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क्या सब्र का पैमाना छलक रहा है?

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|मंगलवार, 01 फरवरी 2011, 17:26 IST

छत्तीसगढ़ में अपह्रत पाँच पुलिसकर्मियों के परिजनों ने ख़ुद जंगल में जा कर उन्हें तलाश करने का बीड़ा उठाया.

आरुषि के पिता राजेश तलवार पर भरे अदालत परिसर में एक युवक ने हमला कर उन्हें लहूलुहान कर दिया.

इसी युवक ने कुछ समय पूर्व रुचिका गिरहोत्रा मामले में अभियुक्त एसपी राठौर पर भी हमला किया था.

कुछ समय पहले नागपुर में महिलाओं ने बलात्कार के दोषी युवक पर ताबड़तोड़ हमला कर उसे जान से मार दिया.

दिल्ली में चोरी करते पकड़े गए एक व्यक्ति पर भीड़ ने हमला किया और उसे इतना पीटा कि वह मरते-मरते बचा.

इन सब मामलों में एक ही बात समान है और वह यह कि लोगों ने क़ानून अपने हाथ में लिया या फिर यह कि उनका क़ानून और सुरक्षा व्यवस्था पर भरोसा नहीं रहा.

सवाल यह नहीं है कि इन लोगों की कार्रवाई जायज़ थी या नाजायज़.

सवाल यह भी नहीं है कि जिन लोगों पर हमला हुआ या जिन्हें निशाना बनाया गया वे दोषी थे या निर्दोष.

सवाल यह है कि लोगों में यह भावना क्यों पैदा हो रही है कि इंसाफ़ नहीं हो पाएगा और वे सज़ावार को ख़ुद सज़ा देने की पहल करें.

सवाल यह भी है कि लोगों का धैर्य क्यों चुकता जा रहा है.

क्या लंबी अदालती कार्रवाई की वजह से? क्या उनकी सहायता के लिए तैनात पुलिस की लापरवाही की वजह से? या फिर इस वजह से कि उनके सब्र का बाँध टूट चुका है और उन्हें आशा की कोई किरण नज़र ही नहीं आ रही है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 18:15 IST, 01 फरवरी 2011 Ebad Ali Khan, Jamshedpur :

    इसी तरह की घटनाओं के चलते लोगों का विश्वास व्यवस्था से उठता जा रहा है. आगे क्या होगा खुदा मालिक है. भारत के लोगों को कोई भी ज़ुल्म सहना पड़े उनकी प्रतिरोध की क्षमता जवाब दे चुकी है. कुछ भी होने पर दो चार दिन हो हल्ला होता है और फिर जैसे कुछ हुआ ही नहीं है. आये दिन कोई न कोई इसी तरह की घटना होती ही रहती है. यहाँ के लोग चुप चाप रहते हैं प्रतिरोध के लिए बीबीसी को कदम उठाना पड़ता है कि कहीं न कहीं सुगबुगाहट हो. नहीं तो मेरे ऐसे संवेदनशील लोग टिप्पणी ही लिख कर अपने दिल कि भड़ास तो निकल लें. सलमा जी आप को इस पहल के लिए धन्यवाद.

  • 2. 19:16 IST, 01 फरवरी 2011 kaushal kishore:

    सलमा जी, बहुत सटीक लेख है. सच यही है कि लोगों का व्यवस्था से भरोसा उठ चुका है. आम व्यक्ति की भावनाओं की प्रस्तुति करने के लिए शुक्रिया.

  • 3. 19:23 IST, 01 फरवरी 2011 shabeeh rizvi:

    सलमा ज़ैदी जी, आज इस समाज में कुछ भी हो रहा है...सब प्रशासन की ग़लती नहीं है. यह भ्रष्टाचार किसी एक से नहीं ख़त्म होगा. इसमें सभी का आगे आना पड़ेगा नहीं तो इसमें निर्दोष ही फंसते हैं.

