एक पाती बापू के नाम
बापू तुमको नागार्जुन याद है? अरे वही यायावर, पागल क़िस्म का कवि जो तुम्हारे जाने के बाद जनकवि कहलाया? वही जिसे लोग बाबा-बाबा कहा करते थे.
उसने तुम्हारे तीनों बंदरों को प्रतीक बनाकर एक कविता लिखी थी. लंबी कविता की चार पंक्तियाँ सुनो,
बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर बापू के
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बंदर बापू के
सचमुच जीवन दानी निकले तीनों बंदर बापू के
ज्ञानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बंदर बापू के
तुमको बुरा लग रहा होगा कि तुम्हारे बंदरों के बारे में ये क्या-क्या लिख दिया. लेकिन तुम्हारे बंदर सचमुच ऐसे ही हो गए हैं. तुम्हारे जीते-जी तो वे तुम्हारी बात माने आँख, कान और मुंह पर हाथ रखे बैठे रहे. लेकिन उसके बाद उन्होंने वही करना शुरु कर दिया जिसके लिए तुमने मना किया था.
देखो ना जिस बंदर से तुमने कहा था कि बुरा मत देखो वह इन दिनों क्या-क्या देख रहा है. उसने देखा कि खेल का आयोजन करने वाले सैकड़ों करोड़ रुपयों का खेल कर गए और देश की रक्षा करने वाले आदर्श घोटाला कर गए.
तुम दलितों के उत्थान की बात करते रह गए लेकिन तुम्हारा बंदर देख रहा है कि एक दलित का इतना उत्थान हो गया कि उस पर एक लाख 76 हज़ार करोड़ रुपए के घोटालों का आरोप लगने लगा.
उसने एक दिन देख लिया कि तुम्हारी कांग्रेस की नेत्री तुम्हारी विशालकाय तस्वीर के सामने एक किताब का लोकार्पण कर रही हैं जिसमें कहा गया है कि वह भी तुम्हारी तरह महान त्याग करने वाली हैं.
वह देख रहा है कि एक दलित लड़की से बलात्कार हो रहा है और जिस पर बलात्कार का आरोप है वह नाम से तो पुरुषोत्तम है यानी पुरुषों में उत्तम लेकिन बयान दे रहा है कि वह नपुंसक है.
और जिस बंदर को तुम कह गए थे कि बुरा मत सुनना वह जहाँ-तहाँ जाकर तरह-तरह की बातें सुन रहा है.
वह सुन रहा है कि देश का प्रधानमंत्री कह रहा है कि महंगाई इसलिए बढ़ रही है क्योंकि आम लोगों के पास बहुत पैसा आ गया है.
संघ याद है ना तुम्हें? वही गोडसे वाला संघ. तुम्हारा बंदर सुन रहा है कि संघ के नेता अब जगह-जगह विस्फोट आदि भी करने लगे हैं जिससे कि मुसलमानों को सबक सिखाया जा सके.
उसने सुना है कि जनसेवक अब बिस्तर पर नहीं सोते बल्कि नोटों पर सोते हैं. वही तुम्हारी तस्वीरों वाले नोटों के बिस्तर पर. दो जनसेवकों ने शादी की और उनके पास 360 करोड़ रुपयों की संपत्ति निकली है.
और वो बंदर जिसे तुमने कहा था कि बुरा मत कहना वह तो और शातिर हो गया है. वह कहता तो कुछ नहीं लेकिन वह लोगों से न जाने कैसी कैसी बातें कहलवा रहा है.
अभी उसने सुप्रीम कोर्ट के जज से कहलवा दिया कि विदेशों में रखा काला धन देश की संपत्ति की चोरी है. कैसी बुरी बात है ना बापू, लोग इतनी मेहनत कर-करके बैंकों में पैसा जमा करें और जज उसे चोरी कह दे?
एक दिन वह नीरा राडिया नाम की एक भली महिला के कान में पता नहीं क्या कह आया कि उसने फ़ोन पर न जाने कितने लोगों से वो बातें कह दीं जो उसे नहीं कहनी चाहिए थीं.
अपनी दिल्ली में एक अच्छे वकील हैं शांति भूषण. न्याय के मंत्री भी रहे हैं. तुम्हारे बंदर ने उनसे कहलवा दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के कितने ही जज भ्रष्ट हैं.
