इस विषय के अंतर्गत रखें जनवरी 2011

एक पाती बापू के नाम

विनोद वर्माविनोद वर्मा|शुक्रवार, 21 जनवरी 2011, 15:32

टिप्पणियाँ (80)

बापू तुमको नागार्जुन याद है? अरे वही यायावर, पागल क़िस्म का कवि जो तुम्हारे जाने के बाद जनकवि कहलाया? वही जिसे लोग बाबा-बाबा कहा करते थे.

उसने तुम्हारे तीनों बंदरों को प्रतीक बनाकर एक कविता लिखी थी. लंबी कविता की चार पंक्तियाँ सुनो,

बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर बापू के
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बंदर बापू के
सचमुच जीवन दानी निकले तीनों बंदर बापू के
ज्ञानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बंदर बापू के

तुमको बुरा लग रहा होगा कि तुम्हारे बंदरों के बारे में ये क्या-क्या लिख दिया. लेकिन तुम्हारे बंदर सचमुच ऐसे ही हो गए हैं. तुम्हारे जीते-जी तो वे तुम्हारी बात माने आँख, कान और मुंह पर हाथ रखे बैठे रहे. लेकिन उसके बाद उन्होंने वही करना शुरु कर दिया जिसके लिए तुमने मना किया था.

देखो ना जिस बंदर से तुमने कहा था कि बुरा मत देखो वह इन दिनों क्या-क्या देख रहा है. उसने देखा कि खेल का आयोजन करने वाले सैकड़ों करोड़ रुपयों का खेल कर गए और देश की रक्षा करने वाले आदर्श घोटाला कर गए.

तुम दलितों के उत्थान की बात करते रह गए लेकिन तुम्हारा बंदर देख रहा है कि एक दलित का इतना उत्थान हो गया कि उस पर एक लाख 76 हज़ार करोड़ रुपए के घोटालों का आरोप लगने लगा.

उसने एक दिन देख लिया कि तुम्हारी कांग्रेस की नेत्री तुम्हारी विशालकाय तस्वीर के सामने एक किताब का लोकार्पण कर रही हैं जिसमें कहा गया है कि वह भी तुम्हारी तरह महान त्याग करने वाली हैं.

वह देख रहा है कि एक दलित लड़की से बलात्कार हो रहा है और जिस पर बलात्कार का आरोप है वह नाम से तो पुरुषोत्तम है यानी पुरुषों में उत्तम लेकिन बयान दे रहा है कि वह नपुंसक है.

और जिस बंदर को तुम कह गए थे कि बुरा मत सुनना वह जहाँ-तहाँ जाकर तरह-तरह की बातें सुन रहा है.

वह सुन रहा है कि देश का प्रधानमंत्री कह रहा है कि महंगाई इसलिए बढ़ रही है क्योंकि आम लोगों के पास बहुत पैसा आ गया है.

संघ याद है ना तुम्हें? वही गोडसे वाला संघ. तुम्हारा बंदर सुन रहा है कि संघ के नेता अब जगह-जगह विस्फोट आदि भी करने लगे हैं जिससे कि मुसलमानों को सबक सिखाया जा सके.

उसने सुना है कि जनसेवक अब बिस्तर पर नहीं सोते बल्कि नोटों पर सोते हैं. वही तुम्हारी तस्वीरों वाले नोटों के बिस्तर पर. दो जनसेवकों ने शादी की और उनके पास 360 करोड़ रुपयों की संपत्ति निकली है.

और वो बंदर जिसे तुमने कहा था कि बुरा मत कहना वह तो और शातिर हो गया है. वह कहता तो कुछ नहीं लेकिन वह लोगों से न जाने कैसी कैसी बातें कहलवा रहा है.

अभी उसने सुप्रीम कोर्ट के जज से कहलवा दिया कि विदेशों में रखा काला धन देश की संपत्ति की चोरी है. कैसी बुरी बात है ना बापू, लोग इतनी मेहनत कर-करके बैंकों में पैसा जमा करें और जज उसे चोरी कह दे?

एक दिन वह नीरा राडिया नाम की एक भली महिला के कान में पता नहीं क्या कह आया कि उसने फ़ोन पर न जाने कितने लोगों से वो बातें कह दीं जो उसे नहीं कहनी चाहिए थीं.

अपनी दिल्ली में एक अच्छे वकील हैं शांति भूषण. न्याय के मंत्री भी रहे हैं. तुम्हारे बंदर ने उनसे कहलवा दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के कितने ही जज भ्रष्ट हैं.

