« पिछला|मुख्य पोस्ट|अगला »

एक सवाल प्रधानमंत्री से

रेणु अगालरेणु अगाल|शुक्रवार, 14 जनवरी 2011, 17:51 IST

प्रधानमंत्री जी, आप कहते हैं कि लोग ज़्यादा और बेहतर खाने लगे हैं इसलिए खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ गई है और इसलिए उनकी क़ीमतें बढ़ रही हैं.

आपका कहना है कि यह सरकार की सामाजिक न्याय दिलवाने की पहल का ही नतीजा है क्योंकि देश में बहुत से लोगों को इसका फ़ायदा हुआ है, उनकी आमदानी बढ़ी और वे अच्छा खा-पी सकते हैं.

पर आख़िर कौन हैं ये लोग प्रधानमंत्री जी? और वो कौन सी योजना है जो उन्हें बेहतर जीवन दे रही है?

आपकी सरकार ने एक योजना शुरु की है जिसका नाम महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी क़ानून (मनरेगा) है.

इस योजना के अंतर्गत गांवों में रह रहे हर परिवार के व्यक्ति को कम से कम 100 दिन का रोज़गार साल में मिलता है. अब आपने महंगाई के मद्देनज़र मेहनताना भी 100 रुपये प्रतिदिन से बढ़ाकर 120 रुपए के आसपास कर दिया है. इस तरह से देखें तो साल में हर ग्रामीण परिवार को 12 हज़ार रुपये तो मिलेंगे ही.

12 हज़ार रुपए, वाह! गांववालों की तो चांदी हो गई... लेकिन ज़रा रुकिए..12 हज़ार रुपये मतलब 32 रुपये रोज़. मान लिया जाए कि यह मनरेगा में काम करने वाले के परिवार की कुल आमदनी है.

अब आज की महंगाई देखिए. दाल, चावल से लेकर दूध, अंडे और माँस-मछली तक सभी के दाम कहाँ पहुँच गए हैं? आपकी सरकार के आंकड़े कह रहे हैं कि खाद्य पदार्थों की महंगाई की दर 18 प्रतिशत तक बढ़ गई है.

क्या आपने कभी सोचा है कि इस महंगाई में 32 रुपए रोज़ कमाने वाले परिवार की थाली में क्या परोसा जाता होगा?

आपके घोषित उत्तराधिकारी राहुल गांधी तो कभी-कभी दलितों के घर पर जाते रहे हैं कभी उनसे पूछिएगा कि उनकी थाली कैसे भरती है और क्या दिन में दोनों वक़्त ठीक से भरती है?

आंध्र प्रदेश से लेकर मध्यप्रदेश तक आज भी किसानों की आत्महत्या की ख़बरें आ रही हैं. जब आपकी सरकार समृद्धि फैला रही है तो ये नासमझ क्यों आत्महत्या कर रहे हैं मनमोहन जी?

कौन है वह जिसे आपकी सरकार आम आदमी कहती है?

चलिए उनकी बात करें जो आपके मनरेगा के भरोसे नहीं हैं. जो रिक्शा चलाता है, ऑटो चलाता है, ड्राइवरी करता है, दुकान में काम करता है या घरेलू काम करता है. वो बहुत कमाता है तो पाँच-सात हज़ार रुपया महीना कमाता है. चार लोगों का आदर्श परिवार भी हो तो घर का किराया देने के बाद उसके पास खाद्य सामग्री ख़रीदने के लिए कितना पैसा बचता होगा मनमोहन जी? और फिर उसे बच्चों की पढ़ाई के लिए, कपड़ों के लिए और गाहे-बगाहे होने वाली बीमारी के लिए भी तो पैसा चाहिए?

चलिए अपने राजप्रासाद से निकलिए किसी दिन चलते हैं आपके आम आदमी से मिलने.

और मनमोहन जी जब आप ऐसे बयान दें तो अपनी पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी कुछ जानकारी दे दिया करें.

देखिए ना, अभी दो दिन पहले एक राष्ट्रीय कहे जाने वाले अख़बार में अपने नाम से लेख लिखा है और कहा है कि देश की 40 प्रतिशत आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे है, 9.3 करोड़ लोग झुग्गी झोपड़ी में रहते हैं, 12.8 करोड़ को साफ़ पानी नहीं मिलता, 70 लाख बच्चे शिक्षा से कोसों दूर हैं.

ये तो आपके आम आदमी से भी गए गुज़रे लोग दिखते हैं.

तो फिर प्रधानमंत्री जी कौन हैं वो लोग जो बेहतर खा रहे हैं और महंगाई बढ़ा रहे हैं?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 20:12 IST, 14 जनवरी 2011 Chandan,delhi:

    बिल्कुल सही लिखा है आपने. ये आम आदमी कौन है, मेरी भी समझ से बाहर है,

  • 2. 20:15 IST, 14 जनवरी 2011 Durgesh Tripathi:

    अच्छा लिखा है. मुझे लगता है कि डॉक्टर मनमोहन सिंह और राहुल गांधी को ये समझना चाहिए कि उनकी नीतियों से धनी लोग और धनी हो रहे हैं और ग़रीबों का भला नहीं हो रहा है. मैं गाँव का रहने वाला हूँ और मुझे पता है कि वहाँ लोगों का जीवन स्तर कैसा है. ज़्यादातर ग़रीब रोटी और प्याज़ खाकर रहते हैं. अगर सरकार अपने नागरिकों को ये भी उपलब्ध नहीं करा पाती है, तो नैतिक आधार पर उन्हें पद छोड़ देना चाहिए.

  • 3. 20:50 IST, 14 जनवरी 2011 Kapil Batra:

    बहुत अच्छा. एकदम चोट करने वाला. मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ कि उन्हें बाहर जाकर ऐसे स्थान पर रहना चाहिए जहाँ इस सर्दी में लोग कैसे ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं.

  • 4. 21:38 IST, 14 जनवरी 2011 Satnam Singh:

    आपने सच लिखा है रेणु जी और ऐसे विषय पर लिखने के लिए बधाई, नहीं तो हमारी पत्रकारिता से जुड़े लोग सिर्फ़ तारीफ़ करना ही जानते हैं. मैं मानता हूँ कि प्रधानमंत्री जी बहुत ऊपर तक पढ़े-लिखे हैं. उन्हें बहुत जानकारी है. लेकिन वो सिर्फ़ ऊपर तक पढ़े हैं नीचे तो उनको कुछ पता ही नहीं क्या होता है. सरकार महंगाई के लिए राज्य सरकारों, व्यापारियों को दोष देती है. ये कहती है कि लोगों की आमदनी बढ़ गई है. लेकिन इसकी असली वजह प्रधानमंत्री ख़ुद हैं क्योंकि आप चाहते हैं कि हम जल्द ही विकसित देश बन जाएँ. पर ऐसा नहीं हो सकता.

  • 5. 22:21 IST, 14 जनवरी 2011 Sheo shankar Pandey:

    रेणु अगाल जी आपका प्रधानमंत्री पर लिखा ब्लॉग सटीक है. प्रधानमंत्री जी को भारत की वास्तविकता का कुछ पता नही है. वातानुकूलित और पाँच सितारा होटल मे बयान देने से महंगाई दूर नही होगी. एक तरफ़ जनता महंगाई से त्रस्त है तो दूसरी तरफ़ प्रधानमंत्री जी फ़िज़ूल का बयान देने मे व्यस्त हैं. प्रधानमंत्री जी, इस दुर्दशा के लिए इतिहास आपको दोषी करार देगा ना कि सोनिया गाँधी या राहुल गाँधी को.

  • 6. 23:56 IST, 14 जनवरी 2011 kaleem:

    आपका कहना बिल्कुल ठीक है. ये सरकार इस मुद्दे पर पूरी तरह नाकाम है.

  • 7. 01:00 IST, 15 जनवरी 2011 Pradeep Shukla:

    आपकी बात से मैं पूरी तरह से सहमत हूँ. ऐसा तर्क कम से कम एक देश के प्रधानमंत्री को तो नहीं ही देना चाहिए. उस बढ़ी हुई आमदनी का क्या मतलब जिसमें कोई मज़दूर अपने परिवार को भोजन न करा सके. पौष्टिक भोजन एक परिवार की मूलभूत ज़रूरत है और इस पर टीका-टिप्पणी करना सामान्य जनमानस का अपमान करना है. एक अर्थशास्त्री की नज़र मे तर्क ठीक भी हो सकता है किंतु मानवता की नज़र मे ऐसे तर्क आम आदमी को गाली देने जैसा है. बेहतर होता प्रधानमंत्री महोदय अपने अनुभव से बढ़ती क़ीमतों पर अंकुश लगते ना की बेशर्मी भरा विश्लेषण करते.

