहास में अपने पन्ने जोड़ने का बड़ा अवसर था. एक नौकरशाह से प्रधानमंत्री बनने के बाद वे चाहते तो अपनी साफ़ सुथरी छवि और निर्विरोध नेतृत्व को आधार बनाकर देश को एक नई दिशा दे सकते थे. लेकिन उन्होंने किया इसका बिल्कुल उल्टा. आज की स्थिति तो ये है कि वे इतिहास के पन्नों में हाशिए पर खड़े कर दिए गए हैं.

मायावती को भी इस देश के इतिहास ने एक अवसर दिया. अपने एक मित्र की इस बात से मैं सहमत हूँ कि वे चाहतीं तो पाँच वर्षों में सदियों से चली आ रही कई परंपराओं को उलट सकती थीं लेकिन वे इसे समझ नहीं सकीं. उन्होंने अपने काम की जगह अपनी मूर्तियों से इतिहास में जगह बनाने की चेष्टा की.

एक अवसर राहुल गांधी की प्रतीक्षा में था लेकिन ऐसा दिखता है कि अपनी राजनीतिक अपरिपक्वता की वजह से वे उस अवसर से लगातार दूर होते जा रहे हैं.

सबसे ताज़ा अवसर अन्ना हज़ारे के पास है. एक बार फिर देश में एक लहर उठी है. इस बात पर विवाद हो सकता है कि ये अवसर उन्होंने हासिल किया है या अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी ने उन्हें उपलब्ध करवाया है. लेकिन अवसर तो अवसर है.

कम से कम इस समय तो नहीं दिखता कि अन्ना हज़ारे के पास ऐसी ठोस योजनाएँ हैं जिससे कि वे इन लहरों पर सवार होकर दूर तक यात्रा कर सकें. अगर वे ये मौक़ा चूक गए तो एक बार फिर इसे लोग जयप्रकाश नारायण की 'संपूर्ण क्रांति' की तरह याद करेंगे. आकर गुज़र जाने वाले सैलाब की तरह.

बम हमलों से मिलता क्या है

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|गुरुवार, 08 सितम्बर 2011, 14:19

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दिल्ली हाईकोर्ट हमले के बाद कथित रूप से हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी(हूजी) की तरफ़ से एक ईमेल भेज कर इस हमले की ज़िम्मेदारी ली गई.
यह भी धमकी दी गई कि अगर अफ़ज़ल गुरू की फाँसी की सज़ा समाप्त नहीं की जाती तो सुप्रीम कोर्ट पर भी हमले होंगे.
सवाल उठता है कि क्या इस तरह के हमलों से चरमपंथियों का उद्देश्य पूरा होता है ? ज़्यादातर मामलों में ठीक इसका उलटा होता है.
मुम्बई हमलों का मुख्य उद्देश्य भारत के शहरों में रहने वाले लोगों के दिलों में दहशत बैठाना था.लेकिन ऐसा हो नहीं पाया.बल्कि इन चरमपंथियों के लिए जो थोड़ी बहुत सहानभूति कुछ लोगों के दिलों में थी वह भी जाती रही.हाँ मीडिया कवरेज उन्हें ज़रूर मिला और वह विश्व सुर्ख़ियों में छाए रहे.
पंजाब में भी जब चरमपंथियों ने अंधाधुंध तरीके से बेगुनाह लोगों को मारना शुरू किया जो उन्होंने लोगों का समर्थन खो दिया.
उसी तरह असम में भी जब उल्फ़ा ने भीड़ भरे इलाक़ों में विस्फोट और गोलीबारी शुरू की तो धीरे धीरे जन समर्थन उनसे दूर होता चला गया.
भीड़ भाड़ वाले इलाकों में सॉफ़्ट टारगेटों को निशाना बनाकर मीडिया का ध्यान तो आकृष्ट किया जा सकता है लेकिन इसकी क़ीमत लोगों की हमदर्दी खोकर चुकानी पड़ती है और संगठन की साख दिन पर दिन गिरती चली जाती है.
लेकिन इसके साथ दूसरे पहलू पर भी नज़र डालना ज़रूरी है.इसको भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के ख़िलाफ़ एक टिप्पणी ही माना जाएगा कि मुम्बई हमलों के बाद एक भी चरमपंथी हमले को अब तक हल नहीं किया जा सका है.
वह चाहे पुणे का जर्मन बेकरी धमाका हो,वाराणसी का शिला घाट बम विस्फोट हो,राष्ट्रमंडल खेलों से पहले जामा मस्जिद के सामने हुई फ़ायरिंग हो या फिर बंगलौर के चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर हुए सीरियल बम विस्फोट हों.इन सभी मामलों में या तो कोई गिरफ़्तारी हुई ही नहीं और या फिर गिरफ़्तार किए गए लोगों को कुछ दिनों बाद सबूतों के अभाव में छोड़ दिया गया.