जज को बुरा कहना कितनी बुरी बात है. लेकिन तुम्हारा बंदर माने तब ना. उसने एक और जज से कहलवा दिया कि तुम्हारे नेहरु के इलाहाबाद का हाईकोर्ट सड़ गया है.
लेकिन ऐसी बुरी बातों का बुरा मानना ही नहीं चाहिए. अब दामाद आदि घोटाला कर दें तो इसका बुरा मानकर किसी पूर्व मुख्य न्यायाधीश को किसी पद से इस्तीफ़ा तो नहीं दे देना चाहिए ना?
ऐसा नहीं है कि बापू कि सब कुछ बुरा ही बुरा है. एक अच्छी बात यह है कि तुम्हारे तीनों बंदरों की आत्मा अब भी अच्छी है और अब वह लोकतंत्र के चौथे खंभे में समा गई है.
इसलिए मीडिया या प्रेस नाम का यह स्तंभ अब न बुरा देखता है, न सुनता है और न कहता है. वह सिर्फ़ अच्छी-अच्छी बातें कहता-लिखता है वह भी पैसे लेकर.
तुम नागार्जुन की बंदर वाली कविता पूरी पढ़ लो तो यह भी पढ़ोगे,
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के
बात तो बुरी है बापू लेकिन चिंता मत करो, 30 जनवरी आने वाली है. तुम्हारी पुण्यतिथि. और पूरा देश बारी-बारी से राजघाट जाकर माफ़ी मांग लेगा. तुम भी देखना, टीवी पर लाइव आएगा.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
बहुत अच्छा लेख है. धन्यवाद विनोद वर्मा जी.
छुट्टा घूमें डाकू गुंडे, छुट्टा घूमें हत्यारे,
देखो, हंटर भांज रहे हैं जस के तस ज़ालिम सारे!
जो कोई इनके खिलाफ़ अंगुली उठाएगा बोलेगा,
काल कोठरी में ही जाकर फिर वह सत्तू घोलेगा!
ख्याल करो मत जनसाधारण की रोज़ी का, रोटी का,
फाड़-फाड़ कर गला, न कब से मना कर रहा अमरीका!
बापू की प्रतिमा के आगे शंख और घड़ियाल बजे!
भुखमरों के कंकालों पर रंग-बिरंगी साज़ सजे!
क्या बात कही है आपने सर. इन बंदरों के माध्यम से अपने देश की बड़ी-बड़ी मुख्य बातें कह डालीं. आजकल बापू के आदर्शों पर कौन चल रहा है. कौन उनके बंदरों की बात सुनता है. उनके बंदर बोलते हैं कि कोई एक थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल बढ़ा दो. लेकिन आज अगर कोई एक थप्पड़ मारेगा तो दूसरा उसका ख़ून करने की कोशिश करेगा.
बेहतरीन, दिल को छू गया.
वाह विनोद जी वाह. कितना सुंदर और सच लिखा है आपने हम बीबीसी श्रोताओं के लिए. मालिक आप की और रेणु जी की उम्र एक हज़ार साल करे ताकि हम ही नहीं बाद की पीढ़ी भी आप दोनों के ब्लॉगों को पढ़ कर सच्चे और महान भारत के महान बेईमान नेताओं, अधिकारियों की सच्चाई जान सके आप के द्वारा. बस विनोद जी, इस ब्लॉग में काश आप थोड़ा आज के मौजूदा मीडिया का भी ज़िक्र कर देते तो चार चाँद लग जाते इसमें. इंतज़ार रहेगा अगले ब्लॉग का.
वाह, वाह. पढ़ कर ऐसा लगा मेरे मीडिया के दोस्त के अंदर एक आत्मा है जो सुबक रही है. सावधान रहना, आपको पता नहीं है कि नेता, अधिकारी, पप्पू, नेक्सस क्या करते हैं...भाई, संभल के.
आपके लेख से यह स्पष्ट हो जाता है...नेता, व्यापारी, मीडिया, अधिकारी और पीछे पप्पू भाई...सब नंगे हैं. बिलकुल बेशर्म हैं. आप एक हज़ार बार लिखो. इन की आँखों में शर्म नहीं है. बड़ी शान से साफ़ कुर्ता पहन कर संसद में बैठे रहते हैं.