  • 4. 19:30 IST, 01 फरवरी 2011 naveen:

    अब लोगों को चारों तरफ़ से परेशानी हो रही है और भारत के नेता ख़ुद की जेबें भर रहे हैं. तो आम जनता के पास अपनी खिन्नता उजागर करने का यह आसान रास्ता है.

  • 5. 21:36 IST, 01 फरवरी 2011 himmat singh bhati:

    सलमा जी, जब आदमी चारों तरफ़ से हताश और निराश हो जाता ैह तब न्यायालय की तरफ़ देखता है और वहाँ जब तारीख़ों पर तारीख़ें मिलती हैं पर न्याय नहीं मिलता तब लोगों का नाराज़ होना लाज़मी है. जबकि ग़लत कारनामे करने वाले मौज मस्ती करते रहते है तो लोगों को बुरा लगता है. इस महंगाई के ज़माने में घर परिवार चलाना बहुत मुश्किल हो रहा है. ऐसे में कोई अचानक आपकी गाढ़ी कमाई धोखे से सबके सामने ले लेता हो तो भावावेश में आदमी कुछ कर बैठता है. सलमा जी, एक बात आपको बता दूँ कि मैं न्याय पाने के लिए 1991 से आज तक इंतज़ार कर रहा हूँ . मामला हाई कोर्ट में है. पर जब कभी फ़ैसला होगा तो सरकार का वह विभाग सुप्रीम कोर्ट तक जाएगा और वहाँ कब तक फ़ैसला होता है, पता नहीं मैं तब तक ज़िंदा रहूँगा भी या नहीं. पर मुझ पर आश्रित रहने वालों को यह नहीं लगता कि न्याय कैसे मिलेगा. उनका विश्वास न्यायालय से उठ गया है. यह बात और है कि वे छोटे न्यायालयों से आगे जा ही नहीं पाते पैसों के अभाव में. यही कारण है कि लोगों का सब्र टूट रहा है. ऐसा और होता रहा तो कोई बड़ी बात नहीं.

  • 6. 22:54 IST, 01 फरवरी 2011 achintya kumar:

    किसकी सरकार और कैसी क़ानून-व्यवस्था? मुझे तो अपना देश सोमालिया से भी बदतर दिख रहा है.

  • 7. 03:31 IST, 02 फरवरी 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    सलमा जी, शानदार लिखा है आपने लेकिन कोई असर नहीं होगा क्योंकि सब चोर-बेईमान हैं. जिस देश में कोई क़ानून-व्यवस्था नहीं है उस देश में यही होगा. बचीखुची कसर बीबीसी पूरी करने जा रही है. मार्च में बीबीसी रेडियो को बंद कर नेताओं और बेईमान लोगों का समर्थन करने जा रही है.

  • 8. 10:55 IST, 02 फरवरी 2011 satyendra kumar jha:

    अब लोगों को चारों तरफ़ से परेशानी हो रही है और भारत के नेता ख़ुद की जेबें भर रहे हैं. इसी तरह की घटनाओं के चलते लोगों का विश्वास व्यवस्था से उठता जा रहा है. सलमा जी, शानदार लिखा है आपने. धन्यवाद.

  • 9. 11:23 IST, 02 फरवरी 2011 BHEEM SINGH:

    एक बात तो पक्की है, जुर्म करने वाले और देश के टुकड़े करने वाले लोगों को सरकारी तंत्र सिर्फ़ सुरक्षित जगह ही देगा. आम आदमी के मामले में कार्रवाई हो सकती है, उन्हें सज़ा भी हो जाएगी. ऐसी स्थिति में यहाँ मिस्र जैसे हालात पैदा हो जाए तो आश्चर्य की कोई बात नहीं.

