इस विषय के अंतर्गत रखें जुलाई 2011

आसार तो दोस्ती के ही हैं

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|शुक्रवार, 29 जुलाई 2011, 12:47

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पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर की भारत यात्रा को मीडिया ने तरह-तरह से, अपने हिसाब से कवर किया.

रिपोर्टें, विश्लेषण, क़यास जुदा-जुदा थे लेकिन एक बार पर सब एक स्वर थे और वह यह कि हिना ने ऐसा कुछ नहीं कहा जो भारतीय अधिकारियों को नागवार गुज़रा हो.

यानी वह दोस्ती का पैग़ाम ले कर आई थीं और उनकी मंशा भी यही थी.

भारत और पाकिस्तान के अधिकारियों के बीच लंबे समय से बातचीत का सिलसिला जारी है.

हर ऐसे मुद्दे पर चर्चा हो रही है जिसमें दोनों देशों की रुचि भी है और जिन्हें लेकर विवाद भी.

सामान्यतः ऐसी बातचीत में कोई न कोई टिप्पणी ऐसी हो जाती है जिससे एक पक्ष भड़क उठता है.

पाकिस्तान की नई विदेश मंत्री ने भी उन सब मुद्दों को छुआ लेकिन संवेदनशीलता के साथ.

उन्होंने बिना कहे ही एक संदेश दे दिया कि वह बात बिगाड़ने नहीं, सुलझाने के उद्देश्य से आई हैं.

हिना रब्बानी ने माना कि पाकिस्तान में लोगों की सोच बदली है और वहाँ की नई पीढ़ी भारत से दोस्ती की इच्छुक है.

पाकिस्तान की नई पीढ़ी अगर भारतीय फ़िल्मों की दीवानी है तो भारत के युवाओं को पाकिस्तानी लिबास अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं.

भारत-पाकिस्तान की जनता कब से संबंध सामान्य होने का इंतज़ार कर रही है.

लेकिन इस के लिए ज़रूरी है ज़बरदस्त राजनीतिक इच्छा शक्ति जिसका आभास हिना रब्बानी खर के बर्ताव में साफ़ नज़र आया.

बस इन कुछ अंतिम पंक्तियों के साथ मैं, सलमा ज़ैदी आप से विदा ले रही हूँ.

सत्रह साल के लंबे साथ के बाद अब बीबीसी के श्रोताओं और पाठकों से नाता टूट रहा है.

लेकिन जहाँ भी रहूँगी, जो भी करूँगी आपका स्नेह मेरे लिए यादगार रहेगा और एक संबंल बन कर मेरा साथ देगा.

अलविदा!

नंगों के लिए नियम

'हम्माम में सब नंगे हैं', इस मुहावरे के साथ ही अक्सर बहस ख़त्म हो जाती है, कोई दूध का धुला नहीं है इसलिए बहस बंद करके दोबारा हम्माम में डुबकी लगाने को बेहतर समझा जाता है.

ब्रिटेन में'ट्रिपल पी' यानी प्रेस, पुलिस और पॉलिटिक्स के रिश्तों को लेकर छिड़ी बहस भी इस निष्कर्ष तक पहुँची कि हम्माम में सब नंगे हैं.

कंज़रवेटिव प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने फ़ोन हैकिंग के एक अभियुक्त को अपना मीडिया सलाहकार बनाया, इससे पहले वाले लेबर प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन उसी अभियुक्त के मालिक को पिछले दरवाज़े से अपने घर बुलाते थे, उनसे पहले वाले लेबर प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर आधी दुनिया पार करके रुपर्ट मर्डोक से मिलने ऑस्ट्रेलिया गए थे.

भारत से अलग बात ये है कि ब्रिटेन की संसद में, प्रेस में और लोगों के बीच बहस अब भी जारी है, बंद नहीं हुई है.

ब्रिटेन में कई लोग तो अब इस बहस से ऊब रहे हैं, ख़ास तौर पर ऐसे लोग जिन्हें लगता है कि वे हम्माम में नहीं हैं, यह सिर्फ़ कुछ नंगों का मसला है.

बहरहाल, ब्रिटेन में अभी कोशिश ये हो रही है कि हम्माम के नियम दुरुस्त कर लिए जाएँ. जो सुझाव आ रहे हैं वे कुछ इस तरह के हैं-

पुलिस, प्रेस और नेता के हम्माम अलग-अलग होने चाहिए.