और सबसे बड़ी ईमानदार जनता इन की जयजयकार करती है. विनोद इतना कठोर मत लिखो, कुछ तो शर्म करो विनोद!
बीबीसी के स्तर के अनुसार एक बेहद उम्दा लेख.
बहुत अच्छा.
निसार मैं तेरी गलियों के ए वतन, कि जहाँ
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहनेवाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले.
यूँ ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़
न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई
यूँ ही हमेशा खिलाये हैं हमने आग में फूल
न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई.
मज़ा आ गया. लिखने वाले ने दिल खोलकर लिखा है वो भी सटीक.
कुपथ-कुपथ रथ जो दौड़ाता, पथ निर्देशक वह है.
लाज लजाती जिसकी कीर्ति से, धृत उपदेशक वह है.
मूर्ख दंभ गढ़ने उठता है शील विनय परिभाषा.
मरण रक्त मुख से देता जन को जीवन की आशा.
जनता धरती पर बैठी है, नभ में मंच खड़ा है.
जो जितना है दूर माही से, उतना वही बड़ा है.
ऊपर-ऊपर पी जाते हैं, जो पीने वाले हैं
कहते ऐसे ही जाते हैं, जो जीने वाले हैं.
जानी वल्लभ शास्त्री की कविता आज सच साबित होती है.
बहुत बहुत धन्यवाद विनोद जी. एक सधे हुए और उम्दा लेख के लिए. जब सुप्रीम कोर्ट निर्णय देती है कि देश के गोदामों में अनाज नहीं सड़ना चाहिए भले ही इसे गरीबों में मुफ्त बाँट दिया जाए. तो प्रधानमंत्री जी कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट को खाद्यान्न वितरण के मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. जब सुप्रीम कोर्ट कहती है कि काला धन देश की संपत्ति की चोरी है इसे उजागर किया जाए तो केंद्र कहता है कि नहीं वह इस पर मुंह नहीं खोलेगी. और जब देश पूछता है कि इतनी महंगाई क्यों है, तो प्रधानमंत्री जी कहते हैं कि आम लोग ज्यादा कमाने लगे हैं और ज्यादा खाने लगे हैं इसलिए महंगाई बढ़ रही है. हमें तो गुस्सा और तरस आता है उनके ऐसे वक्तव्य पर. इससे अच्छा होता कि सभी बड़े मु्द्दों पर सुप्रीमकोर्ट के ही आदेशों माना जाए, बजाय काठ के उल्लुओं को ये अधिकार देने के.
विनोद जी इतने सटीक ब्लॉग के लिए धन्यवाद. मैं जानना चाहता हूँ कि क्या बीबीसी का पीआर डिपार्टमेंट कोई अतिरिक्त प्रयास करता है ये सुनिश्चित करने के लिए कि संबंधित व्यक्ति इनको पढ़े भी. खास तौर पर हमारे प्रधानमंत्री तो हिंदी पढ़ने में दिल्चस्पी नहीं लगती.
सारगर्भित लेख.
विनोद जी,
आपको बहुत बहुत धन्यवाद इस बेहद सटीक और व्यंगात्मक लेख के लिये. आपकी लेखन क्षमता का कायल हो गया हूँ मैं. कृपया इसी तरह लेख लिखते रहे.
क्या बात है आपका ब्लॉग पढ़ा.आपने साबित कर दिया कि हमारा भारत महान नहीं महामहान है.
बहुत बढ़िया लिखा है सर.. आनंद आ गया...पर अफ़सोस की बात है आपने जो लिखा वो गाँधीजी ना तो सुन सकते है ना देख सकते है ना ही उसपर कुछ बोल सकते है...
विनोद जी आपने बंदर को केंद्र में रख कर आज की हालत पर सटीक
टिप्पणी की है. बंदर तो बंदर रहा, मदारी जरुर सिकंदर बन गया.
देख हाल मदारी का,
बंदर का है खेल,
सब कुछ जानकर भी,
मदारी करथ है,
भ्रष्टाचार से मेल
विनोद जी इससे अच्छे व्यंग्य की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता.बहुत ही अच्छी रचना है.जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है.
लाजवाब लेख है आपका. और क्या कहें, बस आप जैसे लोगों कि वजह से ही पत्रकारिता और बीबीसी पर भरोसा है. शुक्रिया इस लेख के लिए.