जज को बुरा कहना कितनी बुरी बात है. लेकिन तुम्हारा बंदर माने तब ना. उसने एक और जज से कहलवा दिया कि तुम्हारे नेहरु के इलाहाबाद का हाईकोर्ट सड़ गया है.

लेकिन ऐसी बुरी बातों का बुरा मानना ही नहीं चाहिए. अब दामाद आदि घोटाला कर दें तो इसका बुरा मानकर किसी पूर्व मुख्य न्यायाधीश को किसी पद से इस्तीफ़ा तो नहीं दे देना चाहिए ना?

ऐसा नहीं है कि बापू कि सब कुछ बुरा ही बुरा है. एक अच्छी बात यह है कि तुम्हारे तीनों बंदरों की आत्मा अब भी अच्छी है और अब वह लोकतंत्र के चौथे खंभे में समा गई है.

इसलिए मीडिया या प्रेस नाम का यह स्तंभ अब न बुरा देखता है, न सुनता है और न कहता है. वह सिर्फ़ अच्छी-अच्छी बातें कहता-लिखता है वह भी पैसे लेकर.

तुम नागार्जुन की बंदर वाली कविता पूरी पढ़ लो तो यह भी पढ़ोगे,
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के

बात तो बुरी है बापू लेकिन चिंता मत करो, 30 जनवरी आने वाली है. तुम्हारी पुण्यतिथि. और पूरा देश बारी-बारी से राजघाट जाकर माफ़ी मांग लेगा. तुम भी देखना, टीवी पर लाइव आएगा.

एक सवाल प्रधानमंत्री से

रेणु अगालरेणु अगाल|शुक्रवार, 14 जनवरी 2011, 17:51

टिप्पणियाँ (111)

प्रधानमंत्री जी, आप कहते हैं कि लोग ज़्यादा और बेहतर खाने लगे हैं इसलिए खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ गई है और इसलिए उनकी क़ीमतें बढ़ रही हैं.

आपका कहना है कि यह सरकार की सामाजिक न्याय दिलवाने की पहल का ही नतीजा है क्योंकि देश में बहुत से लोगों को इसका फ़ायदा हुआ है, उनकी आमदानी बढ़ी और वे अच्छा खा-पी सकते हैं.

पर आख़िर कौन हैं ये लोग प्रधानमंत्री जी? और वो कौन सी योजना है जो उन्हें बेहतर जीवन दे रही है?

आपकी सरकार ने एक योजना शुरु की है जिसका नाम महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी क़ानून (मनरेगा) है.

इस योजना के अंतर्गत गांवों में रह रहे हर परिवार के व्यक्ति को कम से कम 100 दिन का रोज़गार साल में मिलता है. अब आपने महंगाई के मद्देनज़र मेहनताना भी 100 रुपये प्रतिदिन से बढ़ाकर 120 रुपए के आसपास कर दिया है. इस तरह से देखें तो साल में हर ग्रामीण परिवार को 12 हज़ार रुपये तो मिलेंगे ही.

12 हज़ार रुपए, वाह! गांववालों की तो चांदी हो गई... लेकिन ज़रा रुकिए..12 हज़ार रुपये मतलब 32 रुपये रोज़. मान लिया जाए कि यह मनरेगा में काम करने वाले के परिवार की कुल आमदनी है.

अब आज की महंगाई देखिए. दाल, चावल से लेकर दूध, अंडे और माँस-मछली तक सभी के दाम कहाँ पहुँच गए हैं? आपकी सरकार के आंकड़े कह रहे हैं कि खाद्य पदार्थों की महंगाई की दर 18 प्रतिशत तक बढ़ गई है.

क्या आपने कभी सोचा है कि इस महंगाई में 32 रुपए रोज़ कमाने वाले परिवार की थाली में क्या परोसा जाता होगा?

आपके घोषित उत्तराधिकारी राहुल गांधी तो कभी-कभी दलितों के घर पर जाते रहे हैं कभी उनसे पूछिएगा कि उनकी थाली कैसे भरती है और क्या दिन में दोनों वक़्त ठीक से भरती है?

आंध्र प्रदेश से लेकर मध्यप्रदेश तक आज भी किसानों की आत्महत्या की ख़बरें आ रही हैं. जब आपकी सरकार समृद्धि फैला रही है तो ये नासमझ क्यों आत्महत्या कर रहे हैं मनमोहन जी?