  • 8. 01:41 IST, 15 जनवरी 2011 Prasoon Srivastava:

    रेणु जी, प्रधानमंत्री जी होने के बावजूद ऐसे दावे करना और समस्या का हल करने का विकल्प बताने की जगह किसी और योजना पर इल्जाम डाल देना ये दर्शाता है कि हमारे देश की बागडोर कितनी कमज़ोर है.

  • 9. 02:05 IST, 15 जनवरी 2011 Rakesh Kumar:

    एकदम सही सवाल रेणु जी. कुछ समय पहले अमरीका के एक बेवकूफ़ मंत्री ने भी ये ही कहा था. लेकिन वो अमरीका का था. लेकिन ये तो एक भारतीय हैं और वो भी प्रधानमंत्री. भारत का दुर्भाग्य या मनमोहन जी के बढ़ते उम्र का असर.

  • 10. 02:10 IST, 15 जनवरी 2011 anil tyagi:

    देश को आरबीआई अधिकारी नहीं सिर्फ़ राजनीतिक समझ वाले लोग चाहिए. नौकरशाह फ़ाइल से पढ़ता है जबकि नेता अपने क्षेत्र से.

  • 11. 03:41 IST, 15 जनवरी 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    वाह रेणु जी सलाम करता हूँ आपको. लगता है बीबीसी को अब समझ में आ रहा है कि कांग्रेस पार्टी ठीक नहीं है ग़रीबों के लिए, नहीं तो बीबीसी की यह हालत है कि कांग्रेस, सोनिया और मनमोहन सिंह के कसीदे पढ़ते नहीं थकती. काश आपका ये सच लेख श्री मनमोहन सिंह पढ़ ले तो उनके लिए बेहतर होता. जो सरकार ग़रीबों को एक समय का खाना नहीं दे सकती, वो इस तरह ग़रीबों की तौहीन करने का हक़ भी नहीं रखती है. लानत है मनमोहन सिंह और उनकी सरकार पर.

  • 12. 07:13 IST, 15 जनवरी 2011 Gurpreet:

    बहुत अच्छा ब्लॉग. लेकिन मैं नहीं मानता कि प्रधानमंत्री किसी सवाल का जवाब देने जा रहे हैं. ये तय है कि अगले चुनाव में भारत के लोग कांग्रेस के 10 साल के किये-कराए पर उसे असली तस्वीर दिखाएँगे.

  • 13. 07:24 IST, 15 जनवरी 2011 amit batra(srikaranpur):

    क्या ख़ूब लिखा है रेणु जी. मनमोहन जी का बयान ओबामा से मेल खाता है, जिसमें वो कहते हैं कि बढ़ती महंगाई के लिए भारतीय ज़िम्मेदार हैं. लेकिन हमारे नेताओं को तो संसद की कैंटीन का रेट पता है, बाज़ार का नहीं. अब वे प्याज़ के लिए भी कह सकते हैं कि लोगों ने ज़्यादा खाना शुरू कर दिया है.

  • 14. 07:26 IST, 15 जनवरी 2011 Dr.Lal Ratnakar:

    रेणुजी आप सवाल किससे कर रही हैं, जो घोषित रूप से सेवानिवृत्ति के बाद काम कर रहे हैं, पुनर्नियुक्ति पर हैं, अक्सर ऐसे लोग अपने बाल-बच्चों के लिए अपने जीवन में काम करते हैं. अमूमन अपने सारे ज्ञान को अपने मालिक के लिए लगाते हैं जैसा कि जग जाहिर है माननीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी निहायत ईमानदार अर्थशास्त्री और कर्मठ नौकरशाह रहे हैं, हम ईमानदार नौकरशाह की प्रशंसा भी करते हैं. लेकिन किसी देश का प्रधानमंत्री यह कहे कि ग़रीब ज़्यादा खाने लगे हैं इसलिए महंगाई बढ़ गई है, पता नहीं प्रधानमंत्री जी को कौन सा अर्थशास्त्र आता है पर अब तक तो यह होता रहा है कि जब महंगाई कम होती है तो ग़रीब का भी पेट भरने लगता है. यह मान्यता मनमोहन सिंह जी ने महंगाई बढाकर बदल दी है. इस प्रयोग पर इन्हें 'मैग्सेसे' अवार्ड तो मिल ही जाएगा. रही बात आपके सवाल की तो ये जिस मीडियम और सिस्टम में जी रहे हैं वहाँ इसका उत्तर बाकायदा विचार करके मंत्रियों के समूह से सहमति बनाकर दे चुके हैं. इस देश की किस्मत ही ख़राब है तो मनमोहन क्या करें एक भी राजनेता इस लायक नहीं रहा कि उसे देश का प्रधानमंत्री का पद दिया जा सके. अब सब समझ आता है कि 'सोनिया को अपने पुत्र के लिए 'फिलिंग द गैप' वाला प्रधानमंत्री चाहिए था सो वैसे ही 'रिटायर्ड' कामचलाऊ जैसा देश चल रहा है. चारों ओर हाहाकार, भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोज़गारी और न जाने क्या क्या. पर कुछ भी ठीक नहीं पर प्रधानमंत्री नियंत्रण में हैं. अगर यही 'यह सरकार की सामाजिक न्याय दिलवाने की पहल का ही नतीजा है' तो इससे तो सामाजिक अन्याय ही ठीक था. जिसमे आम आदमी भूख से तो नहीं मर रहा था.

  • 15. 08:48 IST, 15 जनवरी 2011 raj kishore jha:

    रेणु जी मैं आपकी बात से सहमत हूँ. मालूम नहीं कौन सा गणित है पीएम के पास.

  • 16. 10:17 IST, 15 जनवरी 2011 Madan Patyal (Hamirpur)H.P.:

    रेणु जी, आप हमारे सबसे आदरणीय प्रधानमंत्री की विश्ववस्नीयता पर कृपया शंका न करे. वो ये सब बाते अपने वोट बैंक पर नज़र रख कर नहीं कह रहे बल्कि इसलिए की यही यथार्थ है. मनरेगा के कारण देश के सबसे ग़रीब को कुछ पैसा मिला खर्च करने के लिेए, चाहे वो काफी न हो. पर याद रखिए नहीं से कुछ सही. ग़रीब लोगों का गांवों से शहर को पलायन थमा है. लोगो का जीवन स्तर सुधर रहा है. पंजाब को पिछले बार कटाई के समय मज़दूर नहीं मिले. हमें सपनों की दुनिया से निकलकर यथार्थ में जीना चाहिए.

  • 17. 10:32 IST, 15 जनवरी 2011 Dhananjay Nath:

    रेणु जी, आपने वर्तमान सरकार की कलाई खोलकर रख दी. वातानुकुलित कमरें में बैठ कर योजनाएं बनाने वालो को ग़रीबों के दर्द का क्या पता. ये सरकार उद्योगपतियों और जमाखोरों की है.

  • 18. 10:36 IST, 15 जनवरी 2011 suhail :

    रेणु जी, क्या बताऊं कांग्रेस का हाथ अब आम आदमी के साथ नहीं रहा.

  • 19. 11:03 IST, 15 जनवरी 2011 ashish yadav:

    प्रधानमंत्री की रोज़ रोज़ की बैठकों से महंगाई कम नहीं होने वाली. सरकार कोई भी हो, आम आदमी कि चिन्ता किसी को नहीं है. नेता लोग गद्दी पाते ही सरकारी खजाने को लूटने में लग जाते हैं.शर्मनाक है कि भारत कृषि प्रधान दश होने के बाद भी विदेश से प्याज़ जैसी वस्तु का आयात कर रहा है.

  • 20. 11:13 IST, 15 जनवरी 2011 Suraj Agrawal:

    आपका कहना बिल्कुल ठीक है. ये सरकार इस मुद्दे पर पूरी तरह नाकाम है.

  • 21. 12:14 IST, 15 जनवरी 2011 BHEEM SINGH:

    प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को क्या पता कि ग़रीब और ग़रीबी कौन सी चिड़िया का नाम है. आम आदमी को भी नहीं मालुम कि वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री की सब्ज़ी का क्या बजट है. एक ग़रीबी से परेशान तो दूसरा सोने के पिंजड़े में बैठा ऐसी बाते करता है. इन सब बातों से नक्सलवाद की फसल और मज़बूत होगी. जैसी रब दी मर्ज़ी.

  • 22. 13:14 IST, 15 जनवरी 2011 भूपेश गुप्ता :

    बहुत अच्छा लिखा है आपने, मगर आपकी भाषा में गुस्सा है, तीखापन है. याद रखिये की राजनीतिज्ञों की भाषा में यही नहीं होता. वो डिप्लोमेट होते हैं. आप और हम भी कोशिश करें ठन्डे दिमाग से कोई हल निकालने की. यकीन मानिए हल निकलेगा, लेकिन गुस्सा छोडिये, और पाँच साल बाद हर जगह से ऐसे इंसान को संसद भेजिए जो न तो सांपनाथ पार्टी का हो ना नागनाथ दल का. कभी निर्दलीयों को मिलाकर भी साझा सरकार बनाने का मौक़ा दीजिये. मुझे तो पूरा भरोसा है की हालात यही रहे तो ऐसा प्रयोग भी देश के राजनीतिक रंगमंच पर होकर रहेगा.