"इसलिए मीडिया या प्रेस नाम का यह स्तंभ अब न बुरा देखता है, न सुनता है और न कहता है. वह सिर्फ़ अच्छी-अच्छी बातें कहता-लिखता है वह भी पैसे लेकर"
विनोद जी, जितनी तारीफ़ करूं कम है. पर आपके इस लेख के बाद एक गीत की चंद पंक्तियां याद आ रही हैं. माफ़ कीजिएगा उनमें कुछ बदलाव कर रहा हूं.
देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई बापू, कितना बदल गया इंसान
अति उत्तम, बहुत बहुत बढ़िया..... जारी रखिए. अच्छा और सच्चा लिखने वाले कम हैं मगर हैं ज़रूर. ऐसे लेख आर लेखकों को पढ़ने और सराहने वाले भले ही कम हों लेकिन हैं ज़रूर.
बहुत ही उत्तम लिखा है आपने. धन्यवाद. कुछ एक को छोड़ कर बाक़ी सबकी टिप्पणियां पढ़कर भी संतोष और ख़ुशी होती है कि हम सब एक अच्छे, उन्नत, ईमानदार और ख़ुशहाल भारत की इच्छा रखते हैं.
बहुत ठीक कहा, धन्यवाद.
विनोद जी, आपके लिखे सभी वाक्य सही हैं लेकिन इनका कोई मोल नहीं है. इनको पढ़कर देश का कोई भी भ्रष्ट नेता या नागरिक नहीं सुधरने वाला. हमें कुछ ऐसे अगुआ लोगों की ज़रूरत है जोकि इन भ्रष्ट लोगों और भ्रष्टाचार को मिटाने में हमारा मार्ग दर्शन करें. साथ में बीबीसी को चाहिए कि देश को मुक्त कराने का उपाय बताए ने केवल बलॉग लिख कर वाहवाही ले.
विनोद वर्मा जी, आपके इस ब्लॉग ने हरिशंकर परसाई की याद ताज़ा कर दी. बहुत उम्दा क़िस्म की लेखनी है.
बहुत ही अच्छा लिखा है. सच में आजकल के बंदर सिर्फ़ चोर, बेईमान और रिशवतख़ोर की भाषा समझते हैं, चाहे वह आम आदमी हो या नेता.
नागार्जुन के हवाले से बापू के तीन बंदरों पर आपने अच्छी टिप्पणी की है. ख़ासकर इसे समाप्त सही मोड़ पर किया है कि "अब ये तीनों बंदर चौथे स्तंभ में समा गए हैं, अब ये न बुरा देखते हैं, बुरा सुनते हैं, बुरा कहते..."
लेख अच्छा है.
वाह विनोद जी, इस शानदार ब्लॉग के लिए आप वास्तव में बधाई के पात्र हैं. बहुत ख़ूब.
विनोद भाई, ऐसा बढ़िया कम पढ़ने में आता है आजकल. परसाई जी और शरद जी की याद ताज़ा हो गई. इस लेख के लिए एक शेर याद आ रहा है,
"जब भी लिखा क़ातिल को क़ातिल ही लिखा मैंने
लखनवी बन के मसीहा नहीं लिखा मैंने"
लगातार लिखते रहिए. शुभकामनाएँ.
बहुत सही व्यंग्यात्मक टिप्पणी की आपने. पर इन बंदरों को बस तीनों खंभों में ही रहने दीजिए. चौथा खंभा तो बोल भी रहा है, देख भी रहा है और सुन भी रहा है. याद कीजिए नीरा राडिया के मामले की मध्यस्थ को. याद कीजिए, चुनाव के समय के पेड न्यूज़ को. पीपली लाइव ने भी ख़ूब हक़ीकत बयान की थी, चौथे स्तंभ की.
