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अनमोल हैं दादा

पंकज प्रियदर्शीपंकज प्रियदर्शी|सोमवार, 10 जनवरी 2011, 17:01 IST

पिछले दिनों आईपीएल की मंडी सजी. नीलामी लाइव. बिकने वाले तैयार. ख़रीदने वाले लैपटॉप, नोटबुक के साथ जमे हुए थे. कुछ चेहरे नए थे. कुछ पुराने थे, लेकिन जेब से बीमार लग रहे थे.

लेकिन ख़रीदारी ख़ूब हुई. दूर बैठे किंग ख़ान ने कहा- बड़ा मज़ा आया देखकर. लेकिन हथौड़े की चोट पर बिकते खिलाड़ियों के बीच दादा का खरीदार कोई नहीं था.

पूरा यक़ीन है कि 'गांगुली अनसोल्ड' का हथौड़ा बड़ी संख्या में लोगों के दिल पर हथौड़ा चला गया होगा. मीडिया में ख़ूब चर्चा है दादा नहीं बिके. क्यों नहीं बिके, इस पर भी विचार मंथन चल रहा है.

शाहरुख़ की नई पेशकश पर चर्चा है. कोलकाता में जलते पुतले भी सुर्ख़ियाँ हैं. लेकिन बिना लाग-लपेट के मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ और वो ये कि ये मेरा भी दर्द है.

जनता की कमज़ोर यादाश्त की दुहाई देकर सब कुछ जायज़ ठहराना एक कला है. एक बार फिर इसी कला का हवाला देकर गांगुली जैसे खिलाड़ी के क़द को छोटा किया जा रहा है.

चलिए मैं थोड़ी पुरानी बात याद दिलाने की छूट ले ही लेता हूँ. भारतीय क्रिकेट को गांगुली का क्या योगदान है, ये शायद फटाफट क्रिकेट की रेलमपेल और रोज़ बनते नए रिकॉर्ड्स की कहानी में भुलाया जा रहा है.

याद कीजिए जॉन राइट के कोच और गांगुली के कप्तान रहते भारतीय क्रिकेट का सुनहरा दौर.

भारतीय क्रिकेट टीम का 2003 के विश्व कप के फ़ाइनल तक पहुँचना. कई यादगार जीतें. युवराज, भज्जी जैसे कई युवा खिलाड़ियों का क्रिकेट परिदृश्य पर आना.

गांगुली की कप्तानी के प्रभाव में न जाने कितनी विदेशी टीमें अपना बेअसर हो गईं और आज भारतीय टीम का जो क़द है, उसमें गांगुली की लोकप्रिय 'दादागिरी' अब भी झलकती है.

लेकिन बदलते समय के साथ बाज़ार और राजनीति की चपेट में कोलकाता का प्रिंस ऐसे फँसा कि जाल से निकल नहीं पाया.

मुझे याद है वर्ष 2007 के विश्व कप के दौरान चैपल की छत्रछाया में फलती-फूलती टीम के बीच गांगुली कैसे अकेले पड़ गए थे. दबाव में चैपल ने उन्हें टीम में तो रख लिया था. लेकिन उनकी क़द्र चली गई थी.

कभी हर तरह की गुगली को सीमा रेखा के पार पहुँचाने का दम रखने वाले दादा, कभी डालमिया गुट का हिस्सा होने तो कभी डालमिया विरोधी गुट के क़रीब होने, तो कभी चैपल का चापलूसी न कर पाने के कारण हाशिए पर आते गए.

और आज हालत ये है कि 'भारतीय' प्रीमियर लीग में इस प्रीमियर खिलाड़ी का कोई ख़रीदार नहीं.

आईपीएल बाज़ार है और क्रिकेट का ये बाज़ार कुछ ज़्यादा ही निर्मम हो गया है. इस बाज़ार में अब विजय मालया, शिल्पा शेट्टी, प्रीति ज़िंटा और नीता अंबानी क्रिकेट की दुकान चला रहे हैं.

पता है कि सारा खेल पैसे का है और शायद गांगुली इसमें फ़िट नहीं बैठते.

लेकिन हमारी तो बस इतनी ही गुज़ारिश थी कि भारतीय क्रिकेट के इस रतन के साथ कम से कम अच्छा बर्ताव तो हो.

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से भी उनकी विदाई दिल तोड़ने वाली थी....और अब आईपीएल में भी यही व्यवहार.

शाहरुख़ ख़ान मेल-मिलाप की कोशिश में हैं....लेकिन क्यों. क्या उन्हें कोलकाता में नाराज़ लोगों का सामना करने से डर लग रहा है या वे वाक़ई गांगुली को उनका हक़ देना चाहते हैं. अगर गांगुली के बिना उनकी टीम अधूरी है, तो फिर उन्हें छोड़ा ही क्यों.

अब तो गांगुली को मैदान पर देखना ही दुर्लभ हो जाएगा. लेकिन क्रिकेट की नई परिभाषा गढ़ने वालों इसकी फ़िक्र कहाँ.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 19:28 IST, 10 जनवरी 2011 sp singh :

    जो भी हुआ ये गांगुली की ही बोयी फसल है. आपने बेशक भारतीय क्रिकेट को ऊँचाइयों पर पहुँचाया लेकिन दादा आपका घमंड ही आपको ले डूबा. सौरभ को सचिन और राहुल द्रविड़ से सीखना चाहिए. खेल से भी बड़ी नम्रता होती है. गांगुली यहीं कमज़ोर पड़ गए.