  • 23. 13:43 IST, 15 जनवरी 2011 mohammed sahul hameed:

    बधाई रेणु जी,
    आपने देश के सबसे बड़े मुद्दें पर सटीक लेखनी लिखी है कि आखिर वो आम आदमी कौन है. क्योंकि अनाज उगाने वाला खुदकुशी कर रहा है, छोटे मोटे काम करने वाला पाँच सात हज़ार में चार लोगों का पेट भर रहा है....देश कहा जा रहा है ये मनमोहन और युवराज को संसद से बाहर निकलकर धरातल पर आकर देखना चाहिए. करोड़ों के बंगलो मे रहने वालों को सहुलियत देने के बजाय उन्हेंम फ़िक्र आम आदमी की करना चाहिए. वर्ना देश के किसान की तरह इसके उपर वाला तबक़ा भी खुदकुशी करना शुरु कर देंगे और उसके बाद हम मिडिल क्लास का नंबर आएगा.

  • 24. 15:13 IST, 15 जनवरी 2011 SUBODH CHOUDHARY:


    बिल्कुल ठीक कहा आपने. पता नही प्रधानमंत्री साहब किस आधार पर ये बात कह रहे हैं. वे कहते हैं कि लोग अच्छा खाने लगे हैं पर मुझे तो लगता है वो पहले से भी कम खा रहे हैं. चाहे गांव हो या शहर हर जगह लोग महंगाई से परेशान है. दाल रोटी भी अब आदमी नहीं खा पाता क्योकि दाल भी सामान्य लोगों के लिए बड़ी चीज़ हो गई है. हो सकता है पीएम शायद कुछ बड़े तबको के बारे में ऐसा कह रहे होंगे.

  • 25. 16:10 IST, 15 जनवरी 2011 rajiv:

    अगर मनमोहन सिंह में जरा भी शर्म है तो उन्हें इस्तीफ़ा दे देना चाहिए.

  • 26. 16:18 IST, 15 जनवरी 2011 dhirendra shukla:

    बड़े दिनों से ये सोच रहा था कि तथाकथित बुद्धिजीवी भी मनमोहन सिंह जैसे लोगों के बयानों पर कुछ बोलते क्यों नहीं. आपकी बात आम आदमी की बात है और उस आम आदमी की बात है जिसके बारे में मनमोहन, सोनिया और राहुल कुछ नहीं जानते.

  • 27. 17:47 IST, 15 जनवरी 2011 shailesh:

    बिलकुल सही लिखा है रेणु जी आपने...
    वाह क्या थ्योरी पेश कि है मौनी बाबा ने..
    आज तक बुद्धिजीवी अर्थशास्त्री होने का जो लबादा ओढ़ रखा था मनमोहन जी ने ...आखिर वो उतर ही गया ..

  • 28. 19:15 IST, 15 जनवरी 2011 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    प्रधानमंत्री का बयान सही है, मंहगाई कम थी फिर भी लोगों को खाने को नहीं मिलता था, आज लोग मंहगाई के बावजूद भरपेट खा रहे हैं. मंहगाई के लिए हम लोग भी ज़िम्मेदार हैं, घरों, पार्टियों और शादी ब्याह में कितना खाना बर्बाद करते हैं, बाज़ारों में खरीदारों की भीड़ लगी रहती है, जहां पैदल या साइकिल से जाया जा सकता है वहाँ भी मोटरसाइकिल या कार से जाते हैं, फैशन के हिसाब से रोज कपड़े बदलते हैं, शादियों में फ़िज़ूल खर्च करतें हैं, मंहगाई तो बढ़ेगी ही. इतनी ही मंहगाई है तो आम आदमी गुटखा, शराब और सिगरेट का सेवन क्यों करते हैं. सिनेमा और मोबाइल पर इतना खर्च क्यों होता है.

  • 29. 19:22 IST, 15 जनवरी 2011 ANIL KUMAR MISHRA:

    रेणु जी बहुत अच्छा लेख लिखा है आपने इस लेख के लिए आपको बहुत बधाई आपने सच कहा की मनमोहन जी को बाहर जाकर देखना चाहिए की आम आदमी कैसे अपनी ज़िन्दगी फुटपाथ पर और कई दिन भूखे रहकर गुजारते है लेकिन उन्हें ये सारी चीज़े राजमहल में बैठकर नहीं दिखाई दे सकती |

  • 30. 19:39 IST, 15 जनवरी 2011 rj_arvinda:

    बेहतरीन.. बिल्कुल निशाने पर लगने वाला शब्दबाण छोड़ा है रेणु आपने....अब मनमोहन जी कहेंगे कि लोगों ने प्याज और चीनी के बाद पेट्रोल की खपत भी ज्यादा करनी शुरू कर दी है...पूरे हिंदुस्तान में हर किसी के पास मोटरसाइकिल और कार रखने की हैसियत हो गई है...आज पेट्रोल के महंगे होने के पीछे भी वहीं वजह है?

  • 31. 19:49 IST, 15 जनवरी 2011 himmat singh bhati:


    रेणु जी शायद आपकी बात हमारें पीएम मनमोहन सिंह के पास किसी तरह पहुंच जाए तो ये भी पहुँचाना की सरकार की ग़लत नीतियों के कारण हो रही है. ये जमाखोर वादा कारोबारी और बड़े बड़े मॉल खोलने वाले क्या जमाखोरी नहीं कर रहे, जिसके कारण भाव बढ़ रहे हैं. सरकार क्यों सफेद झूठ बोल रही है.

  • 32. 19:56 IST, 15 जनवरी 2011 ashok:

    बहुत सही लिखा है. आप जैसे लोगो की ज़रुरत है देश को.

  • 33. 20:16 IST, 15 जनवरी 2011 Balwan Foji, Rohtak BSP:

    परमाणु समझोते को लेकर जब सभी सहयोगी पार्टियों ने समर्थन वापिस ले लिया और कांग्रेस सरकार अल्पमत में आ गयी तो बीजेपी ने कांग्रेस सरकार बचाने के लिए करोड़ो में समझौता कर बीजेपी ने क्रोस वोटिंग करवाई. इस महंगाई का यही एक बहुत बड़ा कारण है.

  • 34. 22:07 IST, 15 जनवरी 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    रेणू जी आप के इस लेख ने बीबीसी श्रोताओं के दिलों में ख़ास जगह बनाई है. बीबीसी में आप और विनोद जी ने सच में नई जान और बीबीसी के प्रति विश्वास पैदा किया है. वरना बीबीसी तो कांग्रेस और नेताओं का ग़ुलाम बनकर रह गया है. लेकिन आप और विनोद वर्मा जी के ब्लॉग से ऐसा महसूस हुआ कि बीबीसी श्रोताओं को पूरी जानकारी देने का काम कर रहा है. मैं ही नहीं आपके इस ब्लॉग को सभी श्रोताओं ने सराहा है. यही सच्ची पत्रकारिता है. क्योंकि आपने वो सच लिखा है जो आज इस पेशे में कोई लिखता नहीं है.

  • 35. 22:07 IST, 15 जनवरी 2011 M. Abdullah:

    मनमोहन जी इंडिया के प्रधानमंत्री है ना कि भारत के. अब आप ही बताएं उन्हें हम भारतीयों के लिए दर्द क्यों होगा? अब अगर भारत में एक महीने में 1000 किसान अपनी आर्थिक तंगी से आत्महत्या करें या एक लाख.. मनमोहन जी या उन जैसे इंडियन मंत्रियों को क्या पड़ी है किसी भारतीय की सुध लेने की.

  • 36. 22:17 IST, 15 जनवरी 2011 Saptarshi:

    मैं आपकी बात से सहमत नहीं हूं. अगर थोड़े ध्यान से अध्ययन किया जाए तो 'नॉन-रेग्यूलेट्ड' पैसे की संख्या बढ़ी है. ये भले ही दिखती ना हो लेकिन लोगों का रहन-सहन पिछले कुछ सालों में बहुत ज़्यादा बढ़िया हुआ है. लोग अब ख़र्च भी करने लगे हैं. आप बड़े शहरों को छोड़ दीजिए लेकिन क्या आपको मालूम है कि झारखंड जैसे पिछड़े इलाक़े में भी लोग आर्थिक रूप से पहले से ज़्यादा सुदृढ़ हुए हैं. और मनमोहन सिंह जी की बातों पर सवाल उठाना बहुत ज़्यादा सही नहीं है. वे अगर कुछ कह रहे हैं तो कुछ सोच कर ही कह रहे होंगे.

  • 37. 00:45 IST, 16 जनवरी 2011 Trinetra Singh - Egypt:

    इस रणनीति से तो भगवान ही बचाए.