बापू को याद नहीं होगा इन बंदरों के बारे में, जिनके बारे में आपने लिखा है. बापू के तीनो बंदर मिट्टी के थे उस ज़माने में मिट्टी के बंदर और मिट्टी के आदमी ही हुआ करते थे, तभी तो अंग्रेजों को इन माटी के लोगों से काम चल रहा था. विनोद जी आज तो मिट्टी के बंदर क्या जिन ज़िंदा बंदरों को आपने अपने ब्लॉग में जगह दी है वह गांधी के बंदर नहीं हो सकते. ये सब दरअसल नकली गांधी के बंदर हैं जो बदले-बदले नज़र आ रहे हैं. गांधी के बंदर तो भाग गए छत्तीसगढ़ के जंगलों में और तमाम ऐसी जगह जहाँ 'नकली' कम होता है. ये वहाँ भी वही दुहरा रहे हैं- बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, पर उनकी कौन सुन रहा है. कोई उन्हें नक्सली कह रहा है, उनका कोई हक़ ही नहीं तय हो पा रहा है. मिट्टी के बंदर गांधी के आदर्श थे जिससे आदमी संदेश पाता था. पर आपके ब्लॉग ने तो समकालीन भ्रष्टाचार में बापू के बंदरों को शरीक कर दिया है. शायद 'बाबा' को यह एहसास हो गया रहा होगा कि आने वाले दिनों के भ्रष्टाचार के महानायकों का स्वरुप क्या होगा, ये कहाँ कहाँ मिलेंगे. पर पिछले दिनों एक तमाशबीन मदारी 'बंदर और बंदरिया' का खेल दिखा रहा था खेल का विषय गज़ब का था 'राजा'. सो बंदर को राजसी कपड़े पहनाए और बंदरिया को विलायती ड्रेस. नाम दिया था 'महारानी सोनी' और 'महाराज मोहन'. महारानी की घुड़की पर बूढ़े महाराज हिलते-डुलते थे पर फिर बैठ जाते, मदारी मध्यस्थ की भूमिका में सवाल करता राजा से और राजा अपनी महारानी की ओर देखता. महारानी कुछ सोचते हुए 'टूटी-फूटी भाषा' में कहती, मैंने इस बूढ़े महाराज को राज इसलिए नहीं दिया है कि यह जनता की भलाई करें और मदारी से कहती यह अपना काम ठीक से कर रहे हैं. अमीरों को और अमीर, ग़रीबों को और ग़रीब बना रहे हैं. पर बोल उल्टा रहे हैं. यह काम इनसे 'अच्छा' करके कोई दिखाए हमने और हमारे ख़ानदान ने देश के लिए क़ुर्बानी दी है. ये सारे गड़बड़ तो विरोधी कर रहे हैं जिससे देश में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है. महंगाई बढ़ रही है. सारा गड़बड़ उनके बंदरों ने किया हुआ है. ये ज़्यादा खाने लगे हैं, 'मल्टी स्टोरी' में रहने लगे हैं, मंत्री और मुख्यमंत्री बनाने लगे हैं, लिखने-पढ़ने लगे हैं, कुछ रेडियो और अखबारों में आ गए हैं, पहले तो पेड़ों की डालियों पर लटक के काम चला लेते थे आख़िर महंगाई तो बढ़ानी ही पड़ेगी. भ्रष्टाचार, छिना-झपटी, दुराचार और आतंक ये सब इन्हीं की देन तो है. बापू ने हनुमान को लंका जलाते हुए देखा होता तो उनके 'खानदानियों' को अपने 'उसूलों का अम्बेसेडर' कदापि न बनाते.
विनोद जी, बहुत अच्छा लिखा है. आज के समय में बापू की याद इन बंदरों के बहाने करना अच्छा लगा. कथित विकास को समय समय पर परखना चाहिए.
सटीक और प्रासंगिक, 30 जनवरी के लिए. माननीय प्रधानमंत्री से इस निवेदन के साथ कि आगामी बजट सत्र में मूल्य बृद्धि के बजाय इसी विषय पर चर्चा की जाए. शायद देश का कुछ भला हो जाए. कम से कम मुझे तो ऐसा लगता है.
वाकई सर, लेख ज़ोरदार है. पर बदलाव नज़र नहीं आता आख़िर क्यूं ?
बहुत अच्छा है.
बहुत ही उम्दा लेख विनोद जी.