  • 10. 11:29 IST, 02 फरवरी 2011 सुन्दर सिंह नेगी दिल्ली-रानीखेत उत्त�:

    जी बिल्कुल सही कह रही हैं आप. अब लोगों का सब्र टूट रहा है हर क्षेत्र मे, जैसे बीबीसी ने अपना सब्र तोड़ा उन तमाम लोगों पर जो सुदूर गाँवों मे रहकर बीबीसी सुनते हैं. लेकिन सलमा जी अब देखने वाली बात यह होगी कि गांवों मे रहने वाले वो लोग किस पर अपना सब्र तोड़ते हैं. मै तो बस यही कहूंगा कि बीबीसी कभी तमाम लोगों की जिंदगी में शामिल था, अब वेबफा हो जाएगा. लेकिन मुहब्बत में बेवफ़ाई सही नहीं जाती. और हो सकता है की बीबीसी की इस बेवफाई का असर अब नफ़रत मे ही न बदल जाए क्योंकि हो सकता बीबीसी भविष्य मे इन्टरनेट के जरिये भी हमारे साथ बेवफाई कर दे और अपना सारा रिश्ता तोड़कर वापस लंदन चला जाए.

  • 11. 12:01 IST, 02 फरवरी 2011 vikas kushwahaKanpur.:

    मैंने खुद ये अनुभव किया है कि पुलिस कोई काम को ठीक से करती ही नहीं उल्टा आपको ही फंसा देगी. कानपुर का दिव्या कांड इसका उदाहरण है.

  • 12. 13:30 IST, 02 फरवरी 2011 Sheo shankar Pandey:

    सलमा जी, यह स्थिति व्यवस्था और जनतंत्र के विफलता की स्वाभाविक परिणति है.

  • 13. 13:55 IST, 02 फरवरी 2011 Prakash Choudhary:

    अब क़ानून से लोगो का भरोसा खत्म होता जा रहा है. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है न्याय में देरी का होना. बात भी सही है कि आम आदमी की पुलिस में एक शिकायत दर्ज करवाने में हालत ख़राब हो जाती है. जिनके पास जुगाड़ है वे काम को मिनटों में करवा लेते हैं. जब न्याय नहीं मिलेगा तो लोग क़ानून को हाथ में ही लेंगे, इसका ताज़ा उदाहरण मिस्र है.

  • 14. 13:56 IST, 02 फरवरी 2011 Bhim Kumar Singh:

    आपने कुछ उदाहरण दिए हैं. कुछ उदाहरण मैं भी देता हूं. विनायक सेन को एक ऐसे मामले में आजीवन करावास की सज़ा मिली है, जिस पर गौर करने पर संदेह होता है. दूसरी ओर ए राजा के मंत्रालय पर सीएजी ने 1,76,000 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप लगाया है. उनसे इस्तीफ़ा ले लिया गया है, लेकिन वे अब भी सामान्य जीवन जी रहे हैं. देश में भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाले मुख्य सतर्कता आयुक्त पर एक आपराधिक मामला चल रहा है, जिन्हें बचाने के लिए सरकार बचकाना तर्क दे रही है. अब आप ही बताएं ऐसी स्थिति में कानून व्यवस्था पर भरोसा कायम रह पाना कैसे संभव है. आपको याद होगा सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने हाल ही में चिंता जताई थी कि ख्याति प्राप्त इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है. इस तरह के हालात में आम आदमी का सब्र तो टूटेगा ही.

  • 15. 20:34 IST, 02 फरवरी 2011 braj kishore singh:

    सलमा जी यह भले ही कटु हो लेकिन सत्य है कि भारत की जनता का व्यवस्था पर से विश्वास उठ गया है और अगर समय रहते इसकी बहाली के लिए प्रयास नहीं किए गए तो देश अराजकता का शिकार हो सकता है. जो स्थिति इन दिनों मिस्र में है वही स्थिति भारत में भी उत्पन्न हो सकती है.

  • 16. 22:35 IST, 02 फरवरी 2011 SHAHNAWAZ ANWAR SINTU, MUNGER,(BIHAR):

    सलमाजी आपने जितने भी मामलों का उल्लेख किया है, वो सब्र का पैमाना निर्धारित नहीं करते बल्कि यूं कहिए कि जुल्म और ज्यादतियाँ काफ़ी बढ़ गईं हैं. इन हालात में भला लोगों को सब्र कहाँ तक कायम रह सकता है.