  • 38. 02:24 IST, 16 जनवरी 2011 MUZZAMMIL HAYAT:

    सवाल बिल्कुल सही मौक़े पर उठाया गया है. लेकिन इस पर बारीकी से सोचने की ज़रूरत है. पहली बात ये कि कांग्रेस पार्टी हमेशा से धनी और ऊँचे लोगों की पार्टी रही है, जिन्हें पहले पार्टी के नाम से ही वोट मिल जाया करते थे. आज अगर पार्टी में कुछ लोग ज़मीनी हैसियत वाले भी है, लेकिन उनकी हैसियत प्यादे से ज़्यादा नहीं है. पूरी पार्टी और सरकार की कमान अभी भी 10 से ज़्यादा लोगों के हाथ में नहीं है. वो लोग हमेशा ग़रीब और ग़रीबी से कोसों दूर रहे हैं. दूसरी बात सरकार की नीतियाँ अमीरी और ग़रीबी के बीच फ़र्क को और बढ़ा रही है. महंगाई की वजह है पैसे का वो हिस्सा जो ग़रीबों और निचले तबकों से छीन कर 10 प्रतिशत करोड़पतियों की झोली में डाला जा रहा है. जिसका कमीशन सरकारी बाबू लोग डकार रहे हैं. जो भ्रष्टाचार के रूप में जगज़ाहिर हो रहा है. दाल, चावल, रोटी, प्याज़ तो ज़्यादा ग़रीब और निचले तबके के लोग खाते हैं. अमीर तो चायनीज़, पित्ज़ा और बर्गर खाते हैं. तो दाल तो काली होनी ही थी.

  • 39. 07:01 IST, 16 जनवरी 2011 achintya kumar, korba:

    प्रधानमंत्री की बातों पर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है.

  • 40. 09:17 IST, 16 जनवरी 2011 sanjay kumar:

    मनमोहन जी ने कभी ग़रीबी देखी है...या फिर यह कहें उनको मालूम है कैसे आम आदमी दो वक़्त खाने के लिए ज़िंदगी से जूझ रहा है? मैं आपके लेख से पूरी तरह सहमत हूँ.

  • 41. 09:46 IST, 16 जनवरी 2011 Arghya Pal, Cooch Behar, West Bengal:

    रेणु जी को धन्यवाद. इन राजनेताओं से इससे ज़्यादा कुछ उम्मीद नहीं कर सकते. उजाले में रहकर उन्हें अंधेरे बिल्कुल नज़र नहीं आते. आख़िरकार ऐसी बयानबाज़ी तो होगी ही.

  • 42. 11:28 IST, 16 जनवरी 2011 Deepak Sharma:

    आज की तारीख़ में जितने भी नेता लोग हैं, उन्हें महंगाई से कोई फ़र्क नहीं पड़ता. क्योंकि ये लोग तो सब कुछ मुफ़्त में पाते हैं. क्यों ना सरकार इनकी सारी सुविधा उनसे हटा ले और एक आम आदमी की तरह ही उनका जीवन चलाने को विवश करे.

  • 43. 11:35 IST, 16 जनवरी 2011 naveen:

    बहुत अच्छा रेणु जी. इस स्थिति में हमें एक मज़बूत विपक्षी पार्टी की ज़रूरत है, और दुर्भाग्य से ऐसा है नहीं. विपक्षी दलों को एकजुट होना चाहिए.

  • 44. 13:06 IST, 16 जनवरी 2011 murari gupta:

    रेणु जी, बीबीसी को कांग्रेस नीत सरकार की चापलूसी से बाहर लाकर बेहतरीन लेख लिखने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद. शायद बीबीसी में कार्यरत दूसरे लोग भी रेणुजी का अनुसरण करें.

  • 45. 13:26 IST, 16 जनवरी 2011 Uday Prakash:

    रेणु जी, आपने बिल्कुल सही बात कही है. वैसे भी अब कांग्रेस का काम तमाम हो गया है. सोनिया जी और राहुल जी को ये बात समझ लेना चाहिए कि अब जनता समझदार हो चुकी है. ये बात उनको अगले चुनाव में समझ में आ जाएगी.

  • 46. 13:47 IST, 16 जनवरी 2011 priyanka:

    आपके लेख से मैं पूरी तरह से सहमत हूँ. लेकिन सवाल सिर्फ़ प्रधानमंत्री से नहीं बल्कि उन तमाम राजनेताओं से करने चाहिए जो गद्दी पर बैठ या तो बड़े-बड़े दावे करते हैं या फिर खोखले वादे. अगर फिर भी मन नहीं भरता तो आरोप और प्रत्यारोप.....

  • 47. 14:46 IST, 16 जनवरी 2011 deepak:

    इससे यह साबित होता है कि प्रधानमंत्री जनता के प्रति ज़िम्मेदार नहीं है. तो कौन है. वे कांग्रेस के पार्टी सदस्य हैं, भारत के प्रधानमंत्री नहीं.

  • 48. 21:15 IST, 16 जनवरी 2011 अरुण कुमार पांडेय, बोमडिला,अरुणाचल प्�:

    रेणुजी ने प्रधानमंत्री के सामने सही सवाल रखे हैं. कई महीने पहले अमेरिकी राजनेता की कही हुई बात को अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के द्वारा दुहराना चिंतन का विषय है. कहीं भारतीय अर्थचिंतन वहीं से निर्देशित तो नहीं हो रहा है ? एक बेबाक टिप्पणी यह भी कि कांग्रेस का शासन काल ऐतिहासिक रूप से जमाखोरों,भ्रष्टाचारियों का स्वर्ग होता है. आम आदमी (Mango Man) कामधेनु है जिसे जब और जितना जी हो चूसा या दूहा जा सकता है. पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी एक और ताजा उदाहरण है.

  • 49. 21:41 IST, 16 जनवरी 2011 Viswanath Jaiswal:

    आपने बिलकुल सही लिखा है. लेकिन मैं यह सोचता हूँ कि क्या प्रधानमंत्री या राहुल गांधी जी या अन्य नेता आपका यह ब्लॉग पढ़ते हैं जिससे उन्हें वास्तविकता की जानकारी हो सके.

  • 50. 22:36 IST, 16 जनवरी 2011 Ebad Ali Khan, Jamshedpur:

    दो तीन दिन पहले जब यह बेतुका बयान क़ि लोग ज्यादा खा पी रहे हैं जिससे मंहगाई बढ़ गयी है उसी दिन से खून खोल रहा है क़ि इस का जवाब कैसे दिया जाये कि तसल्ली हो. रेनू जी का ब्लॉग पढने पर मुझे लग रहा है कि इस बेतुका बयान पर कुछ लिखूं. बात यह है क़ि प्रधान मंत्री जी इस भाषा में बात नहीं करते अगर वे प्रधानमंत्री हाउस में न हो कर झारखण्ड, बिहार, या किसी सुदूर गाँव में होते. जहाँ ग़रीब लोगों क़ी तादाद बहुत ज्यादा है इस तरह क़ी बातें सुनने पर जनता तिलमिला जाती हैं. उनकी निराशा और बढ़ जाती है.. धरातल पर ऐसा कुछ नहीं है क़ी अभी इस तरह का बयान दिया जाये. सही बात यह है कि लोग बहुत तकलीफ में हैं. मंहगाई इस लिए नहीं है कि लोग ज़यादा खा रहे हैं मंहगाई इस लिए है कि सरकार क़ी ग़लत नीतियों या व्याप्त भ्रस्ताचार के चलते खेती में पैदावार कम होती जा रही है. बारिश नहीं होने पर जनता में बड़ी निराशा फैल जाती है जनसँख्या बढती जा रही है उसको रोकने का कोई ठोस उपाय नहीं किया जा रहा है. मंहगाई इस लिए बढ़ रही है कि आयातित पेट्रोलियम पदार्थों पर सरकार पचास फीसदी से ज्यादा के कर लगा रखी है. जमा खोरों को जमाखोरी करने पर थोडा भी दर नहीं लगता. इतनी मामूली सी बात सरकार समझने को तैयार नहीं. बहुत हो गया. इस तरह के बयान पूरी तरह से निरंकुशता पूर्ण है जैसे किसी ज़माने मैं फ्रांस या और किसी देशं में जब वहां क़ी रानी को बताया गया क़ी ग़रीबी क़ी वजह से जनता को रोटी नहीं मिल रही है तो उसने केक खाने का सुझाव दे डाला था. भारत में कम से कम इस तरह का बयान नहीं दिया जाना चाहिए. ग़रीबों को जीने दिया जाये क्यों कि कर के बोझ से उन्हें दिनों दिन दबाया जा रहा है. जनता के करों से उनकी खुशहाली का साधन खोजने क़ी जगह राजनीति के आये दिन नए नए पर्योग किये जाते हैं. आये दिन चुनाव का बिगुल बजाय जाता है.

