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अपने-अपने तहरीर चौक

विनोद वर्माविनोद वर्मा|सोमवार, 07 फरवरी 2011, 15:15 IST

मिस्र का तहरीर चौक अपने नाम को सार्थक करने जा रहा है. तहरीर यानी आज़ादी.

जिस दिन होस्नी मुबारक़ अपनी गद्दी छोड़ेंगे, जनक्रांति के इतिहास में एक और अध्याय जुड़ जाएगा. जैसा कि ट्यूनिशिया में जुड़ चुका है और यमन में इसकी सुगबुगाहट दिख रही है.

काहिरा के इस तहरीर चौक ने सबक सिखाया है कि लोकतंत्र सिर्फ़ पाँच साल के पाँच साल वोट देने भर का नाम नहीं है. इसने एक आस जगाई है कि सरकारों को उखाड़ फेंकने के लिए राजनीतिक दलों की ओर तकते रहना ही एकमात्र रास्ता नहीं है.

मिस्र की जनता ने दुनिया के हर जागरुक नागरिक के मन में यह सवाल ज़रुर पैदा किया होगा कि हमारा तहरीर चौक कहाँ है.

अगर लोकतंत्र सचमुच लोकतंत्र है तो हर गाँव में, हर जनपद में, हर शहर में, हर ज़िला मुख्यालय में, हर राज्य की राजधानी में और फिर देश की राजधानी में एक तहरीर चौक होना चाहिए. अगर लोकतंत्र सच में जागृत है तो हर नागरिक को अपने तहरीर चौक तक आने का मौक़ा मिलना चाहिए और सरकारों में इन लोगों की बातें सुनने का माद्दा होना चाहिए.

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य में पंचायत के स्तर पर 'राइट टू रिकॉल' यानी किसी चुने हुए जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार भी जनता को मिला हुआ है. दोनों ही प्रदेशों में जनता समय-समय पर इसका प्रयोग भी कर रही है.

कितना अच्छा होगा यदि विधानसभाओं में और संसद में चुने गए प्रतिनिधियों के लिए भी इसी तरह के प्रावधान कर दिए जाएँ. यक़ीन मानिए कि न सांसद ये प्रावधान लागू होने देंगे और न राज्य विधानसभाओं के सदस्य.

लेकिन भारत जैसे देश में तो तहरीर चौक का होना भी संकट का हल नहीं दिखता.

आपातकाल के बाद देश में तहरीर चौक जैसा ही माहौल था. चुनाव के ज़रिए जनता ने एक तानाशाह सरकार को उखाड़ फेंका. लेकिन जो विकल्प मिला उसने क्या किया? वह तो पाँच साल का कार्यकाल तक पूरा नहीं कर सकी.

बोफ़ोर्स घाटाले से भ्रष्टाचार विरोधी जो मुहीम शुरु हुई उसने एक सरकार का दम तो उखाड़ दिया लेकिन सत्ता में आकर उन तमाम नारों का दम भी उखड़ गया.

पिछले दो दशकों में प्रत्यक्ष और परोक्ष रुप से हर राजनीतिक दल को सत्ता में रहने या सत्ता को प्रभावित करने का मौक़ा मिला है. अलग-अलग राज्यों में भी सरकारों में जनता उन्हें देख रही है. लेकिन कोई ऐसा दल नहीं है जो आस जगाता हो.

जो भाजपा दिल्ली में कांग्रेस पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाती है उसी पार्टी का मुख्यमंत्री कर्नाटक में भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरा दिखाई देता है. दलितों की बहुजन समाज पार्टी का चेहरा भी जनता के सामने है और वामपंथी दलों की कलई भी जनता के सामने खुल गई दिखती है.

अगर राज्यों की राजधानी के लोग अपना तहरीर चौक पा भी जाएँगे और दिल्ली में जनता आकर अपना तहरीर चौक ढूँढ़ भी लेगी तो वह उस चौराहे पर आकर क्या मांगेगी?