कौन है वह जिसे आपकी सरकार आम आदमी कहती है?

चलिए उनकी बात करें जो आपके मनरेगा के भरोसे नहीं हैं. जो रिक्शा चलाता है, ऑटो चलाता है, ड्राइवरी करता है, दुकान में काम करता है या घरेलू काम करता है. वो बहुत कमाता है तो पाँच-सात हज़ार रुपया महीना कमाता है. चार लोगों का आदर्श परिवार भी हो तो घर का किराया देने के बाद उसके पास खाद्य सामग्री ख़रीदने के लिए कितना पैसा बचता होगा मनमोहन जी? और फिर उसे बच्चों की पढ़ाई के लिए, कपड़ों के लिए और गाहे-बगाहे होने वाली बीमारी के लिए भी तो पैसा चाहिए?

चलिए अपने राजप्रासाद से निकलिए किसी दिन चलते हैं आपके आम आदमी से मिलने.

और मनमोहन जी जब आप ऐसे बयान दें तो अपनी पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी कुछ जानकारी दे दिया करें.

देखिए ना, अभी दो दिन पहले एक राष्ट्रीय कहे जाने वाले अख़बार में अपने नाम से लेख लिखा है और कहा है कि देश की 40 प्रतिशत आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे है, 9.3 करोड़ लोग झुग्गी झोपड़ी में रहते हैं, 12.8 करोड़ को साफ़ पानी नहीं मिलता, 70 लाख बच्चे शिक्षा से कोसों दूर हैं.

ये तो आपके आम आदमी से भी गए गुज़रे लोग दिखते हैं.

तो फिर प्रधानमंत्री जी कौन हैं वो लोग जो बेहतर खा रहे हैं और महंगाई बढ़ा रहे हैं?

अनमोल हैं दादा

पिछले दिनों आईपीएल की मंडी सजी. नीलामी लाइव. बिकने वाले तैयार. ख़रीदने वाले लैपटॉप, नोटबुक के साथ जमे हुए थे. कुछ चेहरे नए थे. कुछ पुराने थे, लेकिन जेब से बीमार लग रहे थे.

लेकिन ख़रीदारी ख़ूब हुई. दूर बैठे किंग ख़ान ने कहा- बड़ा मज़ा आया देखकर. लेकिन हथौड़े की चोट पर बिकते खिलाड़ियों के बीच दादा का खरीदार कोई नहीं था.

पूरा यक़ीन है कि 'गांगुली अनसोल्ड' का हथौड़ा बड़ी संख्या में लोगों के दिल पर हथौड़ा चला गया होगा. मीडिया में ख़ूब चर्चा है दादा नहीं बिके. क्यों नहीं बिके, इस पर भी विचार मंथन चल रहा है.

शाहरुख़ की नई पेशकश पर चर्चा है. कोलकाता में जलते पुतले भी सुर्ख़ियाँ हैं. लेकिन बिना लाग-लपेट के मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ और वो ये कि ये मेरा भी दर्द है.

जनता की कमज़ोर यादाश्त की दुहाई देकर सब कुछ जायज़ ठहराना एक कला है. एक बार फिर इसी कला का हवाला देकर गांगुली जैसे खिलाड़ी के क़द को छोटा किया जा रहा है.

चलिए मैं थोड़ी पुरानी बात याद दिलाने की छूट ले ही लेता हूँ. भारतीय क्रिकेट को गांगुली का क्या योगदान है, ये शायद फटाफट क्रिकेट की रेलमपेल और रोज़ बनते नए रिकॉर्ड्स की कहानी में भुलाया जा रहा है.

याद कीजिए जॉन राइट के कोच और गांगुली के कप्तान रहते भारतीय क्रिकेट का सुनहरा दौर.

भारतीय क्रिकेट टीम का 2003 के विश्व कप के फ़ाइनल तक पहुँचना. कई यादगार जीतें. युवराज, भज्जी जैसे कई युवा खिलाड़ियों का क्रिकेट परिदृश्य पर आना.

गांगुली की कप्तानी के प्रभाव में न जाने कितनी विदेशी टीमें अपना बेअसर हो गईं और आज भारतीय टीम का जो क़द है, उसमें गांगुली की लोकप्रिय 'दादागिरी' अब भी झलकती है.