विनोदजी आपका यह व्यंग्य स्वस्थ एवं सटीक है. प्रतिमान भी आपने अच्छे चुने हैं. बाबा नागार्जुन की पद्यमयी बातों का यह गद्यमयी समसामयिक विस्तारण है. कुछ लोग कहते हैं कि यह सब कहने सुनने में ही अच्छा लगता है, इससे कुछ होता-जाता नहीं. परन्तु मेरा मानना है कि कुछ यदि विराट न भी हो फिर भी कहना-सुनना चाहिए. साहित्यकार ऐसी बातों से लोगों के सीने में धीरे-धीरे बारूद भरता है और फिर हमीं में से ऐसा कोई निकललेगा जो डंके की चोट पर उस में माचिस लगा एक नई क्रांति का बिगुल फूँकेगा. विनोदजी यह ऊर्जा आप अपने भीतर बनाए रखिए. ऐसे व्यंग्यात्मक लेख के लिए साधुवाद.
ये तीनो बंदर अब सरकार के अंदर ही हैं. और मज़े कर रहे हैं. और अब तो कई बंदरिया भी आ गईं होगी इनके सुर में सुर मिलाने. अच्छा प्रहार . लेकिन कोई असर हो तो बात बने. ये सरकार वाकई में ढीठ है,
सच पूछो तो कछुए की पीठ है.
ओ भाई विनोद, तेरे कू मालूम होने को माँगता कि जिनके बारे में तू लिखा है न, यह लोग 10-20 पप्पूभाई पाल के रखते हैं. तेरे कू क्यों पड़ी है सच्चाई की बात लिखने की...यह नेक्सस कातिल है, नज़र की कातिल. इनकी नज़र तेरे पे पड़ गई तो ख़ैर नहीं. लिखना ही था तो जलेबी की तरह गोल-मोल लिखता भाई.
सच पूछो तो आपने बुरा देख लिया, सुन लिया और बोल भी दिया...आज के भारत में सच बोलना सबसे बुरी बात है.
वाह,गाँधीजी के बन्दरों को अब क्या कहें जिनमें कुछ पता ही नहीं चलता कि कौन सत्य के करीब है और कौन असत्य के करीब, इसे नाटक कहें दोअर्थी मजाक जिसमें बुराई को अनदेखा कर उसके प्रति आँख,कान व मुँह को बंद रखने की सलाह दी गई है अथवा उसमें सुधार व अच्छाइयों की उम्मीद की गई है और वह भी 'बन्दरों' से !
ग़ज़ब का लेख है. धन्यवाद.
लेख तो बहुत अच्छा है विनोद जी, लेकिन इसमें नया क्या है. एक भाईसाहब आपकी हज़ार साल उम्र की कामना कर रहे हैं ताकि उन्हें यह मज़ेदार ब्लॉग पढ़ने को मिलते रहें. ठहरिए! क्या यह ब्लॉग मनोरंजन का साधन बन गया है. ऐसा हुआ तो इसलिए हुआ क्योंकि इसमें व्यंग्य था. कटाक्ष और तीखापन नहीं. कृपा कर के ब्लॉग में सिर्फ़ सवालों और व्यंग्य के अलावा कटाक्ष, सुझाव भी लिखें.
आपकी लेखनी लाजवाब है विनोद जी ! बड़ा ही सटीक व्यंग्य है.
बहुत ही अच्छा लिखा है.
विनोद जी, सत्ता के लालची लोग अपने हित साधने में इतने अंधे हो गए हैं कि उन्हें सत्ता में बने रहने के लिए कुछ भी करना ग़लत नहीं लगता. इन लोगों ने गांधी जी के बंदरों को क़ैद करके, उन्हें सम्मोहित करके उनकी आत्मा की जगह किसी शैतान की आत्मा डाल दी है. अब ये लोग जैसा चाहते हैं वैसा बंदरों से करवा रहे हैं. लेकिन अब लगता है कि बंदरों का सम्मोहन जल्दी ही ख़त्म होने वाला है इसके बाद लोगों के सामने सच आना शुरु हो जाएगा.
विनोद जी, बहुत सटीक लिखा है आपने. आज गांधी के बंदरों की नहीं बल्कि गांधी के लंगूरों की ज़रुरत है जो देश के भ्रष्ट और सरकारी खज़ाने को लूटने वाले सियासी बंदरों और लालफीता शाही में जकड़े लोगों को देश के बाहर खदेड़ सकें जो देश की जनता की गाढ़ी कमाई को काली कमाई में बदलने में लगे हुए हैं.
बहुत खूब कहा विनोद जी. साधुवाद!!!
विनोद जी, ये लेख कांग्रेस, भाजपा और मीडिया वालों को भी भेज दीजिए. शायद उन्हें थोड़ी शर्म आ जाए.