पाँच साला चुनावों में जब वोट डालने का मौक़ा आता है तो यह संकट बना रहता है कि साँपनाथ को चुनें या नागनाथ को?

ऐसे में अगर जनता भ्रष्ट, ग़रीब विरोधी और असंवेदनशील सरकारों को उखाड़ फेंकने का सोचे भी तो उसके पास सत्ता में बिठाने के लिए जो विकल्प हैं वे उतने ही घूसखोर, बाज़ार समर्थक और निष्ठुर दिखाई देते हैं.

यह कहना भी मुश्किल है कि सरकारें तहरीर चौक को बर्दाश्त कर सकेंगीं.

ये ठीक है कि 'जलियाँ वाला बाग़' फिर न होगा और भारत में 'थ्येनआनमन चौक' की पुनरावृत्ति भी संभव नहीं है लेकिन हमारी सरकारें आंदोलनों को जिस तरह कुचलती हैं वह बहुत लोकतांत्रिक नहीं है.

दिल्ली के बोट क्लब ने कई ऐतिहासिक रैलियाँ देखी हैं और वह अनगिनत प्रदर्शनों का गवाह है. एक समय वह हमारा अपना तहरीर चौक था. क्या आपने कभी सोचा कि वहाँ ऐसे लोकतांत्रिक प्रदर्शनों पर क्यों रोक लगाई गई और क्यों विरोध प्रदर्शनों को जंतरमंतर और संसद मार्ग की तंग सड़कों तक समेट दिया गया?

बहरहाल, हमें अपना तहरीर चौक मिले न मिले, जब किसी की भी सार्वजनिक रुप से फ़ज़ीहत होगी तो हम कह तो सकेंगे कि 'फलाँ का तहरीर चौक पर होस्नी मुबारक हो गया'. ठीक वैसे ही जैसे दलाली के लिए बोफ़ोर्स एक वैकल्पिक शब्द हो गया है और जब भी कोई घपला करता है तो अक्सर लोग कहते हैं कि 'उसने बोफ़ोर्स कर दिया'.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 16:27 IST, 07 फरवरी 2011 raj kumar:

    2जी घोटाला हुआ है उसके लिए तो राजा को जेल भेज दिया और जाँच चल रही है. लेकिन जो राजस्व का घोटाला हुआ है उसकी कौन भरपाई करेगा.

  • 2. 16:29 IST, 07 फरवरी 2011 vimal kishor singh:

    अगर भारत में तहरीर चौक बना दिया जाए तो जनता को उसके आसपास जमा नहीं होने दिया जाएगा. कर्फ़्यू लगा दिया जाएगा.

  • 3. 18:19 IST, 07 फरवरी 2011 anand:

    भारत की तस्वीर दुनिया से अलग है. नेता और सरकार पर उंगली उठाने से पहले बताएँ कि क्या भारत की जनता ईमानदार है? अगर जनता ख़ुद ईमानदार नहीं होगी तो नेता क्या स्वर्ग से आएँगे? हर आदमी अपने-अपने हिस्से की बेईमानी कर रहा है और सरकार पर ठीकरा फोड़ रहा है. जब पब्लिक का लेवेल सुधरेगा तो सरकारें अपने आप ही साफ़ हो जाएँगी.

  • 4. 19:15 IST, 07 फरवरी 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    मेरे साथ मिस्र के बहुत से लोग काम करते हैं और कई लोगों से मुलाक़ात भी होती है. मालिक जानता है कि कहाँ से ताक़त आ गई. क्योंकि लोगों से बात करके महसूस होता था कि होस्नी मुबारक़ के ख़िलाफ़ विरोध या ग़ुस्सा तो बहुत था लेकिन आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं थी. आज तहरीर चौक वाकई इतिहास बनाने जा रहा है.