हम्माम में पूरी पारदर्शिता होनी चाहिए यानी वहाँ आने-जाने वाले नंगों के नाम रजिस्टर में दर्ज होने चाहिए.

हम्माम का इस्तेमाल सिर्फ़ नहाने के लिए होना चाहिए, नौकरी दिलाने, सौदे पटाने या छिपकर दुसरों की बातें सुनने के लिए नहीं.

हम्माम में कौन किसकी पीठ रगड़ सकता है और किसकी नहीं, इसके नियम तय होने चाहिए.

एक जज साहब को हम्माम की सफ़ाई, साबुन, तौलिए, तेल-पानी की समीक्षा का काम सौंपा गया है, हम्माम को नंगों के भरोसे नहीं छोड़ा जा रहा जैसा कई देशों में होता है.

एक ज़रूरी सुझाव ये भी आ रहा है कि सिर्फ़ हम्माम को ही हम्माम की तरह इस्तेमाल करना चाहिए, पूरे देश को हम्माम नहीं बनाना चाहिए.

ये चेतावनी भी दी जा रही है कि किसी भी संस्था-व्यवस्था-सरकार के हम्माम बनने में देर नहीं लगती अगर वहाँ पिछले दरवाज़े से नंगों की आवाजाही शुरू हो जाए.

पाकिस्तान, अमरीका और नई सोच

हफ़ीज़ चाचड़हफ़ीज़ चाचड़|सोमवार, 18 जुलाई 2011, 21:11

टिप्पणियाँ (19)

विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता तहमीना जंजुआ का कहना है कि पाकिस्तान की जनता और उसके प्रतिष्ठानों को चरमपंथी गुट अल क़ायदा से ख़तरा है और सेना ने देश को सुरक्षा का आश्वासन दिया है.

उनके इस बयान के बाद सेना, पुलिस और अर्थसैनिक बल सतर्क हो गए हैं लेकिन मूल रुप से इसका अर्थ यह है कि पाकिस्तान आगे भी सिक्योरिटी स्टेट बना रहेगा.

आसान शब्दों में इस अर्थ यह है कि अधिक पैसा सुरक्षा पर ख़र्च होगा. यह बयान आईएसआई के प्रमुख लेफ्टीनेंट अहमद शुजा पाशा के अमरीका से लौट आने के तुरंत बाद दिया गया है.

जिस दिन वो लौटे थे तो विदेशी मामलों की राज्यमंत्री हिन रब्बानी खर ने संसद की स्थायी समिति को बताया था कि अमरीका और पाकिस्तान के संबंध सामान्य हो रहे हैं.

दरअसल अमरीका ने 80 करोड़ डॉलर की सैनिक सहायता रोक ली थी और स्पष्ट रुप से उसी की गुहार लगाने गए शुजा पाशा अमरीका गए थे. क्यों न जाएं, 80 करोड़ डॉलर बहुत बड़ी राशि है भाई.

सैनिक साहयता देने के लिए अमरीका का कोई बयान तो सामने नहीं आया लेकिन दोनों देशों ने ये ज़रुर कहा है कि ख़ुफ़िया अधिकारियों की मुलाकातें सकारात्मक रही हैं.
पैसा तो अमरीका ज़रुर देगा क्योंकि उसके इस क्षेत्र में हित हैं और उसकी सेना पड़ोसी देश अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद है.

पाकिस्तान के पास भी अमरीका से संबंध बेहतर करने और पैसा लेने के सिवा कोई विकल्प भी तो नहीं है.

पाकिस्तान की विडंबना यह है कि वह पिछले छह दशकों से सिक्योरिटी स्टेट बना हुआ है. मेरी पीढ़ी जिसकी आयु 40 वर्षों से कम है उसने अपने देश को हमेशा युद्ध जैसी स्थिति में देखा है.

पिछले छह दशकों से जितना पैसा देश की रक्षा पर ख़र्च हुआ है उसके आधा भी यदि आर्थिक विकास पर ख़र्च होता तो आज पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के सामने हाथ न फ़ैलाने पड़ते.

दुनिया के दो ऐसे देश हैं जिनमें बहुत सी समानताएं हैं, दोनों धर्म के नाम पर बने, दोनों को अमरीका बहुत ज़्यादा पैसे देता है और दोनों के अपने पड़ोसी देशों से संबंध बहुत अच्छे नहीं हैं. एक इस्राईल और दूसरा पाकिस्तान.