लेखक ने बहुत अच्छे ढंग से वर्तमान भारतीय राजनीति का विवरण पेश किया है.
आपकी सारी बातें अच्छी हैं लेकिन इसे भारत के नागरिक समझते कहाँ हैं? मेरा देश एक ऐसा देश है जहाँ भारत तो जागता रहता है लेकिन नागरिक सोते रहते हैं और सहते रहते हैं कि उन्हें क्या करना. मेरा भारत महान पर यहाँ के नेता???
अति उत्तम. एकदम सच.
लेखक ने बहुत अच्छे ढंग से विवरण पेश किया है.
विनोद जी, आपने जनभावनाओँ की सटीक अभिव्यक्ति की है. बाक़ी लोगों ने इतना कह दिया है कि मेरे लिए कुछ कहने को अब बचा नहीं है.
एकदम सही बात लिखने के लिए साधुवाद.
"जब कभी बोलना वक्त पर बोलना, मुद्दतों सोचना, मुख़्तसर बोलना
डाल देगा हलाक़त में इक दिन तुझे, ऐ परिंदे तिरा शाख पर बोलना"
ताहिर फ़राज़ के इस शेर को आपने जी लिया है. बधाई, अदम गोंडवी की सी बेबाकी आपने दौरे दौरां की तर्जुमानी की है, उसके लिए बहुत बधाई.
पहली बार आपका लेख पढ़ा और लगा जैसे मैं जो बोलना चाहता हूं, वो आपकी क़लम से निकल रहा है. वैसे हर हिंदुस्तानी यही शिकायत लेकर बैठा है कि कोई सुन ले. लेकिन शायद व्यवस्था, सरकार और नेता, आप जो भी नाम दें, सब बहरे हो चुके हैं और अब उन तक आवाज़ पहुँचाने का क्या एक ही ज़रिया बचा है, जिसने भारत को छोड़कर कई मुल्कों को सही राह पर लाकर खड़ा कर दिया.
विनोद जी, बहुत अच्छा लिखा है. आज बाबू होते तो इस देश को देखकर उन्हे बहुत दुख होता वे यही सोचते कि क्या यह वही देश है जिसे उन्होंने सपनों का भारत कहा था.
बंदरों से जैसे जैसे सम्मोहन ख़त्म होता जा रहा है उसका असर धीरे-धीरे दिखाई देने लगा है. लोगों ने दूसरे रास्तों से हिसाब बराबर शुरु कर रहे हैं. इसकी शुरुआत नेपाल में हो गई है. क्या करें मजबूर होकर ये क़दम उठा रहे हैं क्योंकि क़ानून पर से भी लोगों का भरोसा उठता जा रहा है.
काफ़ी साफ़ सुथरा लिखा है. साधुवाद. अगली बार आपको काले धन पर लिखना चाहिए. ऐसा लगता है कि काले धन से तो कोर्ट का बाप भी हार जाएगा.
क्या कहूँ? मेरे हिंदुस्तान को लूटने में सब लोग शामिल हैं.
विनोद जी बहुत खूब लिखा.
वाह विनोद जी. बिना लाग लपेट कर लिख डाला है कि राष्ट्रपिता की सीख से कैसी सीख ली है देश ने. वक़्त के हिसाब से सब बंदर हैं और अपना फ़ायदा देखते हुए अपने हिसाब से देखना, सुनना और बोलना शुरु कर देते हैं.
तीन बंदरो वाली बात तो गाँधी ने यूँ ही लोकप्रियता पाने के लिए कही थी. वरना स्वयं गाँधी भी कुछ इन लोगों से कम नहीं थे. क्यों भारतीय भूलते हैं कि उन्होंने ही देश को विभाजित किया, सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए जो धन मिला वह केवल गुजरात पर लगा दिया, पूना-पैक्ट के तहत तथाकथित शूद्रों के अधिकार छीने. फिर क्यों हम गाँधी को हमेशा एक महान व्यक्तित्व प्रदर्शित करते हैं?
जब ख़ुद ही नहीं मान सकते तो दूसरों को क्या मना लोगे? आज अगर गांधी जी ज़िंदा होते तो अपने वारिस कहलाने वालों के ढोंग पर दुखी होते.