    रहा सवाल भारत का तो अभी भी ये समझ में नहीं आ रहा है कि भारत में आज़ादी किस तरह से आएगी. आज तो जनता कमज़ोर और बुज़दिल दिखती है, जिस दिन जनता में हिम्मत और ताक़त आ जाएगी, भारत का हर चौराहा तहरीर चौक बन जाएगा. लेकिन वो दिन शायद कभी नहीं आएगा. इन दिनों तो पूरा देश क्रिकेट का तहरीर चौक बना हुआ है. आपने बेबाक लिखा है और इसे पूरे देश को पढ़ने-सुनने का मौक़ा मिलना चाहिए.

  • 5. 19:54 IST, 07 फरवरी 2011 vikas kushwaha:

    कांग्रेस और भ्रष्टाचार एक दूसरे के पूरक हैं. सुखराम, कलमाड़ी और राजा...लिस्ट बहुत लंबी है.

  • 6. 21:28 IST, 07 फरवरी 2011 braj kishore singh:

    विनोद जी जनता जब अपना आप खो देती है तो हर चौक-चौराहा तहरीर चौक बन जाता है, उसे विरोध के लिए किसी ख़ास जगह की जरुरत नहीं पड़ती. भारत में भी ऐसा संभव है अगर सरकार नहीं संभली तो.

  • 7. 22:36 IST, 07 फरवरी 2011 I.Hussain:

    आपने बिलकुल सही लिखा है. लेकिन लोग क्या कर सकते हैं. मैं आपको बताना चाहता हूँ कि अपने देश के क़ानून और न्यायपालिका सबसे बड़े क़सूरवार हैं. आप देखिए ना कि न्यायालय का क्लर्क बिना पैसे लिए हाज़िरी नहीं लगाता और ना आगे की तारीख़ बिना पैसे दिए लगाता है. क्या हमारे न्यायाधीश इसके बारे में नहीं जानते? रिश्वतखोरों का फ़ैसला देने वाला ख़ुद अपने कर्मचारियों के ज़रिए पैसे इकट्ठे करता है तो रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार पर कैसे रोक लगाया जा सकता है. जनता तो मजबूर है, वह सिर्फ़ बाहर विरोध कर सकती है और सरकारी लाठियाँ खा सकती है. इससे ज़्यादा कुछ नहीं.

  • 8. 04:25 IST, 08 फरवरी 2011 rajesh kumar:

    आपने कहा: "जो भाजपा दिल्ली में कांग्रेस पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाती है उसी पार्टी का मुख्यमंत्री कर्नाटक में भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरा दिखाई देता है" आधा सच क्यों बोलते हैं...दोनों बातों में जमीन आसमान का अंतर है....बेहतर होता अगर आप कहते...."कर्नाटक में भाजपा को घेरने वाली कांग्रेस दिल्ली और महाराष्ट्र समेत हर क्षेत्र में घिरी हुई है." जनाब पत्रकारिता का दायित्व निभाइए....निष्पक्ष होकर.

  • 9. 08:03 IST, 08 फरवरी 2011 Dr.Lal Ratnakar:

    तहरीर चौक का सवाल मिस्र में तो हो सकता है पर हिंदुस्तान में बगावत? वह भी बीबीसी का ब्लॉग पढ़ने वालों की ओर से? कमाल की बात है. यही कारण है कि सभ्यता और संस्कृति का नेता रहे मिस्र ने समकालीन युग का राजनैतिक नेतृत्व भी हासिल कर लिया. अमरीका की आतंकी साजिशों और मुसलमानों की मुख़ालफ़त ने ही उन्हें ही नेतृत्व की संभावनाओं के लिए उठ खड़ा होने में बड़ा सहयोग किया है. ऐसे हालात किसी न किसी निरंकुश तानाशाह की ओर से ही पैदा किए जाते हैं. भारत के सदियों पुराने द्विज और दलित आंदोलन के दमन के जब सारे उपाय नाकाफ़ी हो गए तब द्विज और दलित गठबंधन ने जो कुछ आज़ादी के बाद किया वह सबके सामने है. दलितों की दुर्दशा के लिए द्विज अपने ज़िम्मेदार होने को कभी नहीं स्वीकारता, पर दलित की सत्ता में भागीदार बनने से नहीं चूकता. मूलरुप से भारत में जो राजनैतिक बदलाव अब तक हुए हैं उनसे समाजिक बदलाव लगभग न के बराबर हुए बल्कि स्थितियाँ पहले से बदतर ही हुईं. भारत की जनता इन हालातों पर आख़िरकार अपने को ही कोसती रही हैं और उनके नेता 'होस्नी मुबारक' बनते गए.
    यहाँ एक बड़ा सवाल विनोद जी ने उठाया है कि 'फलाँ का तहरीर चौक पर होस्नी मुबारक हो गया' क्या यह जुमला चल निकलेगा? मुझे तो संदेह है क्योंकि यहाँ पर हर नेता, अफ़सर, कर्मचारी और दुराचारी/भ्रष्टाचारी 'होस्नी मुबारक' होने का ख्वाब संजोए हुए है. यदि उसे सचमुच चौक पर होस्नी मुबारक़ नज़र आया तो उन ख़्वाबों का क्या होगा.