  • 2. 19:52 IST, 10 जनवरी 2011 Farid Ahmad khan:

    चढ़ते सूरज के प्रशंसक सभी होते हैं. लेकिन दादा अभी डूबा नहीं है. शाहरुख़ ख़ान को चाहिए कि अविलंब दादा गांगुली को टीम में शामिल करें, ऐसा न हुआ तो क्रिकेट की तौहीन होगी. टीम के ख़रीदारों को दादा क्यों नहीं याद आए...शेम...शेम

  • 3. 19:57 IST, 10 जनवरी 2011 Mukesh Bhavsar:

    सौरभ गांगुली एक लेजेंड क्रिकेटर हैं. हम भारतीय क्रिकेट में उनके योगदान को नहीं भूल सकते. आईपीएल एक बेकार और बेमतलब क्रिकेट फ़ॉर्मूला है. सिर्फ़ पैसा, पैसा और पैसा. क्रिकेट हमारा धर्म है और हमें अपने महान क्रिकेटरों का सम्मान करना चाहिए.

  • 4. 20:09 IST, 10 जनवरी 2011 sanjay singh:

    आज मेरी आत्मा भरी हुई है. ये सुनकर कि जो आदमी भारतीय क्रिकेट को एक ऐसी दिशा दी, जो विरले ही दे पाते हैं, उसके साथ ऐसा व्यवहार. इन सबके लिए बीसीसीआई ज़िम्मेदार है, जो दादा की बेइज्जती करवाने में कहीं नहीं चूकती. दादा की बेइज्जती हर उस भारतीय की बेइज्जती है, जो भारतीय क्रिकेट की कामयाबी पर इठलाते हैं. क्योंकि ये दादा की देन है. आज मेरा जमीर मुझसे ये कह रहा है कि तुम अब क्रिकेट मत देखो. शायद हरेक भारतीय का जमीर भी यही कह रहा होगा. समय है कि पूरे भारत में इस पर बात हो अन्यथा तेंदुलकर के साथ भी यही हो सकता है. चिंता न करें दादा, ये आपकी बेइज्जती नहीं, हम सबकी बेइज्जती है. आप महान हो और आगे भी महान रहोगे.

  • 5. 20:12 IST, 10 जनवरी 2011 pankaj:

    सौरभ अब भी अच्छे खिलाड़ी हैं. ये वाक़ई में बहुत बुरा है कि उन्हें आईपीएल में किसी ने नहीं ख़रीदा. सौरभ ने भारतीय टीम को चमकाया था, वे महान खिलाड़ी हैं.

  • 6. 20:34 IST, 10 जनवरी 2011 krishna:

    किसी को भी सम्मान की चिंता नहीं. उन्हें तो सिर्फ़ इसकी चिंता है कि कैसे ज़्यादा से ज़्यादा पैसा कमाया जाए.

  • 7. 20:40 IST, 10 जनवरी 2011 sanjaykumar:

    मैं इसे भारतीय क्रिकेट का काला दिन तो नहीं मानूँगा. ये भारतीय क्रिकेट का अंत है.

  • 8. 20:44 IST, 10 जनवरी 2011 Chandan mishra,delhi:

    सबसे पहले तो ये आईपीएल ही दलालों की मंडी है, जहाँ हर कोई बोली लगाकर अच्छे घोड़ों को ख़रीदना चाहता है. जहाँ तक आईपीएल की बात है तो ये सिर्फ़ पैसों की बंदरबाँट है. इससे क्रिकेट का भला नहीं होने वाला है. मैं तो दोषी सुभाष चंद्रा को मानूँगा, जिन्होंने आईसीएल शुरू की और उसी से दिमाग़ लेकर ललित मोदी ने आईपीएल शुरू कर दी.

  • 9. 21:06 IST, 10 जनवरी 2011 Saptarshi:

    अब बनिए भला खेल के बारे में क्या जाने? दादा...आपकी जगह दूकानों में नहीं, दिल में है.

  • 10. 21:21 IST, 10 जनवरी 2011 SANJAY KUMAR:

    गांगुली की नीलामी नहीं होने का मतलब ये नहीं कि वो बिकाऊ माल नहीं थे, बल्कि उसे इस रूप में देखा जाना चाहिए कि जो कल तक बिकाऊ था, आज अनमोल हो गया है. आज किसी के पास इतना पैसा नहीं कि वो गांगुली जैसे रतन तो ख़रीद सके. हम तो ये समझते हैं कि यदि गांगुली को कोई नहीं ख़रीद पाता है तो उन्हें कुछ ऐसा करना चाहिए कि कल उनको पाने के लिए वही लोग उनके पास आएँ.

  • 11. 21:31 IST, 10 जनवरी 2011 Rajeev Bharol:

    पंकज जी, कृपया पिछले आईपीएल मैचों में सौरभ गांगुली के प्रदर्शन पर कुछ प्रकाश डालिए. आपको अपने सवालों के जवाब मिल जाएँगे.