  • 17. 22:42 IST, 02 फरवरी 2011 syed afaq ahmad:

    पब्लिक का पुलिस में विश्वास नहीं रह गया है. अदालत में जाना बहुत महंगा है. हर आदमी वकील की फीस भी नहीं दे सकता और फिर न्यायिक प्रक्रिया लंबी है, ऐसे में आदमी करे भी तो क्या, वो तुरंत कार्रवाई कर संतुष्टि प्राप्त करने के लिए ऐसे क़दम उठाता है.

  • 18. 20:17 IST, 03 फरवरी 2011 himmat singh bhati:

    सलमा जी, कुछ साल पहले बीबीसी ने कहा था कि श्रोताओं या पाठकों के कोई भी सवाल हो तो वे पूछें और उनका जवाब कोई नेता या अधिकारी न दे कर राजनीतिक सलाहकार योगेंद्र यादव देंगे. इस पर मेरे सवाल के जवाब में योगेंद्र जी ने कहा था कि कोई भी क़ानून जनता की हिफ़ाज़त के लिए होता है उसके शोषण के लिए नहीं. पर जनता जो चाहे वही होगा. जनता से बड़ा कोई न्यायालय नहीं है. लेकिन सच तो यह है कि अकेले कुछ भी नहीं होता है और ईमानदार आदमी अंत में थकहार कर हार मान लेता है. आज जो हो रहा है वह चारों ओर से हताश और निराश होने के बाद हो रहा है क्योंकि क़ानून बहुत महंगा है और सब की पहुंच के भीतर नहीं है.

  • 19. 21:55 IST, 03 फरवरी 2011 Narinder:

    सलमा जी, आपने बहुत सही बात कही है. लोग वैसे ही बहुत हताश हो रहे हैं और क़ानून-व्यवस्था में सुधार के लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा है. इसीलिए लोग क़ानून अपने हाथ में ले रहे हैं और न्याय या अन्याय कर रहे हैं. यही सब कुछ मिस्र और ट्यूनिशिया में भी हो रहा है. आप कोई भी अख़बार उठाइए या टीवी चैनेल देखिए उसमें भ्रष्टाचार और घोटालों की ख़बरें छाई रहती हैं. किसी के भी धैर्य की एक सीमा होती है और मेरे विचार में वह ख़त्म होने के कगार पर आ गई है.

  • 20. 20:06 IST, 04 फरवरी 2011 himmat singh bhati:

    सलमाजी लोग सरकारी अधिकारियों की मदद से जनता का पैसा हजम कर रहे हैं. लेकिन सरकार ठगे गए लोगों की मदद नहीं कर रही है. लोग हताश हैं, पुलिस से उसे कोई मदद नहीं मिल रही है और न ही सरकार से. और ये लोग अपना काम खुले आम कर रहे हैं.

  • 21. 11:54 IST, 05 फरवरी 2011 PRAVEEN SINGH:

    सलमाजी जिनको आप जनप्रतिनिधि लिखते हैं और जिन्हें आप नेता मानते हो,मेरा मानना है उनमें से अनेक लोग चोरों की बारात के सदस्य हैं. भारत में 80 फ़ीसदी लोग बेचारे बन के जीते हैं,10 फ़ीसदी चमचे बन के मौज करते हैं और बाकी के सरकारी मशीनरी का हिस्सा बनकर घोटालों का हिस्सा बन जाते हैं. पत्रकार लोग इसकी खिचड़ी पका पका कर इसका आनंद उठाते हैं.

  • 22. 00:27 IST, 07 फरवरी 2011 ram vilas maurya:

    क्या भारत में नौकरशाह और राजनेताओं का मकसद केवल भ्रष्टाचार करना है.