विनोद जी खूब लिखा है आपने ! सचमुच कहाँ गए वो दिन ,वो लोग ? क्या फिर से ऐसा युग आयेगा ,ऐसे लोग आयेंगे ? हाँ कभी - कभी तो लगता है कि जिस तरह से पाषाण युग से अब तक का सफ़र हम सबने अपने करीबी आनुवंशिकों से किया है वैसे ही अब समय का विपरीत चक्र चले तो बापू के बंदर मिलने चाहिए ? धीरे -धीरे यह घडा भरता तो जा रहा है ! हर अच्छे बुरे काम काज की समय सीमा इश्वर ने निर्धारित की है ! इंतज़ार है कुछ अच्छा घटित हो !!
गांधी जी महान नहीं तो क्या अपनी ही मूर्तियाँ बनवाने वाली मायावती महान हैं?
शुक्रिया.
आज अगर गाँधी ज़िंदा होते तो गुजरात एक अलग राष्ट्र होता और उसके प्रधानमंत्री न होते हुए भी मोदी जैसों के मार्ग दर्शक बनते जैसे कि जवाहर लाल के थे और भारत का विभाजन करवा दिया था.
बहादुर सिद्ध जी मायावती तो कुछ बनवा ही रही है वह गाँधी की तरह राष्ट्र का विभाजन तो नहीं किया, किसी समाज के अधिकारों का हनन तो नहीं किया. भाजपा की तरह बाबरी मस्जिद तो नहीं तोड़ी.
राहुल गाँधी यह कहलवाने में गर्व महसूस करते है कि वो किसी गरीब के घर टूटी हुयी चारपाई पे बैठकर खाना खाया. राहुल गाँधी या कोई और ये नहीं सोचने कि ज़हमत उठाता कि आज़ादी के ६४ वर्ष पश्चात भी इस राष्ट्र में कोई इतना गरीब कैसे बचा हुवा है. मेरे दोस्त एक एक बात पर गहन चिंतन करना कि क्यों मायावती को बहुजन समाज के भुला दिए गए महापुरुषों के यादगार स्थल बनवाने कि आवश्यकता पड़ी. एक और बात पर विचार करना मेरे दोस्त कि क्यों सम्पूर्ण राष्ट्र में केवल गाँधी परिवार के नाम से ही कितनी ज़मीन पर अनावश्यक रूप से कब्ज़ा कर रखा है.
यह टिप्पणी आज के युग में बहुत तर्कसंगत है जबकि भारत में भ्रष्टाचार, बलात्कार और अपराध ज़रूरत बन चुके हैं.
बार-बार एक ही बात क्या लिखूं सर। आपकी लेखनी का कायल हूं। जिस तरह से आप चीजों को जोड़ते हैं वह वाकई काबिले तारीफ़ है।
गांधीजी के आदर्शों को हम सभी भूल रहे हैं. उन्होंने अपने बंदरों के जरिए हमें संदेश दिया था- न बुरा देखो, न बुरा सुनो और न बुरो करो. हमें उनके आदर्शों का पालन करना चाहिए.
आपने बहुत अच्छा लेख लिखा है और इस से सारे देश की कहानी बयान होती है. धन्यवाद.
ये सारे तथ्य एकदम सही हैं.
आपका धन्यवाद! इतना अच्छा व्यंग लिखने के लिए. विनोद जी बात ये है की. हमारी सरकार, पत्रकार, सेवक और हमारे अति प्रिय नेताओं ने गाँधी के किसी भी बन्दर को अपने आस-पास भटकना बेहतर नहीं समझा. लेकिन यकीन जानिए वो गाँधी से बहुत प्यार करतें हैं तभी तो आज हमारी सरकार, नेता, सेवक सभी गाँधी को अपने तश्रीफ़ के साथ लटक रहे पर्स के अलावा स्वित्ज़रलैंड के अति सुरक्षित बैंक में रखने का फैसला किया है. लेकिन ये तीनो बन्दर गाँधी को हिंदुस्तान वापिस लाना चाहतें हैं. और बंदरों का गाँधी से यही प्यार वय्स्था के ऊँचाई पर बैठे जनाबों के लिए दिक्कत पैदा करने लगी है. गाँधी के तीनो बंदरों का जय हो.
आप से गंभीरता की उम्मीद रहती है रेहान जी और व्यंग्य कभी गंभीर नहीं होता.