  • 12. 21:52 IST, 10 जनवरी 2011 Shakeel Ahmad:

    हमें यह याद रखना चाहिए की हर चढ़ता सूरज शाम को डूबता भी है. जहाँ तक इज़्ज़त का सवाल है, इसे कमाया जाता है दाँव पर नही लगाया जाता. जो भी टीम आज मैदान पर है सब के सब जीतना चाहते हैं और यह सही भी है वरना आज हम सारे पुराने दिग्गज नाम को ले कर इज़्ज़त देते हुए एक टीम बनाते और यही इंडिया को रेप्रेज़ेंट करते. यह कांट्रॅक्ट तीन साल का है, और यह सभी जानते हैं की गांगुली बहुत दिनों से फील्ड से बाहर हैं. ऐसे में कौन सी टीम उनको ख़रीद कर जोखिम लेना चाहेगी और वो भी तीन साल के लिए. यही हाल कुंबले का भी होता मगर समय रहते उसने अकलमंदी से काम लिया और अपनी इज़्ज़त को बचा ले गए.

  • 13. 22:12 IST, 10 जनवरी 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    बीबीसी को क्रिकेट से विशेष प्रेम है, अब अगर कोई मैच नहीं है तो ये मुद्दा ही उछाल दिया. रहा सवाल आईपीएल में खिलाड़ियों की बोली का, तो मेरी समझ में इंसानों की बोली नहीं लगनी चाहिए, बोली तो कुर्बानी के बकरों की लगती है.

  • 14. 22:57 IST, 10 जनवरी 2011 Sangam Kumar:

    अब नहीं बिका तो नहीं बिका, बाज़ार के अपने नियम कायदे हैं. कोलकाता वालों को हर बात पर रोने की आदत छोड़ देनी चाहिए.

  • 15. 00:21 IST, 11 जनवरी 2011 Ashutosh Singh:

    दादा ने केकेआर में पिछली बार सबसे ज्यादा रन बनाए, उससे पहले शाहरुख़ खान ने अपनी करामत दिखाते हुए मैक्कुलम को कप्तान बना दिया. शाहरुख़ इस बार भी गौतम गंभीर को टीम में लेकर बहुत उछल रहे हैं, लेकिन देख लीजिएगा कि केकेआर का क्या हाल होता है. मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता कि दादा को टीमों ने क्यों नहीं ख़रीदा, और इतने सारे लोग जो कह रहे हैं कि दादा का घमंड टूट गया, उन्हें शायद याद नहीं है कि आज विश्व पटल पर भारतीय टीम का नाम है तो दादा की वजह से ही,| नहीं तो यही सचिन, यही द्रविड़ तब भी थे जब हम 1999 में मुंह पर कालिख लगा कर लौटे थे और 2007 में जिसकी पुनरावृत्ति हुई. दादा को किसी अभिनेता की ज़रूरत नहीं है कि उन्हें बताए कि उनकी कीमत क्या है. मेरे दिल में और हम सब के दिल में दादा अनमोल थे अनमोल हैं और अनमोल रहेंगे.

  • 16. 00:37 IST, 11 जनवरी 2011 Ramesh Sharma:

    सौरभ गांगुली महान क्रिकेट खिलाड़ी हैं और उनकी बोली न लगना, ये उनकी बेइज्जती है.

  • 17. 06:31 IST, 11 जनवरी 2011 Kumud B Mishra:

    मुझे लगता है कि मीडिया को इसका मुद्दा नहीं बनाना चाहिए. ये एक पारदर्शी व्यापार है. हमें व्यापार और सम्मान में अंतर को समझना चाहिए. भारतीय क्रिकेट के इतिहास में गांगुली हमेशा सम्मानजनक रहेंगे. इस मुद्दे को उछालने के बजाय मीडिया को चाहिए कि वो देश में व्याप्त भ्रष्टाचार की समस्या पर अपना ध्यान दे. मैं एक पारदर्शी भारत सरकार देखना चाहता हूं.

  • 18. 10:24 IST, 11 जनवरी 2011 Neeta, Madhubani, Bihar:

    पंकज जी क्रिकेट में सौरभ दादा को लेकर आपने इतनी दिलचस्पी क्यों दिखाई? क्या इस तरह भारतीयों के दिल को टीस पहुंचाना मीडिया के लिए उचित है? क्या यही कर्तव्य है बीबीसी वालों का? आप उनके इतिहास को देखें, उनकी कामयाबी को दर्शाएं,बुरे दिन तो सबके साथ आते हैं लेकिन गांगुली की कुछ ज़्यादा ही आलोचना हो रही है. गांगुली भले ही क्रिकेट की दुकानों पर ना सजें लेकिन वो करोड़ों के दिल में आज भी बसे हैं.

  • 19. 10:40 IST, 11 जनवरी 2011 Malik Faisal:

    सभी क्रिकेट खिलाड़ियों को अनिल कुंबले और ग्लैन मैकग्रा से सबक लेना चाहिए. सौरभ ब्रायन लारा से बड़े नहीं हैं और आईपीएल में लारा का ख़रीदार भी नहीं मिला तो सौरभ क्या चीज़ हैं? वैसे भी सौरभ ने नीलामी से पहले कहा था कि कोलकाता नाइट रायडर्स के पास उन्हें ख़रीदने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं. तो अलविदा सौरभ हम आपको मैदान में नहीं देखना चाहते.