  • 23. 07:03 IST, 07 फरवरी 2011 Dr.Lal Ratnakar:

    सलमा जी जो बात आप कहना चाह कर भी नहीं कह पा रही हैं वह यह है "आज हम दानव हो गए हैं इन्सान के भीतर आदमी मर चुका है जिन्दा है केवल और केवल हैवान." इस देश की अदालत पुलिस और सियासत एक ही चीज के इर्द गिर्द घूम रहे हैं कि कहीं आम आदमी हमारी जगह 'न' पहुँच जाए और उसे रोको, उसे रोकने का सबसे आसान तरीका है 'भ्रष्टाचार'. इसीलिए ये पंक्तियाँ याद आती हैं - जाके पाँव न फटी बिवाई, ओ क्या जाने पीर पराई. इस मुल्क के अदालत पुलिस और सियासत दा यही कर रहे हैं.

  • 24. 23:33 IST, 12 फरवरी 2011 AKHILESH SHARAN:

    वास्तव में यहां लोगों ने देखा है कि कभी-कभी या आप कह सकते हैं कि ज़्यादतर गुनहगारों को सज़ा नहीं मिलती है. वजह चाहे कुछ भी हो जनता तो सिर्फ़ इंसाफ़ मांगेगी ना. और कई ऐसे भी मामले हैं जिनकी शुरुआत तो हुई लेकिन अभी तक नतीजा सामने नहीं आया और बंद भी हो गया. ऐसे में इंसान का सब्र टूटना लाज़मी है.

  • 25. 16:39 IST, 14 फरवरी 2011 Kamlesh Jha:

    लोगों के सब्र का पैमाना छलक रहा है. आपने जो कारण गिनाए हैं इसमें वे सब शामिल हैं. जिस दिन इस देश की जनता को सही नेतृत्व मिल जाएगा यहाँ के हालात भी बदल जाएँगे.

  • 26. 20:12 IST, 20 फरवरी 2011 cdas:

    कुछ नई बात कीजिए न.

  • 27. 19:49 IST, 28 फरवरी 2011 parvez alam:

    सलमा जी उक्त घटना से एक बात तो साफ़ है कि अब अवाम को न्यायलय की लेट लतीफी ने ही गलत कदम उठाने को मजबूर कर दिया है अब जनता सही समय पर सही रिजल्ट चाहती है सवाल यह नहीं की चाक चौबंद कैसे है सवाल यह की सब कुछ होने के बावजूद भी लोग इतना लापरवाह कैसे हो गए हैं.

  • 28. 19:16 IST, 09 मार्च 2011 tejwani girdhar:

    सलमा जी, लोगों का व्यवस्था से भरोसा उठ चुका है.

  • 29. 13:38 IST, 10 मार्च 2011 mukesh shnakar bharti:

    अगर हम मिल कर काम करें तो स्थिति पर नियंत्रण पाया जा सकता है.

  • 30. 08:43 IST, 22 मार्च 2011 आशुतोष मालपानी:

    इसी तरह की घटनाओं के चलते लोगों का विश्वास व्यवस्था से उठता जा रहा है. भारत के लोगों को कोई भी ज़ुल्म सहना पड़े उनकी प्रतिरोध की क्षमता जवाब दे चुकी है. कुछ भी होने पर दो चार दिन हो हल्ला होता है और फिर जैसे कुछ हुआ ही नहीं है. आये दिन कोई न कोई इसी तरह की घटना होती ही रहती है. यहाँ के लोग चुप चाप रहते हैं प्रतिरोध के लिए बीबीसी को कदम उठाना पड़ता है कि कहीं न कहीं सुगबुगाहट हो. नहीं तो मेरे ऐसे संवेदनशील लोग टिप्पणी ही लिख कर अपने दिल कि भड़ास तो निकल लें. सलमा जी आप को इस पहल के लिए धन्यवाद. अब लोगों को चारों तरफ़ से परेशानी हो रही है और भारत के नेता ख़ुद की जेबें भर रहे हैं. तो आम जनता के पास अपनी खिन्नता उजागर करने का यह आसान रास्ता है. भले ही कटु हो लेकिन सत्य है कि भारत की जनता का व्यवस्था पर से विश्वास उठ गया है और अगर समय रहते इसकी बहाली के लिए प्रयास नहीं किए गए तो देश अराजकता का शिकार हो सकता है.

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