यहाँ एक ऐसी विचारधारा है जो सत्ता प्रतिष्ठान पर हावी है, जो पाकिस्तान के परमाणु बम को इस्लामी बम समझने लगी है और अपने पड़ोसी देशों के सामने अपनी ताक़त का प्रदर्शन करती रहती है.
इसी विचारधारा ने पाकिस्तान को सिक्योरिटी स्टेट बना दिया है.

देश की नई पीढ़ी में अब यह सोच आ रही है कि एक तो परमाणु बम फटने से जिनता नुक़सान दूसरों को होगा उतना ही मुसलमानों को भी होगा. इतना ही नहीं युवा लोगों को यह भी समझ में आ चुका है कि कि ईरान और अफ़ग़ानिस्तान को अपने प्रांत बनाना और लाल क़िले पर पाकिस्तान का झंडा फहराना कोई आसान काम नहीं है जैसा कि सेना के लोग दावा करते रहते हैं.

एक अख़बार का अंत

टेलीफ़ोन के आविष्कार से 33 साल पहले 1843 में शुरू हुआ अख़बार 'न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड' टेलीफ़ोन हैकिंग कांड की वजह से बंद हो गया. लोगों के मोबाइल मैसेज ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से सुनने का मामला इतना बढ़ा कि रविवारीय अख़बार के मालिक रुपर्ट मर्डोक ने इसे बंद करने की घोषणा कर दी.

जिस अख़बार की 25 लाख प्रतियाँ बिकती हों उसके रुतबे का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है, 1930 के दशक में जब ये अख़बार अपनी लोकप्रियता के शिखर पर था तब इसकी 30 लाख प्रतियाँ बिकती थीं. इस रविवार को अख़बार की 45 लाख प्रतियाँ छापी गई हैं ताकि लोग देश की संस्कृति का हिस्सा बन चुके समाचारपत्र की अंतिम प्रति सहेज सकें.

'न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड' के शुरुआती अंकों में ही वेश्यालयों पर पड़ने वाले छापों के विस्तृत वर्णन होते थे, बाद के वर्षों में फुटबॉल खिलाड़ियों, फ़िल्मी सितारों और अमीरों की रंगरलियों के क़िस्से छपने लगे. गंभीर पत्रकारिता वाले उसे 'गटर न्यूज़' और 'ट्रैश' ही मानते रहे लेकिन ब्रिटेन के लाखों कामगारों ने 'न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड' का साथ पीढ़ी-दर-पीढ़ी दिया.

अधनंगी तस्वीरें, लोगों के प्रेमपत्र और रईसों के रेस्तराँ का बिल जैसी चीज़ें छापने वाले इस अख़बार ने कई बड़े घोटालों का पर्दाफ़ाश भी किया जिनमें पिछले साल पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ियों की स्पॉट फ़िक्सिंग का भंडाफोड़ शामिल है.

2007 में प्रिंस विलियम का एक मोबाइल संदेश सुनकर अख़बार ने ख़बर छापी कि उनके घुटने में तकलीफ़ है जबकि यह बात सिर्फ़ दो-चार लोगों की जानकारी में थी, मामले की जाँच के बाद अख़बार के पत्रकार को मोबाइल हैकिंग का दोषी पाया गया.

वहाँ से शुरू हुआ विवाद अख़बार के 'दी एंड' तक जा पहुँचा, अख़बार चाहे जैसा भी हो, दी एंड सिनेमा के स्क्रीन पर ठीक लगता है, अख़बार के मामले में नहीं, ख़ास तौर पर जब अख़बार 168 साल पुराना हो.

धर्म और आतंकवाद

ज़ुबैर अहमदज़ुबैर अहमद|शुक्रवार, 08 जुलाई 2011, 20:01

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पिछले हफ्ते मेरे ब्लॉग पर कई लोगों ने अपनी राय भेजी जिसके लिए मैं सब को धन्यवाद देता हूँ. आप में से कई लोगों ने लिखा कि मुझे घर न मिलने को मज़हब से नहीं जोड़ना चाहिए था.

मैं खुद ऐसा नहीं करना चाहता हूँ लेकिन अगर मकान मालिक आपका नाम सुन कर ब्रोकर से कहे मैं मुसलमान को किराए पर घर नहीं दूंगा तो आप किया सोचेंगे?