लेकिन बदलते समय के साथ बाज़ार और राजनीति की चपेट में कोलकाता का प्रिंस ऐसे फँसा कि जाल से निकल नहीं पाया.

मुझे याद है वर्ष 2007 के विश्व कप के दौरान चैपल की छत्रछाया में फलती-फूलती टीम के बीच गांगुली कैसे अकेले पड़ गए थे. दबाव में चैपल ने उन्हें टीम में तो रख लिया था. लेकिन उनकी क़द्र चली गई थी.

कभी हर तरह की गुगली को सीमा रेखा के पार पहुँचाने का दम रखने वाले दादा, कभी डालमिया गुट का हिस्सा होने तो कभी डालमिया विरोधी गुट के क़रीब होने, तो कभी चैपल का चापलूसी न कर पाने के कारण हाशिए पर आते गए.

और आज हालत ये है कि 'भारतीय' प्रीमियर लीग में इस प्रीमियर खिलाड़ी का कोई ख़रीदार नहीं.

आईपीएल बाज़ार है और क्रिकेट का ये बाज़ार कुछ ज़्यादा ही निर्मम हो गया है. इस बाज़ार में अब विजय मालया, शिल्पा शेट्टी, प्रीति ज़िंटा और नीता अंबानी क्रिकेट की दुकान चला रहे हैं.

पता है कि सारा खेल पैसे का है और शायद गांगुली इसमें फ़िट नहीं बैठते.

लेकिन हमारी तो बस इतनी ही गुज़ारिश थी कि भारतीय क्रिकेट के इस रतन के साथ कम से कम अच्छा बर्ताव तो हो.

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से भी उनकी विदाई दिल तोड़ने वाली थी....और अब आईपीएल में भी यही व्यवहार.

शाहरुख़ ख़ान मेल-मिलाप की कोशिश में हैं....लेकिन क्यों. क्या उन्हें कोलकाता में नाराज़ लोगों का सामना करने से डर लग रहा है या वे वाक़ई गांगुली को उनका हक़ देना चाहते हैं. अगर गांगुली के बिना उनकी टीम अधूरी है, तो फिर उन्हें छोड़ा ही क्यों.

अब तो गांगुली को मैदान पर देखना ही दुर्लभ हो जाएगा. लेकिन क्रिकेट की नई परिभाषा गढ़ने वालों इसकी फ़िक्र कहाँ.

सलमान तासीर का क़त्लः कौन ज़िम्मेदार?

मोहम्मद हनीफ़मोहम्मद हनीफ़|बुधवार, 05 जनवरी 2011, 14:02

टिप्पणियाँ (52)

सलमान तासीर की हत्या को दुखदायक घटना क़रार देने वाले टीवी ऐंकर और विश्लेषक झूठ बोलते हैं.

उन में से कई दबे दबे शब्दों में खुल यह कह चुके हैं और कई यह लिख चुके हैं कि सलमान तासीर ईश-निंदा पर बयान दे कर ऐसी सीमा पार कर चुके हैं जिस के दूसरी तरफ़ मौत है.

वह मौत क़ादरी के हाथ से आ सकती है, मुहल्ले के किसी मौलवी के हाथों हो सकती है, एक भीड़ के हाथों हो सकती है, किसी जज के क़लम से लिखी जा सकती है.

यह मौत गर्वनर का सुरक्षा कवच तोड़ कर उन तक पहुँच सकती है और जैसा कि पहले हो सकता जेल की किसी कोठरी में भी आ सकती है.

यह सीमा किसी मुस्लिम विद्वान के फ़तवे से नहीं बनी थी न यह जनरल ज़ियाउलहक़ ने बनाई थी न ही सारा दोष धार्मिक गुटों का है.

यह ईमानी रेखा हम सब के दिलों के अंदर खिंची हुई है.

हमें आख़िर अपने देश में दो प्रतिशत से भी कम ग़ैर-मुसलमानों से इतना ख़ौफ़ क्यों आता है?

आख़िर हमें उस महरबान नबी(मोहम्मद) की इज़्ज़त के नाम पर गले काटने का इतना शौक़ क्यों है जिन ख़ुद एक हत्या को समूचे मावनता की हत्या क़रार दिया था.

आख़िर हम रोज़ा रखने से ले कर सूर्यग्रहण के कारण जानने के लिए मुफ़्ती मुनीबुर्रहमान के पास क्यों भागे भागे जाते हैं?