  • 20. 11:20 IST, 11 जनवरी 2011 ZIA JAFRI:

    सबको पता है कि आईपीएल एक बाज़ार है. जो लोग पैसा लगा रहे हैं वो कोई अनाड़ी नहीं हैं. क्रिकेट भले ही आकड़ों का खेल हो लेकिन जहां किसी का पैसा लगता है वहां आकड़े नहीं वास्तविकता काम करती है. गांगुली ने अपने दाम स्वयं चार करोड़ तय किए थे जो बाज़ार को ठीक नहीं लगा. गांगुली को मोहम्मद कैफ़ से सीखना चाहिए.

  • 21. 12:55 IST, 11 जनवरी 2011 शशि सिंह :

    शाहरुख़ ख़ान की मेल-मिलाप की कोशिश एक दिखावा भर है. यदि उन्हें दादा की इतनी ही फिक्र होती तो उन्हें 'रिटेन' न कर लिया होता ? दरअसल, केकेआर में दादा का कद हमेशा से इतना बड़ा था कि टीम का मालिक होते हुए भी किंग खान उनके आगे बौने लगते थे. ये बात उन्हें शुरू से नागवार थी और वे दादा को नीचा दिखाने के लिए सही मौके की तलाश में थे. पिछले साल दादा के करीबी और अपने साझीदार लक्स होजरी वाले अशोक टोडी से अपने कारोबारी रिश्ते तोड़ कर ख़ान ने दादा को पहला झटका दिया था. तीन साल का क़रार पूरा होते ही उन्होंने इस बार सीधे दादा पर चोट कर दी. अपने ढलते फिल्मी कैरियर के मद्देनजर क्रिकेट और क्रिकेट की राजनीति शाहरुख़ ख़ान के लिए बेहद अच्छा विकल्प है. लेकिन उनके वैकल्पिक करियर के लिए क्रिकेट और क्रिकेटरों को चाहने वालों को इतनी जिल्लत झेलनी पड़ेगी, अंदाजा न था.

  • 22. 12:58 IST, 11 जनवरी 2011 Vahedkhan:

    हमें एक बड़ा-सा संग्रहालय बनाकर दादा को उसके बाहर रख देना चाहिए. आईपीएल क्रिकेट नहीं है, ये एक बाज़ार है और कबाड़ी मार्केट के अलावा कहीं भी पुरानी चीज़ें सोना नहीं होतीं.

  • 23. 14:17 IST, 11 जनवरी 2011 Arun:

    दादा अपनी बेइज्जती स्वयं करा रहे हैं. उन्हे परिस्थितियो को समझना चाहिए. यदि कोलकातावासी खेल में बाधा डालते हैं तो ये उनकी भावना नहीं बल्कि उनकी ज़बर्दस्ती होगी. आख़िर कब तक वे दादा को ढ़ोना चाहतें है.

  • 24. 15:44 IST, 11 जनवरी 2011 DKMahto:

    पंकज जी क्या आपको लगता है कि ये इतना बड़ा मुद्दा है जिसपर पाठकों की राय आपेक्षित है?

  • 25. 16:52 IST, 11 जनवरी 2011 Pranshu:

    आज सब दादा का योगदान भूल रहे हैं. दादा ही थे जिन्होंने भारतीय क्रिकेटरों को इज़्ज़त दिलवाई,नहीं तो पहले जहां भी टीम जाती थी दूसरी टीमों के बुरे बर्ताव का जवाब नहीं देती थी. वो दादा ही थे जिन्होंने सबको जवाब दिया.भज्जी ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों को जो जवाब दिया उसके पीछे दादा ही थे. वो अगर भज्जी और टीम के अन्य सदस्यों का साथ नहीं देते तो आज भी हम बुरा-भला सुनकर खेलते रहते. आज दादा का बुरा समय चल रहा है लेकिन ये ज़्यादा दिन नहीं रहेगा. सबका बुरा वक़्त आता है. बहुत जल्द ही दादा के दिन भी लौटेंगे. रही आईपीएल की बात तो ये सही में पैसे की मंडी है,यहां कोई किसी का सगा नहीं, किसी का आदर-अनादर नहीं, कोई नैतिकता नहीं. अरे भई जो लोग डालमिया और ललित मोदी के नहीं हुए,जिन्होंने भारतीय क्रिकेट बोर्ड को दुनिया का सबसे अमीर बोर्ड बना दिया तो वो किसी के सगे नहीं होंगे.

  • 26. 17:58 IST, 11 जनवरी 2011 arpit kumar dubey:

    दादा को ख़रीदार ना मिलना बहुत ही दुख की बात है लेकिन भारत का इतिहास इस बात का गवाह है कि यहां महान कार्य करने वालों को उनके रहते याद नहीं किया जाता लेकिन उनके जाने के बाद लोग उन्हें ख़ूब याद करते हैं.