  • 51. 23:20 IST, 16 जनवरी 2011 Legal eagle:

    रेणु जी, बेबाक टिप्पणी करने के लिए आपको बधाई. मनमोहन सिंह जी अमरीका की चाटुकारी करने वाली आर्थिक नीतियाँ बना बना कर यह भूल गए कि भारत की 75 प्रतिशत जनता मॉल में शॉपिंग नहीं करती. भारत के सबसे कमज़ोर और राजनीतिक रूप से अनाड़ी प्रधानमंत्री को भगवान सदबुद्धि दे.

  • 52. 23:42 IST, 16 जनवरी 2011 Humayun kabir:

    एसी कार घर छोड़ो नेता लोग, हम लोगों के पैसे के बिना तुम्हारा एक दिन नहीं चलेगा.

  • 53. 05:53 IST, 17 जनवरी 2011 prashant:

    प्रधानमंत्री जी शायद सुरेश कलमाडी ,ए.राजा, सोनिया व राहुल गान्धी की बात कर रहे हैं..........

  • 54. 05:53 IST, 17 जनवरी 2011 शेष चौहान,पुणे, महाराष्ट्र:

    बहुत ही ज़बरदस्त है आपका सवाल. मनमोहन क्या, सोनिया और राहुल सभी भ्रष्ट नीति के शिकार हैं.

  • 55. 09:01 IST, 17 जनवरी 2011 sanjay suman:

    रेणु जी, आपने जो लिखा बिलकुल सही लिखा. राहुल जी ग़रीबों के घर जा कर रोटी खाते हैं. अब क्यों नहीं जाते? कहने को मनमोहन जी बहुत बड़े अर्थशास्त्री हैं. कहते हैं कि ग़रीब की वजह से महंगाई बढ़ी है. नहीं प्यारे मनमोहन जी, ग़रीबी तो आपके मंत्रिमंडल में शामिल मंत्रियों की वजह से बढ़ी है.

  • 56. 09:50 IST, 17 जनवरी 2011 Sha N.:

    क्या रेणु जी आपको इतना भी नही मालूम कि यह आम आदमी वे हैं जो कि उधार लेकर बिज़नेस करते हैं. जिन्होंने कॉमनवेल्थ के ठेकों से कमाया है. करप्शन आम तो फिर आम आदमी हुआ कि नहीं पैसे वाला? थोड़ी आँखें खोला यार. अभी तो 3जी या 2जी या जो भी है, उसका पैसा भी बाहर नहीं आया है.

  • 57. 11:48 IST, 17 जनवरी 2011 Hashmat ali:

    प्रधान मंत्री जी शायद ग़रीबी की भाषा ही नहीं जानते, वोह छटा वेतन आयोग वालो को ग़रीब समझ रहे हैं | उन्ही लोगो के न्याय की बात कर रहे हैं | वोह महल में रह कर झल्ली वालो रिक्शा वालो मजदूरों के बारे में क्या जाने ,क्योंकि वोह राजा हैं और ग़रीब कीड़े मकोड़े इंसान नहीं

  • 58. 12:27 IST, 17 जनवरी 2011 Deepak:

    आपका कहना बिलकुल सही है. महंगाई गरीबों के चलते नहीं बल्कि सरकार की गलत नीतियों चलते बढ़ रही है. ये तो वही बात हुई कि जब फ्रांस के लोग भूख से बेहाल होके अपने राजा के घर के सामने गए तो वहाँ कि रानी ने कहा था कि क्या हुआ अगर रोटी नहीं है, ब्रेड खा लो, और फ्रांस में क्रांति हो गयी थी. तीन महीने में छह बार पेट्रोल के दाम बढ़े हैं, इसके लिए भी गरीब ही जिम्मेदार है, हर चीज के दाम बढे है. जब रोम जल रहा था तो नीरो बंसी बजा रहा था. जो गरीब पहले से ही भूख से बेहाल है उसके साथ ऐसा भद्दा मजाक ! कही यहाँ भी लोग कहने के लिए मजबूर ना हो जाये "दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है".

  • 59. 12:31 IST, 17 जनवरी 2011 PRAVEEN SINGH:

    बस सार-तत्व यह है कि कॉंग्रेस का हाथ आम आदमी के मुख पर तमाचा बन गया है. धन्य हो सोनी-मोनी ऐंड कंपनी.

  • 60. 14:28 IST, 17 जनवरी 2011 Ravi Yadav:

    बहुत ही तेज़ तरार शब्दों वाला ब्लॉग ब्लॉग. लेकिन इसमें नया क्या है. सवाल तो हर कोई कर रहा है, आपके इस ब्लॉग की तरह . जबाब कब मिलेगा, प्रतिक्रिया कब होगी.

  • 61. 16:40 IST, 17 जनवरी 2011 india demands:

    जो कुछ आपने कहा वो सहीं है पर सवाल ये है कि हम अपने राजनेताओं को ये कैसे सुनाए और कुछ करने पर मजबूर करे.

  • 62. 19:22 IST, 17 जनवरी 2011 Ajmal Mohsin Sonu:

    बिल्कुल सहीं कहा है. मैं आपकी बात से बिल्कुल सहमत हुँ रेणु जी. प्लीस आगे भी लिखतीं रहिए.

  • 63. 19:27 IST, 17 जनवरी 2011 Smt. Kesha Yadav-Jaunpur:

    प्रधानमंत्री जी इतना तो समझ आ ही गया है की आप का ग़रीबी से कोई लेना देना नहीं है. गाँधी के देश में 'नकली गांधियों की नौकरी करना और देश चलाना दो अलग बात है ' प्रधानमंत्री जी आपको लिखते हुए शर्म आ रही है 'रेणु अगाल' ने आपसे सवाल किया है आंकडे दिए हैं आपके वित्त मंत्री से ज्यादा वास्तविक आंकड़े हैं, उनके सवाल तो शायद आपके समझ में 'न'आयें पर इतना एहसास आप कर लीजिये की आप देश की कमर तोड़ने का काम कर रहें हैं, अंग्रेजों के आक्रमण का तरीका भी 'मॉल' बेचने से शुरू हुआ था और देश के कोने कोने में 'कुकुरमुत्तों की तरह ये जो माल आपके या आपके नेत्रित्व के चलते' मालकिन की भितरघाती नीतियों का ही परिणाम हैं. काम से काम आप से इस तरह की उम्मीद नहीं थी आप जब प्रधानमंत्री बने थे तब आपके 'वर्ड बैंक' के नौकरी के ज़माने के एक साथी ने कहा था यह देश का नाश करके रख देगा तब विश्वास नहीं हुआ था पर प्रधानमंत्री जी आपने उनके कहे पर खरे उतरे और उतर रहे हो, आपकी मालकिन को संभवतः ये सब अच्छा लग रहा होगा. पर आपका एसा बोलना इस देश की गरीब जनता को कैसे अच्छा लगेगा 'एक तरफ महंगाई की मार और दूसरी ओर से देश के प्रधानमंत्री की ग़रीबों के लिए बे-वफाई की मार' अभी तक तो पेट और पीठ पर मार पड़ती थी , लेकिन अब तो भेजा पर वार हो रहा है. गरीब का भेजा जिस दिन ख़राब हुआ न उस दिन आपकी मालकिन और राजकुमार 'उनकी झुग्गियों में रात विश्राम या भोज की नौटंकी करते नज़र नहीं आयेंगे, प्रधानमंत्री जी आप को यह याद रखना होगा यह देश आस्था का देश है यदि ग़रीब की आस्था पर और कुठाराघात हुआ तो उनकी आह का हश्र आप और आपकी 'महारानी' को भोगना होगा क्योंकि 'मत सताईये ग़रीब को जाकी लम्बी हाय - मरे चाम की आह से लौह भसम हो जाय' ये गाँधी का देश है इस देश का विकास गांवों से होकर गुजरेगा यहाँ कृषि आधारित नीतियाँ बनानी होंगी आम आदमी को 'मनरेगा' नामक भिक्षा देकर काम नहीं चलेगा उनकी नियमित आमदनी का उपाय ढूढ़ना होगा आदि आदि............!

  • 64. 22:55 IST, 17 जनवरी 2011 AKHILESH SHARAN:

    अगर हमारे देश की जनता अच्छा खाना खाने लगे हैं तो वो और भी अच्छी बात है. अब इसका मतलब तो ये नहीं है कि आप उसका शोषण करोगें.

  • 65. 11:11 IST, 18 जनवरी 2011 Narender mahar:

    बहुत अच्छा रेणु जी, मैं आपका पूरी तरह से समर्थन करता हूँ.

  • 66. 12:32 IST, 18 जनवरी 2011 निर्मल सिंह राणा :

    मै रेणु अगाल जी की बातों से सहमत हूँ .

  • 67. 13:47 IST, 18 जनवरी 2011 Ruchi Malik:

    माननीय प्रधानमंत्री जी से यह प्रार्थना है कि बीएड डिग्री धारक क्‍या इन्‍तज़ार ही करते रहेगें. कोई हम बीएड वालों की भी सुने. क्‍या आन्‍दोलन से ही सफलता हासिल होती है. अगर ऐसा है तो क्‍या हम लोग भी आन्‍दोलन की राह पकडे़ जरा इस पर विचार कीजिये.