आतंक का सामना प्रतिक्रिया से नहीं किया जा सकता.इसके लिए अग्रसक्रियता बहुत ज़रूरी है.

एनआईए जैसे संगठन घटना हो जाने के बाद तस्वीर में आते हैं.घटना से पहले उनकी भूमिका बहुत संकुचित होती है.यही वजह है कि आतंक को रोकने में इसकी भूमिका सवालों के घेरे में है.

कितने ईमानदार हैं प्रश्न?

अपूर्व कृष्णअपूर्व कृष्ण|सोमवार, 05 सितम्बर 2011, 12:48

टिप्पणियाँ (24)

कोई पाकिस्तानी-श्रीलंकाई-अंग्रेज़ परदेसी, या ख़बरों की दुनिया से दूर रहनेवाला देसी यदि ये बाल सुलभ प्रश्न करता है - कि अन्ना हज़ारे कौन हैं - तो ये सवाल एक सवाल होता हैं, उनमें उत्तर जानने की जिज्ञासा, निश्छलता, ईमानदारी होती है.

पर सचेत सज्जनों की बौद्धिकता से ओत-प्रोत बोली-बात-बहस के बीच जब कहीं ये सवाल आता है - कि अन्ना हज़ारे कौन हैं, या अन्ना हज़ारे हैं कौन, या अन्ना हज़ारे असल में कौन हैं - तो वो सवाल, सवाल नहीं होता, उनमें उत्तर जानने के स्थान पर उत्तर बताने की अभिलाषा होती है. वो सवाल ईमानदार नहीं होता.

पिछले दिनों ऐसे प्रश्न बहुतेरे दिखाई दिए जो एक प्रतिप्रश्न को पैदा करते हैं - कि क्या इस प्रश्न में ईमानदारी है? ये प्रश्न उत्तर जानने की इच्छा से किया गया प्रश्न है? या ये अपनी बात को रखने का एक यत्न भर है.

अन्ना के आंदोलन को लेकर जो प्रश्नों का अंबार लगा रहा, जिनमें एक प्रश्न सर्वत्र छाया रहा - क्या अन्ना की तुलना गांधी से हो सकती है? - अब ये प्रश्न एक प्रतिप्रश्न पैदा करता है. क्या प्रश्नकर्ता को सचमुच नहीं पता कि ये तुलना एक प्रतीक भर है? अन्ना और गांधी की तुलना के इस प्रश्न को लेकर जो भी दिशाहीन बहस होगी, उसका निष्कर्ष कहाँ पहुँचेगा, ये क्या प्रश्नकर्ता को नहीं मालूम?

एक प्रश्न ये भी उठा - क्या अन्ना का आंदोलन, जेपी के छात्र आंदोलन, संपूर्ण क्रांति आंदोलन के जैसा आंदोलन है, या क्या वाकई आंदोलन है भी? - यहाँ अब ये प्रतिप्रश्न आता है - क्या वाकई इस प्रश्न का उद्देश्य ये जानने के लिए किया जा रहा है कि ये आंदोलन है या नहीं? या ये एक प्रयोजन है, ये राय प्रकट करने का कि नहीं अन्ना का आंदोलन, जेपी के आंदोलन जैसा नहीं है.

इन प्रश्नों को भी लीजिए - क्या ये क्रांति है, आज़ादी की दूसरी लड़ाई है? उत्साह और उन्माद में निकले नारों को पकड़कर उछाले गए इस प्रश्न का उत्तर भी पूछनेवाला पहले से जानता है. दिशाहीन मार्ग पर भागती बहस कहीं भी नहीं पहुँचेगी इसका उसे भी अंदाज़ा नहीं होता?

एक बुनियादी प्रश्न ये उठाया गया - क्या एक जन लोकपाल क़ानून से सारी समस्याओं का अंत हो जाएगा, क्या भ्रष्टाचार का निर्मूलन हो जाएगा? - यहाँ फिर प्रतिप्रश्न आता है - क्या वाकई प्रश्न करनेवाला नहीं जानता कि इसका उत्तर नकारात्मक में ही आएगा? स्वयं अन्ना हज़ारे कह चुके हैं इससे भ्रष्टाचार में कमी आएगी, उसका अंत नहीं होगा. जन लोकपाल विधेयक सरकारी भ्रष्टाचार का सवाल उठाता है, भ्रष्टाचार के सामाजिक-आर्थिक-नैतिक आयामों से जूझने के लिए दूसरे उपाय अपनाने होंगे, क्या ये प्रश्नकर्ता को नहीं मालूम?