आख़िर हमें किस ने आश्वासन दिया है कि राष्ट्र की बेटी डॉक्टर आफिया को बचाने के लिए राष्ट्र की बेटी आसिया का सर तन से जुदा करना ज़रुरी है?

उस इस्लामाबाद शहर में जहाँ सलमान तासीर की हत्या हुई केवल दो सप्ताह पहले नामूसे रिसालत कॉंफ्रंस में कौन कौन शामिल था. क्या उस में वह लोग शामिल नहीं थे जिन के पार्टी घोषणापत्र में हर शिया, अहमदी, हिंदू, यहूदी की हत्या करने के संकेत नहीं दिए गए.

क्या ऐसे लोग हमारे समाज में, मीडिया में और सरकारी संस्थाओं में शामिल नहीं हैं? क्या ऐसे लोगों के साथ हम शादियों और मेंहदियों में खाना नहीं खाते?

सलमान तासीर ने जो सीमा पार की वह हम सब के अंदर मौजूद है. कभी कभी हम डरते हैं कि हम ने इस सीमा के दूसरी ओर तो क़दम नहीं रख दिया?

हमें अपना ईमान इतना कमज़ोर लगता है कि उस की सलामती के लिए किसी को बलि का बकरा बनाना ज़रूरी है.

और अगर हमारा दिल इतना कमज़ोर है कि हम ख़ुद छुरी नहीं चला सकते तो चलाने वाले की प्रशंसा तो कर सकते हैं.

वह जो अपने आप को लिबरल मुसलमान समझते हैं वह ज़्यादा से ज़्यादा अपनी नाक पकड़ कर मुँह दूसरी तरफ़ फेर लेते हैं.

क्या अल्लामा इक़बाल ने ग़ाज़ी इलमदीन शहीद के जनाज़े पर नहीं फ़रमाया था कि यह अनपढ़ हमसे बाज़ी ले गया?

नव दशक की शुभकामनाएँ!

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|शनिवार, 01 जनवरी 2011, 09:37

टिप्पणियाँ (20)

दूसरी सहस्राब्दी के दूसरे दशक की शुरुआत आप सबको मुबारक हो!

अब से दस वर्ष पूर्व हम सब एक इतिहास का हिस्सा बने. हमें वह श्रेय हासिल हुआ जो हमारे पूर्वजों और हमारी आने वाली कई नस्लों को नहीं मिलेगा. यानी एक सहस्राब्दी से निकल कर दूसरी सहस्राब्दी में प्रवेश.

आगे आने वाली पीढ़ियाँ शायद हमारा नाम न जान पाएँ लेकिन हम यदि वर्ष 2000 से पहले जन्मे हैं तो हमारा शुमार उन लोगों में ज़रूर है जो विलक्षण हैं, यानी इतिहास बदलता देख चुके हैं.

यह वरदान था. लेकिन इसके साथ आईं ज़िम्मेदारियाँ. हम कैसी दुनिया का निर्माण कर रहे हैं.

क्या हम अगली नस्ल को एक ऐसे विश्व की धरोहर दे कर जाएँगे जहाँ हिंसा न हो, जातीय और नस्ली भेदभाव न हों, बीमारियाँ न हों और न ही हो विद्वेष और बदले की भावना.

आप कहेंगे यह हमारा काम नहीं है और न ही हमारे बस में है.

मेरा कहना है यदि हममें से हर एक अपने आसपास का माहौल सुधार सके, अपने परिवार में यह बीज बो सके जो आगे चल कर एक फलदायक पेड़ का रूप ले ले तो यह काम कोई मुश्किल नहीं है.

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के माध्यम से मेरी आपसे अपील है कि आज एक संकल्प कीजिए.

दूसरी सहस्राब्दी का दूसरा दशक आप संवारेंगे. जहाँ तक हो सकेगा इसमें हाथ बंटाएँगे. अपने को कमतर नहीं समझेंगे और इस बात को पहचानेंगे कि यह देश, यह दुनिया आपकी है और आप इसे रहने लायक़ बनाने की क्षमता रखते हैं.

क्या आप वह दिन ला पाएँगे जब हमारी नई पीढ़ियाँ पूछें कि बेईमानी, भ्रष्टाचार, रिश्वतख़ोरी, झूठ, लालच और धोखाधड़ी किस चिड़िया का नाम है?

आप वह दिन ला सकते हैं. आप बहुत कुछ कर सकते हैं!

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