  • 10. 09:47 IST, 08 फरवरी 2011 अशोक राजपुरोहित:

    चुनावों में एक और विकल्प होना चाहिए - इनमें से कोई नहीं. यदि इस विकल्प को सर्वाधिक मत मिलते हैं तो वहाँ पर राष्ट्रपति शासन लागू कर देना चाहिए.

  • 11. 11:43 IST, 08 फरवरी 2011 BHEEM SINGH:

    प्रिय विनोद जी, इस तरह के सपने दिन में तारे देखने के बराबर है. भारत के लोगों को ठीक से जान लो, ये लोग भारतीय नहीं हैं, कोई हिंदु, कोई मुसलमान, कोई बौद्ध, कोई जैन तो कोई सिख है. भारत के राजा धर्मांध लोगों को एक दूसरे का रक्त बहाने को उत्साहित करते रहेंगे और मौज से राजा-रानी बने रहेंगे. भारत केनेता आनंद करेंगे, जनता पिसती रहेगी. कोई क्रांति भारत में नहीं होगी. धार्मिक नेता और राज लोग मिलजुल कर खीर खाते हैं. विनोद जी सपने देखो और ख़ुशफ़हमी में जिओ.धार्मिक ठेकेदारों का रुतबा भी कभी देखा होता तो पता चल जाता. धन्यवाद

  • 12. 12:20 IST, 08 फरवरी 2011 LAVLEEN SHARMA:

    विनोद जी बड़ा प्यारा लिखा. काफ़ी मसालेदार. इस मिस्र प्रकरण में कोई साज़िश भी हो सकती है. पश्चिमी मित्र पहले राजा को मित्रता का विश्वास दिला कर देश का सारा माल सात समंदर पा चोरी-चोरी जमा करवाता है. फिर मौक़ा पाकर जब जनता का गुस्सा फूटे तो क्रांति के बहाने राजा का काम तमाम. फ़ायदा क्या? मित्र का सारा माल पश्चिम वाले का हो जाएगा. मिस्र की तरह भारत में हुआ तो राजा लोगों का गुप्त धन पश्चिमी मित्रों का हो जाएगा. आपकी समझ में नहीं आएगा..इस विश्वासघात का क़िस्सा. धन्यवाद.

  • 13. 20:49 IST, 08 फरवरी 2011 सव्यसाची मिश्र:

    मैं भी आपके ही विषय पर सोच रहा था. महान देश भारत, जहां एक फ़र्जी लोकतन्त्र है. सत्ता और विपक्ष दोनों ही चोर हैं, वहां बहुत ज्यादा अपेक्षा रखना अपने आप को मूर्ख साबित करना है.

  • 14. 22:39 IST, 09 फरवरी 2011 shahnawaz Anwar sintu , munger bihar:

    मुझे नहीं लगता कि भारत में किसी तहरीर चौक की ज़रुरत है. पांच साल बाद होने वाले चुनाव नई तहरीर को लिखता है.