  • 68. 18:02 IST, 18 जनवरी 2011 नीतू पाण्डेय:

    काश ये ब्लॉग प्रधानमंत्री जी पढ़ रहे होते...

  • 69. 19:36 IST, 18 जनवरी 2011 Husaini tankiwala:


    रेणुजी, आप कभी गांव गई है ये जानने के लिए कि पहले क्या हालत थी और अब कैसी है. मैं आपको अपने आस पास के गांव की बात कहता हूँ कि पहले उनके पास पहनने को धोती नहीं होती थी. आज उनकी नई धोतियों में हज़ार हज़ार के नोट नज़र आते हैं. बीजेपी ने देश को कुछ नहीं दिया. मनमोहन सिंह ने आज देश की काया पलट दी. अर्थव्यवस्था का नियम है कि पैसा आएगा, मांग बढ़ेगी और दाम बढ़ेंगे. क्या आपने कभी अंतरराष्ट्रीय खाद्य पदार्थों की क़ीमते मालूम की है. मैं अकसर चीन जाता हुँ वहां विकास के साथ महंगाई का कड़वा निवाला भी चखना पड़ा है. विकास की कीमत तो चुकानी पड़ती है. उच्च वर्ग को कोई फर्क नहीं पड़ता पर निम्न वर्ग की आय बढ़ी है, पहले सुकुन में है और आत्मविश्वास से भरा है. ये सब मीडिया वालो का खड़ा किया हौवा है.

  • 70. 19:53 IST, 18 जनवरी 2011 ajeet kumar:

    क्या पीएम साहब भी कभी आपका ब्लॉग पड़ते है..

  • 71. 20:00 IST, 18 जनवरी 2011 Akshat dwivedi:

    ये सही है पर मेरा मानना है कि राज्य सरकारे भी इसके लिए ज़िम्मेदार है. कृषि बेहतर बनाने के लिए सरकार कदम नहीं उठा रही. उसका कृषि पर नज़रिया ठीक नहीं है.

  • 72. 20:06 IST, 18 जनवरी 2011 ajeet kumar:

    हमारे प्रधानमंत्री को कोई आयना नहीं दिखा सकता और न ही वो किसी की चीख पुकाप सुन सकते हैं. लेकिन आप का लिखा हुआ ब्लॉग ज़रुर पढ़ना चाहिए.

  • 73. 21:02 IST, 18 जनवरी 2011 श्रीमती अरुणा चौहान,पुणे,महाराष्ट्र,�:

    प्रिय रेणुजी, आपका ब्लॉग पढा,हमारी भी समझ से कोसो दुर है वो आम आदमी। आजतक हम मनमोहन जी को एक आंतरराष्ट्रीय स्तर के अर्थशास्त्री मानते थे ,लेकिन उनकी महंगाई के प्रति उपाय योजनाओं को देखते हुए वह सोच ग़लत साबित हो रही है. खाद्य तेलों की कींमतों मे एक साल के भीतर ही 62% की बढोतरी हो चुकी है. और भी दाम बढ़ते जा रहे है. कौन सी चीज के दाम नही बढे? पेट्रोल,अनाज,साक-सब्जीयाँ,कपडे़ ..सब कुछ महंगा होता जा रहा है. आम आदमी कहाँ खो गया है मनमोहन जी. सरकार मे शामिल मंत्री और सांसद और विधायक और कार्यकर्ता मालामाल हो रहे हैं. अगली सात पुश्तो के लिए धन संग्रह कर चुके है. कहाँ है आम आदमी..अगर मिल जाए तो बता देना. इस देश की अर्थव्यवस्था को जो ठीक से समझे ऐसा प्रधान मंत्री की जरुरत है. किस सोच में है प्रधान मंत्री जी ? कम से कम आम आदमी का मज़ाक तो मत उडाईए।

  • 74. 23:15 IST, 18 जनवरी 2011 Rajeev Ranjan:

    भगवान मनमोहन को सदबुद्धी दे जिन्हें पवार, कलमाडी, क्वात्रोची की समृद्धि से शिकायत नहीं है लेकिन आम आदमी की समृद्धि से शिकायत है.

  • 75. 02:54 IST, 19 जनवरी 2011 Dinesh Singh:

    बहुत बहुत धन्यवाद रेणु जी. एक बहुत ही उचित मुद्दा बीबीसी ब्लॉग में उठाने के लिए. आपने बहुत ही अच्छे से लिखा है की प्रधानमंत्री जी आखिर ये आम लोग कौन हैं. कौन हैं जो की आपकी योजनाओं से बहुत ही लाभान्वित हो गए और उनका जीवनस्तर यकायक बहुत ही ऊँचा हो गया. हमें तो अपने पी एम साहब के अदूरदर्शी और अपरिपक्व सोच पर शर्म आती है. क्या कभीं वो दिल्ली आवास से बाहर नहीं निकलते हैं और अगर निकलते हैं तो जरा अपनी आँख खोलकर निकलें. उनको हमारे देश के आम लोग किस जीवन स्तर में रह रहे हैं साफ़ दिख जाएगा. मनरेगा की बात कर रहे हैं, जाकर गावों में पूछें की कितनी बुरी स्थिति है उनके इस कार्यक्रम की. कितना दुरुपयोग हो रहा है इसका. बेचारे १०० दिन की मजदूरी की आस में बैठे हैं और उनको पचास दिन की भी मजदूरी नहीं मिलती. उनसे काम अधिक दिनों का कराया जाता है और पैसे कम दिन के मिलते हैं, वो भी हज़र्रों चक्कर काटने के बाद. मैं गाँव में रहा हूँ और अच्छे से जानता हूँ. मैंने कई मजदूरों से बात भी की थी.
    इनकी अदूरदर्शिता इतनी की इन्होने पांचवे वेतन आयोग के ज़रिये उन सभी लोगों की तनखाव्ह बढ़ा दी जिनके पास पहले से ही नौकरी थी, अच्छी आमदनी थी, और एक अच्छी लाइफ चल रही थी. उनका ख़याल भी न आया जो की बेचारे शिक्षित और अशिक्षित बेरोजगार थे, गरीब थे, मजदूर थे, किसान थे. एक प्रोफेसर जो पहले से 40,000 पा रहा था उसकी तनख्वाह 80,000 कर दी. और जो कुछ नहीं पा रहा था उसकी कोई चिंता ही नहीं. मैं कहता हूँ की अगर इनको थोड़ी भी अकल होती तो उतने बढ़ाये हुए पैसे में ही चार नए युवा लेक्चर्रो या आठ क्लेरिकल स्टाफ या 16 फौर्थ क्लास स्टाफ रख सकते थे. लकिन नहीं बजाय इतने लोगों को रोजगार देने के इन्होने एक ही आदमी की झोली में और पैसे बरसा दिए. कांग्रेस चुनाव में सिर्फ रोजगार को मुद्दा बनाकर आई थी और ये हैं उसकी बेरोजगारी दूर करने की सोच. उतने बढाए हुए पैसे में ही अगर चाहे होते तो कम से कम 20 लाख लोगों को रोजगार दे दिए होते. जो की भ्रष्टाचार , बेरोजगारी और आतंकवाद जैसे समस्यायों को कम करने में मदद करता. जिस किसी के पास अच्छे से खाने, पहनने और रहने को है, वो बन्दूक नहीं उठाने जाएगा. लेकिन इनकी अपरिपक्व योजना ने ऐसे लोगों को मजबूर कर दिया है यही सब करने के लिए. और कहते हैं की आम आदमी की तन्खावाह बढ़ गयी. मैं पूछता हूँ की अगर जीवन स्तर सुधरा तो क्या लोग चावल दाल ही दिन में दस बार खाने लगे? फिर इन चीजों के दाम क्यों बढे हैं. कहते हैं की हमारे देश में ये समस्या है वो समस्या है, मैं कहता हूँ की मेरे देश की एक ही समस्या है वो है आप जैसे पढ़े लिखे और ऊँचे पदों पर विराजमान लोगों की अपरिपक्वता और अदूरदर्शी सोच. ऊपर से आँख बंद करके कहना की सब अच्छा चल रहा है, आम आदमी का जीवन स्तर सुधर गया है.

  • 76. 03:25 IST, 19 जनवरी 2011 Kaushik Yadav:

    बहुत अच्छा रेणु जी, मैं आपका पूरी तरह से समर्थन करता हूँ.अगर हमारे देश की जनता अच्छा खाना खाने लगे हैं तो वो और भी अच्छी बात है. अब इसका मतलब तो ये नहीं है कि आप उसका शोषण करोगें.