  • 27. 18:28 IST, 11 जनवरी 2011 Sayyad akbar hussain,RIYADH,SAUDIA ARABIA: :

    हमें यह याद रखना चाहिए की हर चढ़ता सूरज शाम को डूबता भी है. जहाँ तक इज़्ज़त का सवाल है, इसे कमाया जाता है दाँव पर नही लगाया जाता. जो भी टीम आज मैदान पर है सब के सब जीतना चाहते हैं और यह सही भी है वरना आज हम सारे पुराने दिग्गज नाम को ले कर इज़्ज़त देते हुए एक टीम बनाते और यही टीम भारत का प्रतिनिधित्व करती. यह कांट्रॅक्ट तीन साल का है, और यह सभी जानते हैं की गांगुली बहुत दिनों से मैदान से बाहर हैं. ऐसे में कौन सी टीम उनको ख़रीद कर जोखिम लेना चाहेगी और वो भी तीन साल के लिए? यही हाल कुंबले का भी होता मगर समय रहते उन्होंने अक्लमंदी से काम लिया और अपनी इज़्ज़त को बचा ले गए. शाहरुख़ ख़ान को चाहिए की सौरभ गांगुली को आईपीएल 4 में केकेआर टीम का कोच बनाए. इस तरह विश्व और भारतीय क्रिकेट को एक नया पर महान कोच मिल जाएगा. एक महान क्रिकेटर कप्तान के योग्य होता हैं और एक महान कप्तान कोच के योग्य होता है.

  • 28. 19:32 IST, 11 जनवरी 2011 शिशुराज यादव:

    मुझे यक़ीन ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि दादा की दादागिरी एक दिन ज़रूर चलेगी, तब वह मैदान में नहीं बल्कि बीसीसीआई के अध्यक्ष की कुर्सी पर नज़र आएगें. इस बेईज्जती का बदला तभी मिलेगा.

  • 29. 22:16 IST, 11 जनवरी 2011 pokar:

    फ़रीद साहब मैं आपकी बात से सहमत हूं लेकिन इस वक़्त गांगुली का खेला कैसा है ये भी सोचना चाहिए.

  • 30. 23:30 IST, 11 जनवरी 2011 Raj Malla:

    केकेआर के लिये खेलना गांगुली और केकेआर दोनों के लिये ठीक नहीं. गांगुली अच्छे खिलाड़ी है और पिछले आईपीएल में गांगुली ने अकेले कुछ मैच जितवाए थे. पुणे और कोच्चि जैसी टीमें उनको लेतीं तो अच्छा होता.

  • 31. 01:37 IST, 12 जनवरी 2011 Ashish Gupta:

    सबसे पहले आईपीएल 'क्लासिक क्रिकेट' नहीं है. ये ग्लैमर, पैसे और मनोरंजन का मेल है और यहां अनुभव की उतनी क़ीमत नहीं जितनी वनडे या टेस्ट क्रिकेट में होती है. दूसरे अगर गांगुली अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं तो उनपर कोई भी इतना पैसा नहीं ख़र्च करेगा. एक बात और..गांगुली एक 'महान भारतीय टीम' में खेल चुके हैं लेकिन आईपीएल में कॉरपोरेट्स नतीजे चाहते हैं. तो जिसे भी अपनी इज़्ज़त की परवाह है वो आईपीएल से बाहर ही रहे.

  • 32. 07:20 IST, 12 जनवरी 2011 Madan Patyal:

    हमें ये समझना चाहिए कि सबसे अहम है प्रदर्शन और अगर कोई अच्छा प्रदर्शन ही नहीं कर रहा तो उसे भला कोई कैसे ख़रीद ले? टीमें क्रिकेट पर करोड़ों ख़र्च रही हैं और ज़ाहिर है वो उन्हीं खिलाड़ियों को ख़रीद रही हैं जिनसे उन्हें मैच में जीत दिलवाने की उम्मीद है. टीमों पर पुराने प्रदर्शन के आधार पर खिलाड़ियों को चुनने का दवाब नहीं बनाया जाना चाहिए.

  • 33. 10:17 IST, 12 जनवरी 2011 bam shankar:

    हमारे देश में सिर्फ़ और सिर्फ़ उगते हुए सूरज को सलाम किया जाता है. ये एक बात दादा समझ लें तो उन्हें मानसिक तनाव नहीं होगा.

  • 34. 13:17 IST, 12 जनवरी 2011 arvind kr pappu:

    सौरभ गांगुली भले ही महान खिलाड़ी और अच्छे कप्तान रहे हो, पर उन्हें समय की पहचान नहीं है. आईपीएल-4 के पहले वो अपनी बेवकूफ़ी का करिश्मा समय को दिखा चुके हैं.