समस्या ये है की मैं अकेला नहीं हूँ. कई ऐसे लोग हैं जिन्हें इस तरह की दिक्क़तों का सामना करना पड़ रहा है.

ये भी सच है की सब मकान मालिक ऐसे नहीं हैं और ये भी सच है की भेदभाव क्षेत्रीय आधार पर भी है.
और सच ये भी है कि मुसलमान भी हिंदुओ के साथ भेदभाव करते हैं.


लेकिन समाज में भेदभाव है तो इसका खंडन करना ज़रूरी है.

दुख हुआ एक साहब की टिप्पणी से जिन्होंने केवल 'टेस्ट'के नाम से अपनी राय प्रकट की थी.

उनका कहना था,"अगर वहां (मुंबई) आके बम विस्फोट करेंगे तो यही हाल होगा."

एक दुसरे व्यक्ति ने अपना नाम नहीं लिखा लेकिन कुछ इस तरह से टिप्पणी की, " सभी मुस्लिमों को अब आतंकवाद रोकने के लिए कुछ ना कुछ करना होगा और समाज को विश्वास दिलाना होगा कि आप उनके साथ नहीं हैं."

यह मानसिकता ग़लत है और मेरा ब्लॉग इसी मानसिकता के विरोध में था.

क्या आतंकवाद को रोकने की ज़िम्मेदारी सिर्फ मुसलामानों पर है या फिर सभी भारतीय नागरिकों पर? और क्या मुसलामानों को समाज को सही मानों में विश्वास दिलाना होगा की वो आतंकवादियों के साथ नहीं हैं? क्या समाज को शक है की मुसलमान आतंकवादियों के हमदर्द हैं?

ये पढ़ कर मुझे अयोध्या में एक साहब की बात याद आ गई. उन्होंने मुझ से कहा, "ज़ुबैर जी मुसलमान देशद्रोही होते हैं."

मैंने कहा ये आपकी राय है लेकिन अगर आप गृह मंत्रालय से उन नामों की लिस्ट मंगाएं जिन्होंने 1947 से अब तक पैसे लेकर पाकिस्तान को सरकारी फाइलें बेचीं हैं तो आप अपना बयान वापस ले लेंगे, क्योंकि उनमें 95 प्रतिशत लोग मुसलमान नहीं हैं"

वो ख़ामोश हो गए. मैंने कहा कि हम उस लिस्ट को देख कर ये नहीं सोचेंगे की इसमें कौन हिन्दू है और कौन मुसलमान. बल्कि हम सभी को देशद्रोही मानेगे.

आतंकवादी तो अकसर बाहर से आते हैं. लेकिन उन देशद्रोहियों का कोई खंडन क्यों नहीं करता जो रोज़ रिश्वत लेकर आपका काम करते हैं और देश को नीलाम करते हैं.

अभी पिछले दिनों एक विदेशी एफ़आरआरओ के दफ्तर गया, उसके कागज़ात अधूरे थे लेकिन रिश्वत देकर उसने अपना काम करवा लिया.

पासपोर्ट बनवाने जाएं तो बिना घूस के आपका काम नहीं होगा.

जबसे हेडली का मामला सामने आया है क़ानून सख्त हो गए हैं लेकिन इसके कारण रिश्वतखोरी भी अधिक बढ़ गई है.

अगर कोई पड़ोस का विदेशी आतंकवादी आए तो वो आराम से पुलिस और पासपोर्ट दफ़्तर को घूस दे कर एक भारतीय नागरिक बन सकता है.

देश को ऐसे ही लोग ख़तरे में डाल रहे हैं और सही मानो में ऐसे ही लोग देशद्रोही हैं.पर वो तो देशभक्तों में शामिल होते हैं क्योंकि वो सरकारी दफ़्तरों में मुलाजिम हैं.


भारतीय क्रिकेट की दबंगई

कई बार दिमाग़ में ये बात आती है कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारतीय टीम और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के दंभ पर गर्व किया जाए या फिर शर्म. अपनी मनमर्ज़ी चलाने और अपनी नाक के लिए क्रिकेट की दुनिया को झुकाने के पीछे भारतीय क्रिकेट बोर्ड का मक़सद क्या है, समझ में नहीं आता.