  • 77. 08:57 IST, 19 जनवरी 2011 jai kumar jha:

    इस देश में भ्रष्ट मंत्री,सांसद,विधायक,IAS -IPS अधिकारी ,बड़े उद्योगपति तथा इनके चमचे इस देश व समाज का खून चूसकर बढ़िया खा रहें हैं ....अरबों के घर में रह रहें हैं और महंगाई बढ़ा रहें है.........और प्रधानमंत्री के पद पर बैठा व्यक्ति मनमोहन सिंह इनकी सुरक्षा और संरक्षा कर रहा है....शर्मनाक से भी बदतर हालात हैं.....

  • 78. 09:27 IST, 19 जनवरी 2011 gaurav:

    मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ. हमारा देश इसलिए आगे नहीं जा रहा क्योकि हमारे नेता भ्रष्ट हैं. वे यहाँ वहाँ से पैसा बनाते है और कहते रहते हैं कि ग़रीबो की संख्या बढ़ती जा रही है. ये सब झूठी बातें हैं . अगर कोई ग़रीबों की स्थिति देखना चाहता है तो उसे ग़रीबों के बीच जाना चाहिए. मेरा देश ग़रीब की उन्नति के बिना आगे नहीं बढ़ सकता.

  • 79. 09:51 IST, 19 जनवरी 2011 Mohd Amir:

    आपने बिल्कुल सही लिखा है.

  • 80. 10:32 IST, 19 जनवरी 2011 BABLOO YADAV:

    बहुत अच्छा सवाल रेणु जी आपने उठाया हैं, यह सवाल तो हमारे सांसद भी कभी संसद भवन में जाकर नहीं करते हैं, मैं आपका पूरी तरह से समर्थन करता हूँ, साथ में यह कहना चाहता हूँ कि जितना हमारे प्रधानमंत्रीजी अनुमान लगाते है वह सब सही नहीं है, यह तो सब दिखावा हैं, उससे कही ज्यादा गरीबी हम और आप ने देखा होंगा, गरीब लोग तो कभी -कभी खली पेट रात को सो जाया करते हैं, आज भी सोया करते हैं, इस ठंड के मौसम में तो उनके पास कम्बल भी नहीं होगा,कि उसे ओढ़कर चैन से सो सके.
    आज ठंड से सैकड़ो लोग मर रहे है, न जाने ठंड के आने से पहले गरीब लोगो को कम्बल क्यों नहीं बाटे जाते हैं? उन्हें दो वक़्त के लिए जो मनरेगा चलाया जा रहा है, उसमे का 25% तो उनके आला अधिकारी बट्टा कर लेते है!! पर इससे प्रधानमंत्री जी को क्या करना है, उन्हें तो सैर- सपाटा से छुट्टी तो मिलनी चाहिए. सच मानो तो किताबी रट्टा मार लेने से आदमी महान नहीं बन जाता हैं,वो कभी भी लाल बहादुर शास्त्री जैसा नहीं बन पायेंगे , वो और उनके लोग जितना भ्रस्टाचार करने के बारे में सोचते हैं उतना नेक काम के बारे में सोचते तो देश जरूर तरक्की करता.

  • 81. 11:17 IST, 19 जनवरी 2011 Prakash Pankaj:

    रेणु जी से पूरी तरह सहमत होते हुए ... प्रधानमंत्री जी से आग्रह करूँगा कि वो जनता के सामने इन प्रश्नों का उत्तर दें ... जनता को यह जानने का पूरा हक है कि उसका पैसा कहाँ खर्च किया जा रहा है ...
    यदि आप ऐसा नहीं कर पाते तो यह सरकार पूरी तरह से विफल है ...
    राजा सशंकित, प्रजा सशंकित और यह ध्वजा सशंकित,
    सोंचता हूँ देश की धरती, तुझे त्याग ही दूँ ।

  • 82. 12:09 IST, 19 जनवरी 2011 Rajeev Joshi:

    प्रधानमंत्री साहब उन लोगों की बात करते हैं जो इनके भ्रष्टाचार में सहभागी है. कॉग्रेस के लोगों को महंगाई महसूस नहीं होती क्योकि कुछ तुकड़े सब को मिल जाते है. हैरानी है जो आदमी 400 लाख करोड़ घोटाले अपने सामने देख चुका हो वो इस बेशर्मी के साथ ग़रीब जनता का मज़ाक उढ़ाता है उसको शर्म भी नहीं आती और इमानदार होने का ढ़ोंग करता है.

  • 83. 12:33 IST, 19 जनवरी 2011 LAVLEEN K SHARMA:

    भाई प्रोफेसर के भाव 15 लाख, चपरासी का भाव पांच लाख, शिक्षकों की भारी कमाई है पर बिना लेनदेन के नौकरी नहीं दी जाती. सब काम सुरक्षित, कोई रसीद नहीं. सब मिलजुल के खाते है. बेचारे मनमोहन क्या कर सकते हैं, लाचार है.. उनकी नौकरी खतरे में है. कमेंट करने वालो को तो मज़ाक सूझती है. दया करो भाई.

  • 84. 13:15 IST, 19 जनवरी 2011 RANDHIR KUMAR JHA:

    रेणुजी मैं आपके लिखे वाक्यों से सहमत नहीं हुं. ये ज़रुर है कि महंगाई बढ़ी है लेकिन आमदानी भी बढ़ी है. लेकिन इसका मतलब नहीं है कि आमदानी बढ़ने से महंगाई बढ़ी है. लोग आज ज्यादा चीज़ो का उपभोग कर रहे हैं.

  • 85. 18:42 IST, 19 जनवरी 2011 Bhupesh Modi:

    हम लोग एक बेहद लाचार प्रधानमंत्री को देख रहे हैं, जबकि छोटे से छोटा बच्चा भी जानता है कि असली प्रधानमंत्री सोनिया गांधी है. तो इस सब के लिए सोनिया गांधी ज़िम्मेदार है.

  • 86. 11:15 IST, 20 जनवरी 2011 sumant:

    रेणु जी मनमोहन सिंह जी सचमुच मनमोहन है.पहले कही गई बात याद नहीं रखते. सो इतने बड़े अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की टांग खींचा न करे. बाकी आपका लेख बहुत अच्छा है.

  • 87. 11:58 IST, 20 जनवरी 2011 रितेश कुमार :

    प्रधानमंत्री जी को सही जबाब!

  • 88. 14:05 IST, 20 जनवरी 2011 touseef ahmed:

    मुझे रेणु जी की प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी. मैं उन्हें थैंक्स कहना चाहुंगा कि उन्होंने इस तरह का सवाल उठाया और हमें बिल्कुल सरकार से ये सवाल उठाया और हमे बिल्कुल सरकार से ये पूछना चाहिए की कौन है वो आम आदमी

  • 89. 14:15 IST, 20 जनवरी 2011 Siddharth Sharma:

    बहुत खूब लिखा है. मनमोहन जी की माने तो अब महंगाई पर रोक लगाने का बस एक ही तरीक़ा बचा है और वो ये है कि जितने भी लोग जो अच्छा खा रहे है उनके खाने पर रोक लगाई जाए. तभी शायद महंगाई पर रोक लगाई जा सकेगी.

  • 90. 20:29 IST, 20 जनवरी 2011 deepak kumar:

    रेणु जी अपने पूछा की वो आम आदमी कौन है -- मै बताता हूँ आम आदमी वो है जो देश को बेच कर अपना घर भरता है ,ये वो है जो अपना पैसा स्विस बैंक मे रखता है, ये वो है जो खेलो मैं पैसा चोरी करताहै, तो कभी 2जी स्पेक्ट्रम मैं, ये आम आदमी वो है जो देश के सबसे बड़े पद पर होते हुए भी इन सब को छुपाता है... ये कोई और नहीं खुद मनमोहन सिंह जी ही है .
    अब मैं आपका गणना ठीक करता हूँ अपने लिखा है 32 रूपये प्रतिदिन जी नहीं उसका आधा 16 रूपये तो मुखिया जी को चाहिए अब बताइए 16 रूपये मैं क्या कोई महंगाई बढ़ाएगा, ये तो वो बढ़ाते है जो देश मैं बड़े पदों पर होते है. अब आप हमे ये बताइए की मनमोहन सिंह जी के ऊपर प्रतिदिन जनता का कितना पैसा खर्च होता है
    एक नेता पर प्रतिदिन लाखो रूपये खर्च होता है इनका एक बार का भोजन पर लगभग 10,000 रुपए खर्च होता है अब बताइए महंगाई कौन बढ़ा रहा है आम आदमी या ये नेता
    अभी कुछ दिन पहले छठा वेतन आयोग आया तो खूब हंगामा हुआ क्योंकि ये जनता को देना था पर कभी किसी पार्टी ने नेताओं को पेमेंट बढ़ने पर हंगामा किया नहीं क्योंकि उसमे उन्हें खुद भी नुक्सान था.