  • 35. 16:16 IST, 12 जनवरी 2011 Deepak , Lucknow:

    मै इस नीलामी को केवल इसलिए देख रहा था कि मेरे सबसे पसंदीदा क्रिकेटर रॉयल बंगाल टाइगर सौरव गांगुली को कितना पैसा मिलता है, लेकिन मुझे तब बहुत धक्का लगा कि प्रिंस ऑफ़ कोलकाता को कोई ख़रीदार ही नहीं मिला. मुझे बहुत दुख पहुँचा है. कुछ लोग कह रहे हैं कि इसके लिए ख़ुद दादा ही ज़िम्मेदार है. लेकिन सौरव तो हमेशा से ही ऐसे ही थे और उनके इसी रवैए के चलते तो भारत आज टेस्ट में नंबर एक और एक दिवसीय में दूसरे नंबर पर है. पिछले तीन सीजन में केकेआर एक मात्र ऐसी टीम थी जिसने मुनाफ़ा कमाया था. इस टीम के पास सबसे ज्यादा फ़ैन थे. गांगुली के ना होने से अब इस टीम के फ़ैन बहुत कम होंगे और कोई हो या ना हो कम से कम मैं तो अब केकेआर को कभी सपोर्ट नहीं करूँगा. और जहां तक बात गांगुली की है तो वो एक चैम्पियन रहे है, हारना उन्होंने नहीं सीखा है, वो फिर से विजेता बनके सामने आएँगे.

  • 36. 17:20 IST, 12 जनवरी 2011 Mohd Parwez alam:

    दादा महान खिलाड़ी हैं. आईपीएल में उनका न खेलना राजनीति है. दादा ने सिखाया कि क्रिकेट क्या होता है लेकिन सब उनको ही भूल गए हैं. भारतीय क्रिकेट टीम में सिर्फ़ राजनीति है. जबसे दादा भारतीय क्रिकेट से निकले हैं, तब से मैं क्रिकेट को पसंद नहीं करता. दादा महान हैं और महान रहेंगे.

  • 37. 17:29 IST, 12 जनवरी 2011 HARINDER SINGH:

    दादा को दादा की तरह रहना चाहिए. बाप नहीं बनना चाहिए. सूरज भी रात को चुपचाप चला जाता है.

  • 38. 18:05 IST, 12 जनवरी 2011 rajeev singh:

    ये भारतीय क्रिकेट के लिए काफ़ी दुख का विषय है. लगता है कि भारतीय पैसा लीग में पुराने क्रिकेटरों की कोई क़ीमत नहीं.

  • 39. 20:22 IST, 12 जनवरी 2011 sunil taneja:

    दादा तो भारत को सिर्फ़ 2003 के विश्व कप के फ़ाइनल में ले गए थे, लेकिन कपिल देव ने तो 1983 का विश्व कप जितवाया था. तो पंकज जी उन्हें क्यों न आईपीएल में शामिल कर लिया जाए? कृपया इतिहास की परतें खोलनी छोड़िए और हकीकत देखिए. गांगुली 20-20 क्रिकेट में बेहद मिसफ़िट खिलाड़ी हैं. एक तो मैच अभ्यास का अभाव, ऊपर से हमेशा की तरह बेकार फ़ील्डर. सौरभ गांगुली को सिर्फ़ भावनाओं के आधार पर ही केकेआर टीम में लिया जा सकता है, प्रदर्शन के आधार पर नहीं.

  • 40. 21:58 IST, 12 जनवरी 2011 करुण कुमार विद्यार्थी:

    दादा को अपनी टीम में लेना एक न एक नए विवाद को जन्म देना हो जाता है ऐसे में कोई भी टीम पैसे ख़र्च करके विवाद क्यों ले? राजनीति उनके लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है और पश्चिम बंगाल एक बढिया प्लेट्फ़ॉर्म.

  • 41. 22:22 IST, 12 जनवरी 2011 raj:

    लगता है आप आजकल क्रिकेट नहीं देखते हैं, कम से कम गांगुली का आईपीएल का रिकॉर्ड ही देख लेते ये लिखने से पहले तब शायद आप ये ग़लती नहीं करते.

  • 42. 03:57 IST, 13 जनवरी 2011 Uday Prakash:

    दादा आप महान खिलाड़ी हो. टेंशन नहीं लेने का. शर्म आनी चाहिए कोलकाता नाइट राइडर्स को.

  • 43. 09:16 IST, 13 जनवरी 2011 Sheo shankar Pandey:

    यह दादा के ख़िलाफ़ सरासर अन्याय है.

  • 44. 12:03 IST, 13 जनवरी 2011 shabih haider:

    दादा का मुक़ाबला किसी भी भारतीय खिलाड़ी से नहीं किया जा सकता, सचिन से भी नहीं क्योंकि सचिन भी कप्तान बनने पर कुछ भी नहीं कर सके. टीम अच्छे लीडरशिप से चलती है ना कि रनों का रिकॉर्ड बनाने से. सचिन महान हैं पर दादा की जगह कोई नहीं ले सकता. कपिल दा के बाद दादा दूसरे भारत के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं. दादा को चाहिए अपनी अलग एक टीम बनाकर आईपीएल में खेलें क्योंकि टीम अच्छी कप्तानी से जीतती है ना कि सिर्फ़ अच्छे प्लेयर से. क्योंकि 438 रन बनाने पर भी हार मिलती है.

  • 45. 12:59 IST, 13 जनवरी 2011 Tabassum Rizvi:

    दादा सच बोलते हैं इसलिए लोग घबराते हैं. शाहरुख़ ने दादा को धोखा दिया है. उनको चाहिए था कि दादा को सचिन की तरह पहले से आईपीएल-4 में केकेआर का कप्तान बना कर रखते. शाहरुख़ को गांगुली से माफ़ी मांगनी चाहिए और अपने ख़र्चे पर दादा को फ़ौरन टीम में लें.