  • 15. 16:39 IST, 10 फरवरी 2011 Sheo shankar Pandey:

    जिस देश की संस्कृति का अभिन्न अंग बन चुका है भ्रष्टाचार, वहाँ तहरीर चौक बनना बिल्कुल नामुमकिन है.

  • 16. 18:15 IST, 10 फरवरी 2011 aniruddh dwivedi:

    जब तक भारत में सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय अपना काम सही से कर रहे हैं तब तक भारत में कोई क्रांति नहीं होने जा रही है.तब तक हमारे देश के राजनीतिज्ञ चैन से सो सकते हैं.लेकिन जिस दिन न्याय के ये मंदिर भी राजनीतिज्ञों की राह पर चल देंगें उस दिन भारतीयों की सहन शीलता जवाब दे जाएगी और तब भारत में भी कोई तहरीर चौक की जरुरत पड़ेगी.

  • 17. 21:54 IST, 10 फरवरी 2011 अरुण कुमार पांडेय, बोमडिला,अरुणाचल प्�:

    मिस्र और भारत दो अलग-अलग भोगौलिक क्षेत्र हैं. दोनों के अपने अलग-अलग सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक सरोकार हैं. भूख और शोषण का तंत्र पूरे विश्व में मनुष्य को समान रूप से पीड़ित करता है. इनकी भोगौलिक सीमा नहीं होती है. अपारदर्शी लोकतंत्र और तानाशाही शासकीय प्रणाली एक ही सिक्के के दो पहलु हैं. मुबारक सत्ता का मनमोहन है और मनमोहन सत्ता के मुबारक हैं. जनता जब जागती है तो तहरीर चौक चौंकती है. विनेद जी ने उन मूलभूत समस्याओं को बहुत प्रवीणता के साथ जोड़ने का प्रयत्न सूत्र रूप में किया है.
    भारत की चुनाव प्रणाली में एक व्यापक सुधार की आवश्यकता है. मतदाताओं को अपने प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार, उम्मीदवार को न्यूनतम 55 प्रतिशत मत की अनिवार्यता के साथ- साथ मतदाताओं को उम्मीदवार को अस्वीकार करने का अधिकार मिलने चाहिए. चुनाव के बाद ऐसी ख़बर प्रसारित की जाती है कि लगभग 60-70 मतदाताओं ने चुनाव में हिस्सा नही लिया. परन्तु कारण नहीं बताए जाते. एक बार यदि मतदाताओं को उम्मीदवार को अस्वीकार करने का अधिकार मिल जाए तो देखिए कैसे लोगों की भागीदारी चुनाव में 90 प्रतिशत हो जाती है.
    हमारे देश की मूल समस्या भ्रष्ट आचरण है. यह ऐसा ऑक्टोपस है जिसकी मज़बुत बाँहों में सब जकड़े हुए हैं ऊपर से नीचे तक. हम कभी भी अपना आत्म निरीक्षण, परीक्षण एवं शोधन नहीं करते हैं.

  • 18. 10:10 IST, 11 फरवरी 2011 ASRAR AHMED:

    अब्राहम लिंकन ने कहा था, "जनता की सरकार, जनता के लिए, जनता के द्वारा."

  • 19. 11:43 IST, 11 फरवरी 2011 आतिश कुमार :

    तहरीर चौक विद्रोह का प्रतीक बन गया है पर इससे पहले भी कई चौक जनआंदोलन के गवाह बन चुके हैं. पर वो कहावत नहीं बन पाई क्योकि हमने अपने ज़हन में ऐसा कोई चौक बनने नहीं दिया. राजधानियों मे बैठा शासक हमारी ही देन है, हमारे यहाँ लोग राष्ट्रहित की बजाय व्यक्तिगत हित को ध्यान में रखकर वोट डालते हैं. लगभग हर कोई रोज़मर्रा के कामों के लिए सरकारी कार्यालयों के भ्रष्ट कर्मचारियों और गद्दीनसीन नेताओं को पोषित करते हैं यही वजह है कि यहाँ राजनीति भ्रष्ट और अपराधियों के लिये ढाल बन चुका है और ढाल हमने खुद उन्हें दिया है. हमने अपने अंदर ही कभी तहरीर चौक नहीं बनने दिया,यदि कभी दिल ने विद्रोह करना भी चाहा तो हमने व्यक्तिगत लाभ-हानि का विचार कर उस विद्रोह को बेरहमी से दबा दिया.

