आसार तो दोस्ती के ही हैं
पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर की भारत यात्रा को मीडिया ने तरह-तरह से, अपने हिसाब से कवर किया.
रिपोर्टें, विश्लेषण, क़यास जुदा-जुदा थे लेकिन एक बार पर सब एक स्वर थे और वह यह कि हिना ने ऐसा कुछ नहीं कहा जो भारतीय अधिकारियों को नागवार गुज़रा हो.
यानी वह दोस्ती का पैग़ाम ले कर आई थीं और उनकी मंशा भी यही थी.
भारत और पाकिस्तान के अधिकारियों के बीच लंबे समय से बातचीत का सिलसिला जारी है.
हर ऐसे मुद्दे पर चर्चा हो रही है जिसमें दोनों देशों की रुचि भी है और जिन्हें लेकर विवाद भी.
सामान्यतः ऐसी बातचीत में कोई न कोई टिप्पणी ऐसी हो जाती है जिससे एक पक्ष भड़क उठता है.
पाकिस्तान की नई विदेश मंत्री ने भी उन सब मुद्दों को छुआ लेकिन संवेदनशीलता के साथ.
उन्होंने बिना कहे ही एक संदेश दे दिया कि वह बात बिगाड़ने नहीं, सुलझाने के उद्देश्य से आई हैं.
हिना रब्बानी ने माना कि पाकिस्तान में लोगों की सोच बदली है और वहाँ की नई पीढ़ी भारत से दोस्ती की इच्छुक है.
पाकिस्तान की नई पीढ़ी अगर भारतीय फ़िल्मों की दीवानी है तो भारत के युवाओं को पाकिस्तानी लिबास अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं.
भारत-पाकिस्तान की जनता कब से संबंध सामान्य होने का इंतज़ार कर रही है.
लेकिन इस के लिए ज़रूरी है ज़बरदस्त राजनीतिक इच्छा शक्ति जिसका आभास हिना रब्बानी खर के बर्ताव में साफ़ नज़र आया.
बस इन कुछ अंतिम पंक्तियों के साथ मैं, सलमा ज़ैदी आप से विदा ले रही हूँ.
सत्रह साल के लंबे साथ के बाद अब बीबीसी के श्रोताओं और पाठकों से नाता टूट रहा है.
लेकिन जहाँ भी रहूँगी, जो भी करूँगी आपका स्नेह मेरे लिए यादगार रहेगा और एक संबंल बन कर मेरा साथ देगा.
अलविदा!