  • 46. 14:34 IST, 13 जनवरी 2011 Ashiq:

    आपको दादा से इतनी क्यों सहानुभूति है. इस दादा ने शाहरुख़ को कंगाल कर दिया और अपना भाव बढ़ाकर बिकने की कोशिश की. अब दादा को आटे दाल का भाव पता चला है.

  • 47. 14:50 IST, 13 जनवरी 2011 Shailesh:

    मेरे हिसाब से आईपीएल में सौरभ गांगुली को न ख़रीद कर किसी टीम ने कोई गलती नहीं की है. रेस में कोई भी लगड़े घोटे पर पैसा नहीं लगाता है. आप भी जब आलू ख़रीदते हैं तो देखकर ख़रीदते हैं. जब आप पाँच रुपए की चीज भी देख परख कर ख़रीदते हैं तो दो करोड़ बहुत बड़ी रकम है. उमर के साथ सबको जाना होता है और पुरानी नींव पर ही नई इमारत खड़ी होती है.

  • 48. 15:04 IST, 13 जनवरी 2011 Nazish Rizvi:

    दादा के बगैर भारतीय क्रिकेट की कल्पना भी नहीं की जा सकती. जब द्रविड़, लक्ष्मण, सचिन जैसे खिलाड़ी जिनके औसत गांगुली से कम है, वो आईपीएल खेल सकते हैं तो दादा क्यों नहीं. शायद इसलिए कि यदि दादा ने नई बुलंदियों को छू लिया तो लोग उनके ख़िलाफ़ राजनीति कैसे कर पाएँगे. मैं तो आईपीएल के बहिष्कार के पक्ष में हूँ.

  • 49. 15:59 IST, 13 जनवरी 2011 Nazish Rizvi:

    भारत को विश्व क्रिकेट में दादा ने स्थापित किया. दादा ने केकेआर को भी स्थापित किया, अगर पोटिंग, शोएब जैसे खिलाड़ी नहीं खेल रहे थे तो वो टीम को कैसे जिता पाते. शाहरुख़ ने शोहरत और पैसे दादा की वजह से ही कमाए. उनके साथ ऐसा बर्ताव उचित नहीं है.

  • 50. 20:45 IST, 13 जनवरी 2011 jitendra nayak:

    मेरा मानना है कि सौरभ गांगुली की नीति ठीक नहीं थी और वो मेलमिलाप करके नहीं चले.

  • 51. 00:50 IST, 14 जनवरी 2011 Trinetra Singh - Egypt:

    हमें भारत के पूर्व महान कप्तान सौरभ गांगुली का समर्थन करने की ज़रूरत है, हमें आईपीएल-4 का बहिष्कार करने की ज़रूरत है. भारत के उद्योगपतियों में भारतीय क्रिकेट के प्रति आदर का भाव नहीं है. दादा को अगली नीलामी में एक टीम ख़रीदनी चाहिए और उसका नाम बंगाल टाइगर रखना चाहिए.

  • 52. 02:34 IST, 14 जनवरी 2011 prem raj:

    ये कहना जल्दबाजी होगा कि कौन ग़लत है लेकिन एक बात साफ़ है कि इस खेल में आपके रिकॉर्ड का कोई महत्व नहीं है. इसमें आपकी मौजूदा फॉर्म का महत्व है और बाज़ार आपसे क्या अपेक्षा करता है. गांगुली के लिए इस सत्य को स्वीकार करना मुश्किल है. केवल केकेआर पर आरोप लगाना उचित नहीं है क्योंकि वो भी अन्य टीमों की तरह पैसा बनाना चाहती है.

  • 53. 05:46 IST, 14 जनवरी 2011 Brijesh Nandani:

    अगर कोई लारा और गिलक्रिस्ट में रुचि नहीं ले रहा तो गांगुली कौन हैं. लोग इस मामले का बखेड़ा क्यों खड़ा कर रहे हैं.

  • 54. 09:24 IST, 14 जनवरी 2011 Kishor Kumar Nasery:

    ये तो होना ही था. आज नहीं तो कल आपको इस तथ्य को स्वीकार करना पड़ेगा कि बाज़ार में आपकी कोई क़ीमत नहीं.

  • 55. 11:30 IST, 14 जनवरी 2011 vipul nema:

    शाहरुख़ ख़ान को फ़िल्म और क्रिकेट में फ़र्क करना नहीं आता. हर दिन एक नया खेल होता है. ना तो कोई विलेन होता है ना कोई हीरो..इसलिए वे तीनों आईपीएल में हारे

  • 56. 11:43 IST, 14 जनवरी 2011 shabbir faizee:

    हमारे देश में सिर्फ़ और सिर्फ़ उगते हुए सूरज को सलाम किया जाता है. ये एक बात दादा समझ लें तो उन्हें मानसिक तनाव नहीं होगा.