समझ में आती है तो एक बात और वो ये है कि इसके क्रिकेट का नुक़सान हो रहा है और भारत की छवि ख़राब रहा. पिछले दिनों दो ऐसी घटनाएँ हुईं, जिसने भारतीय बोर्ड के दंभ और भारतीय क्रिकेटरों के बड़बोलेपन का उदाहरण पेश किया है. इसके चक्कर में तकनीक की भद्द पिटी और एक आहत अंपायर ने समय से पहले टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया.

अंपायरों के फ़ैसले की समीक्षा यानी डीआरएस ने विश्व कप के दौरान ख़ूब चर्चा बटोरी. हालाँकि पहले से इसका इस्तेमाल हो रहा था, लेकिन विश्व कप के दौरान इसे ख़ूब सुर्ख़ियाँ मिली और भारत समेत कई देशों को इसका फ़ायदा भी मिला. जब दुनियाभर के क्रिकेट बोर्डों को इस पर आपत्ति नहीं, तो बीसीसीआई इसे अपनी नाक का सवाल क्यों बना रहा है. इसी हॉक आई या बॉल ट्रैकिंग सिस्टम के आधार पर सचिन तेंदुलकर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ विश्व कप के सेमी फ़ाइनल मैच में नॉट आउट करार दिए गए. इसी हॉक आई के आधार पर कई देश मैच खेल रहे हैं.

लेकिन चूँकि बीसीसीआई ने इसके ख़िलाफ़ पहले ही मोर्चा खोल रखा था, तो वो अपनी बात से कैसे पीछे हट सकते थे. आज के ज़माने में तकनीक को ठेंगा दिखाकर अपनी बात मनवाना कहाँ की समझदारी है. लेकिन बीसीसीआई को समझदारी से क्या मतलब. एक समय ऐसा भी था कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड ट्वेन्टी-20 मैच के भी ख़िलाफ़ था, लेकिन भारत के ट्वेन्टी-20 विश्व कप जीतने के बाद बीसीसीआई की नींद टूटी.

उसकी नींद विज्ञापन से भारी-भरकम कमाई के कारण भी टूटी और ऐसी टूटी की इंडियन प्रीमियर लीग शुरू हो गया और फिर तमाशा क्रिकेट उन्हें ख़ूब भाने लगा. अगर डीआरएस में बॉल ट्रैकिंग सिस्टम ही नहीं होगा, तो डीआरएस का कोई मतलब नहीं है.

अब आइए भारतीय क्रिकेट बोर्ड के बाद भारतीय क्रिकेट टीम की दबंगई की चर्चा करें. कुछ वर्ष पहले भज्जी और साइमंड्स को लेकर जिस तरह भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने अपना दम दिखाया और ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट बोर्ड को झुकने पर मजबूर किया, उससे ऐसा लगता है कि भारतीय खिलाड़ियों के भी पौ-बारह हो गए हैं.

अंपायर डेरेल हार्पर को लेकर भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का सार्वजनिक बयान निराशा पैदा करता है. ख़राब फ़ैसले आपको नाराज़ करते हैं, निराश करते हैं, लेकिन यही तो खेल भावना होती है कि आप अपनी भावनाओं पर काबू रखें. धोनी का सार्वजनिक बोलना और फिर बीसीसीआई का उस पर चुप्पी साध लेना हार्पर को आहत करने के लिए काफ़ी था.

भारत-वेस्टइंडीज़ के बीच आख़िरी टेस्ट हार्पर का आख़िरी टेस्ट होना था. लेकिन हार्पर ने पहले ही टेस्ट क्रिकेट छोड़ने की घोषणा कर दी. स्टीव बकनर के बाद एक और अंपायर भारतीय टीम की नाराज़गी की भेंट चढ़ गया. सवाल ये नहीं है कि अंपायर ग़लत थे या सही- सवाल ये है कि क्या किसी भी अंपायर की इस तरह की विदाई जायज़ है. आईसीसी का एक तबका भी इस बात से चिढ़ा है कि हार्पर को ऐसे जाना पड़ा.

अगर दबंग बीसीसीआई और भारतीय क्रिकेट सूरमाओं की यही हालत रही, तो फिर कदम दर कदम उनका समर्थन कम ही होगा और नाक की लड़ाई में क्रिकेट का कबाड़ा ही होगा.

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