प्रश्न ये भी उठा - टीवी-मीडिया-फ़ेसबुक-ट्विटर ना होता तो क्या अन्ना के आंदोलन को ऐसा प्रचार मिलता? - यहाँ प्रश्नकर्ता सिद्ध करना चाहता है कि बिना इन माध्यमों के ऐसा प्रचार नहीं मिलता. पर प्रतिप्रश्न ये भी उठता है - क्या प्रश्नकर्ता नहीं जानता कि संचार माध्यमों के जगत में जो क्रांति हुई है वो स्थापित हो चुकी है? क्या आज गांधीजी या जेपी होते तो मोबाइल फ़ोन नहीं रखते? टीवी पर दिखाई नहीं देते?

प्रश्न आंदोलन के तरीक़े पर भी उठाया जा गया - कि अनशन करना ब्लैकमेल करने के जैसा नहीं है? - प्रतिप्रश्न आता है - क्या प्रश्नकर्ता समेत समाज का हर सचेत व्यक्ति इसका उत्तर नहीं जानता? क्या वो नहीं जानता कि अनशन दबाव डालने का एक प्रभावी अस्त्र है जिसका इस्तेमाल महात्मा गांधी ने कई बार किया, कभी अंग्रेज़ों पर दबाव डालने के लिए, कभी अपनों पर? और क्या सचमुच इस प्रश्न का उत्तर नहीं समझा जा सकता कि आज कोई भी, कहीं भी, किसी भी मुद्दे को लेकर अनशन करने पर तुल जाए तो उसके पीछे भी लोग उसी तरह जा खड़े होंगे, जिस तरह अन्ना हज़ारे के साथ जा खड़े हुए?

अन्ना हज़ारे की असलियत, अरविन्द केजरीवाल-प्रशांत भूषण-किरण बेदी की मंशाओं, उनके आंदोलन के तरीक़े, उनकी भाषा, उनके तेवर, लोकपाल-जन लोकपाल के अंतरों को बिना बूझे नारे लगानेवाली भीड़, वंदे-मातरम, भारत माता की जय जैसे नारों, टीवी-मीडिया के आक्रामक प्रयोग-दुष्प्रयोग, लालू जी की लोकतांत्रिक परंपरा को बचाने की घनघोर चिंता - इन सबपर बहस करने से पहले ईमानदार प्रश्नों का सामना करना ज़रूरी है.
गहराई में उतरें, तो ऐसे अनेक ईमानदार प्रश्न आज खड़े दिखाई देंगे.

पता करना है तो पता ये करिए कि अन्ना हज़ारे के इस आंदोलन की परिणति चाहे जो भी हो, मगर ऐसा क्या हुआ कि भ्रष्टाचार का एक ऐसा प्रश्न, जो चहुँओर दृश्यमान होने के बावजूद दिखता नहीं था, अचानक सारे देश में चर्चा का केंद्र बन गया?

पता ये करिए कि एक ऐसा शब्द जो कि असहयोग आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन, छात्र आंदोलन जैसी टेक्स्टबुक की विषयवस्तु से अधिक कुछ नहीं था और बहुत हुआ तो जिसे राजनीति का औज़ार समझा जाता था, वो आज बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व के प्रकट कैसे हो गया और अपने होने का अहसास करा गया?

पता करना है तो बजाय विलाप करने के, कोसने के, जो प्रकट है उसपर संदेह करने के, ईमानदारी से इस प्रश्न की पड़ताल होनी चाहिए कि माओवादियों का विद्रोह, आत्महत्या करते किसानों की बेबसी, इंफा़ल में बरसों से अनशन कर रही बहादुर इरोम शर्मिला का सत्याग्रह, और ऐसे न जाने कितने विकट प्रश्न, क्यों नहीं सारे देश को झकझोर पा रहे है? अन्ना हज़ारे की ताल पर ताल मिलाते जनसमुदाय और मीडिया को दूसरे आंदोलन और विरोध क्यों नहीं लुभा पा रहे? और उसमें नुक़सान किनका हो रहा है?

एक सभ्यता के विकासमान पथ पर अग्रसर रहने के लिए प्रश्न बहुत आवश्यक हैं, मगर उन प्रश्नों में ईमानदारी का तत्व होना चाहिए. जिन प्रश्नों की बुनियाद से ईमानदारी का तत्व ओझल हो, उससे निर्मित होनेवाले उत्तर की इमारत ढुलमुल ही रहेगी.

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