  • 57. 14:33 IST, 14 जनवरी 2011 दिनेश कुमार यादव :

    भारतीय क्रिकेट में लगभग सभी महान खिलाड़ी राजनीति के शिकार हुए हैं अपवाद स्‍वरूप केवल गावस्‍कर हैं. दादा का लिमिटेड क्रिकेट में भी राजनीति का शिकार होना बड़ा ही दु:खद है,

  • 58. 23:45 IST, 14 जनवरी 2011 Rishi:

    सब चीज़ें एक जैसी नहीं रहती. हर चीज़ बदलती है और फिर उसकी वापसी भी होती है.

  • 59. 20:13 IST, 16 जनवरी 2011 NANDAN JHA BHAGALPUR BIHAR:

    भारतीय क्रिकेट को गांगुली का क्या योगदान है, ये शायद फटाफट क्रिकेट की रेलमपेल और रोज़ बनते नए रिकॉर्ड्स की कहानी में भुलाया जा रहा है.सारा खेल पैसे का है और शायद गांगुली इसमें फ़िट नहीं बैठते. आईपीएल क्रिकेट नहीं है, ये एक बाज़ार है और कबाड़ी मार्केट के अलावा कहीं भी पुरानी चीज़ें सोना नहीं होतीं.

  • 60. 14:24 IST, 17 जनवरी 2011 Ravi Yadav:

    आईपीएल में गांगुली का नहीं बिकना एक मुद्दा नहीं बनाना चाहिए. इस मुद्दे को लेकर आईपीएल को अपशब्द कहना ग़लत है. भाई, आईपीएल सिर्फ़ मनोरंजन करना चाहता है, खेल का भला और खिलाड़ियों की प्रतिभा निखारने के लिए टेस्ट और एक दिवसीय क्रिकेट काफ़ी है. ये एक तेज़ रफ़्तार मनोरंजन है. तीन घंटे की ऐक्शन फ़िल्म की तरह. उम्मीद है लोग इस बात को समझेंगे.

  • 61. 19:39 IST, 18 जनवरी 2011 Ashok Kaushik:

    यार ये तो हद हो गई... पता नहीं बाज़ार में बिकाऊ किसी चीज( आईपीएल के लिए सभी खिलाड़ी बिकाऊ माल ही हैं) के साथ मान-सम्मान और क्रिकेट में योगदान जैसे बड़े-बड़े शब्द क्यों जोड़े जा रहे हैं. वहां 10 दुकानदार बोलियां लगा रहे थे- एक राजनीति कर सकता- दो राजनीति कर सकते हैं- ये नहीं है कि वहां सब के सब अपने बिजनेस हितों को भूलकर किसी साज़िश के सूत्रधार बने हुए थे. अपने पैसे का सही इस्तेमाल करने का हक़ हर आदमी- हर बिजनेसमैन को है. क्रिकेट के सौदागर वहां किसी की इज्जत अफजाई के लिए नहीं जुटे थे- वहां वो माल खरीद रहे थे. जाहिर है दांव उसी पर लगेगा, जो ज्यादा बिकाऊ और टिकाऊ लगेगा. दाम के खेल में नाम की क्या औकात है. फिर चाहे वो गांगुली हों, लारा हों, जयसूर्या हों या क्रिस गेल हों. इस सीधी सी बात को समझने की बजाय पता नहीं क्यों बात का बतंगड़ बनाया जा रहा है. नीलामी में शामिल कोई भी खिलाड़ी क्रिकेट के भले के लिए चैरिटी शो नहीं कर रहा था, बल्कि सबके सब अपने जेब भरने की मंशा के साथ बाजार में उतरे थे. अब ये तो खरीददार की मर्जी है- उसे जो अच्छा लगेगा-उसे खरीदेगा- जो नहीं जमेगा, उस पर वो भला अपना पैसा क्यों बर्बाद करेगा. हैरत की बात ये है कि बाजार के इस गणित को खुद गांगुली भी अच्छी तरह समझते हैं. लेकिन क्रिकेट के तमाशे को जज्बात के चश्मे से देखने वाले लोगों को क्यों इतनी तकलीफ हो रही है. समझ नहीं आता, लोग क्यों छाती पीट रहे हैं.

  • 62. 16:23 IST, 19 जनवरी 2011 BPL-G:

    सौरभ गांगुली का ना बिकना कोई बड़ी बात नहीं. वो कोई भगवान नहीं हैं.

  • 63. 23:47 IST, 20 जनवरी 2011 santosh kumar pant:

    सौरभ महान खिलाड़ी हैं. आप उनकी किसी से तुलना नहीं कर सकते. दादा क्रिकेट की दौलत हैं.

  • 64. 12:15 IST, 23 जनवरी 2011 uttam:

    दादा सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी हैं. कोई भी भारतीय खिलाड़ी मैदान पर उनके जैसी आक्रामकता नहीं दिखा सकता.

  • 65. 14:57 IST, 24 जनवरी 2011 Gaurav(Munger,Bihar):

    मैं आपसे सहमत हूँ पंकज जी, लेकिन ये जीवन का एक हिस्सा है. कोई भी व्यक्ति पीछे मुड़कर नहीं देखता. सभी ये देखना चाहते हैं कि अभी क्या हो रहा है. इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि गांगुली ने पहले क्या किया, अभी वे अच्छा नहीं खेल रहे हैं. अगर वे अच्छा नहीं कर रहे तो नवोदित खिलाड़ियों को मौक़ा मिलना चाहिए.

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