    हम विनोद वर्मा जी से सहमत हैं कि हम किसी के ख़िलाफ विद्रोह कर भी दें,मगर क्या हमने दूसरा विकल्प ढूँढ़ लिया है? नहीं, वो हमारे पास है ही नही. जयप्रकाश नारायण जी ने जो एक मात्र कोशिश की क्या वो सफल रही? आज वही लोग शासन कर रहे हैं जिनके ख़िलाफ़ उन्होंने आवाज़ उठाई थी. उनके कुछ तथाकथित अनुयायी भी आज गद्दीनशीन और गद्दीपरस्त हो गए हैं. हमारे पास विकल्प नहीं है. या यूँ कहें कि हमने विकल्प बनने नहीं दिया चाहे इसकी वजह लोभ हो या डर.विद्रोही आवाज़ यदि लोभ से नहीं दबी तो उसे मुकदमों का भय दिला कर दबा दिया जाता है. बिनायक सेन का ताज़ा उदाहरण आपके सामने है.और हम चुप बैठे हैं क्योंकि बोलने पर हानि उठाना पड़ सकता है.


    हमे पहले उन अंधों मे कानों को ढूँढ्ना होगा, इससे दिशा बदलेगी और आगे चलकर हम उन आँख वालों को चुन सकेंगे. इसके लिए हमे मतदान केंद्र को ही तहरीर चौक बनाना होगा. "दिल्ली चलो" का नारा नहीं चलेगा, हम घर बैठे दिल्ली को नियंत्रित कर सकते. इससे जान माल और देश तीनों को बचाया जा सकता है.

  • 20. 10:12 IST, 13 फरवरी 2011 RAJESH LALWANI:

    'नागनाथ या साँपनाथ' सबसे अच्छा है.

  • 21. 16:02 IST, 16 फरवरी 2011 Ravi Yadav:

    वर्मा जी लेख तो बहुत अच्छा लिखा है आपने. तेज़ तर्रार और सटीक. ज़रा इस बात का ध्यान रखें कि कुछ राजनीतिक तत्व और राजनीतिज्ञ इसे भड़काऊ और देश के हित के ख़िलाफ़ न मान लें और भारत के तहरीर चौक पर क़ुर्बानियाँ करने वालों में एक आप भी हो जाएँ. लेकिन आपकी हिम्मत और सटीकता की दाद देनी होगी. आशा है कि बाक़ी मीडिया वाले और पत्रकार इससे कुछ सीख लेंगे.

  • 22. 23:04 IST, 02 अप्रैल 2011 मोहम्मद असलम:

    विनोद जी मैं आपका ये दूसरा ब्लॉग पढ़ा हूँ और पढ़ कर ये तो जरूर लगा आपमें हिम्मत हो न हो आपकी लेखनी में ज़बरदस्त ताक़त है. सच तो ये है की इस आर्टिकल का कैपसन होना चाहिए "हर आम भारतीय नागनाथ और सांपनाथ के बीच" हमे तहरीर चौक मिले न मिले गद्दाफी को तो हम ढूंढ ही लेंगे क्योंकि हमारे खून में बलिदान और संघर्ष का गुणधर्म है. इंतजार है नागनाथ और सांपनाथ के ज़हर को उतरने का. हम नागनाथ और सांपनाथ के ज़हर से ही बहार नहीं आ पा रहे, और वो हैं की हमें कभी बाबरी मस्जिद तो कभी गुजरात दंगा तो कभी अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक तो कभी आरक्षण के बहाने काट ही लेते हैं. बस इंतज़ार ही सही.

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