  • 91. 21:10 IST, 20 जनवरी 2011 nandlal shukla:

    ये सब बेतुक़ी बातें है. केन्द्र सरकार राज्य सरकारों को दोष देती है और राज्य सरकारें केंद्र सरकार को. कोई मंत्री कहता है कि मै अकेले ज़िम्मेदार नहीं हुँ. इसी तरह पहले भी कहा गया था कि दक्षिण भारतीय लोग गेहूं की रोटी खाने लगे हैं इसलिए गेहूं के दाम बढ़ गए है.

  • 92. 21:59 IST, 20 जनवरी 2011 rajesh kumar:

    रेणु जी, ये वो लोग हैं जो संसद में बैठे हैं. ये बहुत ग़रीब हैं सरकार इन्हें बहुत ही रियायती दरो पर खाना मुहैया कराती है संसद की कैंटीन में.
    मनमोहन जी कुछ तो कीजिये.....नहीं कर सकते तो कहिये की सब भगवान भरोसे है.....उटपटांग वक्तव्य तो मत दीजिये....की आप ज्योतिष नहीं है और मालूम नही की मंहगाई कब कम होगी....
    और कुछ क़दम अपने कहने पर भी उठाईएं....आखिर आप प्रधानमन्त्री है सौ करोड़ से ज्यादा लोगों के.

  • 93. 12:07 IST, 21 जनवरी 2011 राम देशवाल:

    प्रधानमंत्री जी ने एक अर्थशास्त्री के रूप में खाद्य वस्तुओं की मूल्य वृद्धि के कारणों का जो विश्लेषण किया है वो उचित प्रतीत होता है ! मैं कोई अर्थ शास्त्री तो नहीं हूँ! लेकिन मैं भी ग्रामीण क्षेत्र में पैदा हुआ एवं पला पढ़ा और जिस परिवेश को मैंने देखा है उसमें ये पाया की जो व्यक्ति या परिवार कुछ वर्ष पहले प्रतिदिन एक रोटी खता था आज दो रोटी खाता है और जो व्यक्ति पहले ही दो रोटी खाता था आज चुप्री हुई खाता है ! कोसों के सफ़र को जो व्यक्ति पैदल तय करता था आज वो उसे साइकिल पर तय करता है और जिस व्यक्ति के पास साइकिल था आज वह स्कूटर का मालिक है ! जो पाठक रेणुजी की टिप्पणी से सहमत हैं मैं उनसे भी अनुरोध करूँगा की वे भी अपने इर्द गिर्द नजर भर कर देखें !निसंदेह हर व्यक्ति और परिवार की आमदन बढ़ी है - लेकिन ये बढ़ोतरी एक सामान नहीं है और नहीं ऐसा हो सकता है , किसी भी समाज में ! हाँ विकास की बढ़ोतरी के अंतर को कम किया जा सकता है इसलिए मैं समझता हूँ कि प्रधान मंत्री की बात को एक नकारात्मक नहीं तो अवांछित दृष्टिकोण से जरूर देखा गया है और उन पर बिना वजह आक्षेप किये जा रहें हैं और रेणु जी भी उसी बहाव में बह गईं हैं.

  • 94. 14:30 IST, 21 जनवरी 2011 Sanjay Dabral:

    बहुत अच्छा लिखा है. आम आदमी दैनिक आजीविका के लिए संघर्ष कर रहा है और हमारे कृषि मंत्री शरद पवार आईपीएल 4 के बारे में सोच रहे हैं. मैं सरकार से यह भी पूछना चाहता हूँ कि जब वे वस्तओं की बढ़ी हुई क़ीमतों के लिए ज़िम्मेदार हैं तो कॉमनवेल्थ और आईपीएल आदि में पैसा क्यों बर्बाद कर रहे हैं.

  • 95. 14:49 IST, 21 जनवरी 2011 YASH PAL UBHAN:

    रेणु जी आप अपनी बात रखने में सफल रही. मुझे ज्यादा कुछ नहीं कहना है क्योंकि समाधान हमारे पास नहीं है. हम सिर्फ शब्दों की जुगाली कर सकते हैं. हमारे नेताओं को चुन कर हम पांच साल के लिए मजबूर हो जाते हैं. उन्हें अयोग्य होने पर वापिस बुलाने का अधिकार जबतक जनता को नहीं मिलता, तब तक ऐसे ही चलता रहेगा.

  • 96. 18:44 IST, 22 जनवरी 2011 ANOOP PANDEY:

    एक दम ठीक लिखा है आप ने रेणु जी.

  • 97. 00:10 IST, 23 जनवरी 2011 ABHISHEK THAKUR:

    मैं चाहूँगा कि ख़ुद प्रधानमंत्री जवाब दें.

  • 98. 05:20 IST, 25 जनवरी 2011 Harish Joshi:

    एक फ़्रांसीसी महारानी ने कहा था कि यदि लोग ब्रेड नहीं खा सकते तो उन्हें केक खाना चाहिए. हमारे नेता भी उसी भाषा में बात कर रहे हैं और ग़रीबों का अपमान कर रहे हैं. उस फ़्रांसीसी महारानी को उसकी प्रजा ने मार दिया था.

  • 99. 10:20 IST, 25 जनवरी 2011 shailendra singh rajawat:

    मनमोहन जी, सिर्फ़ अच्छी बातें कर सकते हैं. बाक़ी वह कुछ नहीं कर सकते.

  • 100. 19:36 IST, 28 जनवरी 2011 devespandey:

    ये ग़रीब लोग वही हैं जिन्होंने मनमोहन सिंह की साफ़ छवि देखकर वोट दिया लेकिन उनकी पार्टी को नहीं पहचान सकी.

  • 101. 23:03 IST, 30 जनवरी 2011 suman (bhopal):

    रेणु जी, आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ. आप जैसे कुछ अच्छे पत्रकार ही इस तरह के मुद्दे उठाते हैं. निश्चित रूप से मैं व्यक्तिगत रूप से आपको धन्यवाद देता हूँ.

  • 102. 18:22 IST, 11 फरवरी 2011 SHIV SHANKER MISHRA:

    आपने बेहतरीन ढंग से हमारे प्रधानमंत्री के सामने बात रखी है.

  • 103. 22:27 IST, 18 फरवरी 2011 Bhooraram Choudhary:

    बहुत ख़ूब लिखा है. मनमोहन जी की मानें तो अब महंगाई पर रोक लगाने का बस एक ही तरीक़ा बचा है और वो ये है कि जितने भी लोग जो अच्छा खा रहे है उनके खाने पर रोक लगाई जाए, तभी शायद महंगाई पर रोक लगाई जा सके.

  • 104. 13:02 IST, 22 फरवरी 2011 Amit kumar:

    काजल की कोठरी में कितना भी सयाना जाए काली राख लग ही जाती है. यही हाल अपने प्रधानमंत्री का है. साफ़ छवि भी दाग़दार हो गई. एक जुमला पीएम के लिए, अच्छे ही नहीं, लायक़ भी बनो.

  • 105. 22:03 IST, 23 फरवरी 2011 अशोक:

    दो टूक लेख के लिए आपको बधाई। मुझे भी पीएम के बयान पर दुख और आश्‍चर्य हुआ। लगता है सब मगन हैं। गालिब ओ मीर की दिल्‍ली देखी देख के हम हैरान हुए। उनका शहर लोहे का बना है फूलों से कटता जाए है।

  • 106. 19:59 IST, 24 फरवरी 2011 KULDEEP BISHNOI:

    लेख अच्छा है पर वह भी बेचारे बंधे हुए हैं.

  • 107. 12:38 IST, 05 मार्च 2011 anand:

    भारत की आर्थकि स्थिति पर बहुत सटीक टिप्पणी है.

  • 108. 10:25 IST, 12 मार्च 2011 Rajniti Kumar:

    क्या ख़ूब लिखा है रेणु जी ने. आख़िर प्रधानमंत्री अच्छे अर्थशास्त्री हैं उनकी बातों पर भरोसा किया जाना चाहिए.

  • 109. 14:29 IST, 17 मार्च 2011 Rohit SAhni:

    मुझे लगता है कि आम आदमी को अपने अधिकार समझने होंगे और उसे भी नींद से जागना होगा.

  • 110. 17:38 IST, 22 मार्च 2011 ramesh jangir:

    आज तक की सबसे असंवेदनशील सरकार जो एक दूसरे प्रकार की एमरजेंसी देश पर थोप रही है. जैसा धीमा ज़हर काम करता है उसी प्रकार यह एमरजेंसी.

  • 111. 20:13 IST, 02 अप्रैल 2011 shafiq ansari - Sarangpur m.p.india:

    रेणु जी, आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ. आप जैसे कुछ अच्छे पत्रकार ही इस तरह के मुद्दे उठाते हैं. निश्चित रूप से मैं व्यक्तिगत रूप से आपको धन्यवाद देता हूँ.

इस ब्लॉग में और पढ़ें

विषय

इस ब्लॉग में शामिल कुछ प्रमुख विषय.

BBC © 2014बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.